Tuesday, July 16, 2024
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मोदी विरोधी एकता की अधूरी रह गई कहानी, अकेले ही लोकसभा चुनाव लड़ेंगी ममता बनर्जी: क्षेत्रीय क्षत्रपों की महत्वाकांक्षा से BJP की 2024 की राह और आसान

अप्रैल 2022 में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) नेता रिपुन बोरा के बयान के याद करना भी आवश्यक हो जाता है। बोरा ने कहा था कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी 2024 के लोकसभा चुनावों में विपक्षी मोर्चे का नेतृत्व करने के लिए सबसे उपयुक्त नेता हैं। तब भी कॉन्ग्रेस ने बोरा के बयान को खारिज कर दिया।

विपक्षी एकता तो झटका देते हुए तृणमूल कॉन्ग्रेस की चीफ (TMC Chief) एवं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (West Bengal Chief Minister Mamata Banerjee) ने आखिरकार घोषणा कर दिया कि वह 2024 के लोकसभा चुनाव में अकेले उतरेंगी। इसके पहले वह भाजपा के खिलाफ मोर्चा बनाने की खूब कोशिश कीं, लेकिन वे इसमें सफल नहीं रहीं। ऐसे में क्षेत्रीय क्षत्रपों की महत्वाकांक्षा ने 2024 में भाजपा की राह आसान कर दी है।

ममता बनर्जी ने कहा, “2024 में हम तृणमूल और लोगों के बीच एक गठबंधन देखेंगे। हम किसी अन्य राजनीतिक दल के साथ नहीं जाएँगे। जनता के सहयोग से हम अकेले लड़ेंगे। जो बीजेपी को हराना चाहते हैं, मुझे विश्वास है कि वे हमें वोट देंगे।”

बंगाल के सरदिघी उपचुनाव में कॉन्ग्रेस ने सत्तारूढ़ तृणमूल से विधानसभा सीट छीन ली है। इससे तमतमाई ममता बनर्जी ने आरोप लगा दिया कि कॉन्ग्रेस, वामपंथी और भाजपा ने सरदिघी में सांप्रदायिक कार्ड खेला है। बता दें कि 2021 के बंगाल विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस ने अपने वोट TMC को ट्रांसफर करवाकर भाजपा को रोकने की कोशिश की थी।

दरअसल, 2024 का लोकसभा चुनाव अकेले लड़ने का ममता बनर्जी का यह कदम आत्मविश्वास और जीत की उम्मीद के कारण उठाया हुआ नहीं लगता है, क्योंकि त्रिपुरा विधानसभा चुनावों में टीएमसी का खाता भी नहीं खुला है और ना ही इसके पहले के चुनावों में टीएमसी को कोई उल्लेखनीय लाभ मिला है। ममता बनर्जी का यह कदम आपसी खींचतान और महत्वाकांक्षा का परिणाम है।

साल 2021 में पश्चिम बंगाल में हुए विधानसभा चुनावों में जीत के बाद ममता बनर्जी खुद को राष्ट्रीय परिदृश्य पर देखने लगी थी। जैसे कि आजकल बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद को देख रहे हैं। ममता बनर्जी की इस महत्वाकांक्षा के पीछे मोदी लहर में भी बंगाल के अपने किले को सुरक्षित बचा ले जाना महत्वपूर्ण कारण था। ममता बनर्जी साल 2019 लोकसभा चुनावों के नतीजों के बाद से ही विपक्षी एकता की प्रमुख वर्ताकार रही थीं, लेकिन यह महत्वाकांक्षा 2021 में बनीं।

ऐसा नहीं कि गैर-भाजपा दलों ने मोदी सरकार के खिलाफ मजबूती से खड़ा होने के लिए कोई प्रयास नहीं किया। कॉन्ग्रेस, टीएमसी, उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली तत्कालीन शिवसेना, शरद पवार की एनसीपी, लालू यादव की आरजेडी सहित की पार्टियाँ थीं। उस दौरान ममता एक ताकतवर नेता के रूप में उभरी थीं।

जिस तरह नीतीश कुमार आज दिल्ली और अन्य राज्यों में जा-जाकर मुख्यमंत्रियों और क्षेत्रीय दलों के नेताओं से मिल रहे हैं, उसी तरह विधानसभा चुनाव जीतने के बाद ममता बनर्जी ने शुरू किया था। वे कोलकाता के बजाय अधिकांश समय दिल्ली में रहती थीं। वह भाजपा के खिलाफ एक एक मजबूत मोर्चा बनाने की तैयारी कर रही थीं।

हालाँकि, उस समय भी तेलंगाना राष्ट्र समिति (अब भारत राष्ट्र समिति – BRS) के प्रमुख के चंद्रशेखर राव (KCR) खुद की अपनी अलग राह पकड़े हुए थे। वे दक्षिण भारत के नेताओं सहित कुछ अन्य पार्टियों के नेताओं के साथ मिलकर तीसरा मोर्चा बनाने में लगे थे। केसीआर की महत्वाकांक्षा किसी दूसरे के नेतृत्व को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी। वह किंग या फिर किंगमेकर भी भूमिका में रहना चाहते।

इधर कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली यूनाइटेड प्रोगेसिव अलाएंस (UPA) को मजबूत करने के लिए चहल-पहल बढ़ गई थी। लेकिन ममता बनर्जी चाहती थीं कि उन्हें सोनिया गाँधी की जगह पर UPA का अध्यक्ष या फिर संयोजक बनाया जाए। हालाँकि, कॉन्ग्रेस इसके लिए तैयार नहीं दिखी और ममता UPA में सोनिया गाँधी के नेतृत्व को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हुईं। इसका असर बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद ममता बढ़ी गतिविधियों में दिखी।

साल 2021 में टीएमसी चीफ ममता बनर्जी के उस बयान को याद करना भी जरूरी हो जाता है, जब उन्होंने भाजपा के विरुद्ध विपक्ष की लड़ाई में यूपीए की भूमिका पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘कौन-सा यूपीए? यूपीए कुछ नहीं है’। इसके बाद बंगाल कॉन्ग्रेस की कड़ी टिप्पणी सामने आई थी।

इस पर बंगाल के कॉन्ग्रेसी नेता अधीर रंजन चौधरी ने ममता पर सवाल उठाते हुए कहा था, “क्या ममता बनर्जी को पता नहीं कि यूपीए क्या है? मुझे लगता है उनके पागलपन की शुरुआत हो गई है। उन्हें लगता है सारा भारत ममता-ममता का जाप कर रहा है, लेकिन भारत का अर्थ बंगाल नहीं है और बंगाल का अर्थ भारत नहीं है। पिछले (विधानसभा) चुनावों की उनकी रणनीति का धीरे-धीरे खुलासा हो रहा है।”

इसके बाद कॉन्ग्रेस और टीएमसी के पास आने की संभावनाएँ खत्म हो गईं। इसके ठीक पहले तत्कालीन शिवसेना के संजय राउत ने शरद पवार को यूपीए का अध्यक्ष बनाने की बात कही। राउत के बयान का महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष नाना पटोले ने खारिज कर दिया था। उन्होंने कहा था कि यूपीए के अध्यक्ष पद का विषय किसी बहस का मुद्दा नहीं हो सकता और सोनिया गाँधी ही यूपीए की अध्यक्षा रहेंगी।

साल 2021 के अंत तक खींचतान के बीच तीसरा मोर्चा बनाने की कवायद जारी रही है, लेकिन शरद पंवार, जदयू के नीतीश कुमार, आरजेडी के तेजस्वी, टीएमसी की ममता, अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी, बीजेडी के पटनायक की अपनी-अपनी महत्वाकांक्षाएँ भी कम नहीं हुईं और ये इस समय तक आकार नहीं ले सका।

गोवा विधानसभा चुनाव 2022 में कई नेताओं को टीएमसी में मिलाकर उन्होंने खुद को फिर से राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत नेता के रूप में दावेदारी पेश करने की कोशिश की। वह गोवा विधानसभा चुनावों के दौरान से ही ममता बनर्जी विपक्ष का चेहरा बनने की कोशिश करती रहीं। वह विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने का प्रयास करती दिखीं, लेकिन कॉन्ग्रेस ने ममता के नेतृत्व में विपक्षी मोर्चे को मानने से इनकार कर दिया था।

कॉन्ग्रेस के नेताओं का तर्क था कि विपक्षी दलों के किसी भी गठबंधन या मोर्चे का स्वाभाविक नेतृत्वकर्ता कॉन्ग्रेस और सोनिया गाँधी ही हैं। कॉन्ग्रेस ने इसके पीछे तर्क दिया था कि कॉन्ग्रेस राष्ट्रीय पार्टी है, जबकि TMC एक क्षेत्रीय पार्टी है, जिसका जनाधार सिर्फ एक राज्य तक सीमित है।

अप्रैल 2022 में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) नेता रिपुन बोरा के बयान के याद करना भी आवश्यक हो जाता है। बोरा ने कहा था कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी 2024 के लोकसभा चुनावों में विपक्षी मोर्चे का नेतृत्व करने के लिए सबसे उपयुक्त नेता हैं। तब भी कॉन्ग्रेस ने बोरा के बयान को खारिज कर दिया।

इसके बाद राष्ट्रपति चुनाव के समय एक बार फिर भाजपा की राष्ट्रपति उम्मीदवार के खिलाफ संयुक्त प्रत्याशी उतारकर एकता का संदेश देने की कोशिश की गई। इस दौरान संयुक्त उम्मीदवार उतारकर अधिकांश एक मंच पर दिखे। इनमें कॉन्ग्रेस, TMC, NCP, तब की शिवसेना, BJD, सपा, PDP आदि प्रमुख दल थे। यहाँ पर ममता ने अपनी पार्टी के नेता यशवंत सिन्हा को संयुक्त उम्मीदवार बनाया।

राष्ट्रपति चुनाव में जब मतदान की बारी आई तो यह एकता नहीं दिखी। यशवंत सिन्हा भले ही संयुक्त विपक्ष के साझा उम्मीदवार थे, लेकिन द्रौपदी मुर्मू का नाम उम्मीदवार के तौर पर सामने आते ही BJD, JMM, YSR कॉन्ग्रेस, शिव सेना के उद्धव गुट ने यशवंत सिन्हा से किनारा कर लिया।

यहाँ भी क्षेत्रीय दलों की महत्वकांक्षा ने एक साथ आने नहीं दिया। या ये कहा जाए कि ममता बनर्जी दूसरे के नेतृत्व को स्वीकार करने को तैयार नहीं दिखीं और दूसरे भी उनके नेतृत्व को स्वीकार करते नहीं दिखे। खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है। परिणाम यह हुआ कि कोई भी क्षेत्रीय दल एक-दूसरे का नेतृत्व स्वीकार करने को तैयार नहीं दिखा।

अब जबकि 2024 लोकसभा की पूर्वसंध्या पर ममता बनर्जी ने अंतत: अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया। ऐसे में भाजपा के खिलाफ गठबंधन बनने की संभावना मरती जा रही है। अखिलेश यादव की सपा और जदयू एवं राजद की ओर से किसी गठबंधन की संभावना नजर नहीं आ रही है।

विपक्षी एकता के अभाव में एक बार फिर भाजपा केंद्र की सत्ता की ओर बढ़ सकती है। क्षेत्रीय क्षत्रपों की महत्वाकांक्षा ने इस राह को और आसान कर दिया है। बिना किसी मजबूत अवरोध के भाजपा लोकसभा चुनाव 2024 को आसानी से जीत सकती है। इससे पहले पूर्वोत्तर के तीन राज्यों और एवं कई सीटों पर हुए उपचुनावों में इसकी झलक मिल गई है।

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सुधीर गहलोत
सुधीर गहलोत
इतिहास प्रेमी

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