Monday, May 25, 2020
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सेना को रेपिस्ट बताना, शरजील के लिए नारेबाजी, बलात्कारियों का समर्थन: TISS में फैलता वामपंथी ज़हर

टीआईएसएस के अन्य कई छात्र संगठन भी हैं, जो केंद्र सरकार की आलोचना में लगे रहते हैं। वो दुष्प्रचार फैलाते हैं। निर्भया के बलात्कारियों की फाँसी की सज़ा माफ़ करवाने के लिए राष्ट्रपति को पत्र लिखते हैं। उन्होंने बलात्कारी दरिंदों की फाँसी माफ़ कराने के लिए हस्ताक्षर अभियान भी चलाया।

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अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
चम्पारण से. हमेशा राइट. भारतीय इतिहास, राजनीति और संस्कृति की समझ. बीआईटी मेसरा से कंप्यूटर साइंस में स्नातक.

‘टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज’ (TISS) देश के प्रतिष्ठित संस्थानों में से एक है। अब यहाँ भी वामपंथी मीडिया का ज़हर फ़ैल रहा है। ऐसा एक साज़िश के तहत किया जा रहा है, जिसमें चंद लोग शामिल हैं। भले ही इसमें मुट्ठी भर लोग शामिल हों, इसके दुष्प्रभाव पूरे संस्थान और उसके छात्रों व प्रोफेसरों पर पड़ता है। वामपंथी गतिविधियों से हो सकता है कुछ लोगों को दिक्कत नहीं हो लेकिन अगर किसी शैक्षिक संस्थान के कैम्पस में देश-विरोधी गतिविधियों को साजिशन अंजाम दिया जाए, तो ये छात्रों के भविष्य के लिए और अंततः देश के भविष्य के लिए अच्छा नहीं है।

ऑपइंडिया को टीआईएसएस के कुछ छात्रों ने इस बारे में बताया। छात्रों से बातचीत के दौरान कई बातें पता चलीं, जिन्हें हम आपके सामने रख रहे हैं। हमें सारी सूचनाएँ वहाँ के छात्रों से ही मिली है, जो कैम्पस में मौजूद हैं। छात्रों का तो यहाँ तक कहना है कि देश-विरोधी गतिविधियों की बात करें तो टीआईएसएस इस मामले में जेएनयू से भी आगे जा चुका है। सीएए विरोध के नाम पर यहाँ प्रदर्शन हुए लेकिन ये तो पूरी साज़िश की एक कड़ी भर थी। असली उद्देश्य तो कुछ और ही है।

भाजपा के विरोध के चक्कर में देश के ‘टुकड़े-टुकड़े’ की बात करना और फिर हिंदुत्व को गाली देना वामपंथियों का पेशा है। यहाँ हम सबूतों के साथ आपको बताएँगे कि कैसे टीआईएसएस के कैम्पस में ये खेल चल रहा है। सबसे पहले वामपंथियों का निशाना तो भाजपा होती है। भाजपा के साथ एबीवीपी को गालियाँ दी जाती हैं और फिर आरएसएस को निशाने पर लिया जाता है, जो राजनीतिक संगठन भी नहीं है। प्रोफेसर क्लास लेते वक्त इनकी आलोचना करते हैं और छात्रों के मन में इन संगठनों के ख़िलाफ़ ज़हर भरते हैं।

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आरएसएस-भाजपा-एबीवीपी को गाली देना कैम्पस में एक ट्रेंड सा बन गया है और हर मुद्दे को इससे जोड़ कर देखा जाता है। उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार को बदनाम करने के लिए पूरा जोर लगाया जाता है। एक पोस्टर में आरोप लगाया गया कि यूपी में पुलिस ने 18 लोगों को मार डाला है, जिनमें एक 8 साल का बच्चा भी शामिल है। झूठे आरोप लगाए गए कि यूपी पुलिस मुस्लिमों के घर में घुस कर उन्हें पीट रही है, उनकी संपत्ति को नुकसान पहुँचा रही है और युवाओं को जेल में बंद कर रही है। इसे ‘उत्तर प्रदेश में आपातकाल’ बताते हुए पेश किया गया।

यूपी में आपातकाल की बात कही गई, झूठे आरोप लगाए गए

ये सब आज से नहीं हो रहा बल्कि काफ़ी पहले से ऐसी गतिविधियाँ शुरू कर दी गई थीं। इसके सबूत हम आपको ‘टीआईएसएस क्वीर कलेक्टिव’ नामक व्हाट्सप्प ग्रुप के स्क्रीनशॉट्स से दे रहे हैं, जिनमें देश व सेना के प्रति कई आपत्तिजनक बातें कही गई हैं। पुलवामा में हुए आतंकी हमले में 40 सीआरपीएफ जवान वीरगति को प्राप्त हो गए थे। उपर्युक्त व्हाट्सप्प ग्रुप में एक व्यक्ति ने मैसेज कर के लिखा कि इन्हीं जवानों ने राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर हज़ारों निर्दोष नागरिकों की हत्या की है और कइयों का बलात्कार किया है। उक्त व्यक्ति ने एक तरह से जवानों के बलिदान की खिल्ली उड़ाते हुए हँसने की बात कही।

पुलवामा हमले के बाद व्हाट्सप्प ग्रुप में भारतीय सेना का अपमान

साथ ही भारत की सुरक्षा एजेंसियों व जवानों को सरकार समर्थित हिंसा फ़ैलाने वाला भी बताया गया। इस ग्रुप में सभी लोग एक-दूसरे से बातें करते हुए केवल सेना और देश की खिल्ली उड़ा रहे थे। एक व्यक्ति ‘नो टू ऑल आर्मी मेन’ लिख कर सेना का मजाक बनाता है। साथ ही उसने हँसने वाले इमोट्स भी दिए। एक अन्य व्यक्ति ने सेना को हिंसक और शक्तिशाली संगठन बताया। पुलवामा के बलिदानियों के बारे में कहा गया कि वो बलात्कार और हत्या में शामिल नहीं थे इस बात पर विश्वास करना कठिन है। साथ ही लिखा गया कि ऐसा न करने पर भी वो दोषी हैं क्योंकि सभी हत्यारी संस्था से जुड़े हैं।

उस व्यक्ति ने एक क़दम और आगे बढ़ते हुए लिखा कि सेना का हर एक जीवित और मृत जवान जम्मू कश्मीर और उत्तर-पूर्व भारत में हुई हिंसा के लिए जिम्मेदार हैं। उसने कहा कि जब तक दोषियों को सामने नहीं लाया जाता, एक-एक जवान इसके लिए जिम्मेदार है। जब हुतात्मा जवानों को श्रद्धांजलि देने की बात किसी ने की तो एक व्यक्ति ने व्हाट्सप्प ग्रुप में ‘लोल’ लिख कर मैसेज किया।

सेना के हर जवान को हिंसक और अत्याचारी बताया गया
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इन सबका अर्थ है कि कैम्पस में वामपंथी लगातार ज़हर फैलाने, सेना व देश को गाली देने और दूसरे छात्रों की भावनाओं का अपमान करने में लगे हुए हैं। हॉस्टल के दरवाजों पर ‘MUCK FODI’ लिखा मिलेगा। इसका इशारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर अश्लील और आपत्तिजनक टिप्पणी की ओर था।

पीएम मोदी पर की गई अश्लील आपत्तिजनक टिप्पणी

इसी तरह ‘गेटवे ऑफ इंडिया’ पर एक विरोध प्रदर्शन आयोजित किया गया, जिसमें सीएए, एनआरसी और एनपीआर के ख़िलाफ़ ज़हर उगला गया। गेटवे ऑफ इंडिया को शाहीन बाग़ बनाने के लिए लोगों को सलाह दी गई कि वो रोज़मर्रा को वस्तुएँ लेकर आएँ। मुंबई में भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच खेले गए मैच में टीआईएसएस के छात्रों ने अन्य प्रदर्शनकारियों के साथ मिल कर सीएए और एनआरसी का विरोध किया। सोशल मीडिया पर स्वरा भास्कर ने इस हरकत का समर्थन करते हुए ताली बजाई।

इसके पीछे एक बड़ा कारण टीआईएसएस छात्र संगठन का रवैया भी है, जो जेएनयूएसयू से कम नहीं है। टीआईएसएस के छात्र संगठन ने एक विज्ञप्ति जारी कर जेएनयू में 5 जनवरी को हुई हिंसा के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराया। छात्र संगठन ने लिखा कि जेएनयू में एबीवीपी और आरएसएस के ‘गुंडों’ ने छात्रों को पीटा और अध्यक्ष आईसी घोष की भी पिटाई हुई। उलटा चोर कोतवाल को डाँटे की तर्ज पर एबीवीपी को हिंसा का जिम्मेदार बताया और कहा गया कि केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस और जेएनयू प्रशासन ने मिल कर छात्रों व प्रोफेसरों की पिटाई की गई है।

टीआईएसएस छात्र संगठन ने आरोप लगाया कि जो भी छात्र केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रहे हैं, उन्हें भाजपा हिंसा के जरिए चुप करा रही है। आरोप लगाया गया कि 70 दिनों तक जेएनयू के छात्रों ने फी बढ़ाए जाने के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया और इसीलिए सरकार ने अंत में हिंसा का सहारा लिया। छात्र संगठन ने सभी कॉलेजों के कैम्पस में छात्रों को सीएए और एनआरसी के ख़िलाफ़ एकजुट होने व जेएनयू के छात्रों के प्रति मज़बूरी से खड़े रहने की सलाह दी गई।

टीआईएसएस छात्र संगठन ने जेएनयू के वामपंथियों का किया था समर्थन
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जब अगस्त 2019 में केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त कर जम्मू कश्मीर के विकास के लिए अभूतपूर्व क़दम उठाया, तब टीआईएसएस छात्र संगठन ने इसे वहाँ के जनता के प्रति क्रूरता और भेदभाव भरा फ़ैसला करार दिया था। इस निर्णय को अलोकतांत्रित और असंवैधानिक बताया गया। इस बिल को यूएपीए और तीन तलाक़ से जुड़े क़ानून से जोड़ कर देखा गया। टीआईएसएस छात्र संगठन का कहना था कि अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त करना जम्मू कश्मीर के लोगों के साथ धोखा है।

अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने से भड़का TISS छात्र संगठन

टीआईएसएस के अन्य कई छात्र संगठन भी हैं, जो केंद्र सरकार की आलोचना में लगे रहते हैं। वो दुष्प्रचार फैलाते हैं। निर्भया के बलात्कारियों की फाँसी की सज़ा माफ़ करवाने के लिए राष्ट्रपति को पत्र लिखते हैं। उन्होंने बलात्कारी दरिंदों की फाँसी माफ़ कराने के लिए हस्ताक्षर अभियान भी चलाया। नीचे संलग्न किए गए वीडियो में आप देख सकते हैं कि ‘शरजील तेरे सपनों को, हम मंजिल तक पहुँचाएँगे’ के नारे लग रहे हैं।

भारत के ‘टुकड़े-टुकड़े’करने की बात करने वाला शरजील के समर्थन में नारे

उसी शरजील इमाम का समर्थन किया जा रहा है, जो राजद्रोह के आरोप में कार्रवाई का सामना कर रहा है। वो फ़िलहाल तिहाड़ में बंद है। उसने महात्मा गाँधी को सबसे बड़ा फासिस्ट नेता बताया था। उसने पूरे नॉर्थ-ईस्ट को शेष भारत से अलग करने के लिए मुसलमानों को भड़काया था।

इसके अलावा ‘एबीवीपी की कब्र खुदेगी’ जैसे भड़काऊ नारे भी लगाए गए। नीचे संलग्न किए गए वीडियो में आप टीआईएसएस के वामपंथी छात्रों की इस हरकत को देख सकते हैं:

एबीवीपी को लेकर लगाए गए आपत्तिजनक नारे

टीआईएसएस के कुछ छात्रों ने ऑपइंडिया को बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गाली देना वहाँ हॉस्टल में रह रहे छात्रों का पसंददीदा हरकत है। कैम्पस में राजनीतिक गतिविधियों की अनुमति नहीं है लेकिन फिर भी वामपंथी गुट ने पर्चे बाँटे और अपना संगठन ज्वाइन करने के लिए छात्रों को उकसाया। टीआईएसएस के छात्रों ने गेटवे ऑफ मुंबई पर विरोध प्रदर्शन बिना किसी आधिकारिक अनुमति के आयोजित किया। जेएनयू में जब वामपंथी गुंडों ने सर्वर रूम में तोड़फोड़ मचाई, तब टीआईएसएस के वामपंथियों ने उलटा गुंडों का ही समर्थन किया और एबीवीपी पर आरोप मढ़ा।

इस घटना के अगले ही दिन जेएनयू छात्र संगठन के पूर्व अध्यक्ष एन साई बालाजी टीआईएसएस पहुँच गया। इससे पता चलता है कि सबकुछ एक साजिश के तहत योजना बना आकर किया जा रहा था। हालाँकि, बालाजी को कैम्पस के भीतर नहीं आने दिया गया लेकिन उसने कैम्पस के गेट के बाहर ही छात्रों को सम्बोधित किया और भड़काया। ये लोग चेम्बूर के आंबेडकर गार्डन में दिल्ली के शाहीन बाग़ की तर्ज पर विरोध प्रदर्शन शुरू करना चाहते थे ताकि अंतरराष्ट्रीय मीडिया का अटेंशन मिले।

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