BBC का नया ज़हर: रोहिग्याओं की तरह प्रवासी भारतीयों को भगाने का सपना देख रहे हैं वुसतुल्लाह

अगर विश्व की सबसे बड़ी लोकतान्त्रिक पार्टी के मुखिया और सबसे बड़े लोकतंत्र के गृहमंत्री की तुलना एक तानाशाह मिलिट्री कमांडर से की जाती है तो या तो ये पागलपन है नहीं तो घृणा। इस मामले में दोनों है। बीबीसी यह देख कर पागल हो चुका है कि भारत में एक से एक बड़े निर्णय हो रहे हैं और सांस्कृतिक रूप से भी समृद्धता आ रही है।

बीबीसी ने एक लेख प्रकाशित किया है। इस लेख को वुसतुल्लाह ख़ान ने लिखा है। ख़ान भारतीयों को धमकी दे रहे हैं। बीबीसी हमें धमका रही है। बीबीसी कह रही है कि अगर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बॉरिस जॉनसन अपने देश में रह रहे सभी भारतीयों को बोरिया-बिस्तर समेटने का आदेश दे दें तो क्या होगा? इसी तरह कनाडा और अमेरिका में भी किया जाए तो क्या होगा? रोहिंग्या घुसपैठियों के प्रति सहानुभूति जताते हुए बीबीसी लिखता है कि भारतीयों को भी विदेशों से निकाला जा सकता है।

हालाँकि, बीबीसी यहाँ रोहिंग्या घुसपैठियों और प्रवासी भारतीयों की तुलना करते समय इस बात को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर देता है कि भारतीय नागरिक जहाँ भी रहते हैं, वहाँ की अर्थव्यवस्था में अहम योगदान देते हैं। वे आतंकवादी नहीं बनते। एक प्रकार से वुसतुल्लाह ख़ान बीबीसी के मध्य से ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बॉरिस जॉनसन, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और कनाडा के राष्ट्रपति जस्टिन ट्रुडो को यह आईडिया दे रहे हैं कि प्रवासी भारतीयों को निकाल बाहर किया जाए।

यह इतना आसान है क्या? आइए, देखते हैं। संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में 30 लाख के क़रीब भारतीय मूल के लोग रहते हैं। भारतीय कम्पनियाँ अमेरिका की जीडीपी में सालाना 57 बिलियन डॉलर से भी अधिक का योगदान देती हैं। अमेरिका में रहने वाले भारतीयों की हाउसहोल्ड इनकम सभी प्रवासियों में सबसे ज्यादा है। इसके अलावा वे सबसे ज्यादा व्यापार-पसंद भी हैं। गूगल, फेसबुक, ओरेकल, एडोबी, सॉफ्टबैंक, कॉग्निजेंट और मास्टरकार्ड सहित कई बड़ी कंपनियों में सर्वोच्च पदों पर भारतीय काबिज हैं।

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क्या बीबीसी की बातों में आकर डोनाल्ड ट्रम्प सत्य नडेला और सुन्दर पिचाई को यूएस से निकाल देंगे क्या? कोई भी देश सबसे ज्यादा आय वाले प्रवासी समाज, जो उस देश की जीडीपी में अहम योगदान दे रहा है, उसे निकाल सकता है क्या? अमेरिका में भारतीय सभी प्रवासी व एथनिक समूहों में सबसे ज्यादा शिक्षित हैं। वुसतुल्लाह ने सस्ता नशा कर के अमेरिका में रहने वाले भारतीयों की उन रोहिंग्या मुसलमानों से तुलना की है, जिनमें से कई आए दिन चोरी-डकैती से लेकर अन्य वारदातों में पुलिस के हत्थे चढ़ते रहते हैं।

यहाँ तक कि ख़ुद बीबीसी का अपना देश ब्रिटेन उसकी बात को नहीं मानेगा। बॉरिस जॉनसन ने वो सस्ता नशा नहीं किया है, जो बीबीसी के अधिकतर पत्रकार कर के आर्टिकल लिखने बैठते हैं। उर्दू वाले जम्मू कश्मीर को लेकर झूठी ख़बरें चलाते हैं, हिंदी वाले प्रवासी भारतीयों को धमकाते हैं। 15 लाख के क़रीब भारतीय रहते हैं ब्रिटेन में, जो राजनीति से लेकर मनोरंजन इंडस्ट्री तक में सक्रिय हैं। वे चोरी-डकैती नहीं करते, आतंक नहीं फैलाते। ब्रिटेन में भारतीय सबसे कम ग़रीबी दर वाले एथनिक समाज हैं।

जहाँ यूके में रोज़गार दर 74% है, वहाँ रहने वाला भारतीय समाज 73% रोज़गार दर के साथ कड़ी टक्कर देते हुए दिखता है। मीडियन टोटल संपत्ति की बात करें तो वाइट ब्रिटिशर्स के बाद प्रवासी भारतीय ही आते हैं। बीबीसी के इस भ्रामक लेख को देख कर तो यही लगता है कि इन्हें यही नहीं पता कि इनके देश की जीडीपी में भारतीयों का क्या योगदान है? इसी तरह कनाडा की भी बात की गई है। बीबीसी को यह बता देना ज़रूरी है कि 2015 में जब कनाडा में जब जस्टिन ट्रुडो की सरकार बनी थी, तो 4 सिख मंत्रियों ने शपथ ली थी।

जहाँ के 4 अहम मंत्रालय भारतीय मूल के लोग सँभाल रहे हों, वहाँ से भारतीयों को निकालने वाली बात या तो बीबीसी जैसा प्रोपेगंडाबाज पत्रकार ही कर सकता है और नहीं तो वुसतुल्लाह ख़ान जैसा कोई ऐसा व्यक्ति, जो भारतीयों से घृणा करता हो, भारतीयों के प्रति गन्दी सोच रखता हो। जिस देश की सत्ता भारतीय चला रहे हों, उस देश से भारतीयों को निकालोगे! वाह! अव्वल तो यह कि बीबीसी पूछता है कि ऐसी स्थिति में गृहमंत्री अमित शाह क्या करेंगे?

पहली बात तो यह कि ऐसी स्थिति आ ही नहीं सकती। ऊपर से अगर विदेश में रह रहे भारतीयों पर कोई आँच आती भी है तो भारत सरकार किस प्रकार का एक्शन लेती है, सुषमा स्वराज के मंत्रित्वकाल में हमने देखा है। उससे पहले भी जब ऐसी कोई भी दिक्कत आई, भारत सरकार ने कुवैत से लेकर यमन तक हस्तक्षेप किया है। अब आपको इस आर्टिकल की एक ऐसी बात बताते हैं, जिसकी चर्चा हमने अब तक इसीलिए नहीं की क्योंकि पहले हम डेटा के माध्यम से बीबीसी को जवाब देना चाहते हैं।

बीबीसी ने अपनी बात साबित करने के लिए बेहूदा उदाहरण लिया है। युगांडा का उदाहरण लेकर दिखाया गया है कि वहाँ से भारतीयों को निकाल दिया गया था और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी कुछ नहीं कर पाई थीं। लेकिन, बीबीसी ने इस कार्य को अंजाम देने वाले जिस सनकी तानाशाह का जिक्र किया है, उसे ‘युगांडा का कसाई’ भी कहते हैं। जी हाँ, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की पूर्ण बहुमत से चुनी गई सरकार द्वारा लिए गए निर्णय की तुलना अफ्रीका के एक ख़ूनी तानाशाह से की गई है।

क्या मोदी सरकार द्वारा लिया गया निर्णय ‘युगांडा के तानाशाह कसाई’ के निर्णय से मेल खता है? बीबीसी के पूरे लेख का सार यही है। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ और मानवाधिकार संगठनों की मानें तो ईदी अमीन ने अपने कार्यकाल में 5 लाख लोगों को मौत के घाट उतार दिया। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। मोदी सरकार जो भी अहम निर्णय ले रही है, वे सभी पार्टी के चुनावी घोषणापत्र में शामिल थे। भाजपा ने अप्रैल 2018 में लोकसंभा चुनाव से एक वर्ष पहले ही ऐलान किया था कि फेज के आधार पर पूरे भारत में एनआरसी लागू की जाएगी।

कुछ भी चोरी-छिपे नहीं हुआ है। घोषणापत्र से लेकर चुनावी भाषणों तक में जनता का मैंडेट लेकर तब निर्णय लिए गए। ऐसे में भी अगर विश्व की सबसे बड़ी लोकतान्त्रिक पार्टी के मुखिया और सबसे बड़े लोकतंत्र के गृहमंत्री की तुलना एक तानाशाह मिलिट्री कमांडर से की जाती है तो या तो ये पागलपन है नहीं तो घृणा। इस मामले में दोनों है। बीबीसी यह देख कर पागल हो चुका है कि भारत में एक से एक बड़े निर्णय हो रहे हैं और सांस्कृतिक रूप से भी समृद्धता आ रही है। वहीं वुसतुल्लाह की भारतीयों के प्रति घृणा साफ़ झलक रही है।

इससे पता चलता है कि पागलपन में अंधा हो चुका बीबीसी घृणा से पंगु भी हो गया है। बीबीसी तो क्या, अगर उनके गिरोह विशेष के सारे लोग मिल जाएँ फिर भी दुनिया के किसी भी देश से प्रवासी भारतीयों को नहीं निकाला जा सकता। ऐसे घटिया सपने देख कर उन्हें आर्टिकल की शक्ल देने वाले बीबीसी को ही भारत से निकालने का समय आ चुका है। लेकिन नहीं, अभी तो उन्हें घृणा से और पागल होना है। एक बार पागलपन की हदें पार करते हुए इनके सभी एडिटर सड़क पर नंगा नाचने लगे, ये ख़ुद भारत छोड़ने को मजबूर हो जाएँगे।

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