पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाल-ही में अपनी पॉलिसी में बदलाव दिखाया है। वह वक्फ संशोधन कानून (Waqf Amendment Act) और वोटर लिस्ट पुनरीक्षण (SIR) जैसे संवेदनशील मसलों पर नरम रुख अपना रही हैं।
यह नरमी केवल विचारधारा या प्रशासनिक विवेक का नहीं, बल्कि स्पष्ट चुनावी रणनीति प्रतीत होती है। 2026 की विधानसभा चुनावी तैयारी के मद्देनज़र बंगाल के मुस्लिम वोटरों को संतुष्ट करने और धर्म-आधारित वोट बैंक को सुरक्षित रखने का यह कदम है जिसकी मंशा और असर दोनों पर हमें विचार करना चाहिए।
पहले जब वक्फ संशोधन कानून आया, तो ममता ने इसे ‘मुसलमानों के अधिकारों पर हमला’ करार दिया। उन्होंने कहा कि यह विधेयक एक धर्म विशेष के खिलाफ है, एक एंटी-फेडरल और एंटी-सेक्युलर साजिश है।
मसले की संवेदनशीलता को देखते हुए, वक्फ संपत्तियों के नियंत्रण और प्रबंधन में पारदर्शिता लाना कानून का उद्देश्य था। हालाँकि, इस बिल के विरोध ने हिंसा और सांप्रदायिक अस्थिरता को जन्म दिया मुर्शिदाबाद व मालदा जैसे मुस्लिम बहुल जिलों में हिंदुओं की दुकानों पर हमले हुए थे।
फिर भी, चुनाव से पहले ममता ने अचानक कहा कि वक्फ कानून पश्चिम बंगाल में लागू नहीं किया जाएगा। यह अचानक नरमी बिल्कुल उसी तरह जैसे वोटर लिस्ट पुनरीक्षण (SIR) पर उनकी भाषा बदली।
पहले उन्होंने SIR की मुखर आलोचना की थी, और इसका लक्ष्य ‘छुपे हुए’ नागरिकता रजिस्टर (NRC) लाना माना था। पर अब वही सरकार राज्य में SIR को आगे बढ़ा रही है और मतदाता सूची में संशोधन कराने में जुटी है।
यह बदलाव सहज या विचार-परिवर्तन प्रतीत नहीं होता बल्कि स्पष्ट राजनीतिक गणना जैसा नजर आता है। बंगाल में कम से कम 27% मुस्लिम मतदाता हैं और कम-से-कम 100 सीटें ऐसी हैं जहाँ बिना मुस्लिम वोटों के जीतना मुमकिन नहीं।
चुनाव के पहले ऐसे महत्वपूर्ण फैसलों के माध्यम से ममता बनर्जी साफ संदेश दे रही हैं कि वे अपनी ‘मुस्लिम मददगार’ वोट-बैंक को अहमियत दे रही हैं और साथ ही, अपनी पार्टी के लिए असुरक्षित हिंदू मतदाताओं को भी अस्थिरता की चिंता में छोड़ रही हैं।
लेकिन सवाल उठता है- क्या यह ‘सौहार्द’ है या सत्ता बचाने का समीकरण? वक्फ कानून के केस में पारदर्शिता और जवाबदेही लाने का प्रयास था जिससे अवैध कब्जे, संपत्ति के दुरुपयोग और धार्मिक निधियों के भ्रष्ट प्रयोग को रोका जा सके।
इधर किसी भी तथ्य-आधारित बीच-बचाव के बजाय, राजनीतिक समीकरण के चलते कानून को ठेंगा दिखाना, राज्य प्रशासन की जवाबदेही और संवैधानिक धर्म-निरपेक्षता दोनों के लिए खतरनाक precedent हो सकता है।
साथ ही, SIR वोटर लिस्ट पुनरीक्षण प्रक्रिया, जिसपर पहले यह आरोप लगाया जाता था कि यह ‘छुपा NRC’ है, अब उसी प्रक्रिया को प्रोत्साहित करना, खासकर ऐसी आबादी वाले जिलों में जहाँ पिछले 50 सालों से अवैध प्रवास और अव्यवस्थित वोटर नामांकन को लेकर विवाद रहे हैं, यह साफ संकेत है कि वोट बैंक बदलने की कोशिश हो रही है।
बिना पूरी पारदर्शिता, सुनियोजित जनगणना और नागरिकता व दस्तावेजों की सत्य-जाँच के, यह प्रक्रिया तर्कसंगत लोकतंत्र के लिए खतरा बन सकती है।
इसमें सबसे महत्वपूर्ण, बंगाल जैसे राज्य में, जहाँ विभाजनकारी ताकतों का दायरा हमेशा रहा है, अल्पसंख्यकों के नाम पर वोट बैंक और धर्मनिरपेक्षता दोनों का इस्तेमाल करना- यह रणनीति कहीं न कहीं सामाजिक सामंजस्य और असली हिन्दू–बंगाली पहचान को तहस-नहस कर रही है।
चुनावों से पहले कोई भी जनाधार वाला नेता नहीं चाहेगा कि उसके कोर वोटर्स उससे खफा हो जाएँ और ममता बनर्जी ने ठीक वही किया है। हमारे देश के लिए यह चिंता की बात है कि लोकतंत्र मात्र वोटों तक सीमित न रह जाए उसकी आत्मा यानी संविधान, नागरिकता, एकता और धर्म-निरपेक्षता की रक्षा पहले हो।
हालाँकि जब राजनीतिक फायदे के लिए संवेदनशील मसलों पर नरमी, कानून की अवहेलना और वोट बैंक की राजनीति हो, तो इससे सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता को घात हो सकता है।
इसलिए बंगाल में वक्फ कानून और SIR के प्रति ममता बनर्जी के बदलते रुख को केवल चुनावी जुगाड़ नहीं, बल्कि राजनैतिक सोची हुई चाल समझना चाहिए जो कि यदि रुकी नहीं गई, तो आने वाले दिनों में कई तरह की विभाजनात्मक राजनीति और सामाजिक अस्थिरता की जड़ बन सकती है।


