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गोधरा में भीतर से नहीं फूँकी गई थी साबरमती एक्सप्रेस… शर्म तो आप घोंटकर पी चुके हैं शंकर सिंह वाघेला, पर क्या जमीर भी आपका मर चुका है?

शंकरसिंह का कहना है कि गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस का डिब्बा बाहर से नहीं, बल्कि अंदर से जलाया गया था। उनका यह भी कहना है कि स्थानीय मुस्लिमों को यह तक पता नहीं था कि ट्रेन किस समय आने वाली है और किस डिब्बे में कौन लोग बैठे थे।

राजनीति सर्कस है या नहीं, यह अलग बहस का विषय हो सकता है। लेकिन इसमें जोकरों की संख्या अच्छी-खासी है। ऐसा कहना बिल्कुल भी बढ़ा-चढ़ाकर नहीं होगा। जब किसी नेता का राजनीतिक करियर खत्म हो जाता है और वह पूरी तरह अप्रासंगिक हो जाता है, तब भी मीडिया और सोशल मीडिया में चर्चा बने रहने के लिए उसे उलटे-सीधे और अजीबो-गरीब बयान देने पड़ते हैं।

गुजरात में ऐसे लोगों की संख्या कितनी है, इसके लिए कोई जनगणना हुई हो ऐसा तो ध्यान में नहीं आता, लेकिन शंकरसिंह वाघेला इस सूची में अपना नाम काफी समय से शामिल करवाने में लगे हुए हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके शंकरसिंह ने कुछ साल पहले कॉन्ग्रेस से नाता तोड़ने के बाद मुख्यधारा की राजनीति से लगभग दूरी बना ली है। अब तो वे चुनाव भी नहीं लड़ते। यह अलग बात है कि हर चुनाव से पहले ‘बापू’ एक नई पार्टी लेकर आते हैं, उनकी पार्टी थोड़ी-बहुत हलचल मचाती है और नतीजों के बाद फिर शांत हो जाती है।

काफी समय से ‘बापू’ चर्चा में नहीं थे। हाल ही में वे अचानक सक्रिय हो गए हैं। उनसे ज्यादा सक्रिय उनका सोशल मीडिया हो गया है। आजकल अगर आप शंकरसिंह की फेसबुक वॉल देखें, तो रोज दो-पाँच रील पोस्ट की हुई मिलेंगी। यह सब बिल्कुल हाल ही में शुरू हुआ है। इनमें से ज्यादातर क्लिप अलग-अलग चैनलों को दिए गए इंटरव्यू से ली गई हैं।

इन इंटरव्यू में शंकरसिंह हमेशा अलग-अलग मुद्दों पर बीजेपी, मोदी-शाह और गुजरात सरकार पर हमला करते रहते हैं। और इसमें कोई आपत्ति भी नहीं है। विपक्ष के नेता के तौर पर यह उनका काम ही माना जाता है। लेकिन अब उन्होंने दिशा बदल ली है और एक खतरनाक रास्ता अपना लिया है। बीजेपी और मोदी पर हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण करने का आरोप लगाने के लिए वे गोधरा हिंदू हत्याकांड को बीच में ले आए हैं।

गोधरा हिंदू हत्याकांड पर शंकरसिंह के एक इंटरव्यू की क्लिप चार दिन पहले यानी 8 जनवरी 2026 को पोस्ट की गई थी। उस क्लिप में बेहद घिनौनी, अपमानजनक और बेबुनियाद बातें कही गई हैं।

शंकरसिंह का कहना है कि गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस का डिब्बा बाहर से नहीं, बल्कि अंदर से जलाया गया था। उनका यह भी कहना है कि स्थानीय मुस्लिमों को तो यह तक पता नहीं था कि ट्रेन किस समय आएगी और किस डिब्बे में कौन लोग सवार हैं।

इतना ही नहीं, शंकरसिंह आगे दलील देते हैं कि डिब्बे को अंदर मौजूद किसी व्यक्ति ने ही आग लगा दी थी। वे यह भी कहते हैं कि ऐसा इसलिए किया गया ताकि बीजेपी हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच दुश्मनी पैदा कर सके और चुनाव में इसका फायदा उठा सके।

शंकरसिंह कहते हैं, “हिंदुओं को बाँटो, मुस्लिमों को बाँटो, लोगों को धर्म के आधार पर बाँटो। अगर आप लोगों को धर्म के आधार पर बाँटना चाहते हैं तो क्या होगा? ऐसा करने का एक प्लान था, मैं कहूँगा कि एक साजिश थी, इस साजिश में गोधरा में कारसेवकों की गाड़ी जला दी गई… यह इन कारसेवकों के लौटने का समय नहीं था, बल्कि अयोध्या जाकर कारसेवा करने का समय था।”

वे आगे कहते हैं, “उन्हें वापस आना था, यह किसे पता था? यह तो अंदर का आदमी ही जान सकता था। गोधरा के मुस्लिमों को कहाँ पता था कि कौन कहाँ है? किस डिब्बे पर लिखा था कि इसमें कारसेवक हैं? उस डिब्बे को साजिश के तहत अंदर से जलाया गया। उसमें सभी हिंदू थे। इतना ही नहीं, उन शवों को सफेद कपड़ों में लपेटकर अहमदाबाद में शोक यात्रा निकालने की भी योजना बनाई गई। यह कितना राक्षसी दिमाग वाला प्लान होगा। गुजरात में बीजेपी को सत्ता में लाने के लिए गोधरा में डिब्बा जलाया गया। इतना ही नहीं, रक्षक ही भक्षक बन गए।”

गोधरा में क्या हुआ था, इसकी स्वतंत्र जाँच हो चुकी है। देश की सर्वोच्च अदालत फैसला सुना चुकी है। कई मुस्लिम दोषियों को सजा भी दी जा चुकी है। इसके बावजूद दो दशक बाद भी ऐसी बेबुनियाद बातें सामने आती रहती हैं। लेकिन यहाँ गंभीरता इसलिए ज्यादा है, क्योंकि ये बातें किसी आम व्यक्ति ने नहीं, बल्कि उसी राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री ने कहीं हैं, जहाँ यह घटना घटी थी

क्या शंकरसिंह इतने मूर्ख हैं कि उन्हें 27 फरवरी को वास्तव में क्या हुआ था, इसकी जानकारी ही नहीं है? क्या उन्हें नहीं पता कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले में इस घटना के बारे में क्या लिखा गया है? क्या उन्हें यह भी नहीं मालूम कि स्थानीय मुस्लिमों ने एक दिन पहले बकायदा योजना बनाकर, साजिश रचकर, पत्थर और पेट्रोल इकट्ठा किया था और अगले दिन जब साबरमती एक्सप्रेस स्टेशन पर आई तो उसके दो डिब्बों को बाहर से बंद करके आग लगा दी गई थी? इन सभी सवालों का जवाब स्वाभाविक रूप से ‘नहीं’ ही है।

क्या एक राजनेता, वह भी पूर्व मुख्यमंत्री स्तर का व्यक्ति, इतनी नीचे की सोच तक गिर सकता है कि हत्याकांड में मारे गए 59 कारसेवकों का अपमान करे? यह कहना कि डिब्बा अंदर से जलाया गया था, क्या उन कारसेवकों के बलिदान, उनकी शहादत और उनके परिवारजनों का अपमान नहीं है?

ट्रेन किस समय आएगी, यह किसे पता था- ऐसी बचकानी दलीलें शंकरसिंह ने दी हैं। लेकिन क्या उन्हें नहीं पता कि साजिश पहले से रची जा चुकी थी और एक दिन पहले एक गेस्ट हाउस में बैठक भी हुई थी? “मुस्लिमों को कैसे पता होता कि ट्रेन कब आएगी और किस डिब्बे में कौन बैठे हैं।” ऐसा सवाल उठाने वाले शंकरसिंह को क्या यह पता नहीं है कि इन्हीं मुस्लिम अपराधियों ने पहले से पेट्रोल इकट्ठा कर रखा था और यह सब अदालत में साबित हो चुका है। अदालत दोषियों को सजा सुना चुकी है और उनकी जमानत भी खारिज कर चुकी है।

27 फरवरी को साबरमती एक्सप्रेस के डिब्बे जलाए जाने की घटना में जिन 59 हिंदुओं की मौत हुई थी, वे सभी कारसेवक थे। इनमें 27 महिलाएँ और 10 बच्चे शामिल थे। उनका इतना ही ‘अपराध’ था कि वे अपने आराध्य के जन्मस्थान से कारसेवा करके लौट रहे थे। अपनी आस्था को प्रकट करने की कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। और इतना ही नहीं, इसके बाद भी सालों तक उन पर यह आरोप लगाए जाते रहे कि डिब्बा अंदर से जलाया गया था या फिर कोई नेता अपनी राजनीतिक चमकाने और किसी खास समुदाय को खुश करने के लिए उन्हीं कारसेवकों पर आरोप थोप देता है।

शंकरसिंह की यह रील, यह लिखे जाने तक, 10 लाख से ज्यादा बार देखी जा चुकी है। कमेंट बॉक्स में लोग उनकी बातों को सच मानकर आगे बढ़ा रहे हैं- यही हमारा सामूहिक दुर्भाग्य है। हम यही प्रार्थना कर सकते हैं कि शंकरसिंह को सदबुद्धि मिले। और एक और प्रार्थना करें कि जीवन में कभी शंकरसिंह की मुलाकात उन 59 कारसेवकों के परिवारजनों से न हो। क्योंकि उस समय उन परिवारों का सामना करना उन्हें जिस कठिनाई में डालेगा, वैसी कठिनाई एक 80 वर्ष से ऊपर के वरिष्ठ राजनेता को झेलनी पड़े, यह हम नहीं चाहते।

(मूलरूप से यह रिपोर्ट गुजराती भाषा में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

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મેઘલસિંહ પરમાર
મેઘલસિંહ પરમાર
ઇતિહાસ-રાજકારણમાં રુચિ ધરાવતો, ઘટનાઓના ઊંડાણમાં જઈને બૃહદ પરિપેક્ષથી જોવામાં-લખવામાં વિશેષ રસ ધરાવતો પત્રકાર. ક્યારેક લેખક, ક્યારેક રિસર્ચર, ક્યારેક ફેક્ટચેકર.

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