Homeविचारमीडिया हलचलमुस्लिम तुष्टिकरण पर सिली रही जुबान, आज जागृत हिंदू दिख रहा सांप्रदायिक… 'मॉर्डन जिन्ना'...

मुस्लिम तुष्टिकरण पर सिली रही जुबान, आज जागृत हिंदू दिख रहा सांप्रदायिक… ‘मॉर्डन जिन्ना’ राजदीप सरदेसाई के नाम खुला खत

राजदीप जी, असल में आपने 'हिंदू पाकिस्तान' शब्द का इस्तेमाल डर पैदा करने के लिए जानबूझकर किया है। इसका मकसद हिंदुओं को यह संदेश देना है कि अगर वे अपनी सभ्यता, अपने मंदिरों, अपने त्योहारों या अपने अधिकारों की बात करेंगे तो उन्हें 'कट्टर', 'फासीवादी' या 'पाकिस्तान जैसा' कह दिया जाएगा।

सागरिका के शौहर राजदीप सरदेसाई जी,

‘इंडिया टुडे’ में आपका ‘सांप्रदायिक राजनीति का खतरनाक सामान्यीकरण’ (I won’t work for them: The dangerous normalisation of communal politics) लेख पढ़ा। आपकी इस कुंठा को देखकर मन में मिश्रित भाव हैं, समझ नहीं आता आपके इस लेख को पढ़कर हँसा जाए या नाराज हुआ जाए। इन मनःस्थिति के पीछे आपकी चालाकी है, जो आप और आपके गिरोह के लोग अब देश पर किसी ना किसी तरह बस सवाल उठाने के बहाने ढूँढते हैं। यही आपने इस लेख में करने की कोशिश की है।

राजदीप जी को अब तथाकथित सांप्रदायिक राजनीति की चिंता सता रही है और यह चिंता आज की नहीं है, यह चिंता 2014 के बाद से ही नजर आने लगी है। 2014 के बाद भारत की राजनीति में कई चीजें बदल गई हैं, उनमें एक ये भी है कि अब राजनीतिक दल बहुसंख्यकों की बात भी करने लगे हैं। राजदीप आपको और उनके जैसों को इससे ही दिक्कत है लेकिन ये दिक्कत बनी भी रहे तो भी कोई दिक्कत की बात नहीं, खैर आगे बढ़ते हैं।

कमोबेश आजादी के बाद से ही जब राजनीति में मुस्लिम समाज, मस्जिद, चर्च, अल्पसंख्यक के कथित अधिकार या उनके ही मुद्दों की बात होती तो उसे आप लोग अपनी टीबी डिबेट में उसे ‘धर्मनिरपेक्ष राजनीति’ का लबादा ओढ़ाकर चलाते रहे। लेकिन अब जब बीजेपी या अन्य दल हिंदू समाज, बहुसंख्यक पहचान या सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात करते हैं तो उसे तुरंत ‘कम्युनल’ यानी सांप्रदायिक करार दे दिया जाता है।

राजदीप जी, आपको आज बड़ी तकलीफ हो रही है कि कॉन्ग्रेस को ‘मुस्लिम लीग’ क्यों कहा जा रहा है। लेकिन जरा याद कीजिए, जब कॉन्ग्रेस की पार्टी के प्रधानमंत्री मंच से कहते थे कि ‘देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है’। कॉन्ग्रेस के सबसे बड़े नेता ने अपनी पार्टी को मुस्लिमों की पार्टी बताया था, तब आपकी सेक्युलर आत्मा छुट्टी पर चली गई थी क्या? जब वोट बैंक की राजनीति के लिए हिंदुओं की आस्था को ‘ढोंग’ और मुस्लिम तुष्टिकरण को ‘सेक्युलरिज्म’ बताया जा रहा था, तब आपने कितनी प्राइम टाइम डिबेट चलाई थीं? तब आपको लोकतंत्र खतरे में नहीं दिखा?

आपको समस्या ‘मुस्लिम लीग’ शब्द से नहीं है, समस्या इस बात से है कि अब जनता नैरेटिव समझने लगी है। अब हर बार हिंदुओं को अपराधबोध में डालकर राजनीति नहीं चलेगी। अब बहुसंख्यक समाज अपनी पहचान, संस्कृति और अधिकारों की बात खुलकर कर रहा है और यही बात तथाकथित सेक्युलर गैंग को सबसे ज्यादा चुभ रही है।

राजदीप जी, राजनीति के इस लंबे दौर में हर तरह की बातें हुईं। ‘तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार’ जैसे नारे लगाए गए, ‘भूरा बाल साफ करो’ जैसी बातों के सहारे जातीय घृणा साफ नजर आई। कभी जाति के नाम पर वोट माँगे गए, कभी भाषा के नाम पर, कभी उत्तर-दक्षिण, कभी दलित-पिछड़ा-अगड़ा की दीवारें खड़ी की गईं। तब आप जैसे तथाकथित सेक्युलर बुद्धिजीवियों को लोकतंत्र खतरे में नहीं दिखा।

दशकों तक समाज को टुकड़ों में बाँटकर राजनीति होती रही और उसे टीवी स्टूडियो में बैठ आप जैसे ‘पत्रकार’ ‘सोशल इंजीनियरिंग’ नाम देते रहे। लेकिन आज अगर वही बँटा हुआ समाज अपनी सांस्कृतिक पहचान के आधार पर एक अम्ब्रैला के नीचे आने लगे हैं, अपना हित देख वोट करने लगे हैं तो आपको अचानक सांप्रदायिकता नजर आने लगी है।

दशकों से मुस्लिमों ने सिर्फ एक ध्येय बनाकर वोटिंग की है कि किसी भी तरह से BJP को हराया जाए, तब आपको नहीं लगा कि ‘सांप्रयादिकता’ हो रही है। लेकिन अब जब जिन्होंने नोट दिया है, जिन्होंने चुना है, उनके लिए काम करने की बात होने लगी है तो आपके पेट में मरोड उठ रही हैं।

राजदीप जी, आप कह रहे हैं कि मुस्लिम राजनीति से अदृश्य हो रहे हैं, ऐसा नहीं है। वो उन्हें चुन रहे हैं, जिन्हें वो चुनना चाहते हैं। जो उनके लिए तुष्टिकरण करने को तैयार बैठे हैं। इसकी जिम्मेदारी BJP की नहीं है। आपकी पत्नी जिस TMC से राज्यसभा सांसद हैं उस पार्टी ने मुस्लिम वोटों के लिए क्या-क्या नहीं किया है, ये किसी को बताने की जरूरत नहीं है।

जब हिंदुओं ने देखा कि उनके त्योहारों पर रोक लगती है, दुर्गा विसर्जन के समय प्रशासनिक आदेश आते हैं, रामनवमी यात्राओं पर सख्ती होती है लेकिन दूसरी तरफ कट्टरपंथी तत्वों पर कार्रवाई से ममता की सरकार बचती है तो उनके भीतर असंतोष पैदा होना स्वाभाविक था।

मुस्लिमों के वोट बैंक के लिए बंगाल को तुष्टिकरण की आग में झोंक दिया गया और इसका ताप जब हिंदुओं से सहन करना मुश्किल हुआ तो उन्होंने एक दल को अपना समर्थन दे दिया और इसी बात से आप चिढ़े हैं। आप सवाल उठा रहे हैं कि बीजेपी के मुस्लिम मुख्यमंत्री, सांसद नहीं है।

आपने कभी यह सवाल भी उठाया कि क्या मुस्लिमों ने बीजेपी के साथ कभी वैसा व्यवहार किया? क्या बीजेपी को सिर्फ राजनीतिक दल की तरह देखा? जवाब है नहीं। क्योंकि आप जैसे बुद्धिजीवियों और कट्टरपंथी जमात ने उनके मन में यह भर दिया कि वो आपके वैचारिक दुश्मन हैं और यही ‘दुश्मनी’ वोट ना देकर निभाई जाती रही।

राजदीप जी, आखिरी बात ‘हिंदू पाकिस्तान’ को लेकर है। आपने अपने लेख में इस शब्द का जिक्र किया है, ‘हिंदू पाकिस्तान’ यह शब्द सिर्फ एक ‘राजनीतिक टिप्पणी’ नहीं है बल्कि भारत, हिंदू समाज और संविधान तीनों का अपमान है। हिंदू समाज को पाकिस्तान के साथ जोड़ना ही खतरनाक विचार है। क्या आप ऐसा इसलिए कर रहे हैं राजदीप जी क्योंकि पहली बार हिंदू समाज अपनी पहचान, अपने अधिकारों और अपनी सभ्यता के बारे में खुलकर बोल रहा है?

अगर भारत सच में ‘हिंदू पाकिस्तान’ बन रहा होता, तो क्या यहाँ हर शुक्रवार सड़कों पर नमाज होती? क्या मदरसों को सरकारी सहायता मिलती? क्या मुस्लिम पर्सनल लॉ आज भी कायम रहता? क्या वक्फ बोर्ड देश का सबसे बड़ा भूमि मालिक बन पाता? क्या मुस्लिम समाज को संविधान द्वारा दिए गए सभी धार्मिक अधिकार खुले तौर पर मिले होते?

दशकों तक भारत में खुली मुस्लिम तुष्टिकरण राजनीति हुई। शाह बानो केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट दिया गया। वोट बैंक बचाने के लिए कट्टरपंथियों के सामने सरकारें झुकती रहीं लेकिन तब आपने भारत को ‘इस्लामिक भारत’ नहीं कहा। तब सेक्युलरिज्म खतरे में नहीं आया।

राजदीप जी, असल में आपने ‘हिंदू पाकिस्तान’ शब्द का इस्तेमाल डर पैदा करने के लिए जानबूझकर किया है। इसका मकसद हिंदुओं को यह संदेश देना है कि अगर वे अपनी सभ्यता, अपने मंदिरों, अपने त्योहारों या अपने अधिकारों की बात करेंगे तो उन्हें ‘कट्टर’, ‘फासीवादी’ या ‘पाकिस्तान जैसा’ कह दिया जाएगा।

राजदीप जी, जिन्ना की जिस सोच को आप हिंदू के साथ जोड़ना चाहते हैं वो ना हो भारत का DNA है और ना हिंदू विचार का। पाकिस्तान की नींव धार्मिक अलगाववाद पर रखी गई थी। भारत की आत्मा सांस्कृतिक विविधता पर आधारित है। हिंदू सभ्यता ने हजारों वर्षों से विविधताओं को आत्मसात किया है। यही कारण है कि यहूदियों से लेकर पारसियों तक हर समुदाय को इस देश में शरण और सम्मान मिला।

हिंदू बहुसंख्यक होने के बावजूद भारत ने कभी खुद को हिंदू राष्ट्र घोषित नहीं किया। 1947 में अगर हिंदू समाज चाहता, तो भारत भी एक धार्मिक राष्ट्र बन सकता था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। क्योंकि हिंदू सभ्यता मूलतः थिओक्रेटिक नहीं है। आपका ‘हिंदू पाकिस्तान’ कहना सिर्फ एक राजनीतिक जुमला नहीं बल्कि हिंदू समाज को नैतिक रूप से अपराधी साबित करने की कोशिश है।

भारत को पाकिस्तान बनने से सबसे ज्यादा बचाकर अगर किसी ने रखा है, तो वह हिंदू सभ्यता की सहिष्णुता और उदारता ही है। लेकिन सहिष्णुता का मतलब यह नहीं कि हिंदू हमेशा चुप रहें, अपनी आस्था पर हमले सहते रहें और अपनी ही पहचान के लिए शर्मिंदा महसूस करें। भारत ‘हिंदू पाकिस्तान’ नहीं बन रहा। भारत बस उस दौर से बाहर निकल रहा है जहाँ हिंदू बहुसंख्यक से सिर्फ चुप रहने, सहते रहने और अपराधबोध में जीने की अपेक्षा की जाती थी।

Join OpIndia's official WhatsApp channel

  सहयोग करें  

'द वायर' जैसे राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी वेबसाइट्स को कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

शिव
शिव
7 वर्षों से खबरों की तलाश में भटकता पत्रकार...

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

MOU के बाद भी सुस्ती में रहा तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश ने फुर्ती से पकड़े मझगाँव डॉक के ₹29000 करोड़: समझिए कैसे चंद्रबाबू नायडू के...

प्रोजेक्ट में राज्य सरकार और विशाखापत्तनम पोर्ट अथॉरिटी में ₹5289 करोड़ देंगे, जबकि MDL मुख्य निवेशक के रूप में ₹23964 करोड़ का निवेश करेगा।

पूरी तरह से ‘ड्राई स्टेट’ नहीं था लक्षद्वीप, 47 साल बाद सरकार ने बदले शराब के नियम: जानिए क्यों, कभी विकास परियोजनाओं के विरोध...

भारत के केंद्रशासित प्रदेश लक्षद्वीप में 47 वर्षों बाद शराब नीति में बदलाव करते हुए केंद्र सरकार ने लागू शराबबंदी कानून को समाप्त कर दिया है।
- विज्ञापन -