Homeविचारराजनैतिक मुद्देमुर्दा, घुसपैठिए, फ्रॉड… क्या इनसे ही टिमटिमा रहा लालू का लालटेन? चुनाव आयोग के...

मुर्दा, घुसपैठिए, फ्रॉड… क्या इनसे ही टिमटिमा रहा लालू का लालटेन? चुनाव आयोग के ‘स्वच्छता अभियान’ से घबराए तेजस्वी यादव, बिहार में दे रहे ‘बांग्लादेश मॉडल’ की धमकी

विपक्ष का ये दांव हार की आशंका से लगता है, विदेशी ताकतें अस्थिरता चाहती हैं। लेकिन जनता समझदार है, बहिष्कार से विपक्ष खुद कमजोर होगा। लोकतंत्र बचाने की बजाय ये खत्म करने की कोशिश है।

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले सियासी माहौल गरम है। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन और चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने संकेत दिया है कि अगर मतदाता सूची में कथित हेरफेर और धांधली की स्थिति बरकरार रही, तो विपक्ष विधानसभा चुनावों का बहिष्कार करने पर विचार कर सकता है।

इससे पहले, ठीक यही बात पूर्णिया के निर्दलीय सांसद पप्पू यादव और पत्रकार रवीश कुमार जैसे लोग भी कर रहे थे, जिन्हें ‘बांग्लादेशी टूलकिट’ का हिस्सा माना जा रहा है। ये लोग ठीक वही करने की कोशिश कर रहे हैं, जिसकी बदौलत आज बांग्लादेश में कोहराम मचा हुआ है।

तेजस्वी यादव का बयान: कितना गंभीर, कितना रणनीतिक?

तेजस्वी यादव ने पटना में एक न्यूज एजेंसी से कहा, “अगर चुनाव में धांधली हो रही है, तो लोग वोट क्यों देंगे? ऐसे में सरकार को एक्सटेंशन दे देना चाहिए।” उन्होंने यह भी कहा कि अगर महागठबंधन और जनता इस दिशा में सहमत होती है, तो वे चुनाव बहिष्कार पर विचार करेंगे।

तेजस्वी का यह बयान सतही तौर पर एक रणनीतिक कदम लगता है, जिसका मकसद एनडीए सरकार और चुनाव आयोग पर दबाव बनाना है। लेकिन उनके इस बयान में गंभीरता की कमी साफ झलकती है, क्योंकि ऐतिहासिक रूप से भारत में किसी भी बड़े राजनीतिक दल ने पूरे चुनाव का बहिष्कार नहीं किया, भले ही EVM या मतदाता सूची जैसे मुद्दों पर सवाल उठे हों।

तेजस्वी के इस बयान को गंभीरता से लिया जाना स्वाभाविक है, क्योंकि बिहार की सियासत में उनका कद बड़ा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह बयान केवल जनता को लामबंद करने की कोशिश है, या वास्तव में उनकी हार की आशंका को दर्शाता है?

दरअसल, 2024 के लोकसभा चुनावों में महागठबंधन को केवल 9 सीटें मिलीं, जबकि एनडीए ने 31 सीटें जीतीं। सी-वोटर सर्वे के अनुसार, तेजस्वी की लोकप्रियता 41% से घटकर 35% हो गई है, जबकि नीतीश कुमार की स्वीकार्यता 58% है। नीतीश की विकास-केंद्रित छवि और 35% महिला आरक्षण जैसे कदमों ने उनकी स्थिति को और मजबूत किया है। इसके उलट मतदाता सूची से 53 लाख वोटरों के नाम हटाए जाने की प्रक्रिया में 90% वोटरों को महागठबंधन का समर्थक माना जा रहा है। तेजस्वी का यह बयान उनकी जमीन खिसकने की आशंका को उजागर करता है।

SIR से जुड़े महत्वपूर्ण आँकड़े

बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सियासी घमासान चरम पर है। चुनाव आयोग के अनुसार, SIR का मकसद मतदाता सूची को अपडेट करना और फर्जी या गैर-नागरिक वोटरों को हटाना है। चुनाव आयोग के अनुसार, बिहार में 7.89 करोड़ वोटरों में से 97.30% ने फॉर्म भरे। लेकिन 52.3 लाख वोटर अपने पते पर नहीं मिले (कुल का 6.62%)। इनमें 18.66 लाख मृत हैं, 26.01 लाख शिफ्ट हो चुके हैं, 7.09 लाख डुप्लिकेट हैं, और 1 लाख अनट्रेसेबल हैं।

यह प्रक्रिया 1 लाख बीएलओ और 1.5 लाख राजनीतिक एजेंट्स (विपक्षी सहित) द्वारा की जा रही है। विपक्ष का दावा है कि 53 लाख वोट कैंसल हो रहे हैं, जिनमें 90% उनके समर्थक हैं। लेकिन आँकड़े बताते हैं कि मृत, डुप्लिकेट और शिफ्टेड वोटरों को हटाना जरूरी है, ताकि फर्जी वोटिंग रोकी जाए।

उदाहरण के लिए, 20 लाख मृत वोटरों को सूची में रखना क्या लोकतंत्र है? 7 लाख डुप्लिकेट से दो जगह वोटिंग हो सकती है। 1 लाख के अते-पते नहीं मिल रहे, जो विदेशी या फर्जी हो सकते हैं। एसआईआर नेपाल, बांग्लादेश, म्यांमार से आए वोटरों को भी फिल्टर कर रहा है।

चुनाव आयोग ने दावा किया है कि 96-98% संशोधन कार्य पूरा हो चुका है। यही नहीं, चुनाव आयोग ने कहा है कि जिन लोगों के नाम गलत तरीके से कटे हैं, या जुड़ने बाकी रह गए हैं, उनके लिए 1 अगस्त 2025 से 1 सितंबर 2025 तक इसे सही कराने का समय होगा।

बिहार चुनाव आयोग द्वारा दी गई जानकारी का स्क्रीनशॉट (फोटो साभार: CEOBihar)

हालाँकि लेकिन तेजस्वी ने इसे ‘फर्जी’ करार दिया। उन्होंने कहा, “पहले मतदाता सरकार चुनते थे, अब सरकार मतदाताओं को चुन रही है।” एसआईआर से फर्जी वोटर हटने से उनके कोर वोट बैंक पर असर पड़ेगा। इसलिए बहिष्कार की धमकी देकर जनता को मोबलाइज करने की कोशिश है। लेकिन अगर जीत दिखती, तो मैदान क्यों छोड़ते? यह हार की आशंका है।

बांग्लादेशी टूलकिट और अराजकता का इतिहास

ये सब जो हो रहा है, वह महज संयोग नहीं लगता। विपक्ष की भाषा और रणनीति बांग्लादेश से प्रेरित लगती है, जहां विपक्षी पार्टी बीएनपी ने 2023-24 के चुनावों का बहिष्कार किया था। वहाँ खालिदा जिया की पार्टी ने चुनाव की विश्वसनीयता पर सवाल उठाकर हिंसा और अराजकता फैलाई, जिससे शेख हसीना की सरकार को चुनौती मिली। भारत में भी यही ‘टूलकिट’ चल रहा है।

किसान आंदोलन, शाहीन बाग और अब एसआईआर विवाद में अंतरराष्ट्रीय तत्वों की भूमिका देखी गई है। उदाहरण के लिए, बांग्लादेश में यूरोपीय यूनियन के राजदूत ने चुनाव पर सवाल उठाए, ठीक वैसे ही भारत में विदेशी मीडिया और एनजीओ ईवीएम हैकिंग जैसे मुद्दों को हवा देते हैं।

बिहार में यह टूलकिट स्पष्ट दिखता है। साल 2024 में कॉन्ग्रेस से टिकट न मिलने पर निर्दलीय सांसद बने पप्पू यादव भी चुनाव बहिष्कार की वकालत कर रहे है। हालाँकि उन्होंने यह भी कहा कि बहिष्कार से बेहतर है कि विपक्ष विधानसभा और लोकसभा से इस्तीफा दे दे। दूसरी ओर रवीश कुमार ने अपने यूट्यूब चैनल पर कहा, “चुनाव क्यों करा रहे हैं, प्रिंट कमांड दीजिए और रिजल्ट छाप दीजिए।”

पप्पू यादव और रवीश की भाषा अराजकता को जन्म देने वाली है। जब लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता नहीं मिलती, तो बहिष्कार और हिंसा का सहारा लिया जाता है। महाराष्ट्र चुनावों में भी यही कोशिश हुई, जहाँ राहुल गाँधी ने मैच फिक्सिंग का आरोप लगाया, लेकिन सफल नहीं हुई।

अब बिहार में एसआईआर को बहाना बनाकर एजेंडा चलाया जा रहा है। यह टूलकिट विदेशी ताकतों से प्रेरित है, जो भारत में अस्थिरता चाहते हैं। शेख हसीना को बांग्लादेश छोड़ना पड़ा, तो यहाँ पीएम मोदी को निशाना बनाने की साजिश है। लेकिन बिहार में यह ध्वस्त हो रहा है, क्योंकि नीतीश कुमार की छवि मजबूत है और एनडीए एकजुट। विपक्ष का एजेंडा ध्वस्त होने की कगार पर है, क्योंकि जनता अब ऐसे हथकंडों को समझ चुकी है।

पप्पू यादव और रवीश कुमार महज टूलकिट के प्यादे?

पप्पू यादव का बयान तेजस्वी के बयान से मेल खाता है, लेकिन उनकी स्थिति कमजोर है। 2024 के लोकसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस ने उन्हें टिकट नहीं दिया और महागठबंधन के विरोध प्रदर्शन में उन्हें मंच पर जगह नहीं मिली। फिर भी वे SIR और चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं।

दूसरी ओर रवीश कुमार का बयान और उनकी पत्रकारिता शैली विपक्ष के नैरेटिव को बढ़ावा देती दिखती है। कुछ लोग मानते हैं कि यह एक सुनियोजित रणनीति है, जिसमें विपक्षी नेता और कुछ पत्रकार मिलकर जनता में असंतोष पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं।

वहीं, तेजस्वी की रणनीति एनडीए और चुनाव आयोग पर दबाव बनाने की है, लेकिन सफलता संदिग्ध है। अगर महागठबंधन एकजुट होता है, तो एनडीए असहज हो सकता है, क्योंकि ग्रामीण गरीब मतदान को अधिकार मानते हैं। लेकिन कॉन्ग्रेस की चुप्पी दर्शाती है कि एकजुटता नहीं है। बहिष्कार से विपक्ष प्रतीकात्मक विरोध करेगा, लेकिन जनता एनडीए को मजबूत करेगी।

लोकतंत्र पर हमला या रणनीतिक दाँव?

तेजस्वी का चुनाव बहिष्कार का बयान लोकतंत्र पर हमले के रूप में देखा जा सकता है, क्योंकि यह मतदान जैसे मूलभूत लोकतांत्रिक अधिकार को कमजोर करता है। बिहार में ग्रामीण और गरीब वर्ग मतदान को अपने अधिकार के रूप में देखता है। अगर विपक्ष बहिष्कार करता है, तो यह जनता में असंतोष तो पैदा कर सकता है, लेकिन यह महागठबंधन की विश्वसनीयता को भी नुकसान पहुँचाएगा। कॉन्ग्रेस और अन्य सहयोगी दलों ने अभी तक इस बयान पर स्पष्ट समर्थन नहीं दिखाया है, जिससे तेजस्वी की रणनीति कमजोर पड़ सकती है।

राहुल गाँधी ने भी कर्नाटक में चुनावी धांधली के ‘100% सबूत’ होने का दावा किया है, लेकिन उन्होंने इसे सार्वजनिक नहीं किया। यह दावा तेजस्वी के बयान को बल देता है, लेकिन अगर विपक्ष एकजुट नहीं हो पाता, तो यह केवल प्रतीकात्मक रह जाएगा। केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने तेजस्वी पर तंज कसते हुए कहा, “उन्हें लग रहा है कि बिना नकली वोटरों के वे चुनाव नहीं जीत सकते।”

बिहार में सियासी समीकरण और भविष्य

बिहार में एनडीए की स्थिति मजबूत है। नीतीश कुमार की स्वच्छ छवि, जीतन राम मांझी और चिराग पासवान जैसे नेताओं का समर्थन और बीजेपी की रणनीति ने महागठबंधन को बैकफुट पर ला दिया है। तेजस्वी का वोटर बेस – यादव, मुस्लिम और ओबीसी अभी भी उनके साथ दिखते है, लेकिन SIR के बाद उनके वोट बैंक में सेंध लगने की आशंका है। अगर तेजस्वी और विपक्ष बहिष्कार की राह चुनते हैं, तो यह उनकी हार को और पक्का कर सकता है।

तेजस्वी की धमकी गंभीर कम, रणनीतिक ज्यादा है। यह बांग्लादेशी टूलकिट का हिस्सा है, जहाँ बहिष्कार से अराजकता फैलाई जाती है। लेकिन बिहार में नीतीश की छवि और एसआईआर की पारदर्शिता से विपक्ष का एजेंडा ध्वस्त हो रहा है।

लोकतंत्र पर हमला बंद हो, विपक्ष सबूतों से लड़ाई लड़े। एसआईआर से साफ-सुथरी चुनाव प्रक्रिया बनेगी, जो असली लोकतंत्र है। अगर बहिष्कार होता है, तो विपक्ष खुद को अलग-थलग कर लेगा। बिहार की जनता समझदार है, वह ऐसे हथकंडों से नहीं बहकेगी। बिहार की जनता जो मतदान को अपने अधिकार के रूप में देखती है, शायद इस रणनीति को स्वीकार न करे। तेजस्वी और विपक्ष को अगर अपनी जमीन बचानी है, तो उन्हें बहिष्कार की बजाय जनता के बीच जाकर अपनी बात रखनी होगी।

Join OpIndia's official WhatsApp channel

  सहयोग करें  

'द वायर' जैसे राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी वेबसाइट्स को कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

Searched termsतेजस्वी यादव चुनाव बहिष्कार धमकी बिहार विधानसभा चुनाव 2025, बांग्लादेशी टूलकिट सक्रिय राजनीति अराजकता, मतदाता सूची विशेष गहन पुनरीक्षण SIR धांधली आरोप, पप्पू यादव रवीश कुमार बहिष्कार वकालत, नीतीश कुमार NDA मजबूत स्थिति लोकप्रियता, लोकसभा चुनाव 2024 महागठबंधन हार आंकड़े, फर्जी वोटर हटाने प्रक्रिया चुनाव आयोग दावा, विपक्ष रणनीति लोकतंत्र हमला साजिश, विदेशी ताकतें भारत अस्थिरता एजेंडा, तेजस्वी यादव राजनीतिक दांव हार आशंका, बिहार सियासी तूफान ग्रामीण मतदाता प्रभाव, राष्ट्रीय जनता दल RJD नेता बयान, शेख हसीना बांग्लादेश चुनाव बॉयकॉट इतिहास, चुनाव आयोग पारदर्शिता सुधार अवसर, विपक्ष एकजुटता कमी कांग्रेस चुप्पी, Tejashwi Yadav Election Boycott Threat Bihar Assembly Elections 2025, Bangladeshi Toolkit Active Politics Anarchy, Voter List Special Intensive Revision SIR Manipulation Allegations, Pappu Yadav Ravish Kumar Boycott Advocacy, Nitish Kumar NDA Strong Position Popularity, Lok Sabha Elections 2024 Mahagathbandhan Defeat Statistics, Fake Voters Removal Process Election Commission Claim, Opposition Strategy Democracy Attack Conspiracy, Foreign Powers India Instability Agenda, Tejashwi Yadav Political Gambit Defeat Fear, Bihar Political Storm Rural Voters Impact, Rashtriya Janata Dal RJD Leader Statement, Sheikh Hasina Bangladesh Election Boycott History, Election Commission Transparency Correction Opportunity, Opposition Unity Lack Congress Silence
श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

PM सूर्य घर योजना में लखनऊ बना देश का नंबर-1 सोलर जिला, नागपुर-सूरत को पछाड़ा: समझें कई श्रेणियों में शीर्ष स्थान पाकर कैसे UP...

पीएम सूर्य घर पुरस्कार समारोह में उत्तर प्रदेश ने विभिन्न श्रेणियों में शीर्ष स्थान हासिल कर अपना परचम लहराया है

अमेरिका-ईरान शांति समझौते से भारत को फायदा ही फायदा, कच्चे तेल की कम कीमतों से मिलेगी महँगाई से राहत-मजबूत होगा रुपया: समझें विकास की...

अमेरिका-ईरान शांति समझौता भारत के लिए हर मोर्चे पर एक 'मास्टरस्ट्रोक' साबित होने जा रहा है। भारत के लिए साल 2026 की यह सबसे सकारात्मक खबर है।
- विज्ञापन -