अपने निकम्मेपन को छिपाने के लिए राबड़ी को बिहार का नेहरू बना रहे हैं सुशील मोदी

अगर 1990 से 2005 तक लालू-राबड़ी ने बिहार का कबाड़ा किया तो 2005 से आज तक के समय में 14 में से 9 साल शासन करने वाली राजग ने क्या किया और पूरे 14 साल से सत्ता पर काबिज़ जदयू ने क्या किया?

सुशील कुमार मोदी- एक ऐसा नाम, जो बिहार में तब से प्रासंगिक है, जब से लालू-नीतीश-रामविलास का उद्भव हुआ। सुशील मोदी भी इन्हीं तीनों की तरह जेपी आंदोलन की उपज हैं, लम्बे समय से राजनीति में सक्रिय हैं, छात्र राजनीति से निकले हैं, बिहार की गठबंधन सरकार में दूसरे नंबर के नेता हैं और लालू परिवार के ख़िलाफ़ अदालत जाने के लिए भी इन्हें जाना जाता है। तमाम उपलब्धियों के बावजूद अगर इतने बड़े स्तर का नेता अपने निकम्मेपन का ठीकरा उस लालू-राबड़ी सरकार पर फोड़े, जिसके बारे में जानने को कुछ नया न बचा हो, जिसकी कारस्तानियाँ पूरा बिहार जानता हो, तो यह अजीब है। सुशील मोदी अपनी, अपने गठबंधन सरकार की, अपनी पार्टी की और अपने सहयोगियों के निकम्मेपन को छिपाना चाह रहे हैं।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में टाल गए सवाल, जवाबदेही से भागने का कारण क्या?

सुशील मोदी ने जब प्रेस कॉन्फ्रेंस किया तो पत्रकारों ने उनसे मुजफ्फरपुर में Acute Encephalitis Syndrome (AES) से लेकर सवाल पूछे लेकिन उन्होंने जवाब देने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि ये मीडिया ब्रीफिंग बैंकिंग कमिटी के सम्बन्ध में बुलाई गई है और वह मुजफ्फरपुर त्रासदी से जुड़े सवालों के जवाब नहीं देंगे। अगर कोई अन्य मंत्री या विधायक ऐसी बात करता तो यह क्षम्य था लेकिन बिहार गठबंधन के सबसे बड़े सूत्रधार और बीच के 4 वर्षों को छोड़ दें तो 2005 से लगातार बिहार सरकार में मुख्यमंत्री के बाद सबसे बड़े नेता की ज़िमेम्दारी निभाने वाले व्यक्ति को यह बात शोभा नहीं देती कि वह इस तरह के सवालों से भागे।

सवाल सुशील मोदी से बनता है, सवाल नीतीश कुमार से बनता है कि 2005 से लेकर अब तक पिछले 15 वर्षों में बिहार में स्वास्थ्य सिस्टम में बदलाव लाने के लिए क्या किया गया है? 49 वर्षों पहले बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री के नाम पर स्थापित किया गया मुजफ्फरपुर का SKMCH, मेडिकल के पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स से आज भी क्यों महरूम है? लालू-राबड़ी पर हमें जो बहस करना था कर चुके, जनता को जो हिसाब करना था वह कर चुकी और अदालत भी न्याय कर रही है- लेकिन, अगर 1990 से 2005 तक लालू-राबड़ी ने बिहार का कबाड़ा किया तो 2005 से आज तक के समय में 14 में से 9 साल शासन करने वाली राजग गठबंधन ने क्या किया और पूरे 14 साल से सत्ता पर काबिज़ जदयू ने क्या किया?

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सोचिए, अगर आज मुजफ्फरपुर के सबसे महत्वपूर्ण अस्पताल में पीडियाट्रिक्स (बाल चिकित्सा) विभाग में पोस्ट ग्रेजुएट की 10 सीटें भी होतीं तो स्थिति में कितना सुधार होता? शायद तब मुजफ्फरपुर में आसपास के जिलों से डॉक्टर नहीं बुलाने पड़ते। अब मीडिया में बात आने व इतनी संख्या में मौतों के होने के बाद अब नीतीश ने अस्पताल प्रशासन को इस सम्बन्ध में योजना तैयार करने को कहा है। इन छोटी-छोटी चीजों से बदलाव लाया जा सकता है, राबड़ी की आलोचना करने से नहीं। राबड़ी देवी को बिहार का नेहरू बनाने की ज़रूरत नहीं है। राबड़ी और लालू काल जा चुका है, उसके बाद हमने शासन को ट्रैक पर चलते भी देखा है, इसीलिए अब भी इस चीज के लिए लालू-राबड़ी की आलोचना करने का अर्थ है अपने निकम्मेपन को छिपाना।

लम्बे समय तक राज्य का वित्त मंत्री रहने के बावजूद ऐसी निष्क्रियता?

सुशील मोदी ने वो तमाम चीजें गिनाई जिनसे इस रोज के उन्मूलन का कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने कहा कि रोगियों को अस्पताल लाने का ख़र्च सरकार दे रही है, मुफ़्त में इलाज कर रही है, मृतकों के परिजनों को 4 लाख रूपए दिए जा रहे हैं और स्कूल-कॉलेज गर्मी के कारण बंद करा दिए गए। इनमें से कौन-सा ऐसा क़दम है जो इस बात की तस्दीक करता हो कि अगले वर्ष फिर से मासूमों की जानें नहीं जाएगी? इतना ही नहीं, सुशील मोदी ने उल्टा राजद से सवाल दागे कि राबड़ी काल में अस्पतालों को आवारा पशुओं का तबेला बना दिया गया था एवं मेडिकल कॉलेजों की दुर्दशा की गई थी। सुशील मोदी से बस एक सवाल, अगर किसी सरकार ने बिहार के स्वास्थ्य सेवा सिस्टम का कबाड़ा कर भी रखा था तो उसे ठीक करने में कितने दिन लगते हैं?

सुशील मोदी को जीएसटी के कार्यान्वयन के समय वित्त मंत्रियों की समिति का अध्यक्ष बनाया गया था, कई बजट पेश कर चुके मोदी को इसकी सभी बारीकियाँ पता हैं और योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर फंडिंग के सिस्टम को समझने वाला उनसे बेहतर शायद कोई न हो। इतना सब कुछ समझने के बावजूद सुशील मोदी ने आज तक कितनी बार केंद्रीय वित्त मंत्री के साथ बैठकों में बिहार के अस्पतालों का मुद्दा उठाया? 2014 में भी इस बीमारी से 400 के लगभग बच्चों की जानें गई थी। उसके बाद 4 वर्षों में नीतीश सरकार ने क्या कोई ऐसी योजना पेश की, जिसके आधार पर केंद्र से फंडिंग ली जा सके और व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त किया जा सके? 2017 में फिर से वित्त मंत्री बने मोदी ने क्या 2018 बजट के दौरान केंद्र से इस सम्बन्ध में बात की?

सुशील मोदी और बिहार त्रासदी से जुड़ी गंभीर बातों को आगे बढ़ाने से पहले एक छोटी-सी कहानी बिलकुल संक्षेप में जान लीजिए। भस्मासुर नामक राक्षस ने तपस्या कर के शिव को प्रसन्न कर दिया और यह वर माँगा कि वह जिसके भी सिर पर अपना हाथ रख दे, वह जल कर राख हो जाए। वर मिलने के बाद वह बदनीयत से शिव की ओर ही दौड़ पड़ा। इसके बाद रास्ते में एक मोहिनी ने उसे आकर्षित किया उसके साथ और नृत्य करते-करते ऐसे स्टेप्स तैयार किए जिससे भस्मासुर ने ख़ुद के ही सिर पर हाथ रख डाला। परिणाम- वह अपने ही वरदान का शिकार होकर राख में तब्दील हो गया। अब वापस लौटते हैं वास्तविक चर्चा पर।

राजद और उनके नेताओं की निष्क्रियता पारम्परिक रही है

जवाबदेह लालू-राबड़ी नहीं हैं। लालू की अनुपस्थिति में पार्टी के सर्वेसर्वा बने तेजस्वी यादव का कोई अता-पता नहीं है। वरिष्ठ राजद नेता रघुवंश प्रसाद सिंह अंदेशा जताते हैं कि वह वर्ल्ड कप का मैच देखने गए होंगे। पप्पू यादव कई दिनों से मुजफ्फरपुर में बैठ कर बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं और अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंक रहे हैं। तेजस्वी कहाँ हैं? 80 विधायकों के साथ भी अगर कोई पार्टी निष्क्रिय हो कर बैठी हुई है तो ज़रूर उसका अंत निकट है। अब जिसका अंत निकट है, उसपर आरोप लगाना सक्षम सत्ता का कार्य नहीं है। केंद्र में राजग की सरकार है, राज्य में राजग की सरकार है और बिहार से गिरिराज सिंह, रामविलास पासवान, अश्विनी कुमार चौबे, रविशंकर प्रसाद, नित्यानंद राय और आरके सिंह मोदी मंत्रिमंडल का हिस्सा हैं।

जिस राज्य से 6 मंत्री देश की प्रचंड बहुमत वाली सरकार का हिस्सा हों, सवाल भी उनसे ही पूछा जाएगा। सुशील मोदी शायद अब केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के साथ होने वाली बैठक में बिहार के अस्पतालों का मुद्दा उठाने वाले हैं। शुक्रवार (जून 21, 2019) को सीतारमण ने सभी राज्यों के वित्त मंत्रियों की बैठक बुलाई है और उसमें सुशील मोदी इन्सेफ़्लाइटिस से हो रही मौतों का मुद्दा उठा कर अतिरिक्त सहायता की माँग करेंगे। इस बैठक में प्रखंड स्तर पर बच्चो के लिए आईसीयू और वायरल शोध केन्द्र स्थापित करने के लिए केन्द्रीय मदद की माँग की जाएगी। आख़िर यह सब पहले क्यों नहीं हुआ? क्या लगभग एक दशक की समयावधि तक राज्य का उपमुख्यमंत्री और वित्त मंत्री रहा नेता इसके लिए जवाबदेह नहीं है, राबड़ी हैं?

सुशील मोदी ने मौत के आँकड़ों को मनगढ़ंत बताया है। क्या इस त्रासदी का स्तर गिनने का मापदंड अब मृत मासूमों की संख्या रह गई है? कितनी गंभीरता से काम किया जाना है, वो इस बात पर निर्भर करेगा कि 200 बच्चों की मौतें हुई हैं या फिर 300 की? इससे क्या फ़र्क पड़ता है? अगर कोई बीमारी फ़ैल रही है तो उससे बच्चों की एक भी मौत हुई या नहीं हो, उसके उन्मूलन के लिए सरकार ने ज़रूरी क़दम क्यों नहीं उठाए? वो भी तब, जब यह सिलसिला दशकों से चला आ रहा हो। जितनी बच्चों की मौतें हुई हैं, असल आँकड़ा निश्चित ही उससे ज्यादा है क्योंकि कई सारे ऐसे भी होंगे जो अस्पताल तक पहुँच भी नहीं पाए होंगे। सुशील मोदी को राबड़ी को बिहार का नेहरू बनाने की बजाए बिहार का योगी आदित्यनाथ बन कर काम करना चाहिए और जैसे गोरखपुर व आसपास के 14 जिलों में एइएस को नियंत्रित किया गया, उसी तरह की इच्छाशक्ति यहाँ भी दिखानी चाहिए

भविष्य की सोचें अब, क्या अगले साल भी मौतें होंगी?

अगर अब भी कोई योजना बनती है तो सुशील मोदी को जनता को इस बात की गारंटी देनी चाहिए कि जितने बेड के अस्पताल बनाने का निर्णय लिया जाएगा, जब वह बन कर तैयार होगा तो उसमें उतने ही बेड होंगे। सुशील मोदी इस बात की कड़ी मॉनिटरिंग करें कि सभी प्रस्तावित प्रोजेक्ट्स तय समयसीमा के भीतर पूरे होंगे। यह सब करने में वह और उनकी सरकार अभी तक बुरी तरह से विफल रही है। अगर आगे यह सब हो भी जाता है तो भी सरकार को इन मौतों के लिए माफ़ नहीं किया जा सकता। राबड़ी देवी का नाम जपना बंद किया जाए, विस्तृत कार्य-योजना बना कर केंद्र से फंडिंग माँगी जाए, केंद्र में किसी विपक्षी दल की भी सरकार नहीं है कि आप आरोप प्रत्यारोप का खेल खेलें।

केंद्र सरकार चाह कर भी कुछ नहीं कर सकती जब स्थानीय जनप्रतिनिधि निकम्मे और उदासीन बने रहें। समान गठबंधन की केंद्र व राज्य में सरकार होने का फायदा अगर आप नहीं उठा पा रहे हैं तो इसकी जवाबदेही लालू-राबड़ी-तेजस्वी पर डालने से कोई फायदा नहीं। जनता ने नरेन्द्र मोदी और उनके विकास मॉडल के नाम पर वोट दिया है, वरना आपके नाम पर पार्टी का 2015 विधानसभा चुनाव में क्या हाल हुआ था, यह किसी से छिपा नहीं है।

इसीलिए सुशील मोदी द्वारा राजद को चुनाव परिणाम को लेकर धमकी देना एक बचकानी हरकत है। यह लूडो का खेल नहीं है जिसमें बच्चे बहस करते रहें कि कौन जीता, यह देश के सबसे बड़े लोकतंत्र के चुनाव की बात है। राजद पर एक भी सांसद नहीं होने का तंज कस कर आप अपनेआप को और ज्यादा निकम्मा साबित कर रहे हैं क्योंकि सीटों की संख्या बढ़ने के साथ ही जवाबदेही, जिम्मेदारी और उत्तरदायित्व भी बढ़ता है, वो भी चक्रवृद्धि दर से।

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