Tuesday, August 4, 2020
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चल काँवड़िया शिव के धाम, राह में पत्थरबाजी करेंगे मुसलमान

ये काफी आश्चर्य की बात है कि दिन में पाँच बार लाउडस्पीकर पर, चाहे इलाका मुसलमान बहुल हो या नहीं, अल्लाह के अकबर होने की बात सुनाई जाती है, वो मुसलमान काँवड़ियों को 'बोल-बम' कहने से रोकते हैं!

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अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

क्या मुसलमानों के इलाकों से गुजरने वाली सड़कें मुसलमानों के बाप की हैं? क्या हिन्दुओं के इलाकों से गुजरने वाली सड़कें हिन्दुओं के बाप की हैं? दोनों का जवाब है नहीं। फिर प्रश्न आता है कि शिवभक्त काँवड़िया जब इन इलाकों से गुजरता है तो पत्थरबाजी और मार-पीट की खबरें कैसे आती हैं? क्या इसके उलट आपने कहीं सुना है कि ईद की नमाज पढ़ते, या ईद तो छोड़िए हर शुक्रवार सड़क घेर कर देश के कई इलाके में नमाज पढ़ते मुसलमानों पर किसी ने आवाज भी उठाई हो?

मार-पीट, पत्थरबाजी की तो बात बहुत दूर की है, यहाँ सोनू निगम को यह कहने पर सर काटने की धमकी दी गई थी जब उन्होंने बहुत ही तार्किक बात कही थी कि मस्जिदों के ऊपर लाउडस्पीकर से आने वाली आवाज हर किसी को सुनाना गैरजरूरी है। इस पर आप ट्वीट या पोस्ट लिख कर देख लीजिए, कुछ राज्यों में आप पर ब्लासफेमी का केस चलेगा और आप जेल में होंगे।

सावन चल रहा है, हर साल चलता है, एक महीने जल उठाकर शिव जी का अभिषेक करने हिन्दू भक्त शिव के धाम जाते हैं। ये मुसलमानों के इस धरती पर आने से पहले से हो रहा है, और आगे भी होता रहेगा। न तो काँवड़िए किसी मुसलमान को छेड़ते हैं, गाली देते हैं, बल्कि पूरे रास्ते ‘बोल-बम’ का आह्वान करते हुए चलते हैं। ऐसा नहीं है कि ये ‘बोल-बम’ मुसलमानों के इलाके में आ कर बोलना शुरू कर देते हैं। अब खबर आ रही है कि मुसलमानों को इस ‘बोल-बम’ से समस्या हो रही है।

पिछले सालों में भी ऐसी खबरें आई हैं जहाँ मुसलमान बहुल इलाके से गुजरने वाले काँवड़ियों पर पत्थरबाजी भी हुई है। अगस्त 2016 में उत्तर प्रदेश के बागपत में ईंट-पत्थरों से हमला किया गया। भीड़ ने गाड़ियों में आग लगा दी। जुलाई 2017 में बरेली के खेलम गाँव में मुसलमानों ने पूरी योजना बना कर काँवड़ियों के जत्थे पर पथराव किया। वो जानते थे कि इधर से ये गुजरेंगे, और छतों पर ईंट-पत्थर लेकर बैठे हुए थे। जब पुलिस आई तो उस पर हमला किया गया। साथ ही, एसडीएम को इनकी भीड़ खींच कर अपने घर ले गई और जम कर पीटा।

अगस्त 2018 में राजस्थान के सीकर जिले के फतेहपुर कस्बे में डीजे बजाते हुए काँवड़िए आ रहे थे। मुसलमानों ने डीजे बंद करने को कहा, तो काँवड़ियों ने आवाज धीमी कर दी। लेकिन, इसी के दौरान मुसलमानों की भीड़ ने उन पर पत्थर, लाठी, सरिया और तलवारों से हमला किया। सात लोग घायल हुए। इस घटना के कुछ ही दिन बाद जयपुर के मालपुरा में 150 काँवड़ियों के बड़े समूह पर मुसलमानों ने गुंडागर्दी करते हुए पत्थरबाजी कर दी। तकरीबन 50 काँवड़िए गंभीर रूप से घायल हो गए।

अगस्त 2018 में काँवड़ में जल भरने के लिए फ़र्रूख़ाबाद से 65 लोग, जिसमें 25 महिलाएँ भी थीं, ट्रैक्टर की ट्रॉली से पांचाल घाट को निकले। रात के एक बजे जब वो जमुरा गाँव से गुजर रहे थे तो कुछ मुसलमान अपनी छतों से पत्थर चलाने लगे। हमले से घबराए ट्रैक्टर चालक ने जब ट्रैक्टर रोका तो उन पर मुसलमानों ने लाठी-डंडों से हमला कर दिया। फिर पुलिस आई और उन्हें सुरक्षा के साथ गाँव से बाहर निकाला गया।

आज की खबर यह है कि उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में काँवड़िए ‘बोल-बम’ का नारा लगाते हुए जल चढ़ाने जा रहे थे, तो गोला बाजार इलाके में कुछ मुसलमान युवकों ने उन्हें ‘बोल-बम’ कहने से मना किया। वो नहीं माने तो इन मुसलमानों ने दो काँवड़ियों की बुरी तरह से पिटाई कर दी। एक भी ऐसी घटना में काँवड़ियों का कोई दोष नहीं है क्योंकि वो अपनी धर्म और आस्था के हिसाब से, बिना किसी गैरकानूनी कार्य को अंजाम देते हुए जल चढ़ाने जा रहे थे, या वहाँ से आ रहे थे।

अगर यात्रा करते भक्त अपने आराध्य का नाम लेकर उद्घोष करते हैं तो मुसलमानों को क्यों आपत्ति होती है? ये काफी आश्चर्य की बात है कि दिन में पाँच बार लाउडस्पीकर पर, चाहे इलाका मुसलमान बहुल हो या नहीं, अल्लाह के अकबर होने की बात सुनाई जाती है, वो मुसलमान काँवड़ियों को ‘बोल-बम’ कहने से रोकते हैं!

इन मुसलमानों की भीड़ें लगातार मंदिर तोड़ रही हैं, शिवलिंग पर पेशाब कर रहे हैं, गाय काट कर दंगे करवाने की योजना बना रहे हैं, खुद ही ‘जय श्री राम’ का नारा लगवा कर वीडियो बनाते हैं कि लगे हिन्दू लगवा रहे हैं नारा, अफवाह फैला कर भीड़ जुटाते हैं और पत्थरबाजी करते हुए मूर्तियाँ तोड़ देते हैं, मार-पीट करते हुए टोपी गिरती है तो कहते हैं उनकी टोपी गिरा दी गई… पिछले 50 दिनों में इनके इतने कांड सामने आए हैं जहाँ ये हिन्दुओं पर हमला भी करते हैं और खुद को डरा हुआ भी बताते हैं।

ये तो नहीं चलेगा। प्रशासन अगर मस्जिद की दीवार पर कीचड़ के छींटे पड़ने पर एक्शन में आ जाती है तो फिर उसी शिद्दत से इन मुसलमानों पर भी एक्शन लेना चाहिए। सिर्फ नैरेटिव बनाने के लिए कठुआ पीड़िता का नाम आज भी मुसलमान नाम वाले प्रोफाइलों से हर मौलवी द्वारा रेप के खबर (जो काफी हो रही हैं) के नीचे आ जाता है, लेकिन इन अपराधों की स्वीकारोक्ति उस मुसलमान में भी नहीं है जो आतंकियों को ‘वो तो सच्चे मुसलमान नहीं है’ कह कर खुद को सच्चा बताता फिरता है। इनके मुँह में क्या लाउडस्पीकर डाल दिया गया है?

ये लोग हमेशा मुसलमानों पर हुए सामाजिक, मजहबी नहीं, सामाजिक अपराध पर भी तुरंत सैकड़ों की तादाद में पोस्ट और ट्वीट लिख कर बताते हैं कि कैसे उन्हें टार्गेट किया जा रहा है। एक कथित चोर की पिटाई होती है और इनकी तख्तियाँ गले में लटक जाती है, भारत लिंचिस्तान हो जाता है। उसी सप्ताह एक हिन्दू को तीन मुसलमान चाकुओं से इसलिए गोद देते हैं कि उसने अपने घर के आगे गाँजा पीने से मना किया। वो मर जाता है। तख्तियाँ स्थान विशेष में छुपा ली जाती हैं, अच्छे मुसलमान गायब हो जाते हैं देश से।

यह तर्क आएगा कि ये तो महज कुछ घटनाएँ ही हैं, देश में बीस करोड़ मुसलमान हैं, सारे ऐसे नहीं हैं। सारे हिन्दू भी तो ‘जय श्री राम’ नहीं करवा रहे। सिर्फ पचास दिन में आठ ऐसी घटनाएँ सामने आईं जहाँ मुसलमानों ने ‘जय श्री राम’ वाला एंगल मजे-मजे में डाल दिया और इनके इमाम तक धमकी दे रहे थे कि ये उखाड़ लेंगे और वो उखाड़ देंगे। वो तर्क तो हिन्दुओं पर भी लागू होगा न कि अपराधियों का धर्म नहीं होता, आठ लोगों ने अगर बलात्कार किया तो पूरा हिन्दुस्तान और सारे हिन्दू बलात्कारी कैसे हो जाते हैं?

बात तो प्रवृत्ति की है कि अपने पर आए तो विक्टिम कार्ड खेलो, और मौका मिले तो शिवलिंग पर पेशाब कर दो। कितने मुसलमानों ने इस पर लिखा या ट्वीट किया कि काँवड़ियों पर पत्थरबाजी गलत है? या उन्हें अपनी मजहबी शिक्षा याद आई जहाँ काफिरों को काट देना भी सही है? यहाँ तो बस ईंट-पत्थर और तलवार-सरिया से बस थोड़ी-सी हिंसा हो रही है।

इनके नेता अपने मजहब के उन्मादी लोगों और भीड़ों द्वारा पब्लिक से लेकर पुलिस तक पर हमला बोलने की बात पर चुप रह जाते हैं, और खुद को पीड़ित दिखा कर गाँधी-नेहरू-पटेल से पूछते हैं कि उन्हें सुरक्षा क्यों नही मिल रही? क्या मुसलमान इस देश के नागरिकों में कोई ऊँचा स्थान रखते हैं? क्या वो देश की दूसरी सबसे बड़ी आबादी नहीं? क्या वो लगातार इस देश के सत्तालोलुप नेताओं को तुष्टीकरण के कारण हर उस जगह पर भी अल्पसंख्यक होने का फायदा नहीं उठा रहे जहाँ वो बहुसंख्यक हैं?

ये अगर आतंक नहीं है तो और आतंक की परिभाषा क्या है? हर धार्मिक आयोजन पर पत्थरबाजी को कैसे सही ठहराया जा सकता है? एक बार हो तो कहें कि सामाजिक अपराध है, दो बार हो तो कहें कि दुर्घटना है, हो जाती है, लेकिन एक मजहब के लोग, दूसरे धर्म के आयोजनों पर, मंदिरों पर, मूर्तियों पर एक ही तरीके से हमला बोलें, तब तो वो पैटर्न है। इसका सीधा अर्थ है कि मुसलमान कुछ संदेश देना चाहते हैं।

क्या वो संदेश ये है कि इनके इलाकों की सड़कें, जमीन और हवा इनके बाप की जागीर है? या फिर भारत के हर राज्य के हर इलाके की सड़क सार्वजनिक है, जिस पर कोई भी जा सकता है। क्या अपने मस्जिदों के लाउडस्पीकर से दिन में पाँच बार तेज आवाज में अजान देने वाले मजहब के लोग साल में एक सोमवार को, अपने इलाके की सड़क से जाते काँवड़ियों के ‘बोल-बम’ को बर्दाश्त नहीं कर सकते?

क्या सहिष्णुता सिर्फ एक धर्म में ही सन्निहित रहे और दूसरे मजहब के लोग दुर्गा विसर्जन से लेकर रामनवमी के जुलूसों और सावन के काँवड़ियों पर पत्थर बरसाते रहें? आप सोचते रहिए।

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अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

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