Tuesday, September 28, 2021
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‘न घर के न घाट के’: स्वरा भास्कर को अंबेडकरवादियों और वामपंथियों ने ‘लिबरल गैंग’ से किया बाहर, गृह प्रवेश पूजा बना कारण

नाज़ीवाद से तुलना हाल के दिनों की ऐसी घटना है, जिसे कुछ दिनों में काफी कवर किया गया है। हिंदुत्व और श्वेत वर्चस्व के बीच एक तरह की समानता बनाने की कोशिश की जा रही है, इसके तहत ये लोग सीधे हिंदू धर्म में पवित्र माने जाने वाले प्रतीकों को टार्गेट कर रहे हैं।

बॉलीवुड अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने हाल ही में अपने नए घर के लिए गृह प्रवेश समारोह की कुछ तस्वीरें साझा की थीं। तस्वीरों में उन्हें एक नई शुरुआत के लिए देवताओं का आशीर्वाद लेने के लिए पूजा करते हुए देखा जा सकता है। उनकी राजनीतिक हरकतों को देखते हुए तस्वीरें काफी अजीब थीं, लेकिन फिर भी उन्हें अपनी हिंदू विरासत को पूरी तरह से न छोड़ते हुए देखना अच्छा था। यह हर रोज नहीं होता है कि आप भारत में एक लिबरल्स को अपनी हिंदू विरासत का जश्न मनाते हुए देखते हैं।

तस्वीरें प्यारी थीं, लेकिन धर्मपरायणता के सरल और सहज प्रदर्शन से अम्बेडकरवादियों और कम्युनिस्टों का आक्रोश जाग उठा। इन लोगों ने अपने ब्राह्मण विरोधी और हिंदू विरोधी एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए मौके का लाभ उठाया।

साभार: ट्विटर

स्वरा की इन तस्वीरों पर तरह-तरह के कमेंट किए गए। भारत में ब्राम्हणवाद कभी खत्म नहीं होने का दावा करते हुए स्वरा भास्कर पर ‘ब्राह्मणवाद’ के एजेंडे को आगे बढ़ाने का आरोप लगाया जा रहा है। कुछ ने उन पर जातिवाद को बढ़ाया देने का भी आरोप लगाया।

साभार: ट्विटर
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यूजर्स ने कहा कि इन सब को देख कर हम पूछने पर मजबूर हैं कि हिंदू संस्कारों, कर्मकांडों का हिंदुत्व से क्या लेना-देना है, तब जबकि इसके सहारे हिंदुत्व का मजाक उड़ाया जाता है। कोरोना महामारी से पहले ही इस तरह से चेहरे से मास्क का उतरना सही नहीं है।

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इस बीच कुछ लोगों ने स्वरा भास्कर की तस्वीरों की तुलना नाजी दुष्प्रचार से भी किया। यहाँ एक मिनट के लिए उस नफरत की कल्पना करें। जीवन में एक नए अध्याय को शुरू करने से पहले देवताओं की प्रार्थना की नाजीवाद के दुष्प्रचार से तुलना की जा रही है। पवित्र त्रिशूल और स्वास्तिक की तुलना नाजीवाद से की जा रही है।

किसी दूसरे धर्म के खिलाफ कट्टरता का ऐसा सार्वजनिक प्रदर्शन बर्दाश्त नहीं किया जाता है, लेकिन जब हिंदू धर्म की बात आती है, तो यह सभी के लिए खुला मौसम होता है। इस नफरत को विश्वविद्यालयों के परिसरों में, मीडिया में और मनोरंजन उद्योग में भी काफी बढ़ावा दिया जाता है।

साभार: ट्विटर

नाज़ीवाद से तुलना हाल के दिनों की ऐसी घटना है, जिसे कुछ दिनों में काफी कवर किया गया है। हिंदुत्व और श्वेत वर्चस्व के बीच एक तरह की समानता बनाने की कोशिश की जा रही है, इसके तहत ये लोग सीधे हिंदू धर्म में पवित्र माने जाने वाले प्रतीकों को टार्गेट कर रहे हैं।

हिन्दुत्व से इतनी नफरत कि कुछ लोगों ने तो स्वरा के ‘नारीवाद’ पर ‘ब्राह्मणवाद’ का ठप्पा भी लगा दिया।

साभार: ट्विटर

जिन तरीकों और कारणों के कारण स्वरा भास्कर को ‘कैंसिल’ किया गया था, उससे इस बात की अच्छी जानकारी मिलती है कि अनिवार्य रूप में ‘वैश्विक हिंदुत्व को खत्म करना’ क्या है। अम्बेडकरवादी, कम्युनिस्ट, इस्लामवादी, ईसाई धर्म प्रचारक दावा कर सकते हैं कि वे धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि एक राजनीतिक विचारधारा के खिलाफ हैं। लेकिन यह उनके वास्तविक भयावह एजेंडे को छिपाने का एक सुविधाजनक तरीका है।

लेकिन अगर ये लोग जिसके खिलाफ हैं और वही हिंदुत्व है तो वे अपने स्वयं के हिंदू देवताओं की पूजा करने और गृह प्रवेश समारोह आयोजित करने पर आपत्ति क्यों करेंगे? इस बात में किसी तरह का कोई संदेह नहीं है कि स्वरा भास्कर उन्हीं मे से एक हैं।

स्वरा ने फेक न्यूज फैलाईं, स्पष्ट हकीकत से इनकार किया है और हिंदुत्व को कमजोर करने के लिए हर तरह के दुर्भावनापूर्ण एजेंडे को बड़ी ही बेशर्मी से आगे बढ़ाया। हालाँकि, जिस क्षण उन्होंने अपनी विरासत में गर्व करते हुए हिंदू देवी-देवताओं की पूजा की तो उन्हें ‘खारिज’ कर दिया गया।

इससे यह पता चलता है कि भाजपा के खिलाफ दुष्प्रचार और अनुच्छेद 370 व सीएए का विरोध करना भी पर्याप्त नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी की छवि को नुकसान पहुँचाना ही मूल अपेक्षा है और ऐसा करना ही हिंदुत्व को चोट पहुँचाना हो गया है।

उनके समूह का हिस्सा बनने के लिए असली लिटमस टेस्ट ये होता है कि आप अपनी पहचान को पूरी तरह से खत्म कर दो और हिंदू धर्म को बदनाम करते रहो। हिंदू धर्म के सबसे ऊपरी सतह से भी जुड़े रहना इन लोगों (वामपंथियों, इस्लामवादियों) को विश्वासघात नजर आता है। जब कोई हिंदू धर्म का जश्न मनाने का फैसला करता है ऐसे ‘वैश्विक हिंदुत्व को डिसमैटल करना’ डरावना है। ऐसा करने पर उसे वही लोग खारिज कर देते हैं, जिसे उसने आपनी आत्मा तक बेच दी थी।

हम इस सत्य को भलीभाँति जानते हैं, क्योंकि हमने देखा है कि पश्चिम में यह कैसे काम करता है। हिंदू राजनेताओं और राजनीतिक उम्मीदवारों के कर्मचारियों को उनकी आस्था के कारण ही निशाना बनाया गया है और इस तथ्य को छिपाने का कोई प्रयास नहीं किया गया है कि आरोप केवल इसलिए लगाए गए, क्योंकि वह व्यक्ति हिंदू था।

हमने ये तब भी देखा जब भारत में बैठे इस्लामवादियों ने सोशल मीडिया पर की गई टिप्पणियों से नाराज होकर मिडिल ईस्ट में रहने वाले हिंदुओं को टार्गेट करते हुए न केवल उन्हें नौकरियों से बाहर करवाया, बल्कि उन्हें गिरफ्तार करवाने की कोशिश भी की थी। कम से कम एक मामले में इस्लामवादियों द्वारा एक नकली प्रोफ़ाइल के साथ एक हिंदू को फंसाया गया था और दुर्भाग्य से उसे न केवल अपनी नौकरी खोनी पड़ी, बल्कि सऊदी अरब में दो साल जेल में बिताने पड़े।

जब स्वरा भास्कर पर हिंदू परंपराओं और रीति-रिवाजों के अनुसार अनुष्ठान करने के लिए हमला किया जाता है तो हम फिर से उसी नफरत को देखते हैं।

 

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K Bhattacharjee
Black Coffee Enthusiast. Post Graduate in Psychology. Bengali.

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