Saturday, July 4, 2020
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अगर मोदी लोकतंत्र को बर्बाद कर रहा है, तो हमें बर्बाद लोकतंत्र ही चाहिए

अगर इस बर्बाद लोकतंत्र से घोटालेबाज़ों से सहानुभूति रखने वाले नेताओं की नींद उड़ती है, तो देश की जनता इसी बर्बाद लोकतंत्र में चैन की नींद सोएगी। इसीलिए, अब समय आ गया है कि नेतागण किसानों, युवाओं और ग़रीबों के मुद्दे उठाएँ, बनावटी और काल्पनिक मुद्दे नहीं।

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अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
चम्पारण से. हमेशा राइट. भारतीय इतिहास, राजनीति और संस्कृति की समझ. बीआईटी मेसरा से कंप्यूटर साइंस में स्नातक.

विपक्षी नेतागण हद से ज्यादा बोरिंग हो गए हैं। उनके घिसे-पिटे बयानों से अब देश की जनता को खीझ और बोरियत होने लगी है, जो कभी-कभी ग़ुस्से में भी तब्दील हो जाता है। प्रधानमंत्री के अंध-विरोध में ये इतने पागल हो चुके हैं कि जब किन्हीं भ्रष्टाचार, अपराध या देशद्रोह के आरोपितों के यहाँ सरकारी एजेंसियों की दस्तक पड़ती है, तो सबसे पहले इन नेताओं के ही कान खड़े होते हैं। आतंक-विरोधी अभियान से लेकर भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई तक – विपक्षी दलों के ये नेता इन सभी का राजनीतिकरण करने की भरसक कोशिश करते हैं।

विजय माल्या को यूपीए कार्यकाल के दौरान हजारों करोड़ के लोन दिए जाते हैं। मोदी सरकार उसके प्रत्यर्पण में पूरी ताक़त झोंक देती है और उसकी सम्पत्तियों को एक-एक कर ज़ब्त करती है। लेकिन, लोकतंत्र की बर्बादी मोदी कर रहे हैं। अगस्ता-वेस्टलैंड हैलीकॉप्टर घोटाला यूपीए कार्यकाल में होता है। मोदी सरकार उस घोटाले के मामले में क्रिस्चियन मिशेल सहित अन्य दलालों के प्रत्यर्पण में सफल होती है। लेकिन, लोकतंत्र को बर्बाद मोदी कर रहे हैं। प्रवर्तन निदेशालय थाईलैंड में घुसकर आर्थिक भगोड़े मेहुल चौकसी की फैक्ट्री को ज़ब्त कर लेता है। लेकिन नहीं, मोदी तो लोकतंत्र को तार-तार करने में व्यस्त हैं।

चिटफंड घोटाले पश्चिम बंगाल में हुए, राज्य सरकार की नाक के नीचे। सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस के कई नेताओं के ख़िलाफ़ जाँच चल रही है। लेकिन भ्रष्टाचार पसंद नेताओं के लिए किसी घोटाले की जाँच भी लोकतंत्र की हत्या है। केंद्रीय जाँच एजेंसियों का बड़ी मछलियों पर कार्रवाई करना भी अलोकतांत्रिक और सुपर इमरजेंसी है। अधीर विपक्षी नेताओं का इस तरह से दिशा-विहीन हो जाना बताता है कि उनके पास असली मुद्दों की कमी है, या फिर उनके भीतर इस धारणा ने घर कर लिया है कि आम जान के मुद्दों को उठा कर मीडिया की सुर्खियाँ नहीं बन सकते। आइए, कुछ बिंदुओं की पड़ताल कर बोरियत की पराकाष्ठा बन चुके इन मुद्दाविहीन नेताओं की मदांध अधीरता पर एक नज़र डालते हैं।

कुछ अलग बोलो या असली मुद्दे उठाओ

ताज़ा बयान कर्नाटक के सीरियल रोंदू मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी का है। वो और उनके पिता पूर्व-प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा रोते-रोते सत्ता की मलाई चाभने में माहिर हैं। 225 सदस्यीय विधानसभा में 37 सीटों वाली पार्टी कर्नाटक जैसे बड़े राज्य में सरकार चला रही है और साथ ही एक बहुमत वाली सरकार पर लोकतंत्र की हत्या के आरोप मढ़ रही है। यह सब देख कर विडंबनाओं ने भी अपना सर घूँघट से ढक लिया है। एचडी कुमारस्वामी ने कहा है कि पीएम मोदी देश के लोकतंत्र को बर्बाद कर रहे हैं और लोगों को भ्रमित कर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने विपक्ष के ईवीएम राग में अपना सुर मिलाते हुए कहा था कि भाजपा को अब सत्ता का ऐसा नशा चढ़ गया है कि वह हर कीमत पर सत्ता हथियाने के क्रम में लोकतंत्र की प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रुप से हत्या तक करने पर उतारु लगती है। अपने शासनकाल के दौरान पूरे यूपी को अपनी और अपनी पार्टी के चुनाव चिन्ह हाथी की मूर्तियों से पाट देने वाली मायावती लोकतंत्र की नई रक्षक हैं।

यूपी के ही एक और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी कहा था कि 2019 के संसदीय चुनाव में यदि बीजेपी जीत गई तो देश में लोकतंत्र खत्म हो जाएगा। बम धमाके के दोषी आतंकियों के ख़िलाफ़ अभियोग वापस लेने का प्रयास करने वाली तत्कालीन समाजवादी पार्टी सरकार को इलाहबाद उच्च न्यायालय ने कड़ी डाँट पिलाई थी, लेकिन मोदी सरकार लोकतंत्र की हत्यारी है क्योंकि अब आतंकियों को जहन्नुम का रास्ता दिखा दिया जाता है, उन्हें जल्द से जल्द सज़ा दिलाई जाती है।

कमोबेश यही हाल पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का भी है। बंगाल में लोकतंत्र की जगह तानाशाही प्रेरित तृणमूलतंत्र चलाने वाली ममता को लोकतंत्र सिर्फ इसलिए ख़तरे में नज़र आ रहा है, क्योंकि सरकारी जाँच एजेंसियाँ सुचारू रूप से अपना कार्य कर रहीं हैं। बंगाल में ममता के कार्टून बनाने वाले भी जेल की हवा खाते हैं, लेकिन तृणमूलतंत्र सेक्युलर है, उसके ख़िलाफ़ आवाज उठाना गुनाह है।

राजद सुप्रीमो लालू यादव के सुपुत्र और बिहार के पूर्व उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को भी मोदी में लोकतंत्र के लिए ख़तरा दिखता है। तेजस्वी यादव के अनुसार, मोदी के कार्यकाल के दौरान लोकतंत्र तार-तार हो गया है। बिहार को 15 वर्षों तक अपने परिवार की जागीर समझ कर चलाने वाले लालू यादव फ़िलहाल तो जेल में अपने भ्रष्टाचार की सज़ा भुगत रहे हैं, लेकिन उनके ट्विटर हैंडल से लगातार लोकतंत्र रक्षा संबंधी ट्वीट्स आते रहते हैं।

अगर इस सूची में राहुल गाँधी की बात न करें तो शायद यह लेख अधूरा रह जाए। एक ही बेढंगे बात को दिन में 100 बार बोलने वाले राहुल तो हवा में ऐसी बोरियत फैलाते हैं, जिसे न्यूट्रलाइज़ करना किसी के भी वश की बात नहीं। देश में कभी आपातकाल लगाने वाली पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल ने कहा था कि वो किसी भी क़ीमत पर लोकतंत्र की रक्षा करेंगे। अब सोचने वाली बात यह है कि आखिर इन नेताओं का लोकतंत्र-प्रेम अभी ही क्यों जाएगा है?

अच्छा, तो घाव यहाँ है

दरअसल, दिक्कत कहीं और है। वो क्या है, हम बताते हैं। लोकतंत्र और संविधान की दुहाई देते नहीं थकने वाले इन मौक़ापरस्त नेताओं का संवैधानिक संस्थाओं से ही भरोसा उठ गया है। सीबीआई और सेना से लेकर न्यायपालिका तक- इन्होने सबका राजनीतिकरण करने की पूरी कोशिश की है। संसद के भीतर भ्रष्टाचार मिटाने की बात करने वाले ये नेता संसद के बाहर भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई होते ही तिलमिला उठते हैं।

रॉबर्ट वाड्रा के द्वारा ज़मीन खऱीद में की गई अनगिनत अनियमितताओं की जाँच चल रही है और दामाद जी को प्रवर्तन निदेशालय के दफ़्तर में हाज़िरी लगानी पड़ रही है। शारदा और रोज़ वैली चिटफंड घोटालों की आँच ममता तक जा पहुँची है और आरोपितों को शिकंजे में लेने की पूरी कोशिश की जा रही है। जीएसटी जैसे बड़े टैक्स सुधार क़ानून को लागू करने के लिए जिस इच्छाशक्ति और जनसमर्थन की ज़रूरत थी- मोदी सरकार ने वो सब सफलतापूर्वक जुटाया। फ़र्जी कंपनियों की पोल खुल रही है, आर्थिक अनियमितता करने वाले पकड़े जा रहे हैं। 20,000 विदेशी फण्ड से चलने वाले NGO बंद किए जा चुके हैं, लाखों शेल कम्पनियाँ बंद करके उन्हें टैक्स संबन्धित नोटिस थमा दिया गया।

क्या आर्थिक भगोड़ों और महाघोटालों के दलालों का प्रत्यर्पण लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक है? क्या जनता के करोड़ों रुपए लेकर नेताओं और व्यापारियों को फ़ायदा पहुँचाने वाली चिटफंड कंपनियों पर कार्रवाई से लोकतंत्र तार-तार हो जाता है? क्या नोटबंदी और जीएसटी जैसे बड़े आर्थिक सुधार कार्यक्रमों से हजारों फ़र्जी कंपनियों का पकड़ा जाना लोकतंत्र की हत्या है? क्या संवैधानिक संस्थाओं का बड़े आरोपितों के खिलाफ़ स्वतंत्रतापूर्वक जाँच करना अलोकतांत्रिक है? अगर ये सब करने से लोकतंत्र बर्बाद होता है, तो देश की जनता को यही बर्बाद लोकतंत्र चाहिए।

अगर ऐसे बर्बाद लोकतंत्र से अपराधियों (आर्थिक भगोड़ों, घोटाले के बिचौलियों और फ़र्जी कंपनियों) में ख़लबली मचती है, तो देश की जनता को यही लोकतंत्र चाहिए। अगर इस बर्बाद लोकतंत्र से घोटालेबाज़ों से सहानुभूति रखने वाले नेताओं की नींद उड़ती है, तो देश की जनता इसी बर्बाद लोकतंत्र में चैन की नींद सोएगी। इसीलिए, अब समय आ गया है कि नेतागण किसानों, युवाओं और ग़रीबों के मुद्दे उठाएँ, बनावटी और काल्पनिक मुद्दे नहीं।

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अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
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