काश! कश्मीर में दंगे हो जाते, घरों में आग लगाई जाती, सैकड़ों लोग मारे जाते! कितना मजा आता…

चूँकि कश्मीर में ऐसा कुछ नहीं हुआ, तो बीबीसी, वाल स्ट्रीट जर्नल और द वायर सरीखे प्रोपेगेंडा मीडिया ने झूठी खबरें गढ़ीं, लोगों को बताया कि अस्पताल कब्रगाह बन रहे हैं, लोगों को सेना बर्बरता से मार रही है।

कश्मीर घाटी की आबादी है लगभग सत्तर लाख। जम्मू-कश्मीर-लद्दाख को मिला दें तो 2011 की जनसंख्या लगभग सवा करोड़ की है। केन्द्र सरकार द्वारा कश्मीर से अनुच्छेद 370 के शक्तिहीन बनाने और 35A को हटाने के बाद, बीते दिनों से शांति बहाल करने के प्रयासों के तहत सरकार ने एहतियातन सुरक्षा बलों को तैनात किया हुआ है और कई इलाकों में फोन व इंटरनेट की सुविधा बंद कर रखी है।

ऐसा करना बहुत लोगों को मानवाधिकारों का उल्लंघन लगता है, जो कि लगेगा भी अगर आपको कश्मीर के हालात की जानकारी नहीं है। आप कल्पना कीजिए कि केन्द्र सरकार के फैसले के बाद वहाँ सुरक्षा बल नहीं होते, इंटरनेट और फोन चालू रहते और लोगों की आवाजाही पर कोई नियंत्रण न होता, तो क्या होता। अगर कल्पना करने में समस्या हो रही है तो आप उन दिनों की याद कीजिए जब हर शुक्रवार को पत्थरबाजी होती थी। याद कीजिए सेना के अफसरों द्वारा दिए गए आँकड़ों को जब वो बताते हैं कि हर साल लगभग 200 आतंकी मारे जा रहे हैं। फिर याद कीजिए कि इन सारे आतंकियों में 83% वो थे जो पत्थरबाजी किया करते थे।

अब याद कीजिए कि ये आतंकी क्या करते थे, वो भी तब जब कोई धारा 144 नहीं थी, कर्फ्यू नहीं था। इन्होंने ईद के लिए घर लौटते कश्मीरी जवान मंजूर अहमद बेग को नहीं मारा? या रायफलमैन औरंगजेब अपने आप किडनैप हो गए और उन्होंने आत्महत्या कर ली? ये भी तो कश्मीर के ही थे, मुसलमान ही थे, ईद पर घर आए थे, फिर इनके मानवाधिकारों का क्या? गिनाने पर आ जाऊँ तो और भी नाम गिना सकता हूँ लेकिन आप मेरा इशारा समझ गए होंगे।

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जब आपको पता हो कि एक फैसले से, जो एक बड़ी जनसंख्या के लिए लाभकारी होगी, लेकिन कुछ मुट्ठी भर आतंकी और अलगाववादी एवम् राजनैतिक अस्तित्व गँवाते नेता इस फैसले को आधार बना कर उपद्रव करेंगे और लाशें गिराएँगे, तो आप वृहद समाज की सुरक्षा के लिए क्या उन्हें महीने भर के लिए थोड़ी तकलीफ उठाने नहीं कह सकते? क्योंकि दूसरा उपाय नहीं है इसलिए, इन कश्मीरियों को, बिना किसी प्रकार का कष्ट पहुँचाए, सरकार ने कुछ लोगों के आतंकी मंसूबों को नियंत्रण में रखने के लिए कुछ सावधानियाँ बरती हैं। ये मानवाधिकारों का हनन नहीं है, ये मानवों को बचाना है ताकि महीने भर बाद जब स्थिति सामान्य हों तो वो भारतीय संविधान की छाया में अपने नागरिक अधिकारों का इस्तेमाल कर सकें।

मानवाधिकारों का हनन वह भी है जब बहुत बड़ी जनसंख्या को आतंकियों के खौफ में रहना पड़ता है। यहाँ तो सड़कों पर खड़ी पुलिस या सेना से आपको किसी भी तरह का डर तो नहीं है कि अपनी बात मनवाने के लिए वो आपको किडनैप कर लेंगे और कहीं कोने में ले जा कर गोली मार देंगे। मानवाधिकारों का हनन क्या होता है वो जा कर सीरिया में, लीबिया में, कई और इस्लामी देशों में, तानाशाही शासनों में, चीन में जा कर पता कीजिए। फोन लाइन बंद होना और इंटरनेट न चलना मानवाधिकारों का हनन नहीं है। अगर ऐसा करने से कुछ लोगों की जान बचती है, तो वो ही समझदारी है।

दिल्ली, लंदन और अमेरिकी मीडिया क्यों फैला रही है झूठ 

हाल ही में बीबीसी कश्मीर के दो लोगों से बातचीत करते हुए, साढ़े आठ बजे सुबह अपने हेडलाइन्स में भारतीय सेना द्वारा क्रूर टॉर्चर के आरोपों की बात करती दिखी। बीबीसी ने कहा कि उन्होंने ढूँढ निकाला कि ऐसा हो रहा है। और भारतीय सेना द्वारा टॉर्चर की खबरों की पुष्टि करने के लिए इन्होंने बात की एक आतंकी के भाई से, और एक अन्य व्यक्ति से। सवा करोड़ लोगों में दो लोगों से बात करते हुए, बीबीसी ने इसे हेडलाइन बना कर चला दिया और इसकी सत्यता की पुष्टि के लिए कोई प्रयास नहीं किया।

इसके बाद अमेरिकी मीडिया में वाल स्ट्रीट जर्नल ने यह लिख डाला कि कश्मीर में अस्पताल कब्रगाहों में तब्दील होते जा रहे हैं। लिखने की वजह एक कथित ‘हेल्थ क्राइसिस’ थी जो कि इनके पत्रकारों के हिसाब से सरकार द्वारा उठाए कदमों के कारण दवाइयों में सप्लाय की कमी के कारण लोगों के मरने के रूप में दिख रही थी।

इसके पहले प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘द वायर’ ने ऐसी ही बेहूदी रिपोर्ट चला दी जिसमें यह कहा गया कि कश्मीर में जीवनरक्षक दवाइयों की कमी होती जा रही है। इसका संज्ञान श्रीनगर के डीएम श्री शाहिद चौधरी ने लिया और लिखा कि ऐसी संवेदनाएँ तो ठीक हैं लेकिन पूरे प्रदेश में किसी भी दिन दवाइयों ती कोई कमी नहीं हुई, न ही सप्लाय में किसी भी तरह की समस्या आई। अगर किसी को कोई परेशानी है तो व्यक्तिगत मामलों के बारे में भी मदद के लिए वो उपलब्ध हैं।

इस पर ‘वायर’ के ‘लायर इन चीफ’ अपने रिपोर्टर के पक्ष में बोलने लगे कि उसकी रिपोर्टिंग सारी बातों को सामने लाती है। ‘द वायर’ और सिद्धार्थ वरदराजन जैसे लोगों के साथ समस्या यह हो गई है कि न तो इनके लिखे पर लोगों का कोई विश्वास है, न ही कोर्ट का। हाल ही में इनकी पत्रकारिता को न्यायालय ने ‘यलो जर्नलिज्म’ यानी सनसनी फैलाने वाली कहा था। इसलिए वरदराजन सड़क पर माइक ले कर भी चिल्लाते रहें कि उनके प्रोपेगेंडाबाज रिपोर्टर ने सच लिखा है, कोई विश्वास नहीं करेगा। खास कर तब, जब डीएम शाहिद चौधरी स्वयं ही ऐसे प्रोपेगेंडा को काट रहे हों।

इसके बाद, इसी विषय पर जम्मू-कश्मीर के पुलिस अधिकारी श्री इम्तियाज हुसैन ने वाल स्ट्रीट जर्नल की खबर पर ट्वीट करते हुए कहा कि ये पूरी तरह से एक प्रोपेगेंडा यानी झूठी कहानी गढ़ी गई है कि कश्मीर के अस्पताल कब्रगाह में बदल चुके हैं। उन्होंने बताया कि कश्मीर के सारे अस्पताल सामान्य रूप से काम कर रहे हैं, और दवाई आदि की कोई कमी नहीं है।

‘हेल्थ क्राइसिस’ की खबरों को गढ़ना एक सुनियोजित षड्यंत्र

आपने सोचा है कि अचानक से विदेशी मीडिया को इसमें इतनी रुचि क्यों होने लगी? इनके नाम पढ़ेंगे तो आपको जवाब मिल जाएगा कि ये आदत से मजबूर मीडिया संस्थान हैं जिन्होंने भारत को लेकर हमेशा नकारात्मक खबरें फैलाई हैं। इनका उद्देश्य हर तरह से भारत को ऐसे दिखाना है जैसे यहाँ किसी तानाशाह का शासन चल रहा है और यहाँ की सेना किसी कॉन्गो या इथियोपिया जैसे देश की बेलगाम सेना की तरह सामूहिक नरसंहार में व्यस्त है। इसीलिए बीबीसी और अल जजीरा जैसे लम्पट मीडिया वाले भारतीय सेना को दस हजार लोगों के ऊपर पैलेट गन चलाते दिखा देते हैं।

चूँकि सेना द्वारा अत्याचार की खबर चल नहीं पाई, कोई सबूत मिल नहीं पाया, न कोई सत्यापित विडियो है, न ही किसी तरह की मानवाधिकारों के उल्लंघन की सही खबर, तो अब ये कल्पनाशीलता के आधार पर ये मान कर चल रहे हैं कि कश्मीर में तो स्वास्थ्य समस्या पैदा हो गई है, और लोग दिन-रात मर रहे हैं। इसीलिए, अब मानवाधिकारों की बात को साइड में ‘मिलिट्री क्लेम्पडाउन’ कहते हुए फोकस इस बात पर शिफ्ट किया जा रहा है कि लोग मर रहे हैं क्योंकि दवाई नहीं है।

जबकि सोचने की बात यह है कि जब केन्द्र सरकार इतना बड़ा फैसला ले रही थी, और हजारों की संख्या में जवानों को सुरक्षा व्यवस्था को नियंत्रण में रखने के लिए भेज चुकी थी, पेट्रोल पंप में महीने भर के तेल और सरकारी संस्थानों में राशन से लेकर ईद के लिए बकरे तक का इंतजाम कर रही थी, तो क्या सरकार स्वास्थ्य जैसी सुविधा के लिए तैयार नहीं रही होगी?

श्रीनगर के डीएम शाहिद चौधरी को लगभग हर सप्ताह लिखना पड़ रहा है कि इन झूठी खबरों पर विश्वास न करें, यहाँ स्थिति नियंत्रण में है और किसी भी तरह की हेल्थ क्राइसिस नहीं है। उन्होंने कहा कि कुछ परेशानियाँ ज़रूर हैं जो कि केन्द्र के फैसले के बाद सुरक्षा के लिहाज से जन्मी हैं, लेकिन उसे क्राइसिस नहीं कह सकते। उन्होंने कहा कि लोगों को इन विदेशी मीडिया पर विश्वास होगा और स्थानीय डीएम की बातों को शायद वो गंभीरता से न लें, लेकिन वो हर व्यक्ति की हर संभव मदद को तत्पर हैं।

उन्होंने फिर कुछ आँकड़े दिए जिसमें अलग-अलग अस्पतालों में हुई सर्जरी आदि का ब्यौरा है। उन्होंने बताया कि ये आँकड़े पिछले महीने के औसत के हिसाब से मेल खाते हैं। यानी कि किसी भी तरह की समस्या नहीं है जैसे कि वाल स्ट्रीट जर्नल ने लिख दिया कि लोग हर रोज मर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह की रिपोर्टिंग से उन्हें दुःख होता है क्योंकि कुछ परेशानियों से इन्कार नहीं है लेकिन इसे इस तरह से प्रस्तुत करना बहुत ही गलत है।

प्रोपेगेंडा मशीनरी का यही काम है

जब मोदी सरकार ने यह फैसला लिया तो विरोधियों की संख्या दिन-ब-दिन घटती ही चली गई। शुरु में विरोध करने वालों के सुर बदलने लगे कि बाँटना तो ठीक है लेकिन तरीका गलत है। ये बातें भी बस कहने के लिए कही जाती हैं क्योंकि ‘तुमने आम खा लिया वो ठीक बात है लेकिन उसे छीला गलत तरीके से’ कहना बकैती है, तर्क नहीं। कॉन्ग्रेस वाले भी इस पर विभाजित दिखे और जो समझदार थे, उन्होंने जनता का रुख देखते हुए, गोल-गोल बात करते हुए स्थिति को अतंतः स्वीकार ही लिया।

मीडिया के गिद्धों को लगा था कि जो दंगे और रक्तपात मोदी के पहले कार्यकाल में नहीं हुआ, योगी के आने पर नहीं हुआ, मोदी के दूसरी बार आने पर नहीं हुआ, वो इस बार शायद हो जाए क्योंकि बात कश्मीर की है। लेकिन सरकार और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की सूझबूझ के कारण किसी भी तरह की बड़ी हिंसा की घटना नहीं हुई। कुछ लोगों के मरने की खबर आई हैं जो कि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकियों का शिकार बने। कहीं किसी ट्रक चालक नूर मोहम्मद पत्थरबाजों का शिकार हुए तो कहीं दो गुर्जर भाइयों को आतंकियों ने हाथ-पाँव बाँध कर बेरहमी से मार डाला।

यानी, जो सोचा गया था कि आंतरिक सुरक्षा के मामले में सरकार फँस जाएगी, वहाँ भी ऐसे ही निर्दोष नूर मोहम्मद या अहमद और कादिर को आतंकियों ने मारा। अपने ही कश्मीरी लोगों को, कश्मीर के आतंकियों ने मारा क्योंकि उनके हाथ बँध चुके हैं। सेना इन आतंकियों को करियर बनाने से पहले ही जहन्नुम भेज रही है, तो बिलबिलाहट में ये किसी भी निर्दोष व्यक्ति की हत्या कर दे रहे हैं। जिहाद की राह में निर्दोषों की हत्या करना कश्मीरी मुसलमान आतंकियों के लिए कोई पहली घटना नहीं है।

इसलिए, प्रपंच फैलाया जा रहा है कि अस्पतालों में लोग मर रहे हैं, जीवनरक्षक दवाइयाँ नहीं हैं। आप सोचिए कि आखिर यही चार-पाँच मीडिया वाले, इसी एक तरह की रिपोर्टिंग क्यों कर रहे हैं? आखिर दो लोगों के बयान के आधार पर पूरी सेना को बर्बर कहने की रिपोर्टिंग का लक्ष्य क्या है? अमेरिकी अखबार को भारत के एक हिस्से के अस्पतालों पर झूठ लिखने की क्यों जरूरत पड़ती है?

आखिर कश्मीर के मुद्दे को मुसलमानों का मुद्दा क्यों बनाया जा रहा है? कश्मीर का मुद्दा अगर कुछ है तो वो है गिलगिट बल्तिस्तान का, पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर का, जहाँ से लोग पाकिस्तानी सेना द्वारा गायब कर दिए जाते हैं, आर्थिक स्थिति बहुत खराब है, ज़िन्दगी कठिनाइयों से भरी हुई है। लेकिन वहाँ की रिपोर्टिंग करने में न तो बीबीसी को रुचि है, न वाल स्ट्रीट जर्नल को। आप सोचिए कि इन चार-पाँच निर्दोष कश्मीरियों की हत्या का, जिनके लाशों की फोटो हर जगह हैं, उसके ऊपर बीबीसी की रिपोर्टिंग, इन-डेप्थ एनालिसिस क्यों गायब है? आप सोचिए कि ‘द वायर’ ने आज तक कश्मीरी आतंकियों द्वारा ली जा रही जानों पर कोई वैचारिक स्तंभ क्यों नही लिखे?

सोचिए… सोचते रहिए… जवाब नहीं मिलेगा क्योंकि प्रोपेगेंडा पत्रकारिता में खबरें गढ़ी भी जाती हैं, दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं को सामान्यीकृत उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, एक हिस्से को ही दिखाया जाता है, भविष्य में क्या हो सकता है उसकी नकारात्मक काल्पनिक रिपोर्टिंग होती है, ‘लोगों में डर का माहौल है’ कह कर लोगों को डराया जाता है, अपनी एक खबर के लिए कुछ लोग चाहते हैं कि दस-पचास लोग सड़क पर दंगे में मारे जाएँ ताकि वो आधे घंटे में सरकार, सेना या हिन्दू सवर्णों को इसका जिम्मेदार बता सकें।

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