Tuesday, June 22, 2021
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गैर बीजेपी मुख्यमंत्रियों की ‘हरकतों’ में मोदी विरोध का ‘हीरो’ तलाशता इकोसिस्टम: संघीय ढाँचे में राजनीतिक परंपराओं की ये कैसी नींव?

यह कैसा मिलकर लड़ना है जिसमें संघीय ढाँचे, उद्योग और व्यापार के मूलभूत नियमों और परंपराओं को ताक पर रखने की कोशिशें आरंभ हो गई हैं?

तीसरी बार सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तीन पत्र लिख चुकी हैं। पहले पत्र में उन्होंने केंद्र सरकार से अपने राज्य के लिए कोविड की महामारी से निपटने के लिए अधिक ऑक्सीजन, दवाइयाँ और वैक्सीन की माँग की। दूसरे पत्र में अधिक ऑक्सीजन की माँग करते हुए उन्होंने लिखा कि यदि राज्य के लिए मेडिकल ऑक्सीजन की मात्रा न बढ़ाई गई तो अधिक लोगों की मौत हो सकती है। तीसरे पत्र में उन्होंने लिखा कि केंद्र सरकार कोविड संबंधित दवाइयों के साथ-साथ ऑक्सीजन टैंक, क्रायोजेनिक टैंक, टैंकर, कॉन्सेंट्रेटर और सिलेंडर पर टैक्स की छूट दे। साथ ही उन्होंने पश्चिम बंगाल में उत्पादित ऑक्सीजन से दूसरे राज्यों का कोटा बढ़ाने पर केंद्र सरकार की आलोचना की।

केंद्र सरकार के सामने ये माँगें रखने के बाद वे एक माँग लेकर सुप्रीम कोर्ट भी पहुँच गई हैं। सुप्रीम कोर्ट से उनकी माँग है कि केंद्र द्वारा 18 से 44 वर्ष आयु वर्ग के लिए घोषित टीकाकरण अभियान पर रोक लगे और एक नया यूनिवर्सल टीकाकरण अभियान शुरू किया जाए जिसमें सबका मुफ्त में टीकाकरण हो।  

केंद्र सरकार के वित्त मंत्रालय की ओर से उनके एक पत्र के उत्तर में बताया गया कि कोविड की रोकथाम और इलाज के लिए देश में बनने वाली दवाइयों और उपकरणों पर जीएसटी आवश्यक क्यों है। साथ ही कोविड की राहत सामग्री, आयात होने वाले उपकरणों, दवाइयों और संबंधित चीजों पर आयात शुल्क 30 जून तक हटा लिया गया है।

बढ़ते संक्रमण को देखते हुए किसी भी राज्य के लिए अधिक ऑक्सीजन की माँग स्वाभाविक है। पर इस माँग को कैसे जायज ठहराया जा सकता है कि केंद्र सरकार पश्चिम बंगाल में उत्पादित ऑक्सीजन से अन्य राज्यों का कोटा न बढ़ाए? इस बात को देखते हुए कि ऑक्सीजन का उत्पादन अन्य राज्यों में भी होता है, कल और राज्य ऐसी माँगे उठाने लगेंगे तो उसका क्या परिणाम होगा?

ओडिशा से देश के अन्य राज्यों को ऑक्सीजन मिल रही है। क्या ऐसी ही माँग ओडिशा से आई? वेदांता को उच्चतम न्यायालय ने तमिलनाडु के उसके प्लांट में ऑक्सीजन के उत्पादन की अनुमति दी ताकि बढ़ते संक्रमण के चलते ऑक्सीजन की कमी को कुछ हद तक पूरा किया जा सके। पश्चिम बंगाल से प्रभावित होकर यदि तमिलनाडु भी यह माँग कर दे तो?

जिन राज्यों में वैक्सीन का उत्पादन होता है, क्या वे राज्य माँग कर सकते है कि चूँकि वैक्सीन उन राज्यों में बनती है इसलिए उस पर पहला अधिकार उनका है? वहाँ के नागरिकों के टीकाकरण के बाद यदि वैक्सीन बची तभी दूसरे राज्यों को दी जा सकेगी? क्या होगा यदि दवाइयों का उत्पादन करने वाले राज्य यह माँग करें कि दवाइयाँ पहले उन राज्य के नागरिकों को मिलेंगी और बाकी राज्यों को उसी स्थिति में मिलेंगी जब अतिरिक्त होंगी?

प्रश्न यह उठता है कि भारत के संघीय ढाँचे में यह कैसी राजनीतिक परंपराओं की नींव रखी जा रही है? अपने ही पत्र में खुद ममता बनर्जी लिखती हैं कि महामारी से यदि हम मिलकर लड़ेंगे तभी उसे परास्त कर सकेंगे। ऐसी माँगों से मिलकर लड़ने वाली सोच की ख़ुशबू आ रही है? यह कैसा मिलकर लड़ना है जिसमें संघीय ढाँचे, उद्योग और व्यापार के मूलभूत नियमों और परंपराओं को ताक पर रखने की कोशिशें आरंभ हो गई हैं?

दवाइयों, उपकरणों और संबंधित चीजों पर आयात शुल्क हटाने की माँग पर केंद्र सरकार की ओर से यह बताया गया कि शुल्क पहले ही हटा लिया गया है। एक राज्य के मुख्यमंत्री को पत्र लिखने से पहले क्या यह जानकारी नहीं ले लेनी चाहिए कि जिन शुल्कों को वे हटाने की माँग कर रही हैं वे वर्तमान में लगते हैं या नहीं? यह जानकारी लेने में क्या समस्या है कि जिन शुल्क को हटाने की माँग होने जा रही है, उन्हें लेकर वर्तमान सरकारी नीति क्या है? यह जानना कितना कठिन है?

इन मुख्यमंत्रियों के साथ ‘सहानुभूति’ रखने वाला मीडिया ऐसे पत्र पर बढ़-चढ़कर रिपोर्टिंग करता है। लेकिन इन पत्रों के जवाब गोल कर जाता है। विरोधी मुख्यमंत्रियों के ऐसे प्रश्नों पर जो हल्ला मचाया जाता है उसे लेकर आम नागरिकों के मन में एक धारणा जन्म लेती है कि केंद्र सरकार इतनी ख़तरनाक महामारी से लड़ने को लेकर उतनी गंभीर नहीं है जितने राज्यों के ये मुख्यमंत्री हैं। कुछ ऐसी ही स्थिति दिल्ली उच्च न्यायालय में दिखाई दी जब दिल्ली सरकार के वकील ने माँग रखी कि न्यायालय केंद्र सरकार को आदेश देकर रेमडेसिविर के निर्यात पर रोक लगाए। जवाब में उन्हें जब यह सुनने को मिला कि निर्यात पहले से ही बंद है तो उसके बाद उनके पास कुछ कहने को नहीं था।

इस तरह से उठाए जाने वाले प्रश्न क्या अनभिज्ञता का परिणाम हैं? यदि यह राज्य सरकारों की अनभिज्ञता का ही परिणाम है तो क्या राज्य सरकारों के प्रतिनिधियों की ज़िम्मेदारी नहीं बनती कि वे अपना होमवर्क करके प्रधानमंत्री को पत्र लिखें? पत्र लिखने की ऐसी क्या जल्दी है कि एक मुख्यमंत्री एक ही विषय पर सप्ताह भर में तीन पत्र लिखे, साथ मिलकर काम करने की वकालत भी करे और उसके बाद भी अपनी एक माँग लेकर सुप्रीम कोर्ट भी पहुँच जाए?

दरअसल इस तरह की घटनाएँ केंद्र विरोधी राज्यों की सोच, उनकी प्राथमिकता और उनकी गंभीरता दर्शाती हैं। वे ऐसी हरकतें कर खुद कुछ करते हुए दिखना चाहते हैं, साथ ही यह भी साबित करना चाहते हैं कि केंद्र सरकार या प्रधानमंत्री गंभीर नहीं हैं। यही सोच झारखंड के मुख्यमंत्री से ट्वीट करवाती है कि प्रधानमंत्री ने फ़ोन कर अपने मन की बात की। काश वे काम की बात करते। ये ऐसा कर सकते हैं, क्योंकि इन्हें पता है कि इनकी विफलताओं की चर्चा नहीं होगी। इनसे सवाल नहीं पूछे जाएँगे क्योंकि मीडिया इनमें वह हीरो खोजने में लगा है जो नरेंद्र मोदी को कुछ भी करके नीचा दिखा दे।

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