Saturday, October 16, 2021
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भारत के सदानंद मास्टर हों या चीन का थियानमेन चौक: वामपंथी छल-बल ने मानवता को दिए हैं बेहिसाब घाव

भारत के वामपंथी जो मानवाधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विषयों को चीख-चीख कर उठाते हैं, वे आज तक चीन की वामपंथी सरकार द्वारा की गई इस नृशंसता पर अपना होंठ सिले बैठे हैं।

कोई विचारधारा जब स्वयं के अतिरिक्त किसी और के अस्तित्व को स्वीकार नही कर पाती है तो उसका हिंसक हो जाना ही उसकी अंतिम परिणति होती है। वामपंथ के झंडे तले समय-समय पर उगने वाली दर्जनों विचारधाराओं में यह दोष व्याप्त रहा है। वे अपने नाकारा सिद्ध हो चुके सिद्धांतों की आड़ लेकर सबको गलत घोषित करती हैं और एक सीमा के बाद हिंसा के माध्यम से अपने विरुद्ध उठने वाले आलोचना के प्रत्येक स्वर को जड़ से समाप्त करने निकल पड़ती हैं। इसका परिणाम यह हुआ है कि वामपंथ की वैचारिक परिधि में पनपी विचारधाराओं का इतिहास और वर्तमान भी हिंसा और रक्त से सना हुआ है।

20वीं शताब्दी में रूस की बोल्शेविक क्रांति के बाद से ही जहाँ-जहाँ वामपंथी सत्तासीन हुए, उन देशों और क्षेत्रों में राजनीतिक हत्याओं और नरसंहारों की लम्बी फेहरिस्त है। साल 1997 में आई ‘द ब्लैक बुक ऑफ कम्युनिज्म: क्राइम्स, टेरर, रिप्रेशन (The Black Book of Communism: Crimes, Terror, Repression)’ में लगाए गए सांख्यिकीय अनुमानों के मुताबित, साम्यवाद, स्टालिनवाद, माओवाद तथा इनकी अन्य सहोदर विचारधाराओं ने 10 करोड़ मनुष्यों को मंशापूर्ण ढंग से जान से मारा है। वहीं 2017 में बोल्शेविक क्रांति के सौ साल पूरे होने पर ‘वाल स्ट्रीट जर्नल’ में छपे एक लेख में प्रोफेसर एस. कोत्किन ने बताया था कि 10 करोड़ का आँकड़ा सिर्फ सीधे तौर पर हुई हत्याओं और नरसंहारों का है। इससे कहीं अधिक संख्या में तो लोग कम्युनिस्ट शासनों के द्वारा पैदा की गई भूखमरी और सुनियोजित दुर्व्यवस्थाओं में मारे गए हैं।

वामपंथ के त्रासदीपूर्ण इतिहास में कुछ पृष्ठ इतने लोमहर्षक हैं कि वे सम्पूर्ण मानवता की स्मृति में एक स्थायी पीड़ा के रूप में अंकित हो चुके हैं। ऐसी ही एक घटना थी चीन की राजधानी बीजिंग के थियानमेन चौक पर 04 जून 1989 को हुआ हजारों छात्रों का बर्बर नरसंहार। देंग जिओपिंग के नेतृत्व वाली चीन की साम्यवादी सरकार ने निर्दोष छात्रों के ऊपर सेना के टैंक चला दिए थे।

उन छात्रों की माँग थी कि चीन की सरकार उन्हें कुछ मूलभूत मानवीय अधिकार दे। जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की माँग प्रमुख थी। वामपंथी दुनिया के अन्य देशों में तो वैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हिमायती होने का दावा करते नहीं थकते हैं, लेकिन जिस जगह भी वे सत्ता में आते हैं वहाँ विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को वे पूरी तरह कुचल देते हैं।

चीन में 1949 में सत्ता हासिल करने के बाद ही माओवादी व्यवस्था में किसी भी नागरिक को बोलने या स्वतंत्र चिंतन करने की आजादी नहीं है। मीडिया को काम करने की छूट नहीं है। लोगों की आवाज को दबाने के लिए सेंसरशिप, प्रतिबन्ध, निषेधाज्ञा, कारावास, हिंसा एवं हत्याएँ वामपंथी कानूनों का हिस्सा है।

तीन दशक पहले, मार्च-अप्रैल 1989 से ही बीजिंग में युवा एवं छात्र अपनी कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार की इस अमानवीय परम्परा के खिलाफ खुलकर आने लगे। समाचार एजेंसियों के ऊपर पूर्ण सरकारी नियंत्रण होने के बावजूद भी सरकार के खिलाफ विरोध शुरू होने की खबर फैलने लगी। विरोध कर रहे छात्रों को मिलने वाला समर्थन बढ़ता गया। बीजिंग शहर की हृदयस्थली में बसा थियानमेन चौक ही छात्रों और युवाओं का प्रदर्शन स्थल बन गया। धीरे-धीरे इस प्रदर्शन की खबर अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में भी फ़ैल गई।

हालाँकि, चीन में स्थानीय या विदेशी, किसी भी प्रकार के मीडिया को यह प्रदर्शन कवर नहीं करने दिया जा रहा था। कम्युनिस्ट पार्टी आफ चाइना की सरकार ने इस विरोध के स्वर में विद्रोह का नाद सुन लिया था। इसलिए उसने इस विरोध को कुचलने के लिए एक ऐसा तरीका चुना कि आने वाले दशकों तक फिर कोई चीन की साम्यवादी सरकार के खिलाफ बोलने की हिम्मत ना कर सके। चीन की सेना, जिसे ‘पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA)’ कहते हैं, उसे टैंकों का प्रयोग करके प्रदर्शनकारियों को समाप्त करने के लिए कहा गया।

3-4 जून, 1989 की रात्रि में प्रदर्शन स्थल को रौंद दिया गया। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि कई हज़ार की संख्या में युवा मारे गए। परन्तु चीनी सरकार ने एक आधिकारिक प्रेस रिलीज जारी कर मृतकों की संख्या 300 बताई। इस पूरी घटना के जो प्रत्यक्षदर्शी थे, उनके बयानों के आधार पर कैनेडियन पत्रकार टिमोथी ब्रूक ने ‘जन दमन’ (क्वेल्लिंग द पीपल) नामक पुस्तक लिखी। बाद में थियानमेन की घटना और उसकी पृष्ठभूमि पर और भी पुस्तकें आईं। लेकिन वे सभी पुस्तकें चीन में प्रतिबंधित हैं। यहाँ तक कि वे साम्यवादी रुझान वाली सभी व्यवस्थाओं में प्रतिबंधित हैं।

भारत के वामपंथी जो मानवाधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विषयों को चीख-चीख कर उठाते हैं, वे आज तक चीन की वामपंथी सरकार द्वारा की गई इस नृशंसता पर अपना होंठ सिले बैठे हैं। विश्वविद्यालयों के सेमिनार कक्षों और मीडिया जगत में संपादकीय कुर्सियों से देश का विमर्श नियंत्रित करने वाले वामपंथियों ने थियानमेन नरसंहार की पूरी घटना को ही अनदेखा कर दिया।

यदि इस घटना का भारत के लोगों को उसी समय विस्तार से पता चल गया होता तो वामपंथी पाखंड उसी समय पूर्ण रूप से उजागर हो गया होता। देश ने यह देख लिया होता कि ऊँची आवाज में ‘बोलने की आज़ादी’ का नारा लगाने वाले वामपंथी ही ‘बोलने की आजादी’ के सबसे बड़े दुश्मन रहे हैं। देश ने यह भी देख लिया होता कि ‘पीपुल’ या जनता की दुहाई देकर अपनी राजनीति करने वालों ने चीन के युवाओं का जिस सेना से दमन किया उसके नाम में भी ‘पीपुल’ लगा हुआ था। वामपंथ की कलई तभी खुल गई होती।

हालाँकि, भारत में वामपंथ अपने कुकर्मों के बोझ तलें देर सबेर गिर ही गया। पश्चिम बंगाल में भी वामपंथी पार्टियों ने 34 साल के अपने शासन में राजनीतिक सभ्यता और शिष्टाचार को ताक पर रख कर पूरी तरह से लोकतंत्र को ध्वस्त किया। कैसे भुलाया जा सकता है 1979 में वामपंथी सरकार द्वारा मरीचछापी में शरण माँगने आए निःसहाय दलितों का भीषण नरसंहार? कौन भूल सकता है 21 जुलाई 1993 की घटना को जब बंगाल की वामपंथी सरकार ने विरोध-प्रदर्शन कर रहे युवा कार्यकर्ताओं पर खुलेआम गोलियाँ चलवा दी थी, जिसमे 13 लोग मारे गए थे।

इस मामले की जाँच कर रहे आयोग के अध्यक्ष पूर्व न्यायाधीश सुशांत चटोपाध्याय ने इस घटना को ‘जलियांवाला बाग नरसंहार’ से भी बदतर करार दिया था। यह देश सिंगुर-नंदीग्राम के उस रक्तपात को कैसे भूला पाएगा जिसमें किसानों और मजदूरों को निशाना बनाकर पश्चिम बंगाल की वाम मोर्चा सरकार ने गोलियाँ चलवाई। केरल में आए दिन राष्ट्रीय विचार के संगठनों के लोगों को वामपंथी गुंडों के द्वारा मारा जाता है। चाहे केरल के सदानंद मास्टर के दोनों पैरों को काट डालने का दुस्साहस हो या उस्मानिया यूनिवर्सिटी में तिरंगा फहराने के लिए माओवादियों द्वारा मार दिए गए जगनमोहन रेड्डी हों या फिर बंगाल की तपसी मालिक जैसी युवतियों को वामपंथी कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया बलात्कार और जलाकर मार डालने की घटना हो- भारत में भी वामपंथियों ने अपने अत्याचारों को अपने चरम पर पहुँचाने में कोई कोताही नहीं बरती है।

आज की तारीख में भी चीन की सरकार के द्वारा हांगकांग में लोकतंत्र के समर्थकों पर अत्याचार हो रहे हैं। तिब्बत और शिनजियांग क्षेत्रों में स्थानीय लोगों के साथ बर्बरता हो रही है। भारत में निर्वासित जीवन जी रहे तिब्बती समुदाय के लोग वामपंथी एक्टिविस्टों के लिए कभी विषय नहीं रहे। 1962 के चीन हमले के समय ही वामपंथियों ने चीन के प्रति अपनी निष्ठा को उजागर कर दिया था। आज जब सम्पूर्ण विश्व कोरोना महामारी से सम्बंधित सूचना छिपाने के लिए चीन को दोषी करार दे रहा है, तो वामपंथियों का प्रचार तंत्र चीन का चारण-गान कर रहा है।

आज कोरोना जैसी विकट समस्या का सामना पूरा विश्व कर रहा है। इसके मूल में सत्य को छल और बल के द्वारा छिपाने की कम्युनिस्ट मानसिकता है। जब चीन में डॉक्टर ली वेन लियांग ने दिसम्बर में कोरोना की पहचान करके इसके विषय में बोलना शुरू किया था, उसी समय उनकी बात को सुना जाना चाहिए था। लेकिन चीन की सरकार ने उस डॉक्टर की आवाज़ को सदा-सदा के लिए दबा दिया। मध्य जनवरी तक अपनी साख बचाने के लिए चीन की सरकार दुनिया के आगे कोरोना को लेकर नए-नए झूठ बोलती रही। नतीजतन, आज हमें इतनी मुश्किलों भरे दिन देखने पड़ रहे हैं।

पिछले सौ सालों में वामपंथी सोच के कारण मानवता के शरीर पर अनेक घाव लगे हैं। आज के दिन 32 वर्ष पहले थियानमेन चौक पर जो बर्बरता हुई, वो आने वाली पीढ़ियों को वामपंथ के वास्तविक चेहरे का परिचय कराती रहेगी। आज के दिन चीन के उन लोकतंत्र-आकांक्षी युवाओं ने अपने प्राण देकर कभी ना भुलाया जा सकने वाला सन्देश दिया। आज की पीढ़ी के युवाओं को वामपंथ से लड़ते हुए शहीद होने वाले हर व्यक्ति के बलिदान का मूल्य समझना चाहिए।

(लेखक श्री श्रीनिवास, अभाविप के राष्ट्रीय संयुक्त संगठन सचिव हैं)

 

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