उत्तर प्रदेश में नशे के काले कारोबार को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए योगी आदित्यनाथ सरकार ने जो अभियान छेड़ा है, वह न सिर्फ राज्य की सीमाओं को पार करता है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय ड्रग माफिया के साम्राज्य को चूर-चूर करने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो रहा है। यूँ तो कोडिन से बने साधारण कफ सिरप फेन्सेडिल (Phensedyl) का इस्तेमाल खाँसी के इलाज के लिए होता है, लेकिन यह अवैध तस्करी के जरिए हेरोइन जैसी लत फैलाने वाला हथियार बन चुका है।
उत्तप्रदेश में इस दवा की अवैध ब्रिक्री का एक ऐसा रैकेट सामने आया जो राज्य या देश नहीं बल्कि विदेशों तक इसके अवैध कारोबार को फैला चुका था। साल 2024 में योगी आदित्यनाथ सरकार ने इस मामले की जाँच के लिए एक जॉइंट ऑपरेशन का आदेश दिया। Food Safety and Drug Administration और राज्य की Special Task Force को आदेश मिला कि कोडिन बेस्ड दवाओं और सिरप का अवैध स्टोरेज और स्मगलिंग किया जा रहा है।
साल 2024 से शुरू हुई इस जाँच ने 2025 तक एक विशालकाय नेटवर्क को उजागर किया है, जिसमें 128 FIR दर्ज हुईं, 280 ड्रग लाइसेंस रद्द किए गए, 3.5 लाख से ज्यादा शीशियाँ जब्त की गईं और 32 प्रमुख आरोपित गिरफ्तार हो चुके हैं। अनुमानित 425 करोड़ रुपये का यह काला साम्राज्य उत्तर प्रदेश के 28 जिलों से लेकर नेपाल, बांग्लादेश, दुबई और पाकिस्तान तक फैला था।
इसमें सुपर स्टॉकिस्ट फर्मों से लेकर शेल कंपनियाँ, राजनीतिक कनेक्शन और यहाँ तक कि टेरर फंडिंग का एंगल भी जुड़ गया। समाजवादी पार्टी के नेताओं और अखिलेश यादव के करीबियों के नाम आने से राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सख्त निर्देश पर STF, FSDA और ED की संयुक्त कार्रवाई ने इस ‘हलाल नशे’ के सिंडिकेट को धराशायी कर दिया, जो युवाओं को बर्बाद करने के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा को भी खतरे में डाल रहा था। अब SIT और ED की जाँच आगे बढ़ रही है, जो हजारों करोड़ के मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकी फंडिंग तक पहुँच सकती है।
क्या है कोडिन और उसकी सिरप
कोडिन दरअसल अफ़ीम से निकला हुआ एक पदार्थ है। सामान्य तौर पर जिन सिरप में इसका इस्तेमाल होता है वो खांसी का इलाज करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन यदि इसकी अधिक मात्रा ले लिया जाए तो दिमाग को सुन्न कर देता है। लंबे समय तक इस्तेमाल करने पर हेरोइन या अफीम जैसी ही लत पैदा करने की क्षमता रखता है। बीते कुछ वर्षों में तेजी के साथ सॉफ्ट ड्रग के तौर पर इसका इस्तेमाल लोगों ने करना शुरू किया है। 100 मिली सिरप में अगर 10 मिली कोडिन का इस्तेमाल किया जाए तो इसका सेवन करने वाला व्यक्ति इसका आदी बन सकता है।
कैसे सामने आया पहला मामला?
साल 2024 की फ़रवरी में लखनऊ की सुशांत गोल्फ सिटी इलाके में एक छापा पड़ा। Phensedyl नाम की एक सिरप, जो कोडिन बेस्ड सिरप थी… यूपी एसटीएफ को सूचना मिली कि यहाँ पर बड़ी मात्रा में उसका अवैध भंडारण किया जा रहा है। जब छापा पड़ा तो पता चला कि इसके कागजात फर्जी थे और इस सिरप की सप्लाई चेन संदेह को बढ़ा रही थी।
सुशांत गोल्फ सिटी थाने में NDPS और IPC की अलग-अलग धाराओं में इस मामले की FIR दर्ज हुई। जब इस मामले की सघनता से जाँच हुई तो ये मामला कहीं ज्यादा बड़ा नजर आने लगा। कई महीनों से मिल रहे इनपुट के आधार पर यह कार्रवाई की गई थी। इस छापे के बाद एक साल से भी ज्यादा वक्त तक इस मामले की हर कड़ी की जाँच हुई।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का सीधा आदेश था कि इस नशे के अवैध कारोबार के खिलाफ कोई कोताही नहीं बरतनी है। उत्तर प्रदेश की जाँच एजेंसियों ने किया भी ठीक वैसा ही। एक साल के करीब के वक्त में STF और FSDA ने पूरी तरह से जाँच की और हर कड़ी को खंगाला ताकि कोई भी गुनहगार एजेंसियों की नजरों से ना बच सके और इसके पीछे मौजूद पूरे रैकेट का भंडाफोड़ किया जा सके।
सुपर स्टॉकिस्ट और ड्रग माफिया का गठजोड़
इस केस में जब STF ने जाँच आगे बढ़ाई तो सामने आया कि कुछ ऐसी फर्म्स हैं जो सुपर स्टॉकिस्ट हैं। जो दवाओं को बड़ी मात्रा में स्टॉक करने का लाइसेंस रखती हैं। जांच में सामने आया कि, पहले इन्हीं सुपर स्टॉकिस्ट कंपनियों के नाम पर बड़ी मात्रा में कोडिन युक्त कफ सिरप की वैध खरीद दिखाई गई। फिर उन्हें अवैध रूप से बेचने के लिए फर्जी फर्म खड़ी कर दी गई।
रिकॉर्ड में हेराफेरी करके सिरप को दवा की बजाए नशे के सिरप के तौर पर काले बाजार में उतारा गया। उत्तर प्रदेश से सटे राज्यों- बिहार, झारखंड, बंगाल के रास्ते होते हुए इस नशे को नेपाल और बांग्लादेश तक सप्लाई किया जाने लगा। लखनऊ, लखीमपुर खीरी, बहराइच, बनारस, जौनपुर, सहारनपुर समेत प्रदेश के 28 जिलों और कई राज्यों में इस नशे के अवैध कारोबार के तार फैले हुए थे।
इसमें राजनीतिक कनेक्शन से लेकर ड्रग्स के अंतरराष्ट्रीय माफिया तक के नाम सामने आए। प्रदेश सरकार और प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी इसके किंगपिन को गिरफ्तार करना और इसके सिंडिकेट का खुलासा करना।
कैसे हुआ सिंडिकेट का खुलासा?
एक साल के करीब के समय की जाँच के बाद 18 अक्टूबर 2025 को उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में एक ट्रक पकड़ा गया। ट्रक के अंदर बड़ी संख्या में चिप्स के कार्टन थे। लेकिन जब इन कार्टन को खोला गया तो अंदर नशे का पूरा जखीरा रखा हुआ था। इन कार्टन के अंदर कोडिन युक्त कफ सिरप की शीशियाँ रखी हुई थी। जब इनकी कीमत का अंदाजा लगाया गया तो प्रशासन के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। इस ड्रग्स की कीमत करीब 3 करोड़ रुपये बताई गई। यहाँ मध्य प्रदेश के तीन तस्कर हेमंत पाल, बृजमोहन शिवहरे और रामगोपाल धाकड़ गिरफ्तार हुए।
पिछली फरवरी से ही STF इसी तरह की तस्करी की कड़ियाँ जोड़ रही थी। जब सोनभद्र से ये सूचना आई तो तार जुड़ने लगे। प्रारंभिक जाँच में पता चला कि यह खेप नेपाल के रास्ते पाकिस्तान जाने वाली थी। इसी के पंद्रह से बीस दिनों के भीतर झारखंड और राँची से भी नशीली दवा की बड़ी खेप पकड़ी गई।
इस मामले की सघन जाँच हुई तो एक नाम सामने आया। नाम था- शुभम जायसवाल। शुभम के नाम तक पहुँचने से पहले एजेंसियों ने 300 से अधिक फर्मों की स्क्रीनिंग की। उनमें से 133 ऐसी फर्म्स के नाम शॉर्टलिस्ट किए गए जो सामूहिक रूप से इस नशे के इस धंधे में या तो सीधे शामिल थे या डायवर्जन में मदद दे रहे थे। और सोनभद्र में ट्रक पकड़े जाने से कुछ महीनों से पहले ही इस तरह की छापेमारी की जाने लगी थी जिससे कि इस पूरे सिंडिकेट की कमर को एक झटके में ही तोड़ा जा सके।
बनारस से दुबई कनेक्शन और नशे का सिंडिकेट
एसटीएफ ने जाँच को तेजी से आगे बढ़ाया तो राज खुलने लगे। शुभम जायसवाल जो मूल रूप से बनारस का रहने वाला है, वो आज के समय में दुबई में रहता है। एसटीएफ ने 27 नवंबर को लखनऊ के विभूतिखंड इलाके में गौरी चौराहे के पास अमित कुमार सिंह उर्फ़ अमित टाटा को गिरफ्तार किया गया। पूछताछ में पता चला कि ये इस ड्रग्स के कारोबार की अहम कड़ी है और दुबई से शुभम जायसवाल के इशारे पर पूरे नेटवर्क को ऑपरेट करता है।
अमित टाटा के पास मिले डिजिटल उपकरणों से सप्लाई रूट, लेनदेन का रूट, सिंडिकेट का पूरा नेटवर्क मैप सब कुछ सामने आ गया। शुभम के इस नशीले कारोबार में उसका पिता भोला प्रसाद भी शामिल था। उसे कोलकाता एयरपोर्ट से उस समय गिरफ्तार किया गया जब वो उत्तर प्रदेश की STF की कार्रवाई से डरकर थाईलैंड भागने की फिराक में था।
STF और उत्तर प्रदेश के औषधि विभाग को मुख्यमंत्री ने आदेश दिया कि इस पूरे नेटवर्क पर कानून का बुलडोजर चलाया जाए। जाँच तेज हो गई। सामने आया कि कुछ बड़ी दवा निर्माता कंपनियों लेबोरेट, थ्री-बी हेल्थकेयर और एबॉट की सप्लाई चेन का इस्तेमाल किया गया।
उत्तर प्रदेश पुलिस के एक बर्खास्त सिपाही आलोक कुमार सिंह का नाम भी सामने आया, जिसकी सात हजार वर्ग फुट की कोठी को देखकर ED के अधिकारी भी सन्न रह गए थे। और बात तब और गहरी हो गई जब इसी बर्खास्त सिपाही के साथ समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव की तस्वीर भी निकल कर सामने आ गई। कई बाहुबली नेताओं के नामों को लेकर भी चर्चा हुई, हालाँकि अभी एजेंसियों ने किसी का नाम सामने नहीं किया है।
हालाँकि, इंटरनेट पर शुभम जायसवाल और अमित टाटा के साथ उनकी तस्वीरें और वीडियो तेजी से वायरल हो रहे हैं। इसके अलावा इतने बड़े कारोबार के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैल जाने की वजह से संदेह है कि इसमें कुछ बड़े नाम भी शामिल हो सकते हैं। और योगी आदित्यनाथ इसीलिए तेजी के साथ जीरो टॉलरेंस की नीति पर कार्रवाई करने का आदेश दे रहे हैं।
अभी तक क्या कार्यवाई हुई?
इन गिरफ्तारियों और सिंडिकेट के किंगपिन का नाम सामने आने के बाद जरूरी था इस पूरे नेटवर्क की कमर तोड़ना। 8 दिसंबर को लखनऊ में गृह विभाग के प्रमुख सचिव संजय प्रसाद, डीजीपी राजीव कुमार कृष्ण और FSDA कमिश्नर रौशन जैकब ने संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अब तक की कार्रवाई का पूरा ब्योरा दिया।
बताया गया कि अभी तक 128 FIR दर्ज की गई है, 280 ड्रग लाइसेंस कैंसिल हुए हैं, 3.5 लाख शीशियां जब्त की गई। 32 लोग जो इस तस्करी नेटवर्क से जुड़े हुए थे, उनको अभी तक गिरफ्तार किया गया है। इन गिरफ्तारियों में जो प्रमुख नाम सामने आए हैं वो कुछ इस प्रकार हैं- विभोर राणा, विशाल राणा, सौरभ त्यागी, भोला प्रसाद जायसवाल, आलोक प्रताप सिंह, अभिषेक शर्मा, आकाश पाठक और अमित सिंह उर्फ अमित टाटा।
इस पूरे रैकेट की जाँच के दौरान यूपी STF को दिखा कि ये मामला हजारों करोड़ का बन सकता है। करीब 425 करोड़ रुपए के काले धन का सीधा एस्टीमेट समझ में आने लगा। और इस मामले में एक SIT का भी गठन किया गया है। जो विशेष रूप से इस केस से जुड़े हर तथ्य की सघनता से जाँच करेगी।
3 दिसंबर को ED के द्वारा इस मामले में 67 आरोपितों के खिलाफ ECIR दर्ज किया गया। ED ने 25 ठिकानों पर एकसाथ तलाशी अभियान चलाया। उत्तर प्रदेश के लखनऊ, सहारनपुर, वाराणसी और गाजियाबाद और झारखंड और गुजरात की राजधानियों की लोकेशंस पर भी यह तलाशी अभियान चलाया गया।
तलाशी के दौरान पता चला कि 700 फर्जी फर्म्स 220 लोगों के नाम पर रजिस्टर हैं, जो सीधे तौर पर पैसों के हेरफेर के लिए बनाई गई हैं। ED का अनुमान है कि पैसों का कुल जोड़ हजार करोड़ के ऊपर भी जा सकता है और इसीलिए इस केस में PMLA के तहत कार्रवाई करने की तैयारी भी चल रही है।
बीते दिनों 8 दिसंबर को लखनऊ में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में यूपी पुलिस के डीजीपी राजीव कृष्ण ने बताया कि लखनऊ जोन में कुल 11 मुकदमे दर्ज किए गए हैं, बरेली जोन में 4 मुकदमे, गोरखपुर जोन में 10 मुकदमे, वाराणसी जोन में 2 मुकदमे दर्ज किए गए हैं। जिनके जरिए उस पूरे नेटवर्क को ध्वस्त करने की तैयारी की जा रही है जिसके जरिए ये नशे का अवैध कारोबार चल रहा था।
हलाल नशा है कफ़ सिरप और टेरर फंडिंग का एंगल भी आ रहा है सामने
कई मौकों पर भारत बांग्लादेश बॉर्डर पर बीएसएफ के द्वारा कफ़ सिरफ़ की तस्करी को रोकने और उन्हें जब्त करने की खबरें भी आती हैं। और अब ED की जाँच के दौरान इस तरह की बातें भी निकल कर सामने आ रही हैं कि तस्करी से होने वाली कमाई का इस्तेमाल टेरर फंडिंग के लिए किया जा रहा है।
दरअसल, उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के आसिफ और वसीम नाम के तस्करों का नाम भी इस मामले में सामने आ रहा है। जानकारी मिली है कि आसिफ बांग्लादेश के रास्ते अन्य खाड़ी देशों तक तस्करी करता है। और पैसों के हेरफेर में हवाला के जिस नेटवर्क का सहारा लिया जाता है, शक है कि वो आतंकवादियों को लाभ पहुँचाता हो।
इसके अलावा दावा यह भी किया जाता है कि चूँकि इस्लाम में शराब प्रतिबंधित है तो नशे के लिए इस तरह की कफ सिरप का इस्तेमाल तेजी के साथ बढ़ा है। कफ सिरप को हलाल नशे के तौर पर प्रचारित किया जाता है। और कई ऐसी सूचनाएँ हैं कि कफ सिरप का प्रसार उन क्षेत्रों में ज्यादा है जहाँ मुस्लिम जनसंख्या की बहुलता है।
विस्तार से जानिए उन 12 नामों के बारे में जो कोडिन कफ़ सिरफ़ मामले में मुख्य आरोपित हैं।
शुभम जायसवाल: वाराणसी का रहने वाला है, फ़िलहाल दुबई में रहता है। इस पूरे रैकेट का मास्टरमाइंड यही है।
भोला प्रसाद जायसवाल: वाराणसी का रहने वाला है। शुभम जायसवाल का पिता है। सैली ट्रेडर्स का मालिक है।100 करोड़ का टर्नओवर है।
मनोहर जायसवाल: शुभम जायसवाल के परिवार का सदस्य है। शेल कंपनियों को बनाने में अहम योगदान रहा है।
विभोर राणा: सहारनपुर का रहने वाला है। यह मुख्य सुपरस्टॉकिस्ट है। जीआर ट्रेडिंग कंपनी के ज़रिए इस सिरप की सप्लाई करवाता था।
सौरभ त्यागी: गाजियाबाद का रहने वाला है।इसके पास से 1.57 लाख बोतल पकड़ी गई। इसी ने शुभम जायसवाल का नाम एजेंसियों को बताया था।
विशाल राणा: सहारनपुर का रहने वाला है। विभोर राणा का भाई है। फर्जी बिलिंग और शेल फर्म के नेटवर्क को बनाया था।
पप्पन यादव: लखीमपुर खीरी/बहराइच का रहने वाला है। ट्रांसपोर्ट का काम करता था। नेपाल सप्लाई रूट पर काम करता था।
शादाब: वाराणसी/जौनपुर का रहने वाला है। फर्जी लाइसेंस के ज़रिए लोकल लेवल पर स्टॉकिंग का आरोपी है।
अभिषेक शर्मा: लखनऊ का रहने वाला है। फर्जी ड्रग लाइसेंस रखने का आरोप है। 80 लाख बोतल पकड़ी गई है।
विशाल उपाध्याय: लखनऊ का रहने वाला है। बोगस बिलिंग और पेपरवर्क को हैंडल करता था।
आकाश पाठक: वाराणसी का रहने वाला है। लोकल लेवल पर धंधे को हैंडल करता था।
विनोद अग्रवाल: लखनऊ/वाराणसी का रहने वाला है। पेशे से CA है। शेल कंपनियों के ज़रिए मनी ट्रेल को मैनेज करने का काम करता था।
सपा नेताओं का कनेक्शन आया सामने
इसके अलावा कई और नाम हैं जो सोशल मीडिया पर तैर रहे हैं। इनमें एक नाम समाजवादी पार्टी के जौनपुर जिले की मलहनी सीट से विधायक लक्की यादव के बेहद करीबी राहुल यादव का भी है। राहुल यादव की तस्वीर अखिलेश यादव के साथ हाथ मिलाते हुए दिख रही है।
इसके अलावा बर्खास्त यूपी पुलिस के सिपाही आलोक सिंह की अखिलेश यादव के साथ की तस्वीरें सोशल मीडिया हर जगह वायरल ही है। जिसका नाम ही इस पूरे रैकेट के भंडाफोड़ की जड़ बनी है। 28 जिलों में जो 128 FIR दर्ज की गई है, उनमें से कई नाम ऐसे बताए जा रहे हैं जिनको अखिलेश यादव के शासनकल में ड्रग लाइसेंस मिले थे। इस अवैध कारोबार को फैलाने में इनकी अहम भूमिका बताई जा रही है, SIT इनसे जुड़े मामलों की पड़ताल कर रही है। वो आज लोकल लेवल पर रिटेलर बने हुए हैं।
योगी आदित्यनाथ सरकार की कार्रवाई से समाजवादी पार्टी में तिलमिलाहट
जितनी तेजी के साथ उत्तर प्रदेश की एजेंसियाँ कोडिन के गुनहगारों को पकड़ रही हैं उसी रफ्तार से उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की तिलमिलाहट बढ़ती जा रही है। एक तरफ जहाँ सटीक प्लानिंग के साथ बड़े ड्रग्स माफिया के पूरे नेटवर्क को ध्वस्त किया जा रहा है, पूरे भारत में फैले इस ड्रग नेटवर्क को अकेले उत्तर प्रदेश की एजेंसियाँ ध्वस्त कर रही हैं, सरकार की तरफ से एजेंसियों को खुली छूट मिली हुई है तो दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी में तिलमिलाहट साफ नजर आ रही है।
हो भी क्यों ना? यूपी पुलिस के बर्खास्त सिपाही आलोक सिंह की सपा मुखिया अखिलेश यादव के साथ सुखद मुलाकात की तस्वीर अपने आप में कहानी बता रही है। अभी जाँच का दायरा जैसे-जैसे बढ़ रहा है समाजवादी पार्टी की तकलीफ बढ़ती जा रही है।
कोडिन एक बड़ी आबादी को बर्बाद करने वाला जहर बन चुका है। जिसके धंधे से लाभ कमाने वाले लोग समाजवादी पार्टी के करीबियों में गिने जा रहे हैं। अभी कई और नामों का खुलासा और उनका समाजवादियों से संबंध सामने आना बाकी है। उन माफियाओं का नाम भी सामने आ रहा है जिनके एक लंबे समय तक अखिलेश यादव के पिता मुलायम सिंह यादव के साथ अच्छे संबंध रहे हैं।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बीते दो वर्षों की सतत कार्रवाई से स्पष्ट कर दिया है कि इस मामले में कोई बचने वाला नहीं है। ED ने अपनी जाँच का दायरा टेरर फंडिंग तक बढ़ाया है और इस नशे के काले कारोबार से 200 करोड़ की कमाई करने वाले बर्खास्त सिपाही की तस्वीर अखिलेश यादव के साथ नजर आई है। सरकार और प्रशासन दोनों ने अपनी मंशा स्पष्ट कर दी है कि इस नशे के काले कारोबार को समूल नष्ट कर दिया जाएगा।


