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सूअर बनेंगे इंसान, आसमान से बरसेंगे पत्थर… लड़कियों का सोशल मीडिया चलाना भी ‘इस्लाम विरोधी’: औरत विरोधी फतवों में केरलम के मौलाना ने जोड़ा नया अध्याय

आज के समय में जब महिलाएँ किसी भी समाज की प्रगति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं तो ऐसे में उन्हें केवल घर या सीमित सामाजिक दायरे तक बाँध देना निजी स्वतंत्रता से आगे बढ़कर पूरे समाज के विकास को बाधित करने की कोशिश बन जाती है।

केरलम के मौलाना अब्दुल हमीद फैजी अम्बालाकादावु के महिलाओं के खिलाफ दिए गए विवादित ‘फतवे’ को लेकर बड़ा बवाल शुरू हो गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, मौलाना समस्त युवजन संघम (SYS) से जुड़े हुए हैं जो समस्त केरल जम-इय्यतुल उलेमा के अधीन एक युवा संगठन है।

मौलाना अब्दुल हमीद फैजी ने आधुनिक समाज में मुस्लिम महिलाओं की भूमिका को लेकर बेहद सख्त टिप्पणी की है। उन्होंने महिलाओं के सार्वजनिक जीवन में भागीदारी, जैसे नौकरी करना, रिसेप्शनिस्ट बनना, एंकरिंग करना, स्टेज पर प्रदर्शन करना, सोशल मीडिया पर सक्रिय रहना और गैर-महरम पुरुषों से बातचीत या हाथ मिलाने जैसी गतिविधियों को इस्लामी शिक्षाओं के खिलाफ बताया है।

अब्दुल हमीद फैजी ने क्या कहा?

यह विवाद मौलाना अब्दुल हमीद फैजी के एक फेसबुक पोस्ट के बाद शुरू हुआ। यह पोस्ट उनके फेसबुक अकाउंट पर 10 मई 2026 को शेयर किया गया था जिस पर लगातार विवाद छिड़ा हुआ है।

मौलवी अब्दुल हमीद ने अपने पोस्ट में लिखा, “‘लोगों को जमीन निगल जाएगी, इंसानों को बंदरों, सूअरों और दूसरी शक्लों में बदल दिया जाएगा और आसमान से पत्थरों की बारिश होगी…’ जब प्रोफेट मोहम्मद ने अपने साथियों से भविष्य में होने वाली इन बातों के बारे में बताया तो वहाँ मौजूद एक व्यक्ति ने पूछा:- ‘ऐ अल्लाह के रसूल, यह सब कब होगा’? इस पर नबी ने कहा:- ‘जब गाने वाली औरतें, संगीत के उपकरण, मंचीय कार्यक्रम आम हो जाएँगे और शराब पीना हर जगह फैल जाएगा’।”

इसके आगे अब्दुल हमीद ने महिलाओं की आलोचना करते हुए लिखा, “आज हमारी शादियों में गाने-बजाने के कार्यक्रम होते हैं। शादी समारोहों में हमारा स्वागत करने के लिए महिलाएँ हाथ जोड़कर खड़ी रहती हैं। गरीब लोगों की किडनी बदलवाने के लिए फंड जुटाने हेतु ‘इशल नाइट’ जैसे कार्यक्रम किए जाते हैं। रिसेप्शनिस्ट बनने के लिए सुंदर किशोर लड़कियों की जरूरत होती है। एंकरिंग के लिए भी महिलाओं की जरूरत पड़ती है।”

उन्होंने आगे लिखा, “स्कूल स्तर से ही हमारी लड़कियों को गाना सिखाया जाता है और उन्हें इसके लिए प्रोत्साहन दिया जाता है। हमारी बेटियाँ यूट्यूब और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर हर जगह दिखाई देती हैं। धार्मिक मंचों पर भी मुस्लिम महिलाएँ गैर-महरम पुरुषों को संबोधित करके भाषण देती हैं। हमारी महिलाओं को गैर-महरम पुरुषों से हाथ मिलाने और उन्हें गले लगाने में भी शर्म महसूस नहीं होती!”

मौलवी ने 50 साल पहले का जिक्र करते हुे कहा, “50 साल पहले, अगर पर्दा नहीं होता था तो महिलाएँ चलते समय हाथ में छाता रखती थीं, और जैसे ही कोई गैर-महरम पुरुष सामने आता था, वे छाते से अपना चेहरा ढक लेती थीं और इस्लाम के हिजाब के नियमों का पालन करती थीं। वही पीढ़ी आज इतने बड़े बदलाव का शिकार हो गई है। इस मामले में धार्मिक प्रमाणों को अपने तरीके से पेश करने वाले मुजाहिद और जमात समूहों की भी बड़ी भूमिका रही है।”

क्या कह रहे हैं आलोचक?

आलोचकों का कहना है कि मौलाना द्वारा महिलाओं की सार्वजनिक भूमिका को लेकर दी गई राय एक ऐसी सोच को दर्शाते हैं जिसे साफ तौर पर महिला विरोधी और सामाजिक रूप से उन्हें पिछड़ा मानने व पीछे ले जाने की कोशिश है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या मजहबी व्याख्याओं के नाम पर महिलाओं की स्वतंत्रता और उनके अधिकारों को सीमित किया जा सकता है।

जब महिलाओं के शिक्षा प्राप्त करने, नौकरी करने, सार्वजनिक मंचों पर बोलने, कला और मीडिया में भाग लेने जैसी सामान्य और आधुनिक भूमिकाओं को गलत या अस्वीकार्य बताया जाता है तो यह सीधे तौर पर उनके मौलिक अधिकारों पर ही सवाल उठाना है। आज के समय में जब महिलाएँ किसी भी समाज की प्रगति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं तो ऐसे में उन्हें केवल घर या सीमित सामाजिक दायरे तक बाँध देना निजी स्वतंत्रता से आगे बढ़कर पूरे समाज के विकास को बाधित करने की कोशिश बन जाती है।

आलोचकों का यह भी मानना है कि इस तरह के विचार समाज को आगे ले जाने के बजाय पीछे की ओर धकेलते हैं। इतिहास और आधुनिक विकास दोनों यह दिखाते हैं कि जिन समाजों ने महिलाओं को शिक्षा, रोजगार और नेतृत्व के अवसर दिए हैं तो वे अधिक प्रगतिशील और आर्थिक रूप से मजबूत बने हैं। इसके उल्ट जहाँ महिलाओं को सीमित दायरे में रखा गया, वहाँ सामाजिक विकास की गति धीमी रही है। इसलिए, महिलाओं की भागीदारी को सीमित करने वाली सोच केवल व्यक्तिगत नहीं रह जाती है।

आलोचकों का मानना है कि ऐसे बयान एक व्यापक रूढ़िवादी प्रवृत्ति का हिस्सा हैं जो आधुनिक सामाजिक बदलावों को स्वीकार करने के बजाय उन्हें रोकने या सीमित करने की कोशिश करती है। आलोचकों का कहना है कि मजहब और समाज के बीच संतुलन जरूरी है लेकिन अगर किसी व्याख्या के कारण आधी आबादी यानी महिलाओं के अधिकारों पर असर पड़ता है, तो उस पर फिर से विचार किए जाने की आवश्यकता है।

महिला विरोधी फतवों का लंबा इतिहास

हालाँकि, यह कोई पहली बार नहीं है जब महिलाओं के खिलाफ इस तरह का फतवा दिया गया हो। महिला के शरीर, पहचान, पेशा और सार्वजनिक भागीदारी पर नियंत्रण की कोशिश एक सुनियोजित पैटर्न रही है। इसके पीछे हर बाद इस्लाम और परंपराओं को हवाला दिया जाता रहा है।

ससुर ने किया रेप- अब शौहर को मानो ‘बेटा’

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर की मुस्लिम महिला इमराना के साथ उसके ससुर अली मोहम्मद ने बलात्कार किया। इसके बाद पंचायत ने फैसला दिया था कि शरिया कानून के तहत वह शौहर के साथ नहीं रह सकती और शौहर को ‘बेटा’ मानना होगा। दारुल उलूम ने फतवा किया कि इमराना का निकाह उसके पति नूर इलाही से ‘बातिल’ हो गया है। बाद में सामाजिक संगठनों ने आवाज उठाई, केस दर्ज हुआ और ससुर को 10 साल की सजा सुनाई गई।

सानिया मिर्जा को स्कर्ट पहनकर टेनिस खेलने से रोकने का फरमान

सुन्नी उलेमा बोर्ड के मौलाना हसीब-उल-हसन सिद्दीकी ने टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्जा के खिलाफ 2005 में फतवा जारी किया था। मौलाना का कहना था कि सानिया की ड्रेस ‘इस्लाम-विरोधी’ है। उन्हें ईरानी महिला बैडमिंटन खिलाड़ियों की तरह लंबी टुनिक और हिजाब पहनकर खेलने को कहा गया था।

जमीयत-ए-उलेमा-ए-हिंद ने धमकी दी कि न मानने पर खेलने से रोका जाएगा। सानिया ने फतवा नकार दिया और खेल जारी रखा।

महिलाओं और पुरुषों का एकसाथ काम करना हराम

मई 2010 में दारुल उलूम देवबंद के उलेमाओं ने फतवा जारी किया कि सरकारी दफ्तरों और कार्यस्थलों पर महिलाएँ और पुरुष एक साथ काम नहीं कर सकते, जब तक कि महिलाएँ पूरी तरह इस्लामी लिबास में ना हों। इस फतवे को महिलाओं के रोजगार और आर्थिक स्वतंत्रता पर सीधे हमले के रूप में देखा गया और बड़े पैमाने पर आलोचना हुई।

महिलाओं की फोटो खींचना और खिंचवाना हराम

2013 में देवबंद के रेक्टर ने फोटोग्राफी को ‘गैर-इस्लामी’ करार दिया। महिलाओं की फोटो खींचना, खिंचवाना सब पर रोक लगा दी गई। हालाँकि, इसमें चालाकी दिखाते हुए इसे केवल पहचान पत्र और पासपोर्ट के लिए जरूरी बताया गया। दारुल उलूम देवबंद के मोहतमिम मुफ्ती अब्दुल कासिम नोमानी ने कहा, “फोटोग्राफी करना इस्लाम विरोधी है।” इस फतवे को सोशल मीडिया युग में महिलाओं की हर तरह की डिजिटल पहचान मिटाने की कोशिश बताया गया।

भौंहें बनाना, बाल कटाना और ब्यूटी पार्लर जाना हराम

दारुल इफ्ता के प्रमुख मौलाना एल. सादिक कासमी ने अक्टूबर 2017 में एक फतवा जारी किया कि मुस्लिम महिलाओं के लिए भौंहें बनाना, बाल कटाना और ब्यूटी पार्लर जाना सख्त मना है। मौलाना कासमी ने कहा कि बाल महिला की खूबसूरती हैं और इन्हें कभी नहीं काटना चाहिए। वहीं, मेकअप को भी ‘दूसरे मर्दों को आकर्षित करने’ का जरिया बताकर हराम घोषित किया।

जींस, टाइट सलवार और डिजाइनर बुर्का पहनना हराम

दारुल उलूम देवबंद की इफ्ता समिति ने टाइट सलवार, जींस, स्कर्ट और डिजाइनर बुर्के को हराम घोषित किया। इफ्ता समिति की तरफ से कहा गया, “पैगंबर ने कहा है कि मुस्लिम महिलाओं को बाहरी दुनिया से बचाओ। जरूरत ना हो तो घर से मत निकलो।”

वहीं, तंजीम अब्नाए दारुल उलूम के मुफ्ती याद इलाही ने इस मामले में कहा कि पश्चिमी संस्कृति ने भारत को बरबाद किया है।

महिलाओं का फुटबॉल मैच देखना हराम

जनवरी 2018 में दारुल उलूम देवबंद के मुफ्ती अतहर कासमी ने फतवा दिया कि महिलाओं के लिए पुरुषों का फुटबॉल मैच देखना हराम है क्योंकि खिलाड़ी हाफ-पैंट पहनते हैं।

तीन तलाक के खिलाफ बोली तो किया ‘इस्लाम से बाहर’

बरेली की महिला अधिकार कार्यकर्ता निदा खान ने तीन तलाक का विरोध किया और पति के अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाई थी। इससे मौलाना परेशान हो गए और 2018 में इसके जवाब में बरेली जामा मस्जिद के इमाम ने उनके खिलाफ फतवा जारी कर उन्हें इस्लाम से बाहर करने की घोषणा की। निदा ने इसकी आलोचना करते हुए कहा था कि कोई उन्हें इस्लाम से बाहर नहीं कर सकता है।

गैर मर्द से मेंहदी लगवाना हराम

2018 में दारुल उलूम देवबंद ने एक फतवा जारी किया था जिसमें कहा गया कि मुस्लिम महिलाओं का किसी अंजान पुरुष से मेहंदी लगवाना इस्लाम के अनुसार उचित नहीं है। संस्था के अनुसार, मेहंदी लगवाने के लिए किसी गैर-परिचित पुरुष को अपना हाथ देना गैर-इस्लामिक माना जाता है। साथ ही यह भी कहा गया कि इससे महिलाओं की सामाजिक छवि पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है, इसलिए मुस्लिम महिलाओं को ऐसी स्थितियों से बचना चाहिए।

सिंदूर-बिंदी लगाने के खिलाफ फतवा

ऑल इंडिया मुस्लिम जमात (AIMJ) के अध्यक्ष मौलाना शाहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने 2023 में एक फतवा जारी कर कहा कि गैर-मुस्लिम युवकों से शादी के बाद ‘सिंदूर’, ‘कलावा’ और ‘बिंदी’ लगाने वाली मुस्लिम महिलाएँ इस्लाम के सिद्धांतों के खिलाफ जा रही हैं। फतवे में यहाँ तक कहा गया कि अगर ऐसा चलता रहा तो उन्हें समुदाय से बहिष्कृत कर दिया जाएगा।

औरतों का मेले में जाने इस्लाम के खिलाफ

जमीयत दावतुल मुस्लिमीन के संरक्षक और देवबंद के उलेमा मौलाना कारी इसहाक गोरा ने कहा कि मुस्लिम महिलाओं को मेलों में जाने से बचना चाहिए क्योंकि यह इस्लामी शिक्षाओं के अनुरूप नहीं है। उनका कहना है कि मेलों में देर रात तक महिलाओं का घूमना-फिरना उनकी सुरक्षा और सम्मान के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि आजकल मेलों में बड़ी संख्या में मुस्लिम युवा शामिल होते हैं और देर रात तक वहाँ मौजूद रहते हैं जो चिंताजनक और अनुचित है। इसहाक गोरा के अनुसार, ऐसी गतिविधियों का नई पीढ़ी के संस्कारों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

क्या है फतवा और इसकी कानूनी वैधता?

‘फतवा’ एक अरबी शब्द है। इसका मतलब होता है किसी मजहबी सवाल पर इस्लामी विद्वान (मौलाना या मुफ्ती) द्वारा दी गई राय या व्याख्या। यह किसी व्यक्ति या समुदाय को यह बताने की कोशिश होती है कि किसी विशेष स्थिति में मजहबी दृष्टि से क्या सही माना जाता है और क्या गलत। लेकिन यह समझना जरूरी है कि फतवा कोई कानूनी आदेश नहीं होता। यह सिर्फ एक मजहबी राय होती है। इसका मतलब यह है कि किसी भी व्यक्ति को फतवा मानने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

भारत के संविधान में फतवा को किसी भी तरह की कानूनी मान्यता नहीं दी गई है। इसका कोई कानूनी बल (legal force) नहीं होता। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी 2014 में यह स्पष्ट किया था कि फतवे किसी भी नागरिक पर लागू नहीं किए जा सकते। यानी कोई भी व्यक्ति केवल फतवे के आधार पर किसी को बाध्य नहीं कर सकता या उसके अधिकारों को सीमित नहीं कर सकता।

इसके बावजूद, कई बार फतवे समाज में एक तरह का दबाव बना देते हैं। कुछ जगहों पर लोग इन्हें मजहबी डर या सामाजिक बहिष्कार के कारण गंभीरता से लेते हैं। इस वजह से कई बार लोगों पर मानसिक दबाव, सामाजिक अलगाव या आलोचना जैसी स्थिति बन जाती है।

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शिव
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