भारतीय लोकतंत्र की परंपरा रही है कि चुनाव नतीजे आने के बाद मुख्यमंत्री अपना इस्तीफा राज्यपाल को सौंप देते हैं। फिर राज्यपाल नई सरकार और विधानसभा के गठन की प्रक्रिया शुरू करते हैं। सत्ताधारी दल के चुनाव जीतने पर भी यही प्रक्रिया है। लेकिन पश्चिम बंगाल का चुनाव हारने के बाद भी इस्तीफा नहीं देने की बात कह ममता बनर्जी ढीठपना का एक नया अध्याय लिख रही हैं।
हालाँकि जो संवैधानिक प्रक्रिया हैं उसमें ममता बनर्जी की बकलोली का कोई खास महत्व नहीं है। आइए जानते हैं कि ऐसी स्थिति में पश्चिम बंगाल में नई सरकार और विधानसभा का गठन कैसे होगा? क्या अतीत में भारत के किसी राज्य में पहले भी ऐसी स्थिति बन चुकी है?
क्या मुख्यमंत्री की जिद कानून से बड़ी है?
संविधान के हिसाब से मुख्यमंत्री की कुर्सी किसी की निजी जागीर नहीं होती। यह एक तय प्रक्रिया से चलती है। सुप्रीम कोर्ट के बड़े वकील विकास सिंह का कहना है कि मुख्यमंत्री तब तक पद पर रहता है जब तक राज्यपाल की सहमति हो। इसे कानून की भाषा में ‘डॉक्ट्रिन ऑफ प्लेजर’ कहते हैं।
#WATCH | On West Bengal CM Mamata Banerjee's "I will not resign, I did not lose" statement, president of the Supreme Court Bar Association, Senior Advocate Vikas Singh says, "According to the Constitution, the CM functions under the Doctrine of Pleasure, as far as continuing in… pic.twitter.com/22zrfqRA1U
— ANI (@ANI) May 6, 2026
जब तक मुख्यमंत्री के पास बहुमत रहता है, तब तक राज्यपाल उनके काम में दखल नहीं देते। लेकिन जैसे ही चुनाव के नतीजे आते हैं और यह साफ हो जाता है कि सरकार हार गई है, तो मुख्यमंत्री की सारी ताकत खत्म हो जाती है। ऐसे में इस्तीफा न देने की बात कहना सिर्फ राजनीति का हिस्सा है, कानूनन इसका कोई आधार नहीं है।
इस्तीफा न देने पर राज्यपाल क्या करेंगे?
अगर कोई मुख्यमंत्री चुनाव हार जाए और फिर भी कुर्सी न छोड़े, तो राज्यपाल चुप नहीं बैठते। संविधान के अनुच्छेद 164 के तहत उनके पास बहुत ताकत होती है। राज्यपाल सबसे पहले मुख्यमंत्री को खुद इस्तीफा देने के लिए कहते हैं। अगर मुख्यमंत्री मना कर देते हैं, तो राज्यपाल उन्हें और उनके मंत्रियों को तुरंत उनके पद से हटा यानी बर्खास्त कर सकते हैं।
इसके लिए उन्हें मुख्यमंत्री की परमिशन की जरूरत नहीं होती। इसके बाद राज्यपाल चुनाव आयोग से जीतने वाले नेताओं की लिस्ट माँगते हैं और देखते हैं कि किस पार्टी के पास सबसे ज्यादा सीटें हैं, ताकि नई सरकार बनाई जा सके।
कैसे बनेगी नई सरकार?
ममता बनर्जी भले ही राजभवन जाने से मना कर दें, लेकिन वह नई सरकार को बनने से रोक नहीं सकतीं। राज्यपाल सीधे बहुमत पाने वाली पार्टी यानी BJP के नेता को सरकार बनाने के लिए बुलाएँगे। कानून के मुताबिक राज्यपाल को नए मुख्यमंत्री को शपथ दिलाने का पूरा हक है।
जैसे ही नया मुख्यमंत्री शपथ लेता है, पुराने मुख्यमंत्री की सारी पावर खत्म हो जाती है। पुलिस और प्रशासन की कमान भी नए मुख्यमंत्री के पास चली जाती है। इसके बाद पुरानी सरकार के पास कोई कानूनी ताकत नहीं बचती और उनका कुर्सी पर अड़े रहने का कोई फायदा नहीं होता।
7 मई की आखिरी तारीख और कुर्सी का जाना
बंगाल की पुरानी विधानसभा का समय 7 मई को खत्म हो रहा है। यह एक बहुत जरूरी नियम है। संविधान कहता है कि जैसे ही विधानसभा का समय पूरा होता है, वह अपने आप खत्म यानी भंग हो जाती है। इसका मतलब है कि 8 मई की सुबह होते ही ममता बनर्जी कानूनी रूप से मुख्यमंत्री नहीं रहेंगी।
भले ही वह इस्तीफा दें या न दें, 8 मई से नई सरकार बनाने का काम शुरू करना ही होगा। BJP ने पहले ही बता दिया है कि 9 मई को नए मुख्यमंत्री शपथ ले सकते हैं। ऐसी स्थिति में इस्तीफा देने की जिद का कोई मतलब नहीं रह जाएगा, क्योंकि कानून की नजर में उनकी सरकार की ताकत पहले ही खत्म हो चुकी होगी।
जब हालात बिगड़ें तो क्या है आखिरी रास्ता?
अगर हारने के बाद भी मुख्यमंत्री कुर्सी न छोड़ें और सरकारी काम में अड़ंगा डालने लगें, तो राज्यपाल के पास एक बहुत सख्त कानून होता है। वह केंद्र सरकार से राज्य में ‘राष्ट्रपति शासन‘ (अनुच्छेद 356) लगाने की सिफारिश कर सकते हैं। यह कदम तब उठाया जाता है जब राज्य की कानून-व्यवस्था पूरी तरह फेल हो जाए।
हालाँकि, बंगाल के मामले में BJP को साफ बहुमत मिला है, इसलिए इसकी जरूरत नहीं पड़ेगी। राज्यपाल सीधे नए मुख्यमंत्री को शपथ दिलाकर सरकार बनवा सकते हैं। सीधी बात यह है कि लोकतंत्र में जनता का फैसला ही सबसे बड़ा होता है। कोई भी नेता बहुमत खोने के बाद जबरदस्ती सत्ता में नहीं रह सकता।
किन-किन मुख्यमंत्रियों ने इस्तीफा देने से किया था इनकार?
साल 2015 में बिहार में भी ऐसा ही ड्रामा हुआ था। नीतीश कुमार ने अपनी जगह जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया था। कुछ समय बाद जब नीतीश वापस मुख्यमंत्री बनना चाहते थे, तो मांझी ने कुर्सी छोड़ने से मना कर दिया। पार्टी में भारी खींचतान हुई और उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया। आखिरकार बहुमत साबित करने से ठीक पहले उन्होंने इस्तीफा दिया।
साल 2007 में कर्नाटक में JDS और BJP के बीच सरकार चलाने का समझौता हुआ था। तय हुआ था कि 20 महीने बाद कुमारस्वामी मुख्यमंत्री का पद येदियुरप्पा को सौंप देंगे। लेकिन समय आने पर कुमारस्वामी ने इस्तीफा देने से साफ मना कर दिया। इसके बाद BJP ने समर्थन वापस ले लिया। नतीजा यह हुआ कि राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा।
उत्तर प्रदेश में साल 1998 में भी ऐसा ही ड्रामा हुआ था, जब राज्यपाल ने कल्याण सिंह को हटाकर जगदंबिका पाल को रातों-रात मुख्यमंत्री बना दिया था। हालाँकि, मामला अदालत पहुँचा और सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हुए चुनाव (फ्लोर टेस्ट) के बाद जगदंबिका पाल को महज 44 घंटे में अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी थी।
लेकिन जो ड्रामा बंगाल चुनाव के बाद ममता बनर्जी ने किया, वो अभी तक किसी ने नहीं किया था। अपनी हार को ममता बनर्जी पचा नहीं पा रही है और मुख्यमंत्री पद पर बने रहने की जिद कर रही हैं।
अगर TMC जीतती तो क्या होता?
यहाँ यह समझना भी जरूरी है कि अगर बंगाल चुनाव में TMC को बहुमत मिलता, तब भी पुरानी सरकार का कार्यकाल तो खत्म होना ही था। नियम के मुताबिक, ममता बनर्जी को पहले इस्तीफा देना पड़ता और फिर नई विधानसभा के गठन की प्रक्रिया शुरू होती। वे बहुमत के साथ दोबारा दावा पेश करतीं और फिर से मुख्यमंत्री पद की शपथ लेतीं।
संविधान के अनुसार, बिना शपथ लिए और बिना नई विधानसभा के गठन के कोई भी मुख्यमंत्री कुर्सी पर नहीं रह सकता। यानी जीत हो या हार, 7 मई के बाद पुरानी सत्ता का अंत और नई प्रक्रिया का पालन करना कानूनी मजबूरी है। लोकतंत्र में कोई भी व्यक्ति बिना शपथ और बिना जनादेश के मुख्यमंत्री की शक्तियों का इस्तेमाल नहीं कर सकता।


