Saturday, July 20, 2024
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ढाह दी गई शत्रु संपत्ति काबुल हाउस: 40 साल से फर्जी दस्तावेजों के सहारे रह रहे थे कब्जेदार, पाकिस्तान से है कनेक्शन

देहरादून में शत्रु संपत्ति घोषित काबुल हाउस अब ध्वस्त। काबुल हाउस अफगानिस्तान के राजा याकूब खान का महल था। 1947 के बंटवारे के बाद उसके वशंज पाकिस्तान चले गए थे। इसके बाद कई लोगों ने फर्जी दस्तावेज तैयार कर इस पर कब्जा कर लिया था।

देहरादून के बीचों बीच ईस्ट कैनाल पर शत्रु संपत्ति घोषित ऐतिहासिक काबुल हाउस को जिला प्रशासन ने शनिवार (2 दिसंबर 2023) की सुबह ध्वस्त कर दिया। इसमें कई दशकों से साल 1947 के बंटवारे का बाद 17 परिवार रह रहे थे। दो दिन पहले ही इन परिवारों से ये जगह खाली करवा ली गई थी। मौजूदा वक्त में यह 400 करोड़ रुपए की संपत्ति है।

सरकार द्वारा काबुल हाउस को शत्रु संपत्ति घोषित होने के बाद इसके रखरखाव की जिम्मेदारी देहरादून जिला प्रशासन के जिम्मे थी। बताते चलें कि देहरादून प्रशासन की इस जगह को खाली कराने के लिए इन परिवारों के साथ 1984 से ही कानूनी लड़ाई चल रही थी। आखिरकार 40 साल बाद प्रशासन को इसमें कामयाबी मिल गई।

गौरतलब है कि अक्टूबर में ही जिला अदालत ने काबुल हाउस में रह रहे परिवारों को इस परिसर को खाली करने का आदेश दिया था। इसके बाद यहाँ रहने वाले परिवारों ने जिला अदालत के इस फैसले को नैनीताल हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

नैनीताल हाई कोर्ट ने काबुल हाउस के कब्जाधारियों को जगह छोड़ने के लिए 1 दिसंबर तक का वक्त दिया था। कोर्ट के आदेश के बाद देहरादून प्रशासन ने काबुल हाउस के घरों को आंशिक तौर से सील कर दिया था।

फोटो साभार: aajtak.in

1879 बना कॉबुल हाउस

दरअसल काबुल हाउस कभी अफगानिस्तान के राजा याकूब खान का महल हुआ करता था। इसे आज मंगला देवी कॉलेज कहते हैं। राजा को यहाँ से निर्वासित कर भेजा गया था। इसे याकूब खान ने 1879 में बनवाया था। 1947 के बंटवारे के बाद उसके वशंज पाकिस्तान चले गए। इसके बाद कई लोगों ने फर्जी दस्तावेज तैयार कर इस पर कब्जा कर लिया था। इसे खाली कराने को लेकर देहरादून प्रशासन 40 साल से कानूनी लड़ाई लड़ रहा था।

क्या है शत्रु संपत्ति

दरअसल शत्रु संपत्तियाँ उन लोगों से जुड़ी संपत्ति को कहा जाता है, जो लोग बंटवारे के दौरान और 1962 और 1965 के युद्ध के बाद भारत छोड़ने के बाद पाकिस्तान और चीन की नागरिकता ले चुके हैं। संसद ने मार्च 2017 में शत्रु संपत्ति (संशोधन और मान्यकरण) अधिनियम 2016 पारित किया था।

इसमें युद्ध के बाद पाकिस्तान और चीन चले गए लोगों की छोड़ी गई संपत्ति पर उत्तराधिकार के दावों को रोकने के प्रावधान किए गए थे। दरअसल दो देशों में युद्ध छिड़ने पर ‘शत्रु देश’ के नागरिकों की संपत्ति सरकार कब्जे में ले लेती है ताकि शत्रु युद्ध के दौरान उसका लाभ न उठा सके।

इसी के तहत भारत ने भी 1962 में चीन, 1965 और 1971 में पाकिस्तान से युद्ध छिड़ने पर भारत सुरक्षा अधिनियम के तहत इन देशों के नागिरकों की संपत्तियों पर कब्जा कर लिया था। इस संपत्ति के तहत ज़मीन, मकान, सोना, गहने, कंपनियों के शेयर और शत्रु देश के नागरिकों की किसी भी दूसरी अन्य तरह की संपत्ति को सरकार अपने अधिकार में ले सकती है।

सरकार के सामने ऐसे कई मामले आए थे, जब शत्रु संपत्ति का बेजा इस्तेमाल किया गया था। शत्रु संपत्ति को लेकर साल 2023 फरवरी में गृह मंत्रालय (एमएचए) के एक अधिकारी ने बयान जारी किया था, “भारत के शत्रु संपत्ति संरक्षक (सीईपीआई) ने शत्रु संपत्तियों का निपटान कर कुल 3,407.98 करोड़ रुपए कमाए हैं।”

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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