देशभर में भारी आक्रोश पैदा करने वाले 2018 के अट्टापडी मॉब लिंचिंग मामले में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। केरल हाई कोर्ट ने सोमवार को इस मामले के आरोपित नंबर 1 हुसैन को ही बरी कर दिया है। यह मामला मधु नाम के एक मानसिक रूप से कमजोर जनजातीय युवक (ST Youth) की हत्या से जुड़ा है, जिस पर खाने-पीने का सामान चुराने के संदेह में भीड़ ने बेरहमी से हमला किया था।
यह फैसला जस्टिस राजा विजयराघवन वी. और जस्टिस के.वी. जयकुमार की खंडपीठ ने दोषियों, राज्य सरकार और मधु की माँ मल्ली द्वारा दायर अपीलों पर सुनवाई करते हुए सुनाया।
हाई कोर्ट ने आरोपित नंबर 4 अनीश और आरोपी नंबर 11 अब्दुल करीम को बरी किए जाने के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। हालाँकि अदालत ने मरक्कर, शम्सुद्दीन, राधाकृष्णन, अबू बकर, सिद्दीक, उबैद, नजीब, जयजुमोन, सजीव, सतीश, हरीश और बीजू की सजा को बरकरार रखा है।
अदालत ने आपराधिक दायित्व के दायरे को बढ़ाते हुए दोषियों को आईपीसी की धाराओं (जिसमें 304 पार्ट II, 326, 367, 323, 324, 342, 143, 147 और 149 शामिल हैं) के अलावा, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(2)(v) और 3(2)(va) के तहत भी दोषी ठहराया। आरोपित नंबर 16 मुनीर जिसे पहले केवल आईपीसी की धारा 352 के तहत दोषी ठहराया गया था, उसे भी एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(2)(va) के साथ पठित आईपीसी की धारा 323 के तहत दोषी पाया गया।
इस मामले का विस्तृत फैसला आना अभी बाकी है। इस मामले को बाद में बदली हुई सजा पर सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया था।
केरल हाई कोर्ट के सामने हुसैन के पक्ष की दलील
हुसैन ने अपनी सजा को इस आधार पर चुनौती दी थी कि वह उस समूह का हिस्सा नहीं था जो शुरू में जंगल के इलाके में गया था और मधु को मुक्कली लेकर आया था, जहाँ उसके साथ मारपीट की गई थी।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, हुसैन बाद में भीड़ में शामिल हो गया था और उसने मधु की छाती पर लात मारी थी, जिससे उसका सिर दीवार से टकरा गया था। मेडिकल साक्ष्यों से संकेत मिला था कि इन चोटों के कारण पीड़ित की मौत हुई थी।
हालाँकि उसकी कानूनी टीम ने दलील दी कि ऐसा कोई सबूत नहीं है जो मधु के प्रति किसी पुरानी दुश्मनी को दिखाता हो या उसके गैरकानूनी रूप से इकट्ठा हुई भीड़ से जुड़े होने का कोई कारण बताता हो। बचाव पक्ष ने इस बात पर भी जोर दिया था कि निचली अदालत ने उसे एससी/एसटी एक्ट के प्रावधानों के तहत दोषी नहीं पाया था।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला 22 फरवरी 2018 का है, जब केरल के पलक्कड़ जिले के अट्टापडी के रहने वाले 27 वर्षीय ST युवक मधु की एक इस्लामी भीड़ ने स्थानीय दुकान से चावल सहित खाने-पीने का सामान चुराने के संदेह में पीट-पीटकर हत्या कर दी थी।
मानसिक रूप से कमजोर मधु अपने परिवार से बहुत कम संपर्क रखता था, अट्टापडी में जंगल के इलाकों और उसके आसपास रहता था। जाँचकर्ताओं के अनुसार, वह जंगल के इलाके के पास छुपा हुआ मिला था, जहाँ स्थानीय लोगों के एक समूह ने उसे पकड़ लिया, उसके साथ गंभीर मारपीट की और फिर उसे पुलिस के हवाले कर दिया।
अभियोजन पक्ष ने बताया कि मधु को सिर पर चोट, पसलियों में फ्रैक्चर और आंतरिक रक्तस्राव सहित गंभीर चोटें आई थीं। बाद में अस्पताल ले जाते समय वह गिर गया और उसने दम तोड़ दिया।
इस घटना के बाद घटनास्थल की तस्वीरें ऑनलाइन सामने आने पर देश भर में भारी गुस्सा देखा गया था। जनता की तीखी आलोचना का कारण बनने वाली तस्वीरों में एक ऐसी तस्वीर भी थी, जिसमें मधु साफ तौर पर घायल और परेशान दिख रहा था, जबकि उबैद नाम का एक व्यक्ति उसके पास खड़ा होकर सेल्फी ले रहा था।
पुलिस ने बाद में मुक्कली थोडियिल उबैद उम्मर को गिरफ्तार कर लिया और मामले में उसे आरोपितों में नामजद किया। उस पर आईपीसी, एससी/एसटी एक्ट और घटना की तस्वीरें व वीडियो प्रसारित करने से जुड़े सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) कानूनों के प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया गया था।
उस समय की रिपोर्टों में कुछ आरोपितों के कथित राजनीतिक संबंधों पर भी सवाल उठाए गए थे। ऐसे आरोप सामने आए थे कि उबैद के संबंध इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग से थे। हालाँकि तत्कालीन विधायक एन. शम्सुद्दीन ने किसी भी औपचारिक संबंध से इनकार किया था और कहा था कि उबैद ने केवल चुनाव से जुड़ी गतिविधियों में भाग लिया था।
मुकदमे में देरी और अभियोजन पक्ष को लेकर आरोप
इसके बाद मुकदमे की कार्यवाही के दौरान बार-बार देरी देखी गई, जिससे पीड़ित के परिवार और कार्यकर्ताओं ने इसकी आलोचना की।
जनवरी 2022 में, एससी/एसटी एक्ट के तहत मन्नारकाड की विशेष अदालत ने कथित तौर पर मधु का प्रतिनिधित्व करने के लिए नियुक्त विशेष लोक अभियोजक (स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर) के बार-बार अनुपस्थित रहने पर सवाल उठाए थे। अभियोजक के कई मौकों पर पेश न होने के बाद अदालत ने पहले भी सुनवाई टाल दी थी।
अगस्त 2019 में विशेष अभियोजक नियुक्त किए गए एडवोकेट वी.टी. रघुनाथ कथित तौर पर कार्यवाही के दौरान अदालत के सामने पेश नहीं हुए और बाद में चिकित्सा कारणों का हवाला देते हुए इस्तीफा दे दिया।
अभियोजकों की बार-बार अनुपस्थिति के कारण मुकदमे की कार्यवाही में देरी हुई। मधु के परिवार ने आरोप लगाया कि न्याय की प्रक्रिया को जानबूझकर धीमा किया जा रहा था। मधु की माँ मल्ली ने इस देरी पर सार्वजनिक रूप से अपनी निराशा व्यक्त करते हुए कहा था कि उनके बेटे की मौत को कई साल बीत चुके हैं, जबकि मुकदमा आगे बढ़ने के लिए संघर्ष कर रहा है।
घटना के बाद गठित विशेष जाँच दल (एसआईटी) ने मई 2018 में लगभग 3,500 पन्नों की चार्जशीट तैयार की थी, जिसमें 16 आरोपितों के नाम थे। हत्या के प्रावधानों और एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत आरोपों का सामना करने के बावजूद कार्यवाही के दौरान सभी आरोपितों को जमानत मिल गई थी।
मामले में स्थायी अभियोजक की नियुक्ति में देरी को लेकर भी आलोचकों द्वारा सवाल उठाए गए थे। इस रिपोर्ट के बाद राजनीतिक विवाद सामने आया कि आरोपियों में से एक शम्सुद्दीन को सितंबर 2021 में सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) का शाखा सचिव चुना गया था, हालाँकि विरोध के बाद कथित तौर पर यह फैसला वापस ले लिया गया था।
आरोपितों पर लगाई गई थी कौन सी धाराएँ?
मधु के हत्यारों पर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के कई प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया गया था, जो गैरकानूनी रूप से इकट्ठा होने से लेकर हत्या तक के अपराधों से जुड़े थे। इनमें धारा 143 (गैरकानूनी जनसमूह), धारा 147 (बलवा), धारा 148 (घातक हथियार से लैस होकर बलवा करना), धारा 323 (स्वेच्छा से चोट पहुँचाना), धारा 324 (खतरनाक हथियारों से चोट पहुँचाना), धारा 326 (गंभीर चोट पहुँचाना), धारा 342 (गलत तरीके से बंधक बनाना), धारा 352 (हमला), धारा 364 (हत्या के इरादे से अपहरण या अगवा करना), धारा 367 (गंभीर चोट पहुँचाने के लिए अपहरण करना), धारा 368 (अपहृत व्यक्ति को गलत तरीके से छिपाकर रखना) और धारा 302 के साथ पठित धारा 149 शामिल थी, जो एक सामान्य उद्देश्य के साथ गैरकानूनी जनसमूह द्वारा की गई हत्या से संबंधित है।
आरोपितों पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के प्रावधानों के तहत भी मामला दर्ज किया गया था, जिसमें धारा 3(1)(d), 3(1)(r), 3(1)(s), 3(2)(v) और 3(2)(va) शामिल हैं, जो अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों के खिलाफ किए गए अपराधों से संबंधित हैं, जिसमें सामाजिक पहचान के आधार पर किए गए अपराधों के लिए अपमान, भेदभाव और सख्त सजा का प्रावधान है।
‘दलित-मुस्लिम एकता’ का नरेटिव हुआ ध्वस्त
मधु मॉब लिंचिंग मामले ने एक बार फिर उस बहुप्रचारित ‘जय भीम-जय मीम‘ के ढाँचे की कमजोरी को भी उजागर कर दिया है, जिसे वाम-उदारवादी इकोसिस्टम के कुछ हिस्सों द्वारा एक स्वाभाविक सामाजिक और राजनीतिक गठबंधन के रूप में पेश किया जाता रहा है।
सालों से इस फर्जी नरेटिव का इस्तेमाल दलितों और मुसलमानों के बीच एक स्वाभाविक साझेदारी के रूप में प्रचारित किया गया है, जिसका बड़ा राजनीतिक उद्देश्य अक्सर हिंदू चुनावी एकजुटता के खिलाफ एक मजबूत विकल्प तैयार करना होता है। हालाँकि जमीन पर होने वाली घटनाएँ अक्सर टेलीविजन स्टूडियो और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर तैयार किए गए आदर्श नैरेटिव की तुलना में अधिक जटिल दिखाई देती हैं।
महज खाने-पीने का सामान चुराने के आरोपित एक कमजोर ST युवक मधु की बेरहमी से की गई हत्या उन लोगों के लिए असहज करने वाले सवाल खड़े करती है जो इस तरह के गठबंधनों की वकालत करते रहे हैं। यदि इस एकजुटता को एक राजनीतिक रणनीति के बजाय एक जीवंत सामाजिक वास्तविकता के रूप में पेश किया जाता है, तो इस तरह की घटनाओं को समझाना मुश्किल हो जाता है। मुद्दा केवल आरोपित व्यक्तियों की पहचान का नहीं है; बल्कि यह है कि क्या राजनीतिक नारे वास्तव में जमीनी सामाजिक सच्चाइयों और स्थानीय तनावों पर काबू पा सकते हैं।
यह आलोचना इसलिए भी अधिक तीखी हो जाती है क्योंकि मधु का मामला कोई अकेला मामला नहीं है। अतीत में दलित पीड़ितों और इस्लामी अपराधियों से जुड़ी कई घटनाएँ इस धारणा को उजागर करती हैं कि ‘दलित-मुस्लिम एकता’ जमीनी सामाजिक वास्तविकताओं के प्रतिबिंब के बजाय वामपंथी हलकों में गूँजने वाले एक राजनीतिक नारे के रूप में अधिक काम करती है।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)


