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आग लगी है बस्ती में, अंजुम डूबे कैमरे की मस्ती में… संकट के बीच भी नहीं छूटा ‘फ्रेम का मोह’, आपदा बनी प्रचार का ‘शो’

जब आदत ही हर जगह फेम खाने की हो, तो कोई कैसे खुद को रोक सकता है। सामने आग लगी हो, लोग अफरा-तफरी में हो, लेकिन अजीत अंजुम जैसे लोग कैमरे में एंट्री मिस नहीं कर सकते। ये तो वही मीम हो गया, कैमरा ऑन होते ही गरीब को रोटी दी, कैमरे बंद होते ही वो भी छीन ली।

आग लगे चाहे बस्ती में, अजीत जी तो डूबे कैमरे की मस्ती में…। तो ऐसा परिचय देने के पीछे वजह यह है कि गाजियाबाद के गौर ग्रीन एवेन्यू अपार्टमेंट में भयानक आग लगी और इसकी चपेट में 8 फ्लोर आ गए। जिन फ्लैटों में आग लगी, उनके ठीक सामने वाले टावर मे प्रोपेगेंडा पत्रकार और यूट्यूबर अजीत अंजुम का भी फ्लैट है। तो अजीत अंजुम भी लग गए इस आपदा को ‘अवसर’ बनाने। ‘अवसर’ बनाना तो था पड़ोसी की मदद करने का, लेकिन उन्होंने इस आपदा को प्रचार का ‘शो’ बना लिया।

तभी तो अजीत अंजुम को राहत और बचाव के बीच भी सबसे बड़ी चिंता यही थी कि फ्रेम सही आ रहा है या नहीं। पड़ोसी मुसीबत में थे, लोग घबराए हुए थे, लेकिन अजीत जी का ध्यान था- ‘कैमरामैन, जल्दी फोकस करो।’ अब इसी लाइन पर उनके वीडियो एडिट कर मीमर मजे ले रहे हैं। अजीत जी, ये पत्रकारिता थी, राहत कार्य था या फिर ‘कंटेंट क्रिएशन’ का नया एपिसोड?

वैसे अजीत जी ने अपनी खिल्ली भी खुद ही उड़वाई है। क्यों आग बुझाते वीडियो के बीच कैमरा अड़ाया? क्यों पाइप को सिर पर टाँगकर पानी डालने का दिखावा किया? और जब कैमरे का फोकस खुद पर से हटा तो क्यों उनको इतनी मिर्ची लगी? क्योंकि ये तो वही अजीत जी हैं न, जो कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके कैमरे पर वीडियोज बनाते थे। क्यों है न, अजीत जी? खुल गई न पोल।

‘पीएम मोदी अपने और कैमरे के बीच में किसी को आने नहीं देते‘,’कैमरा में अकेले दिखने का ऐसा शौक मोदी को ही क्यों है?’, ‘पीएम मोदी अपने और कैमरे के बीच में किसी को आने नहीं देते‘ आदि आदि..। ये अजीत अंजुम के कुछ वीडियो के टाइटल हैं, जिनमें पीएम मोदी और उनका कैमरे से लगाव पर तंज कसा गया है। लेकिन अब ये मत बोलना- मोदी जैसा पोज क्यों देने लगा मैं।

जब आदत ही हर जगह फेम खाने की हो, तो कोई कैसे खुद को रोक सकता है। सामने आग लगी हो, लोग अफरा-तफरी में हो, लेकिन अजीत अंजुम जैसे लोग कैमरे में एंट्री मिस नहीं कर सकते। ये तो वही मीम हो गया, कैमरा ऑन होते ही गरीब को रोटी दी, कैमरे बंद होते ही वो भी छीन ली। क्योंकि हमें क्या पता आपने कैमरे के पीछे कितनी मदद की? क्योंकि हमने जो देखा वो आपका और कैमरे का प्रेम था।

क्या पता कैमरा बंद होते ही पाइप भी नीचे, और खुद भी नीचे, अरे नीचे यानी फ्लैट से नीचे उतरकर भीड़ में खड़े हो गए। ये मैं नहीं कह रही, ये वो लोग सोच रहे हैं जिन्होंने आपदा के बीच में आपका और कैमरे के बीच का प्रेम देखा।

एक बार को अजीत अंजुम के ‘कैमरा-प्रेम’ पर लिखने से मैं खुद को रोक भी लेती। लेकिन जैसे ही प्रोपेगेंडाबाज और यूट्यूब रवीश कुमार ने अजीत जी को ट्रोल करने पर उनकी साइड ली। तब मैं समझ गई। बोलना तो पड़ेगा। वरना रवीश कुमार तो लंबा-चौड़ा निबंध लिखकर इसे भी मोदी की ही गलती करार देंगे। कहीं उनकी अगली यूट्यूब वीडियो का टाइटल भी यही न हो- पीएम मोदी और उनके कैमरे के रिश्ते ने अजीत अंजुम को बनाया कैमरा-प्रेमी।

दरअसल, राजनीति और पत्रकारिता में एक पुरानी कहावत है- जो गड्ढा दूसरों के लिए खोदता है, कभी-कभी उसी में कैमरा लेकर खुद उतर जाता है। अजीत अंजुम के साथ भी ऐसा ही हुआ। पीएम मोदी के कैमरे पर सवाल करते-करते खुद कैमरा लेकर उतर गए। अब झेलिए मीम की बारिश, खुद पर। क्योंकि मीम बनाने वालों को छाता तो आपने ही दिया है न? इस पूरी कंट्रोवर्सी से अजीत जी को एक सीख तो मिली होगी कि पड़ोसी के घर में आग लगने पर जो लोग कैमरा लेकर खड़े होते हैं, उन्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि अगर हवा बदल गई तो उनके अपने घर भी नहीं बचेंगे।

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पूजा राणा
पूजा राणाhttps://hindi.opindia.com/
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