सोशल मीडिया से उपजी कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने शनिवार (6 जून 2026) को दिल्ली के जंतर-मंतर पर कुछ तिलचट्टों के साथ प्रदर्शन किया। इस प्रदर्शन का नेतृत्व करने के लिए CJP के संस्थापक और पूर्व AAP कार्यकर्ता अभिजीत दिपके अमेरिका से भारत पहुँचे थे।
सरकार से CBSE और NEET विवाद को लेकर जवाब माँगने के नाम पर आयोजित इस प्रदर्शन में कई ऐसे लोग भी शामिल हुए, जो खुद को निष्पक्ष बताने का ढोंग करते हैं लेकिन उनके राजनीतिक मकसद साफ नजर आ रहे थे। इसी दौरान प्रदर्शन स्थल पर मौजूद एक विदेशी महिला ने कई लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा।
अधिकांश प्रदर्शनकारियों के बीच सुनहरे बालों वाली इस महिला को देखकर सोशल मीडिया पर भी सवाल उठने लगे। एक सोशल मीडिया यूजर ने पूछा कि आखिर यह विदेशी महिला प्रदर्शन में क्या कर रही है, क्योंकि टूरिस्ट वीजा पर इस तरह की राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होने की अनुमति नहीं होती।
उसने दिल्ली पुलिस से कार्रवाई करने और उसका वीजा रद्द कर उसे देश से बाहर भेजने की माँग भी की। कुछ ही समय बाद उस महिला की पहचान सामने आ गई। वह महिला ब्रिटिश अखबार The Guardian की दक्षिण एशिया संवाददाता हन्ना एलिस-पीटरसन (Hannah Ellis-Petersen) थीं, जो इस प्रदर्शन को कवर करने के लिए वहाँ मौजूद थीं।
What is a foreigner doing at the protest? Tourist visa doesn’t allow any such activity & @DelhiPolice must immediately take action
— Sameer (@BesuraTaansane) June 6, 2026
Cancel her visa and deport her @MEAIndia pic.twitter.com/sKgcWbKOqV
कौन हैं हन्ना एलिस-पीटरसन? जानिए उनके बारे में सबकुछ
हन्ना एलिस-पीटर्सन का लव जिहाद के मामलों को कमतर करके दिखाने और कथित ‘ऑनर किलिंग’ के मामलों को इससे गलत तरीके से जोड़ने का इतिहास रहा है। जनवरी 2020 में जब देशभर में CAA विरोधी प्रदर्शन चल रहे थे, तब वह द गार्जियन के पाठकों के सामने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर भ्रम फैलाने में जुटी थीं।
अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से धार्मिक उत्पीड़न का शिकार होकर भारत में अवैध रूप से रह रहे अल्पसंख्यकों को तेजी से नागरिकता देने के कानून के उद्देश्य को बताने के बजाय, उन्होंने दावा किया कि इस मानवीय कानून के खिलाफ महिलाओं के प्रदर्शन, मोदी की हिंदुत्व राजनीति की कथित ‘टॉक्सिक मैस्कुलिनिटी’ के खिलाफ एक जवाबी कहानी है।

उन्होंने फरवरी 2020 में दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों के दौरान हुई हिंसा के लिए जिम्मेदार इस्लामी कट्टरपंथियों को भी क्लीन चिट देने की कोशिश की और हिंदू विरोधी हिंसा को केवल ‘हिंदुओं और मुसलमानों के बीच झड़प’ बताकर पेश किया।
हन्ना एलिस-पीटर्सन ने यह अफसोस भी जताया था कि इन दंगों का भारत-अमेरिका संबंधों पर कोई असर नहीं पड़ा और इसके बजाय अमेरिका के राष्ट्रपति ने भारत में धार्मिक स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए मोदी सरकार की प्रशंसा की।
इस ‘पत्रकार’ ने कर्नाटक के स्कूलों में बुर्का पहनने पर लगी पाबंदियों को दक्षिण भारत में ‘हिजाब बैन’ के रूप में पेश किया। उन्होंने यह भी दावा किया कि हिंदू मंदिरों के ऊपर बने विवादित ढाँचों को वापस हासिल करने की प्रक्रिया, ‘हिंदू राष्ट्रवादियों द्वारा भारत का इतिहास दोबारा लिखने’ की कोशिश है।

हन्ना एलिस-पीटर्सन ने द गार्जियन के लिए कई ऐसे लेख भी लिखे, जिनमें उन्होंने राम जन्मभूमि फैसले और राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा को लेकर हिंदुओं को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की। उन्होंने भव्य हिंदू मंदिर के स्थान पर पहले मौजूद विवादित ढाँचे का बार-बार उल्लेख कर इन घटनाओं के महत्व को कम करके दिखाने का भी प्रयास किया।
इसके अलावा इस प्रोपेगेंडा पत्रकार ने 2022 में इंग्लैंड के लीसेस्टर शहर में हुई हिंसा को ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ से जोड़ दिया, जबकि इसके समर्थन में कोई सबूत मौजूद नहीं था।
वास्तव में सेंटर फॉर डेमोक्रेसी, प्लूरलिज्म एंड ह्यूमन राइट्स (CDPHR) ने अपनी फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट में बताया था कि लीसेस्टर में इस्लामी कट्टरपंथियों ने गलत सूचनाओं को हथियार बनाया, हिंदुओं के मानवाधिकारों का उल्लंघन किया और जातीय सफाए की कोशिश की, जिसके चलते कई हिंदू परिवारों को अस्थायी रूप से अपना घर छोड़ना पड़ा।

रिपोर्ट में कहा गया था, “लीसेस्टर हिंसा को लेकर BBC और द गार्जियन की रिपोर्टिंग का जब सत्यापित पुलिस रिपोर्टों, प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों और विभिन्न थिंक टैंकों की पुष्ट रिपोर्टों से तुलना की गई, तो संस्थागत हिंदूफोबिया और पक्षपात स्पष्ट रूप से सामने आया।”
हन्ना एलिस-पीटर्सन का प्रोपेगेंडा केवल हिंदुओं को बदनाम करने या इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा हिंदुओं पर किए गए अत्याचारों को कम करके दिखाने तक सीमित नहीं रहा है। उन्होंने ऐसे लेख भी लिखे, जिनमें कुंभ मेले में भाग लेने वाले हिंदुओं को ‘कोविड सुपरस्प्रेडर’ बताया गया, जबकि उनके इस दावे के समर्थन में कोई ठोस सबूत मौजूद नहीं था।
Typical propagandist she is, far from journalism. She is writing hit job on you and few more. Eventually will publish in a series, whether you gove remarks or not. pic.twitter.com/GCBZMmuozg
— The Hawk Eye (@thehawkeyex) March 24, 2024
इस ‘पत्रकार’ ने कोविड-19 के वास्तविक सुपरस्प्रेडर माने जाने वाले तबलीगी जमात के सदस्यों को भी क्लीन चिट देने की कोशिश की थी। जबकि एक समय ऐसा था जब देश में सामने आए कुल कोरोना मामलों में लगभग 30 प्रतिशत मामले तबलीगी जमात से जुड़े पाए गए थे।
Here’s an important — sensitive, powerful, and moving — truth-telling podcast by The Guardian’s South Asia Correspondent, Hannah Ellis-Petersen. Caution: Listeners may find this distressing: “India’s Covid disaster: a crisis for the world”: https://t.co/tlQRsIHilW
— N. Ram (@nramind) April 27, 2021
इसके बावजूद 2021 में भारत की कोविड-19 स्थिति को लेकर उनकी निराशाजनक रिपोर्टिंग और डर का माहौल बनाने वाली प्रस्तुतियों की प्रशंसा ‘पत्रकार’ से ‘दस्तावेज काट-छाँट करने वाले’ बने एन राम ने की थी, जो राफेल सौदे को लेकर भ्रामक जानकारी फैलाने के आरोपों के कारण चर्चित रहे हैं।
मार्च 2024 में ऑपइंडिया ने हिंदू कार्यकर्ता काजल हिंदुस्तानी के खिलाफ हन्ना एलिस-पीटरसन की कथित हिट-जॉब की कोशिश को विफल कर दिया था। इसके एक महीने बाद उन्होंने एक विवादित लेख का सह-लेखन किया, जिसका शीर्षक था- ‘भारतीय सरकार ने पाकिस्तान में हत्याओं का आदेश दिया, खुफिया अधिकारियों का दावा।’
लेख की शुरुआत में ही पाकिस्तान के आतंकवादियों को केवल ‘व्यक्तियों’ के रूप में बताया गया, जिनकी कथित तौर पर भारतीय सरकार द्वारा हत्या करवाई गई थी।
इस रिपोर्ट में मुख्य रूप से गुमनाम स्रोतों, खासकर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों से जुड़े सूत्रों के दावों का सहारा लिया गया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘सीमा पार हत्याओं’ को बढ़ावा देने वाले नेता के रूप में पेश करने की कोशिश की गई। हालाँकि द गार्जियन ने अनजाने में उन्हें बाहरी खतरों से भारत की सुरक्षा करने वाले नेता के रूप में भी स्वीकार कर लिया।

दिलचस्प बात यह है कि हन्ना एलिस-पीटरसन ने ऑपइंडिया की एडिटर-इन-चीफ नूपुर जे शर्मा द्वारा दिए गए लाइवस्ट्रीम बहस के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। हालाँकि वह एक ऐसी डॉक्यूमेंट्री का हिस्सा जरूर बनीं, जिस पर हिंदुओं और भारत के बारे में भ्रामक जानकारी फैलाने का आरोप लगाया गया था।
(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है, मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)


