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UP में योगी सरकार ने पसमांदा मुस्लिमों को उच्च पदों पर बैठाया: कॉन्ग्रेस ने की थी अनदेखी, अखिलेश-मायावती ने भी नहीं दी हिस्सेदारी

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में ओवैसी अपने भाषणों में जिस मुस्लिम वर्ग को केन्द्रित कर रहें हैं और जिन वोटरों पर उनकी निगाहें हैं, वे पिछड़े पसमांदा ही हैं। वे इस समुदाय के बीच कायदे आजम बनना चाहते हैं

भाजपा (BJP) के सुनील बंसल के नेतृत्व में पिछले साल 9 अक्टूबर को 6 नेताओं की एक कमेटी बनी। इसका प्रभारी उत्तर प्रदेश के मंत्री मोहसिन रजा (Mohsin Raza) को बनाया गया। इस कमेटी को यूपी के पिछड़े तबके के मुस्लिमों, जिन्हें पसमांदा कहा जाता है, उनको भाजपा के पक्ष में लाने का दायित्व दिया गया।

हालाँकि भाजपा के भीतर ऐसी योजना 2014 में ही रखी गई थी, लेकिन हिंदुत्व की राजनीति करने वाली भाजपा (BJP) और आरएसएस (RSS) ने इसे अपने एजेंडे के प्रतिकूल समझा। वहीं, 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव (Uttar Pradesh Assembly Election 2022) की तैयारी और रणनीति में पसमांदा अभियान को स्वीकृति दी गई, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा की भी भूमिका रही।

बता दें कि पसमांदा फ़ारसी शब्द है, जो दो शब्दों से मिलकर बना है। पस शब्द का अर्थ है पीछे और मांदा का शाब्दिक अर्थ छूट जाना- अर्थात जो पीछे छूट गए उन्हें पसमांदा कहा गया। ऐसा माना जाता रहा है कि हिंदू पिछड़ी जातियों और दलित जातियों का मुगल काल में भारी संख्या में धर्मांतरण हुआ और वे लोग मुस्लिम हो गए।

विशेषकर उत्तर प्रदेश और बिहार में इनकी संख्या मुस्लिम समुदाय के भीतर अधिकतम देखने को मिलती है। पसमांदा मुस्लिमों में कुरैशी, दर्जी, बढ़ई, चूड़ीदार, जुलाहा, मंसूरी, धुनिया, रंगरेज, हजाम, तेली, धोबी, नाई, मोची, राजमिस्त्री आदि आते हैं। मुस्लिमों के बीच जो अशरफ- जिनमें खान, पठान, सैयद आदि ऊँचे तबके के माने जाते हैं, वही अंसारी और मियाँ निचले तबके में आते हैं। 

अशरफ को राजनीति, सामाजिक और प्रशासन में उच्चतर स्थान प्राप्त हुआ, लेकिन पसमांदा मुस्लिमों को राजनीति में उचित प्रतिनिधितव न के बराबर रहा। पसमांदा मुस्लिमों की राजनीति करने वालों का मत रहा है कि संविधान में अनुच्छेदों के माध्यम से हिंदुओं के भीतर दलितों को तो फायदा पहुँचाया गया, लेकिन पसमांदा पर संविधान मौन है।

उत्तर प्रदेश के अंदर दलितों के लिए तो सीटें आरक्षित रखी गईं, लेकिन पसमांदा मुस्लिम का ध्यान नहीं रखा गया। आज उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में पसमांदा मुस्लिम को मुस्लिमों से हटकर एक नए वोट बैंक के रूप में देखा जा रहा है। पूर्वांचल में इनकी भारी तादाद होने के कारण सभी पार्टियों के एजेंडे में पसमांदा शामिल हो चुका है। हालाँकि, खास बात है कि कल तक भाजपा इनके वोट लेने से परहेज करती थी, मगर इस बार उसने इस वर्ग पर केंद्रित किया है। 

पसमांदा मुस्लिमों के पैरवीकार मानते हैं कि आजादी के तुरंत बाद उत्तर प्रदेश में सत्ताधारी कॉन्ग्रेस ने इनकी अनदेखी की, जबकि यह समुदाय कॉन्ग्रेस को वोट देता रहा। कॉन्ग्रेस के बड़े नेता रफ़ी अहमद किदवई मुस्लिमों के बड़े नेता रहे। वे अशरफ समुदाय से आते थे। उनके द्वारा पिछड़े और कमजोर पसमांदा की अनदेखी हुई ।

उत्तर प्रदेश के अंदर मोहसिना किदवई, सलमान खुर्शीद और आरिफ मोहम्मद खान प्रमुख मुस्लिम नेता रहे, लेकिन ये सभी अशरफ समुदाय से ताल्लुक रखते थे। 1974 और 1985 में मात्र जिया-उर-रहमान अंसारी पसमांदा समुदाय से कॉन्ग्रेस के उन्नाव से सांसद रहे। बाद के दिनों में 2012 के विधानसभा चुनाव में राहुल गाँधी के आग्रह से कॉन्ग्रेस ने पसमांदा मुस्लिमों की समस्या को अपने चुनावी घोषणा पत्र में शामिल किया।

समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी में आजम खान और नसीमुद्दीन सिद्दीकी प्रमुख मुस्लिम चेहरे रहे। मुलायम सिंह यादव अपने मुस्लिम-यादव गठजोड़ के कारण और मौलाना मुलायम की भूमिका में इस तबके का वोट लेते रहे। वहीं, बाद में उनके पुत्र अखिलेश यादव को भी पसमांदा मुस्लिमों ने वोट देकर 2012 में मुख्यमंत्री बनाया। समाजवादी पार्टी ने 70 प्रतिशत पसमांदा मुस्लिमों के वोट तो लिए लेकिन नौकरी, सरकार और तैनाती में हिस्सेदारी नहीं दी। यहाँ तक कि आज तक कोई भी पसमांदा सपा से राज्यसभा नहीं पहुँचा। 

अखिलेश यादव ने मुस्लिमों को 18 प्रतिशत आरक्षण का वादा किया लेकिन रंगनाथ मिश्र कमेटी ,सच्चर कमेटी की सिफारिशों को लागू तक नहीं किया। पसमांदा नेता मानते हैं कि अब मुस्लिम अखिलेश पर यकीन नहीं कर रहा, जहाँ से हिसेदारी मिलेगी वहीं जायेगा। दलित-पिछडो की राजनीति करने वाली मायावती भी 2007 में पसमांदा के वोट से मुख्यमंत्री बनी थी लेकिन उनके विषय में ज्यादा कुछ नहीं कर सकी।

2017 से उत्तर प्रदेश के भीतर भाजपा की सरकार ने अपने हिंदुत्व की विचारधारा के बीच ही मुस्लिम समुदाय के पसमांदा वर्ग के वोट को एक रणनीति के तहत प्राप्त करने की खास योजना बनाई है, जिसमें सबसे पहले योगी सरकार ने उच्च पदों पर पसमांदा समुदाय को बैठाया। इसमें अल्पसंख्यक आयोग के पद पर पसमांदा मुस्लिम के बढ़ई समुदाय से आने वाले को अध्यक्ष बनाया तो उत्तर प्रदेश मदरसा बोर्ड के अध्यक्ष पद पर भी पसमांदा को ही जगह दी।

इसके साथ ही राष्ट्रीय अल्पसंख्यक मोर्चा का अध्यक्ष अब्दुल रशीद अंसारी को बनाया तो आतिफ रशीद को उपाध्यक्ष बनाया। भाजपा द्वारा इस प्रकार की तैनाती उनकी विशेष रणनीति की हिस्सा रही है। यदि रोजगार की बात की जाए तो भाजपा ने रामपुर से वाराणसी तक हुनर हाटों को प्राथमिकता दिया, जहाँ बुनकारी और कारीगरी जैसे पसमांदा मुस्लिमों के व्यवसाय को प्राथमिकता दिया गया। इससे इस वर्ग को फायदा पहुँचा।

हुनर हाटों में पहँचने के लिए 1500 रुपए दैनिक भत्ता, ट्रेन किराया और अपने साथ एक सहयोगी को ले आने का प्रबंधन किया गया। वाराणसी में बुनकरों को नए करघे दिए गए, बिजली  की अनुपस्थिति में इनवर्टर की व्यवस्था तथा मार्केट भी उपलब्ध कराया गया। हालाँकि वाराणसी में जब 2004 से 2009 तक डॉ. राजेश मिश्रा कॉन्ग्रेस से संसद सदस्य थे, तब बुनकरों की हालत बहुत सुधरी थी, लेकिन बाद के सरकारों ने इसकी अवहेलना की। 

भाजपा ने वंचित मुस्लिमों में अपने नए मतदाता को देखा है, इसलिए इनके बीच अपनी पैठ बढ़ाने के लिए तमाम विकास योजनाओं को सक्रियता के साथ इन तक पहुँचाया है। भाजपा ने सांप्रदायिक राजनीति के ठप्पे से अपने को बाहर निकलने का प्रयास किया है। भाजपा ने प्रधानमंत्री आवास योजना द्वारा सबसे ज्यादा पसमांदा मुस्लिमों को लाभ पहुँचाया है। पूर्वांचल के गाजीपुर में शहरों में रहने वाले 80 प्रतिशत पसमांदा को लाभ पहुँचा है। राशन योजना और पेंशन योजना के माध्यम से भी पसमांदा मतदाताओं को अपने पक्ष में करने का प्रयास किया।

सामाजिक रूप से बहिष्कृत, उपेक्षित, अशरफ मुस्लिमों द्वारा शोषित मुस्लिमों ने अपनी पारंपरिक मतदान व्यवहार में भी परिवर्तन किया है। आज इनकी राजनीति महत्वकांक्षा और उच्च पदों पर पहुँचने की लालसा ने इनके पुराने विचारों में परिवर्तन किया है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में पसमांदा ने एक नया नारा दिया है, “वोट हमारा राज तुम्हारा, नहीं चलेगा, नहीं चलेगा।” 

उनका मानना है कि उत्तर प्रदेश में बाबरी मस्जिद का मामला हो या दंगों की बात हो, सभी में उच्चे वर्ग के मुस्लिमों के हित टकराते हैं। इसमें करघा जलता है तो कमजोर मुस्लिमों का ही जलता है, जबकि इन मुस्लिमों को न दंगे से कोई सरोकार है न ही किसी धार्मिक मुद्दे में दिलचस्पी है। उन्हें तो बस सस्ता धागा मिल जाए और बिजली मिल जाए, इसी से ताल्लुक है। न मंदिर चाहिए, न मस्जिद चाहिए। केवल बेरोजगार मुस्लिमों को काम, बेहतर जीवन स्तर और सस्ती कार्य कुशलता को लेकर प्रशिक्षण मिल जाए।

भाजपा के द्वारा पसमांदा मुस्लिमों पर नजरें इनायत करने को एक तीर से दो निशाने के रूप में भी देखा जा रहा है। भाजपा की राष्ट्रीय अल्पसंख्यक मोर्चा ने एक ब्लू प्रिंट तैयार किया है। एक तो 4000 बूथों पर तैनात किए जाने वाले अल्पसंख्यक मोर्चा के अधिकतर कार्यकर्त्ता पसमांदा मुस्लिम हैं, जिससे उन बूथों पर भाजपा के पक्ष में पसमांदा के अधिकतम वोट प्राप्त किया जा सके। वहीं, पिछड़ी हिंदू जातियों और दलित जातियों से मुगल काल में जो धर्मांतरण हुआ है, उन मुस्लिमों को पुनः हिंदू धर्म में वापसी कराना है। 

हालाँकि, उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में ओवैसी अपने भाषणों में जिस मुस्लिम वर्ग को केन्द्रित कर रहें हैं और जिन वोटरों पर उनकी निगाहें हैं, वे पिछड़े पसमांदा ही हैं। वे इस समुदाय के बीच कायदे आजम बनना चाहते हैं और काफी मुखरता के साथ इसी समुदाय की संवेदनाओं को उभारते हुए मजबूत अपील कर रहे हैं। 

एक बात मालूम होता है कि पूर्वांचल के अंदर भाजपा 4 प्रतिशत राजभर जातियों के बिखराव की भरपाई 4 से 5 प्रतिशत पसमांदा मुस्लिमों के मतों को प्राप्त कर करना चाहती है। यदि पसमांदा मुस्लिमों का वोट भाजपा या ओवैसी को मिलता है तो समाजवादी पार्टी के लिए पूर्वांचल में संकट खड़ा हो सकता है। यदि पसमांदा मुस्लिमों ने धार्मिक आधार से हटकर रोजगार, आवास, कुशलता, बुनकारी को बढ़ावा, उच्च पदों पर उनके समुदाय की बहाली और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर भाजपा को यदि वोट किया तो भारत के चुनावी राजनीति में एक नया प्रयोग साबित होगा और धार्मिक संवेदनाओं पर मिलने वाले वोट का मिथक टूटेगा। ये बातें वास्तविकता के धरातल पर चरितार्थ होगी या धार्मिक रुख के साथ जाएगी, वह आने वाले चुनाव परिणाम के बाद तय होगा।

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