Tuesday, July 16, 2024
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दरगाहों में छिपता था, वहीं रखता था हथियारों का जखीरा: गुजरात से पकड़ा गया डॉन अब्दुल लतीफ गैंग का मो. हुसैन उर्फ टेंपो

टेंपो का संबंध अब्दुल लतीफ गैंग से रहा है। पूछताछ के दौरान उसने खुलासा किया कि उसने अहमदाबाद के ढोलका की एक दरगाह में और हथियार जमीन में दबा कर रखे थे। उस दरगाह से पुलिस ने 2 पिस्टल, 20 कारतूस और 2 मैगजीन बरामद की है।

अहमदाबाद क्राइम ब्रांच ने डॉन अब्दुल लतीफ गिरोह के सदस्य मोहम्मद हुसैन उर्फ ​​टेंपो और उसके सहयोगी को गिरफ्तार किया है। दोनों के पास से आठ पिस्टल और 62 कारतूस बरामद किए गए हैं। मोहम्मद हुसैन मुन्ना शेख उर्फ ​​टेंपो (50) अहमदाबाद के बेहरामपुरा का रहने वाला है और ड्राइवर सरफराज मोहम्मद पटेल उर्फ ​​शफी अमदावादी (35) सूरत का रहने वाला है। दोनों को भारी मात्रा में हथियार और गोला-बारूद के साथ गिरफ्तार किया गया है। दोनों दरगाहों में शरण लेते थे और वहीं पर हथियार छिपाते थे। बताया जा रहा है कि इनमें से कुछ हथियार बरामद किया गया है।

क्राइम ब्रांच के पीआई पीबी देसाई के दस्ते को गुप्त सूचना मिली थी कि मोहम्मद हुसैन उर्फ ​​टेंपो एक कार में अवैध हथियार लेकर जा रहा है। वह इन हथियारों को हाथीजन सर्कल से जशोदानगर चौराहे से नारोल की ओर जा रहा है। इसके बाद पुलिस सतर्क हो गई और आवाजाही पर नजर रखे हुए थी। उन्होंने हुसैन की कार रोकी तो उसके पास से 3 पिस्टल, 22 कारतूस और एक मैगजीन बरामद हुई।

जानकारी के मुताबिक टेंपो का संबंध अब्दुल लतीफ गैंग से रहा है। पूछताछ के दौरान उसने खुलासा किया कि उसने अहमदाबाद के ढोलका की एक दरगाह में और हथियार जमीन में दबा कर रखे थे। उस दरगाह से पुलिस ने 2 पिस्टल, 20 कारतूस और 2 मैगजीन बरामद की है।

पूछताछ के दौरान उसने खुलासा किया कि उसने उन लोगों को धमकाने के लिए हथियार खरीदे थे जिन्होंने जमीन खरीदी थी या अशरफपीर बावा की दरगाह पर निर्माण शुरू किया था। बता दें कि यहाँ उसका मजहबी उस्ताद रहता था। अपने उस्ताद की मौत के बाद, टेंपो दरगाह के ट्रस्टियों के खिलाफ अदालत में मुकदमा हार गया।

मोहम्मद हुसैन उर्फ टेंपो

टेंपो डॉन अब्दुल लतीफ गिरोह से जुड़ा था और 1986 से वह कई हत्याओं, जबरन वसूली और अपहरण के मामलों में शामिल रहा है। टेंपो ने सूरत की एक दरगाह में कथित तौर पर हथियार भी छिपाए थे। उसे 2012 में भी गिरफ्तार किया गया था और जुहापुरा के पास फतेहवाड़ी के कूड़ा बीनने वालों की झुग्गी बस्ती पर हमलों के पीछे सरगना के रूप में नामित किया गया था। बाद में अक्टूबर 2013 में उसे दो बंदूकों के साथ फिर से गिरफ्तार कर लिया गया। वह उस समय शहर के वटवा इलाके में हुई एक बड़ी चोरी में वांटेड था। 2010 में, उसे ‘माथाभारे’ (कुख्यात) नाम की एक गुजराती फिल्म का निर्माण किया और इसमें मुख्य भूमिका भी निभाई। हालाँकि, फिल्म सिनेमाघरों में नहीं आई।

जेल में रहकर चुनाव जीता डॉन अब्दुल लतीफ

खूँखार डॉन अब्दुल लतीफ एक खूँखार और खतरनाक अपराधी था जो 80 और 90 के दशक में अहमदाबाद में रहता था। वह विभिन्न आपराधिक गतिविधियों जैसे बूटलेगिंग, जबरन वसूली, अपहरण, हत्या में शामिल था। उसका जन्म अहमदाबाद के कालूपुर इलाके में 1951 में एक गरीब मुस्लिम परिवार में हुआ था। उसके अब्बू के सात बच्चे थे। उसे अच्छी परवरिश नहीं मिल सकी। वह जल्द ही अपने अब्बू की दुकान पर काम पर लग गया, जहाँ वह तम्बाकू बेचता था, लेकिन वह अधिक पैसे के लिए अपने पिता से लड़ने लगा। 2000 के बाद, उसने अपने रास्ते जाने का फैसला किया।

जल्दी पैसा कमाने के लिए, उसने आपराधिक रास्ता अपनाया और बूटलेगिंग शुरू कर दी। वह कुख्यात बूटलेगर अल्लाह रक्खा में शामिल हो गया, जो एक जुए का अड्डा भी चलाता था। लतीफ पहले जुआघर में काम करता था। फिर उसने अल्लाह रक्खा छोड़ दिया और एक प्रतिद्वंद्वी जुआरी संगठन में शामिल हो गया, लेकिन चोरी का आरोप लगने के बाद उससे भी अलग हो गया।

फिर वह खुद एक बूटलेगर बन गया और यहीं से अपराध, राजनीति और आतंकवाद की दुनिया में उसकी यात्रा शुरू हुई। एक बूटलेगर के रूप में, उसने तस्करों, अपराधियों, पुलिसकर्मियों और राजनेताओं के साथ संपर्क और संबंध बनाए, जिन्होंने इस अवैध व्यवसाय को फलने-फूलने में मदद की और अनुमति दी। उसने जल्द ही अपने नेटवर्क का विस्तार किया और जबरन वसूली, अपहरण और यहाँ तक ​​कि हत्या जैसे अन्य अपराधों में शामिल हो गया। उसने पाकिस्तान में संपर्क भी स्थापित कर लिया।

लतीफ का गिरोह केवल मुस्लिम सदस्यों से बना था। उसने गरीब मुसलमानों के बीच रॉबिनहुड जैसी छवि विकसित करने के लिए ऐसा किया और यह काम कर गया। लतीफ 1986-87 में अहमदाबाद के स्थानीय निकाय चुनावों में पाँच नगरपालिका वार्डों में जीत गया। उस समय वह जेल में था। हालाँकि बाद में उसे अयोग्य घोषित कर दिया गया था।

हालाँकि, मुस्लिम समुदाय पर अपने प्रभाव के कारण, वह जल्द ही मेनस्ट्रीम के राजनेताओं, विशेषकर कॉन्ग्रेस के करीब आने लगे। कॉन्ग्रेस पार्टी के साथ उसकी निकटता स्पष्ट थी क्योंकि उस समय गुजरात युवा कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष हसन लाला उसके बचपन के दोस्त थे। अगस्त 1992 में, अहमदाबाद में राधिका जिमखाना में 9 लोग मारे गए थे, इसमें एके-47 का इस्तेमाल किया गया था। लतीफ के गिरोह के सदस्य हंसराज त्रिवेदी को मारने के लिए वहाँ गए थे, लेकिन चूँकि उन्होंने उसे नहीं पहचाना, इसलिए उन्होंने सभी को मार डाला। सभी को मारने का आदेश लतीफ की ओर से आया था। आतंक के इस नग्न प्रदर्शन से शहर स्तब्ध था।

1992 के सांप्रदायिक दंगों के बाद लतीफ ने अयोध्या में विवादित ढाँचे (जिसे बाबरी मस्जिद कहा गया) को ध्वस्त करने का बदला लेने के लिए दाऊद इब्राहिम के साथ हाथ मिलाया था। लतीफ को कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के उत्पाद के रूप में भी देखा गया, जिसने ऐसे अपराधियों को छोटे राजनीतिक लाभ के लिए बढ़ने दिया।

1990 के दशक की शुरुआत में भाजपा ने लतीफ और उसकी आपराधिक गतिविधियों को चुनावी मुद्दा बनाया। 1995 में, भाजपा ने गुजरात में अपनी सरकार बनाई और उसी वर्ष बाद में लतीफ को गुजरात पुलिस के आतंकवाद विरोधी दस्ते के नेतृत्व में दो महीने के लंबे ऑपरेशन के बाद दिल्ली में गिरफ्तार किया गया। लतीफ को बाद में अहमदाबाद की साबरमती जेल में बंद कर दिया गया था और दो साल बाद, जब वह पुलिस हिरासत से भागने की कोशिश कर रहा था, तब वह एक मुठभेड़ में मारा गया था।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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