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‘क्या मर्द भी हो सकते हैं प्रेग्नेंट?’: US में छिड़ी ‘Woke’ बहस, जानिए क्या कहता है विज्ञान

प्रकृति ने स्त्री और पुरुष के शरीर की बनावट अलग-अलग कामों के लिए की है। महिलाओं के शरीर में बच्चे दानी (गर्भाशय) और अंडाशय (Ovary) जैसे विशेष अंग होते हैं, जो पुरुषों के शरीर में नहीं पाए जाते। बच्चा पैदा करने के लिए इन अंगों का होना सबसे जरूरी है।

अमेरिका की सीनेट में गर्भपात (Abortion) दवाओं की सुरक्षा पर चल रही एक सुनवाई अचानक उस वक्त सुर्खियों में आ गई, जब रिपब्लिकन सीनेटर जोश हॉली ने भारतीय मूल की प्रसिद्ध स्त्री रोग विशेषज्ञ (गायनोकॉलोजिस्ट) डॉ निशा वर्मा से सीधा सवाल कर दिया, “क्या पुरुष प्रेग्नेंट हो सकते हैं?”। यह सवाल एक नहीं, बार-बार दोहराया गया। डॉक्टर ने सीधे ‘हाँ या ना’ में जवाब देने से इनकार किया और कहा कि वह अलग-अलग जेंडर पहचान वाले मरीजों का इलाज करती हैं।

इसी पल का वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल है। कोई इसे वोक पॉलिटिक्स बता रहा है, तो कोई इसे बायोलॉजिकल सच्चाई की अनदेखी कह रहा है। सवाल सीधा था, लेकिन उसके पीछे राजनीति, जेंडर आइडेंटिटी और मेडिकल साइंस की एक जटिल बहस छिपी हुई है।

मामला क्या था और बहस क्यों भड़की?

यह सुनवाई अमेरिकी सीनेट की हेल्थ, एजुकेशन, लेबर एंड पेंशन (HELP) कमेटी में हो रही थी। विषय था ‘महिलाओं की सुरक्षा और केमिकल अबॉर्शन ड्रग्स के खतरे’। ऑब्स्टेट्रिशियन-गायनेकोलॉजिस्ट डॉ निशा वर्मा ने गर्भपात (Abortion) की दवाओं का बचाव करते हुए कहा कि इन पर 100 से ज्यादा पीयर-रिव्यू रिसर्च हो चुकी हैं और साल 2000 से अब तक अमेरिका में 75 लाख से ज्यादा लोग इनका सुरक्षित इस्तेमाल कर चुके हैं।

यहीं से सीनेटर हॉली ने बहस का रुख बदल दिया। उन्होंने डॉक्टर से बार-बार पूछा, “क्या पुरुष प्रेग्नेंट हो सकते हैं? यह हाँ या ना का सवाल है।” सीनेटर हॉली का तर्क था कि अगर डॉक्टर बुनियादी बायोलोजिक सच्चाई भी स्वीकार नहीं कर रहीं, तो उनकी मेडिकल गवाही पर भरोसा कैसे किया जाए। वहीं डॉ वर्मा ने कहा कि ऐसे सवाल असल मुद्दे से ध्यान भटकाने और मरीजों की जटिल वास्तविकताओं को नजरअंदाज करने का तरीका हैं।

बायोलॉजी और हार्मोन: महिलाएँ ही क्यों गर्भवती हो सकती हैं?

प्रकृति ने स्त्री और पुरुष के शरीर की बनावट अलग-अलग कामों के लिए की है। महिलाओं के शरीर में बच्चे दानी (गर्भाशय) और अंडाशय (Ovary) जैसे विशेष अंग होते हैं, जो पुरुषों के शरीर में नहीं पाए जाते। बच्चा पैदा करने के लिए इन अंगों का होना सबसे जरूरी है। इसके साथ ही, महिलाओं के शरीर में कुछ खास हार्मोन (जैसे एस्ट्रोजन) होते हैं, जो बच्चे को पेट में पालने और उसे सुरक्षित रखने का काम करते हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, पुरुषों के शरीर में बच्चे दानी नहीं होती, इसलिए वहाँ भ्रूण (बच्चा) के ठहरने और बढ़ने के लिए कोई जगह नहीं है। बच्चे को जीवित रहने के लिए माँ के शरीर के भीतर जिस पोषण और सुरक्षा की जरूरत होती है, वह केवल महिलाओं के बच्चे दानी (गर्भाशय) में ही मिल सकती है। पुरुषों के शरीर में वह जैविक सिस्टम ही नहीं है जो नौ महीने तक बच्चे का बोझ उठा सके या उसे विकसित कर सके।

गर्भधारण (Pregnancy) के लिए शरीर में अंडे (Eggs) का बनना जरूरी है, जो केवल महिलाओं के अंडाशय (Ovary) में ही बनते हैं। पुरुषों के शरीर में मुख्य रूप से ‘टेस्टोस्टेरोन’ हार्मोन होता है, जो दाढ़ी-मूँछ और शारीरिक मजबूती के लिए होता है। उनके शरीर में वह हार्मोनल चक्र नहीं चलता, जो एक अंडे को विकसित करने और फिर उसे एक बच्चे का रूप देने के लिए जरूरी होता है। इसी कारण से, एक जैविक पुरुष प्राकृतिक रूप से कभी प्रेग्नेंट नहीं हो सकता।

ट्रांस-प्रेग्नेंसी का सच: जेंडर पुरुष का, लेकिन अंग महिला के

अक्सर जब हम खबरों में पढ़ते हैं कि ‘एक पुरुष ने बच्चे को जन्म दिया’, तो यह सुनकर हैरानी होती है। लेकिन चिकित्सा और विज्ञान की भाषा में इसका मतलब उन लोगों से होता है जिन्हें हम ट्रांसजेंडर पुरुष कहते हैं। इसे समझना बहुत आसान है। ये वे लोग होते हैं जिनका जन्म तो एक लड़की के रूप में हुआ था और उनके शरीर में जन्म से ही महिलाओं वाले अंग (जैसे बच्चा दानी और अंडाशय) मौजूद थे, लेकिन बड़े होने पर उन्होंने खुद को पुरुष के रूप में पहचान दी और पुरुषों की तरह रहना शुरू किया।

ऑब्सटेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी की रिपोर्ट बताती है कि वैज्ञानिक रूप से देखा जाए, तो सारा खेल शरीर के अंगों का है। बहुत से ट्रांसजेंडर पुरुष अपनी पहचान बदलने के लिए सर्जरी करवाते हैं या पुरुषों वाले हार्मोन (टेस्टोस्टेरोन) के इंजेक्शन लेते हैं, लेकिन वे अपने शरीर से बच्चा दानी (गर्भाशय) को बाहर नहीं निकलवाते। जब ऐसे लोग बच्चा पैदा करना चाहते हैं, तो वे कुछ समय के लिए हार्मोन लेना बंद कर देते हैं। ऐसा करने से उनका शरीर वापस उसी तरह काम करने लगता है जैसे एक महिला का शरीर करता है और वे प्राकृतिक रूप से गर्भवती हो सकते हैं। यानी भले ही वे दुनिया के सामने एक पुरुष की तरह रहते हों, लेकिन उनके शरीर के अंदर मौजूद ‘महिला अंग’ उन्हें माँ बनने (या तकनीकी रूप से पिता बनने) की शक्ति देते हैं।

इसका सबसे मशहूर उदाहरण थॉमस बीटी हैं, जिन्हें दुनिया का पहला ‘प्रेग्नेंट फादर’ कहा जाता है। द न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट बताती है कि थॉमस ने एक महिला के शरीर के साथ जन्म लिया था, लेकिन बाद में उन्होंने अपनी पहचान बदल ली और दाढ़ी-मूँछ वाले पुरुष बन गए। उनकी पत्नी बच्चा पैदा करने में असमर्थ थीं, इसलिए थॉमस ने फैसला किया कि वे खुद बच्चे को जन्म देंगे। चूँकि उन्होंने अपने बच्चे दानी को शरीर से अलग नहीं किया था, इसलिए वे गर्भवती हो सके और एक नहीं बल्कि तीन बच्चों को जन्म दिया। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि विज्ञान के हिसाब से थॉमस इसलिए प्रेग्नेंट हो सके क्योंकि उनके पास जन्मजात महिला अंग थे, किसी जैविक पुरुष (सिसजेंडर) के लिए ऐसा करना फिलहाल मुमकिन नहीं है।

द गार्जियन‘ की रिपोर्ट बताती है कि जेसन बार्कर एक ट्रांसजेंडर पुरुष हैं। इसका सरल मतलब यह है कि उनका जन्म एक लड़की के रूप में हुआ था, लेकिन बड़े होकर उन्होंने खुद को पुरुष के रूप में पहचाना और दाढ़ी-मूँछ वाले व्यक्ति बन गए। जेसन और उनकी पार्टनर ट्रेसी कई सालों से बच्चा चाहते थे, लेकिन ट्रेसी माँ नहीं बन पा रही थीं। तब जेसन ने एक साहसी फैसला लिया। चूंकि उन्होंने सर्जरी के बाद भी अपनी ‘बच्चा दानी’ (गर्भाशय) शरीर से नहीं हटवाई थी, इसलिए उन्होंने खुद बच्चे को जन्म देने का निर्णय किया।

जेसन ने पुरुषों वाले हार्मोन (टेस्टोस्टेरोन) लेना बंद कर दिया, जिससे उनका शरीर फिर से गर्भधारण के लिए तैयार हो गया। अपनी गर्भावस्था के दौरान, जेसन बाहर से एक दाढ़ी वाले ‘मोटे आदमी’ जैसे दिखते थे, इसलिए बस या दुकानों में किसी को अंदाजा ही नहीं होता था कि वे प्रेग्नेंट हैं। उन्होंने इस पूरे अनुभव पर एक फिल्म भी बनाई, जिसमें उन्होंने दिखाया कि कैसे एक पुरुष की पहचान रखते हुए भी उन्होंने माँ बनने का सुख पाया। आज उनका बेटा बड़ा हो चुका है और जेसन उसे एक पिता की तरह पाल रहे हैं।

यह उदाहरण साफ करता है कि ‘ट्रांस-प्रेग्नेंसी’ का मतलब किसी बायोलॉजिकल पुरुष का प्रेग्नेंट होना नहीं है, बल्कि उन लोगों का माँ बनना है जिनके पास जन्म से महिला अंग मौजूद थे। जेसन की कहानी दिखाती है कि भले ही समाज के लिए यह एक अजीब बात हो, लेकिन विज्ञान के लिए यह अंगों और हार्मोन का एक तालमेल है, जिसने एक पिता को अपनी संतान को जन्म देने की शक्ति दी।

कोख का ‘ट्रांसप्लांट’: क्या भविष्य में बायोलॉजिकल पुरुष भी दे पाएँगे बच्चे को जन्म?

नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन की रिपोर्ट बताती है कि विज्ञान आज इतनी तरक्की कर चुका है कि अब उन महिलाओं के लिए भी माँ बनना मुमकिन हो गया है, जिनके पास जन्म से गर्भाशय (बच्चा दानी) नहीं था या किसी बीमारी के कारण उसे हटाना पड़ा था। इसे ‘यूटरस ट्रांसप्लांट’ यानी गर्भाशय प्रत्यारोपण कहते हैं। इस तकनीक की सफलता के बाद अब दुनिया भर में यह चर्चा छिड़ गई है कि क्या भविष्य में यह तकनीक किसी बायोलॉजिकल पुरुष (सिसजेंडर पुरुष) के लिए भी काम कर सकती है? क्या सर्जरी के जरिए किसी पुरुष के शरीर में कोख लगाई जा सकती है? हालाँकि, सुनने में यह किसी चमत्कार जैसा लगता है, लेकिन विज्ञान के सामने इसके लिए बहुत बड़ी चुनौतियाँ खड़ी हैं।

पहली और सबसे बड़ी मुश्किल शरीर की बनावट यानी ‘पेल्विस’ (कूल्हे की हड्डी) के ढाँचे को लेकर है। कुदरत ने महिलाओं के कूल्हे की हड्डियों को चौड़ा और लचीला बनाया है, ताकि गर्भ में बच्चा बढ़ सके और जन्म के समय आसानी से बाहर आ सके। इसके उलट, पुरुषों के कूल्हे का ढाँचा संकरा (Narrow) और सख्त होता है। पुरुष के शरीर में न तो बढ़ते हुए बच्चे के लिए पर्याप्त जगह होती है और न ही वहाँ वैसी नसें मौजूद होती हैं, जो गर्भाशय को भारी मात्रा में खून की सप्लाई दे सकें। सिर्फ सर्जरी से बच्चा दानी फिट कर देने से काम नहीं चलेगा, बल्कि पूरे शरीर के आंतरिक ढाँचे को बदलना पड़ेगा, जो फिलहाल नामुमकिन जैसा है।

दूसरी बड़ी चुनौती हार्मोनल सिस्टम की है। एक महिला का शरीर गर्भावस्था के दौरान प्राकृतिक रूप से ढेरों हार्मोन पैदा करता है, जो बच्चे को नौ महीने तक जिंदा रखने के लिए जरूरी होते हैं। पुरुषों के शरीर में ये हार्मोन नहीं होते। अगर किसी पुरुष को प्रेग्नेंट करने की कोशिश की जाती है, तो उसे बाहर से भारी मात्रा में दवाओं और हार्मोन के इंजेक्शन देने पड़ेंगे। इतने ज़्यादा हार्मोन पुरुष शरीर के अंगों (जैसे लीवर और दिल) पर बुरा असर डाल सकते हैं और इसके नतीजे बहुत खतरनाक हो सकते हैं। यही वजह है कि आज तक दुनिया में ऐसा कोई भी मामला सामने नहीं आया है जहाँ किसी जैविक पुरुष ने बच्चे को जन्म दिया हो। यह तकनीक फिलहाल केवल महिलाओं के लिए ही एक वरदान साबित हुई है।

विज्ञान और विचारधारा का टकराव

अमेरिकी सीनेट में हुई यह बहस सिर्फ एक डॉक्टर और एक नेता की नोकझोंक नहीं है, बल्कि यह इस दौर की एक बड़ी वैचारिक जंग है। एक तरफ वह लोग हैं जो मानते हैं कि विज्ञान और शरीर की बनावट कभी नहीं बदलती, और दूसरी तरफ वे हैं जो मानते हैं कि इंसान की अपनी पसंद और पहचान सबसे ऊपर है। सीनेटर जोश हॉली जैसे लोगों का मानना है कि जो सच है उसे वैसे ही कहना चाहिए। उनका कहना है कि अगर कोई डॉक्टर यह बुनियादी बात मानने से ही इनकार कर दे कि केवल महिलाएँ ही गर्भवती हो सकती हैं, तो फिर उनकी डॉक्टरी और उनके ज्ञान पर भरोसा कैसे किया जा सकता है? उनके लिए यह भावनाओं का नहीं, बल्कि सीधे तौर पर विज्ञान का सवाल है।

दूसरी तरफ, डॉ निशा वर्मा और उनके जैसे विचार रखने वाले लोगों का तर्क अलग है। उनका कहना है कि आज के समय में इलाज करते वक्त हमें मरीज की भावनाओं और उसकी पसंद का ख्याल रखना चाहिए। वे ‘गर्भवती महिला’ की जगह ‘गर्भवती व्यक्ति’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना चाहते हैं, ताकि ट्रांसजेंडर लोगों को बुरा न लगे। लेकिन यहीं से विवाद शुरू होता है। आलोचकों का मानना है कि किसी को खुश करने या उनकी भावनाओं का सम्मान करने के चक्कर में हम उन वैज्ञानिक सच्चाइयों को नहीं झुठला सकते जिन्हें दुनिया सदियों से जानती है।

कुल मिलाकर, यह विवाद हमें एक बड़ी बात समझाता है। पुरुष और महिला के शरीर की अपनी-अपनी सीमाएँ और पहचान होती हैं, जो कुदरत ने तय की हैं। जब राजनीति और अलग-अलग विचारधाराएँ विज्ञान के काम में दखल देने लगती हैं, तो असली सच कहीं खो जाता है। यह बहस चेतावनी देती है कि समाज में सबको साथ लेकर चलना अच्छी बात है, लेकिन ऐसा करते समय हमें उन बुनियादी तथ्यों को नहीं भूलना चाहिए जो जीवन का आधार हैं। विज्ञान सबूतों पर चलता है, और सबूत यही कहते हैं कि कोख कुदरत ने सिर्फ महिला शरीर को ही दी है।

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