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मुजफ्फरनगर दंगों में 13 साल बाद हिंदुओं को मिला न्याय, सबूत के अभाव में 37 बरी: जानें कैसे अखिलेश सरकार में ‘पीड़ित’ मुस्लिम को मिलते रहे मुआवजे

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में 2013 के सांप्रदायिक दंगों में हिंदू परिवारों को आखिरकार न्याय मिल गया है। अदालत ने कुटबा गाँव के मामले में 37 आरोपितों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। इनमें से 8 की पहले ही मौत हो चुकी थी।

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में 2013 के सांप्रदायिक दंगों के एक बड़े मामले में आखिरकार हिंदू परिवारों को न्याय मिल गया है। कोर्ट ने कुटबा गाँव के मामले में 37 आरोपितों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। ये वे हिंदू युवक और परिवार थे जो 13 साल से जेल-कोर्ट का चक्कर काट रहे थे।

अखिलेश यादव की सरकार के समय इन बेगुनाहों पर झूठे मुकदमे ठोप दिए गए थे, जबकि केवल मुस्लिम पीड़ितों को मुआवजा देने का फैसला लिया गया था। सुप्रीम कोर्ट तक इस पक्षपात पर भड़क गया था। आज योगी सरकार में इन हिंदू परिवारों की सांस में सांस आई है।

मुजफ्फरनगर के कुटबा में गई थी 8 मुस्लिमों की जान

बता दें कि 8 सितंबर 2013 को मुजफ्फरनगर के शाहपुर थाना क्षेत्र के कुटबा गाँव में दंगे की आग भड़की थी। एक मुस्लिम परिवार के सदस्य इमरान ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई कि सैकड़ों लोगों की भीड़ ने सांप्रदायिक नारे लगाते हुए मुस्लिम घरों पर हमला कर दिया। राइफल, तमंचे, तलवार और धारदार हथियारों से फायरिंग हुई, घरों में आग लगाई गई, लूटपाट हुई और 8 मुस्लिमों की मौत हो गई।

मरने वालों में वहीद, शमशाद, इरशाद, तराबूद्दीन, कय्यूम, फैय्याज, मौमीन और एक महिला खातून शामिल थीं। इमरान ने कुल 110 लोगों पर FIR दर्ज कराई थी। बाद में विशेष जाँच दल (SIT) ने 36 आरोपितों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की।

अब 13 साल बाद मिला हिंदुओं को न्याय, 8 की पहले ही हो चुकी है मौत

उस घटना के 13 साल बाद अब मंगलवार (24 फरवरी 2026) को अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश (POCSO कोर्ट नंबर 1) मंजुला भालोटिया की अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष यानी पुलिस और सरकार आरोपितों के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं पेश कर सकी। गवाहों के बयान बदल गए, साक्ष्य कमजोर थे। इसलिए 37 आरोपितों को दोषमुक्त कर दिया गया। इनमें से 8 आरोपितों की पहले ही मौत हो चुकी थी।

बरी होने वालों के नाम हैं- कुंवरपाल, योगेंद्र उर्फ जोगेंद्र, मनोज, गुल्लू, सोनू, भालू, नीरज, लव कुमार, शौकी, बुरेश, प्रदीप, कालू, पप्पू, नीटू, पप्पू पुत्र ब्रह्मपाल, गुड्डू, नरेन्द्र, जितेन्द्र, भीम, राम सिंह, देस्सा, छोटू, जूली, दीपक, कल्लू उर्फ मदन, सोमपाल, नरेन्द्र, खजान, विकास, टुल्ली उर्फ कल्लू, धीरज, पिंटू उर्फ बिंदू, मनोज, राहुल, बिजेन्द्र और अन्य। ये सभी कुटबा गाँव के निवासी हैं।

इस फैसले के बाद हिंदू परिवारों में खुशी की लहर दौड़ गई। आरोपितों के परिजनों ने कहा कि 13 साल तक ये बेगुनाह जेल में सड़े, कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटते रहे। खेती-किसानी बर्बाद हो गई, बच्चे पढ़ाई छोड़ बैठे, परिवार टूट गए।

एक आरोपित के भाई ने बताया, “हमारे भाई-भतीजे निर्दोष थे। दंगे में दोनों तरफ से नुकसान हुआ, लेकिन अखिलेश सरकार ने केवल एक तरफ को पीड़ित मानकर मुआवजा दिया। हिंदुओं का सब कुछ लुट गया, लेकिन कोई सहायता नहीं मिली।”

अखिलेश राज में कैसे सुलगा था पूरा मुजफ्फर नगर?

साल 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश को हिला गए थे। 27 अगस्त को कवाल गाँव में एक छोटी सी घटना से आग भड़की। जाट परिवार की एक लड़की के साथ छेड़छाड़ का आरोप लगने के बाद दो जाट भाइयों सच्चिन और गौरव की हत्या हो गई। फिर बदले में मुस्लिम युवक शाहनवाज की हत्या हुई। इसके बाद 7 सितंबर को महापंचायत हुई, जिसमें भावुक भाषण दिए गए। 8 सितंबर को हिंसा पूरे जिले में फैल गई। कुल 62 लोग मारे गए, जिनमें 42 मुस्लिम और 20 हिंदू थे। 50 हजार से ज्यादा लोग बेघर हो गए, ज्यादातर मुस्लिम परिवार राहत शिविरों में पहुंचे।

बुरी तरह विफल साबित हुई थी अखिलेश सरकार

अखिलेश यादव की सरकार पर दंगों को रोकने में लापरवाही का आरोप लगा। सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2014 में सख्त टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि अखिलेश सरकार ने दंगों को रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए। सभी आरोपितों की गिरफ्तारी हो, चाहे वे किसी भी पार्टी के हों। कोर्ट ने मुआवजे पर भी फटकार लगाई। अक्टूबर 2013 में अखिलेश सरकार ने सिर्फ मुस्लिम परिवारों को 5 लाख रुपए मुआवजा देने का नोटिफिकेशन जारी किया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “सबको मुआवजा मिलना चाहिए, किसी एक समुदाय को नहीं।” बाद में सरकार ने मृतकों के परिजनों को 15 लाख रुपये देने का फैसला किया, लेकिन हिंदू परिवारों का कहना था कि उन्हें देर से और कम मदद मिली। कई हिंदू परिवारों ने आरोप लगाया कि उनके घर लूटे गए, फसलें बर्बाद हुईं, लेकिन मुआवजा नहीं मिला।

योगी आदित्यनाथ सरकार आने के बाद कानून-व्यवस्था मजबूत हुई। पुराने दंगों के कई मुकदमों की सुनवाई तेज हुई। इस कुटबा मामले में भी कोर्ट ने सबूतों की कमी देखते हुए फैसला सुनाया। बचाव पक्ष के वकील अजय सहरावत ने कहा, “13 साल बाद सच्चाई सामने आई। अभियोजन पक्ष कुछ नहीं साबित कर सका। आरोपित निर्दोष थे।” सरकार के वकील नरेंद्र शर्मा ने भी कोर्ट में माना कि सबूत कमजोर थे।

इस फैसले का असर पूरे मुजफ्फरनगर पर पड़ा है। दंगे के समय के कई अन्य मामले भी इसी तरह बरी हो रहे हैं। 2026 में ही मोहम्मदपुर रायसिंह गाँव के 23 आरोपितों को भी बरी किया गया था। कुल मिलाकर 2013 के दंगों में 1100 से ज्यादा आरोपित बरी हो चुके हैं, सिर्फ मुट्ठी भर को सजा हुई है। हिंदू संगठनों का कहना है कि अखिलेश सरकार ने दंगों को राजनीतिक फायदा उठाने के लिए इस्तेमाल किया। महापंचायत में शामिल नेताओं पर भी बाद में मुकदमे हुए, लेकिन कई वापस ले लिए गए।

अब विकास पर ध्यान दे रही योगी सरकार, जख्म भर रहे हैं

कुटबा गाँव आज भी शांत है, लेकिन पुराने घाव अभी भी ताजे हैं। हिंदू परिवार कहते हैं कि 13 साल की लड़ाई के बाद न्याय मिला। अब वे खेती पर ध्यान देंगे, बच्चों की पढ़ाई पूरी करेंगे। मुस्लिम परिवारों ने भी कहा कि दंगे दोनों तरफ के लिए अभिशाप थे। अब शांति बनाए रखनी चाहिए।

योगी सरकार ने दंगों के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विकास पर जोर दिया। नए सड़क, स्कूल, अस्पताल बने। कानून का राज कायम हुआ, जिससे ऐसे पुराने मामले जल्दी निपट रहे हैं। जिला प्रशासन का कहना है कि कोर्ट का फैसला मान्य है। दोनों समुदायों को शांति बनाए रखनी चाहिए।

लोग बोले- योगी सरकार में मिला न्याय

यह फैसला सिर्फ कुटबा का नहीं, पूरे हिंदू समाज के लिए राहत है। जो परिवार बेगुनाह साबित हुए, वे अब सिर ऊँचा करके जी सकेंगे। अखिलेश के समय जो अन्याय हुआ, योगी के समय उसका सुधार हो रहा है। मुजफ्फरनगर के इतिहास में यह एक नया अध्याय है, जहां सच्चाई आखिरकार जीत गई।

दंगों के बाद कई परिवार बिखर गए थे। हिंदू युवक जेल में बंद थे, उनकी माँएँ-बहनें कोर्ट के बाहर रोती रहीं। कुछ आरोपितों की उम्र निकल गई, शादी-ब्याह रुक गए। अब वे कहते हैं, “भगवान का शुक्र है, योगी जी की सरकार में न्याय मिला।” पीड़ित मुस्लिम परिवारों को भी सहानुभूति है, लेकिन दोनों तरफ के निर्दोषों को न्याय चाहिए।

कुल मिलाकर यह फैसला दिखाता है कि न्याय की राह चाहे कितनी लंबी हो, सही समय पर पहुँच ही जाती है। योगी सरकार में उत्तर प्रदेश में ऐसा माहौल बना है जहाँ कोई भी बेगुनाह नहीं सताया जाता। मुजफ्फरनगर के इस मामले ने एक बार फिर साबित कर दिया कि साक्ष्यों के बिना कोई सजा नहीं हो सकती। हिंदू परिवार अब राहत की सांस ले रहे हैं।

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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