Friday, May 31, 2024
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…तो ट्विटर देश के भी PM नहीं रहेंगे राहुल गाँधी, ट्रेंड में अब पटक ना दें बंगाली दीदी

यह कोशिशें किस तरफ से होंगी वह तो समय बताएगा पर ट्रेंड में इस्तेमाल हैशटैग को देखते हुए यह अनुमान लगाया जा सकता है कि हाल ही में संपन्न हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में ममता बनर्जी ने जिस बंगाली अस्मिता को आगे रखकर राजनीति करने की कोशिश की, यह ट्रेंड उसी सोच को आगे बढ़ाता है।

आए दिन ट्विटर पर चलने वाले ट्रेंड किसी नेता, अभिनेता या राजनीतिक दल के समर्थकों, सलाहकारों और शुभचिंतकों के लिए मन की बात कहने का एक लोकप्रिय जरिया है। आज ट्विटर पर एक ट्रेंड चला #BengaliPrimeMinister जिसमें ट्वीट के जरिए ममता बनर्जी को 2024 में प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट किए जाने को लेकर ट्वीट देखे गए। किसी नेता को राष्ट्रीय या राज्य के स्तर पर इस तरह से प्रोजेक्ट करने के लिए ऐसा ट्रेंड चलाने का यह पहला मौका नहीं था। ऐसा पहले भी देखा गया था। ऐसे ट्रेंड कई बार राहुल गाँधी के समर्थकों ने भी पहले चलाया है। बिहार चुनावों के समय तेजस्वी यादव को भी ट्रेंड चलाकर मुख्यमंत्री बताया गया था। चुनाव के नतीजे उनके पक्ष में आते और सफल हो जाते तो ट्रेंड भी सफल हो जाता। 

तेजस्वी यादव की पार्टी सफल नहीं हुई इसलिए ट्रेंड भी सफल नहीं हो सका पर वह पहले की बात है। ममता बनर्जी के पक्ष में आज जो ट्रेंड चला वह चूँकि 2024 में उन्हें प्रधानमंत्री प्रोजेक्ट करने के विषय में था ऐसे में यह ट्रेंड सफल होगा या नहीं, यह जानने के लिए हमें अभी तीन वर्ष की प्रतीक्षा करनी होगी पर आज उनके समर्थकों और शुभचिंतकों की इस इच्छा से कुछ प्रश्न उठ रहे हैं जिन्हें आने वाले समय में राजनीतिक विमर्शों का हिस्सा बनाए जाने की कोशिश होगी।

यह कोशिशें किस तरफ से होंगी वह तो समय बताएगा पर ट्रेंड में इस्तेमाल हैशटैग को देखते हुए यह अनुमान लगाया जा सकता है कि हाल ही में संपन्न हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में ममता बनर्जी ने जिस बंगाली अस्मिता को आगे रखकर राजनीति करने की कोशिश की, यह ट्रेंड उसी सोच को आगे बढ़ाता है।

जो प्रश्न उठेंगे उनमें एक प्रमुख प्रश्न होगा कि 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले कोलकाता में ही ममता बनर्जी की कोशिशों पर विपक्ष की जिस एकता के दर्शन तस्वीरों में हुए थे यदि वही एकता एक बार फिर से हो जाती है तो फिर वह तस्वीरों तक ही सीमित रहेगी या वहाँ से आगे तक जाएगी? और यदि आगे तक जाएगी तो क्या विपक्ष के बाकी नेताओं के साथ राहुल गाँधी भी राष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री पद के लिए ममता बनर्जी के दावे को स्वीकार करेंगे? यदि ऐसा संभव होगा तो फिर कॉन्ग्रेस और उसके इकोसिस्टम की योजनाओं का क्या होगा? 

दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठेगा कि बंगाल विधानसभा चुनावों के समय कॉन्ग्रेस और लेफ्ट ने ममता बनर्जी को जो समर्थन दिया वे उसकी क्या कीमत वसूलना चाहेंगे? और यदि ऐसी कोई कीमत वसूली की बात भविष्य में उठेगी तो क्या ममता बनर्जी को वह स्वीकार्य होगा? इसमें कोई दो राय नहीं कि कॉन्ग्रेस और लेफ्ट ने योजनाबद्ध तरीके से अपने वोट ममता बनर्जी को ट्रांसफर किए। जिस तरह से अधीर रंजन चौधरी को चुनाव प्रचार से हटाया गया, वह ममता बनर्जी के साथ कॉन्ग्रेस और लेफ्ट की किसी न किसी तरह की डील ही साबित करता है। ऐसे में यदि पश्चिम बंगाल मॉडल को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने की कोई योजना बनी तो फिर एक दल के रूप में कॉन्ग्रेस पार्टी और एक नेता के रूप में राहुल गाँधी खुद को कहाँ पाएँगे? 

महत्वपूर्ण बात और है। पश्चिम बंगाल में मुस्लिम तुष्टिकरण के मुद्दे पर ममता बनर्जी की भूमिका की चर्चा अब केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं रही है और यह अब देश के लगभग हर कोने तक फ़ैल चुकी है। उनके सलाहकार मुस्लिम तुषिकरण की उनकी पुरानी नीति को क्लब हाउस जैसे सार्वजनिक मंच पर स्वीकार कर चुके हैं। ऐसे में मुस्लिम तुष्टिकरण की उनकी नीति क्या राष्ट्र स्तर पर अलग-अलग राज्यों के मतदाताओं को स्वीकार्य होगी?

और यदि ऐसा मान भी लिया जाए कि स्वीकार्य होगी तो फिर उन्होंने अपने चुनाव प्रचार के दौरान जो चंडी पाठ और मंत्रोच्चार किया था, उस मेहनत का क्या होगा? यदि कॉन्ग्रेस पार्टी प्रधानमंत्री पद के लिए ममता बनर्जी के दावे को स्वीकार कर भी लेगी तो राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी के भी पूजा-पाठ वाली तस्वीरों का क्या होगा? उन्होंने पिछले तीन-चार वर्षों में खुद को जिस तरह से हिन्दू साबित करने के लिए मेहनत की है, उस मेहनत का असर तो ममता बनर्जी को नेता स्वीकार करने के बाद क्षण भर में खत्म हो जाएगा। 

ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जो उठेंगे और किसी भी संभावित विपक्षी एकता के लिए इन प्रश्नों को नजरअंदाज करना मुश्किल होगा। समर्थकों, सलाहकारों और शुभचिंतकों की अभिलाषा अपनी जगह पर 2024 आने में अभी बहुत देर है। उसके पहले ममता बनर्जी की परीक्षा अपने राज्य में म्युनिसिपल इलेक्शन और पंचायत इलेक्शन के समय होनी है। इसी तरह राहुल गाँधी की परीक्षा अगले वर्ष होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के समय होनी है। ये चुनाव तय करेंगे कि किसे किसके दावे का समर्थन करना पड़ेगा। तब तक ट्विटर ट्रेंड चलते रहने चाहिए। ऐसे ट्रेंड केवल समर्थकों की अभिलाषा के लिए ही नहीं नेताओं के उत्साह के लिए भी ऑक्सीजन का काम करते हैं। 

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