सोमनाथ का नाम आते ही इतिहास अपनेआप बोलने लगता है। वह मंदिर, जिसे बार-बार तोड़ा गया, बार-बार लूटा गया, पर हर बार हिंदू समाज ने उसे फिर खड़ा किया। मंदिर के इसी संघर्ष को 1000 साल पूरे होने जा रहे हैं, जब 1026 ईस्वी में मुस्लिम शासक महमूद गजनवी ने मंदिर पर आक्रमण किया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी बताया और कहा कि यह संदेश देता है कि मिटाने की मानसिकता रखने वाले खत्म हो जाते हैं।
इसी बीच राहुल गाँधी का नाम भी सोमनाथ मंदिर से चर्चा में आया है। राहुल गाँधी का वह पुराना किस्सा, जिसपर कॉन्ग्रेसियों ने खूब पाखंड फैलाया। जब साल 2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान राहुल गाँधी सोमनाथ मंदिर गए थे। उस वक्त मंदिर के विजिटर रजिस्टर की एक एंट्री को लेकर विवाद हुआ।
मंदिर के रजिस्टर में धर्म के कॉलम में राहुल गाँधी का धर्म ‘ईसाई’ दर्ज बताया गया। बाद में इस पर तर्क भी दिए गए, लेकिन सवाल वहीं का वहीं रहा। कॉन्ग्रेस के पास स्पष्टीकरण के लिए कुछ नहीं था, बल्कि लोगों को और ज्यादा भ्रम में डाल दिया गया। बात यहाँ आकर टिकी कि राहुल गाँधी का गैर-हिंदू रजिस्टर में नाम लिखा गया। लेकिन आज भी राहुल गाँधी के ‘ईसाई’ होने का लोगों का सवाल ज्यों की त्यों ही है।
यह राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस की वही सोच है, जो बार-बार हिंदू आस्था के सवाल पर असहज दिखाई देती है। यह कोई एक घटना या बयान की बात नहीं है, बल्कि एक लंबी राजनीतिक और वैचारिक परंपरा का हिस्सा है। राहुल गाँधी खुद को हिंदू बताते हैं, मंदिर-मंदिर दर्शन करते हैं, लेकिन जब बात धार्मिक पहचान की आती है तो तस्वीर धुँधली हो जाती है।
सोमनाथ सिर्फ राहुल गाँधी की एक यात्रा का मुद्दा नहीं है। यह उस विरासत का हिस्सा है, जिसे उनकी पार्टी कॉन्ग्रेस दशकों से लेकर चल रही है। आजादी के बाद जब देश ने तय किया कि सोमनाथ मंदिर का पुनर्निमाण होगा, तब देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद इसके पक्ष में थे। सरदार पटेल ने इसे हिंदू समाज के आत्मसम्मान से जोड़ा।
लेकिन उस समय राहुल गाँधी के परनाना तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस पुनर्निमाण से असहज थे। उन्होंने खुलकर कहा था कि देश को धार्मिक पुनर्निमाण से दूर रहना चाहिए। उन्होंने राष्ट्रपति के उद्घाटन में जाने पर भी आपत्ति जताई। यह तथ्य इतिहास का हिस्सा है।
क्यों राहुल गाँधी का साल 2017 के उस किस्से से लेकर नेहरू के सोमनाथ विरोध तक एक ही धागे में जुड़े दिखते हैं। क्यों यह कॉन्ग्रेस पार्टी की वही हिंदू-विरोधी लीगेसी है। यह कोई अचानक पैदा हुई सोच नहीं, बल्कि दशकों से चली आ रही वह असहजता है। जो हिंदू आस्था के सवाल पर बार-बार सामने आती रही है। राहुल गाँधी का सोमनाथ जाना और फिर विजिटर रजिस्टर में धर्म को लेकर उठा विवाद नेहरू की सोमनाथ मंदिर पर असहजता का आधुनिक रूप लगता है, जैसे इतिहास खुद वर्तमान को आईना दिखा रहा हो।
समय बदला, पीढ़ियाँ बदलीं लेकिन यह असहजता बनी रही। कभी राम मंदिर आंदोलन को कट्टरता कहकर खारिज किया गया। कभी काँवड़ यात्रा पर सवाल उठाए गए कि सड़कें क्यों रोकी जाती हैं। कभी दीपावली पर पटाखों को लेकर नैतिकता का पाठ पढ़ाया गया।
कॉन्ग्रेस की राजनीति में यह पैटर्न बार-बार उभरता है। हिंदू आस्था को या तो संदेह की नजर से देखा जाता है या फिर उसे राजनीतिक रूप देकर असहज मान लिया जाता है। राहुल गाँधी का साल 2017 वाला सोमनाथ मंदिर का किस्सा इसी लंबे सिलसिले की एक कड़ी बन जाता है। यह किस्सा छोटा हो सकता है, लेकिन यह उस बड़ी कहानी को मजबूती देता है जिसमें कॉन्ग्रेस और हिंदू आस्था के बीच दूरी साफ दिखाई देती है।
यही वजह है कि जब आज सोमनाथ पर हुए आक्रमण के 1000 साल पूरे होने की बात होती है, तो सिर्फ महमूद गजनवी की बात नहीं होनी चाहिए। बल्कि यह भी जरूरी है कि आज की राजनीति उस इतिहास से क्या सीख लेती है।
एक तरफ प्रधानमंत्री खुलकर सोमनाथ को भारत की अटूट आस्था का प्रतीक बताते हैं और दूसरी तरफ कॉन्ग्रेस की वही पुरानी असहजता बार-बार सामने आती है। यही कारण है कि समस्या सिर्फ घटना या बयान की नहीं, बल्कि उस लीगेसी की है, जो हिंदू आस्था को पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाते।
सोमनाथ आज भी खड़ा है, वो भी पहले से अधिक मजबूत। शायद यही इस देश की सबसे बड़ी सच्चाई है।


