गाजियाबाद के लोनी इलाके में जुमे के दिन 27 फरवरी 2026 की सुबह EX-मुस्लिम सलीम वास्तिक पर जानलेवा हमला किया जाता है। दो नकाबपोश हमलावर चाकू, पेपर कटर और अन्य धारदार हथियारों से वास्तिक के गले और पेट पर वार करते हैं। इससे साफ है कि हमलावर का मकसद सिर्फ मौत नहीं, बल्कि ‘दर्दनाक’ मौत देना था।
दो दिन के भीतर उत्तर प्रदेश पुलिस हमलावरों में से एक अमरोहा के मोहम्मद जीशान को मुठभेढ़ में ढेर कर देती है। जीशान के पास से एक मेड इन इटली पिस्टल, 14 कारतूस, पेपर कटर और एक मोटरसाइकिल बरामद की जाती है। अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब हमलावरों के पास मजबूत और सटीक निशाने वाली इटली की पिस्टल थी, तो सलीम वास्तिक को चाकू से क्यों काटा गया?
यह हमला किसी साधारण रंजिश का परिणाम नहीं था बल्कि एक सुनियोजित और सोच समझकर किया गया कृत्य था। जिस तरह से सलीम वास्तिक पर हमला किया गया, वह साफ संकेत देता है कि मकसद केवल उनकी जान लेना नहीं था बल्कि समाज में डर का माहौल पैदा करना भी था। हमलावारों ने जानबूझ कर पिस्टल के बजाए चाकू से हमला किया। यह गुलाम-ए-नबी की सजा ‘सर तन से जुदा’ का पाक उदाहरण था, जो कट्टरपंथी अक्सर ‘काफिरों’ के लिए इस्तेमाल करते हैं।
यह घटना उस कट्टरपंथी सोच को उजागर करती है, जो अपने मजहब के खिलाफ एक शब्द नहीं सुन सकते, ‘गुस्ताख-ए-नबी’ और ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगाने लग जाते हैं। सलीम भी इसीलिए इन कट्टरपंथियों का निशाना बने। वो एक विद्वान व्यक्ति थे। उन्होंने अपनी दीनी तालीम पूरी की थी। इस्लाम को लेकर उनकी अच्छी-खासी समझ थी। उन्हें इस्लाम में खामियाँ साफ दिखती थीं, वह सार्वजनिक तौर पर इसे कबूल भी कर चुके थे।
उनके अनुसार कुरान को अल्लाह ने नहीं लिखा है और यह जबरन थोपा जा रहा है। यही वजह रही कि वास्तिक ने इस्लाम छोड़ा और अपने यूट्यूब चैनल के जरिए इस्लाम की खामियों और मजहब में महिलाओं की आजादी और हलाला जैसी कृत्यों को लेकर आवाज उठाने लगे। उन्होंने यह भी कहा कि सच्चा मुस्लिम आतंकवादी है। यह सभी ओपिनियन वास्तविक ने कुरान के हवाले से ही दिए हैं।
लेकिन इसके बावजूद यह कुछ इस्लामी कट्टरपंथियों को रास नहीं आया। वे हिंसा के रास्ते पर जाने के लिए बहानें खोज ही लेते हैं। कभी धर्म के नाम पर, तो कभी धर्म के लिए। उन्होंने वास्तिक के खिलाफ फरमान निकाला। वास्तिक का इस्लाम के खिलाफ बोलना इन कट्टरपंथियों को नागवारा और हत्या की साजिश रची। लेकिन उनके लिए यह हत्या कोई मामूली नहीं, बल्कि समाज के लिए उदाहरण पेश करने वाली होनी चाहिए थी।
इटली की पिस्टल होने के बावजूद आसान मौत देने के बदले कट्टरपंथियों ने ‘कसाईनुमा’ मौत का रास्ता चुना। वास्तिक को चाकुओं से गोदा गया। उनके गले, छाती और पेट को चाकुओं से काटा गया। तब तक जब तक वो मर न जाए। लेकिन गनीमत रही कि हमले के कारण वह बेहोश होकर गिर पड़े, जिससे हमलावरों को लगा कि वास्तिक मर गए और वे मौके से फरार हो गए। वास्तिक को तुरंत अस्पताल ले जाया गया। आज वो दिल्ली के जीटीबी अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ रहे हैं।
पुलिस के बयान में सामने आया कि हमला करने वाले अपराधी अपने मकसद को अंजाम देने के लिए दोबारा से घटनास्थल पर आए थे। हमलावरों को पता लगा कि सलीम सिर्फ घायल है, तो वो घटनास्थल पर जाकर एक बार फिर हमला करने के लिए पहुँचे। हमले में AIMIM के कुछ कट्टरपंथी नेता के भी नाम सामने आए हैं, सलीम के बेटे ने उनके खिलाफ FIR दर्ज करवाई है।
साफ है कि सलीम वास्तिक के जरिए कट्टरपंथियों ने उदाहरण पेश कर दिया। वह बताना चाहते हैं कि कोई भी इस्लाम के खिलाफ बोलेगा तो उसका भी यही हश्र होगा। फायरिंग करते, तो शायद ‘काफिरों’ पर उतना असर नहीं डालता। वास्तिक पर हमला गुलाम-ए-नबी की शान में गुस्ताखी करने के कारण किया गया, और ये उसी ‘सर तन से जुदा’ के नारे का लाइव उदाहऱण है, जो कट्टरपंथी गली-मोहल्लों और सड़कों पर ‘काफिरों’ के लिए चींख-चींखकर देते हैं।


