Thursday, September 29, 2022
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मजहब के हिसाब से नहीं ढलता बदन, फिर पीरियड आते ही निकाह कबूल कैसे: दूध पीती बच्ची से ‘कामुक हरकत (लिंग प्रवेश नहीं) जायज’ वाली सोच से कब लड़ेंगे मुस्लिम

इस्लाम में लड़की के निकाह की सही उम्र उसके सयाने होने के बाद से मानी जाती है। फिर वो चाहे 15 साल की उम्र में हो या उससे कम में। अदालतें भी ऐसे निकाह को नाजायज नहीं बता पातीं क्योंकि शादियाँ इस्लामी कानून के लिहाज से होती हैं।

भारत में लड़कियों के विवाह की न्यूनतम आयु 18 वर्ष कानून से तय है। लेकिन बात जब मुस्लिम लड़कयों की होती है तो अदालतों के हाथ इस्लामी कानून के कारण बंध जाते हैं। हाल में दिल्ली हाईकोर्ट ने एक आदेश में 15 साल की लड़की निकाह को जायज ठहराया। लड़की के घरवाले इसके खिलाफ थे। फिर भी बच्ची के निकाह को मानते हुए उसे उसके शौहर के साथ रहने की अनुमति दी गई। कोर्ट ने उन्हें आश्वस्त भी किया कि अगर वह दोनों साथ रहना चाहते हैं तो कोई उन्हें अलग नहीं कर सकता।

कैसे माना गया निकाह जायज? क्या कहता है इस्लामी कानून

निकाह आदि के मामले में इस्लाम का कानून, भारतीय कानून से अलग चलता है। इस्लाम पर्सनल लॉ कहता है कि अगर लड़की सयानी हो गई है तो उसका निकाह करने में कोई दिक्कत नहीं है। हालाँकि सयानी होने की उम्र कितनी होती है ये इस कानून में स्पष्ट नहीं है। मेडिकली मानते हैं कि लड़की 15 साल की उम्र तक प्यूबर्टी को छूती है। लेकिन व्यवहारिक तौर पर देखें तो ये कई लडकियों को मासिक धर्म कम उम्र में भी शुरू हो जाते हैं। ऐसे में इस्लाम की परिभाषा के अनुसार, वो 15 की हो या कम की, सयानापन आते ही उनका निकाह जायज हो जाता है।

भारत में विवाह की सही उम्र के लिए कानून

मुस्लिम सुमदाय के लोग मानें या न मानें लेकिन अन्य समुदाय के लोग शादी की उम्र पर बात करते हुए तय कानून को मानते हैं। इसका कारण यही है कि शादी की जो उम्र 18 साल बनाई गई है वो बहुत सोच-विचारने के बाद तय हुई है। आगे भी इसके बढ़ने की संभावना है।

सबसे पहले 1860 के इंडियन पीनल कोड में शादी की उम्र का कोई जिक्र नहीं था, लेकिन 10 साल से कम उम्र की लड़की के साथ शारीरिक संबंध को गैरकानूनी बताया गया था। फिर धर्म के आधार पर शादी की उम्र को लेकर कानून आए जैसे इंडियन क्रिश्चियन मैरिज एक्ट, हिंदू मैरिज एक्ट। 

इस बीच 1929 में पहली बार शादी की उम्र को लेकर कानून बना। बाल विवाह निरोधक कानून 1929 के अनुसार शादी के लिए लड़के की न्यूनतम आयु 18 साल और लड़की की न्यूनतम आयु 16 साल तय की गई। फिर 1978 में बाल विवाह कानून में संशोधन किया गया। इसमें लड़के की शादी की न्यूनतम उम्र 21 साल और लड़की की 18 साल कर दी गई।

इसके बाद 1929 के बाल विवाह निषेध अधिनियम को निरस्त कर केंद्र सरकार बाल विवाह निषेध कानून 2006 लेकर आई। नवंबर 2007 से यह कानून लागू किया गया। आज यह कानून सभी धर्मों पर लागू होता है। लेकिन, मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट 1937 की वजह से यह पूरी तरह कारगर साबित नहीं हो पा रहा।

क्या-क्या होगा जायज?

अब हालात जब ये हैं कि हमारी अदालतें भी इस कानून के आगे इतना बंध गई है तो सवाल उठना जाहिर है कि आखिर कब तक मजहबी कानून के आधार पर समाज में फैसले होंगे। एक ओर इस्लाम लड़की के सयानी होने की उम्र को उसके निकाह की सही उम्र मानता है। तो दूसरी ओर ये भी कहता है कि दूध पीती बच्ची के कामुक टच भी जायज है, बस लिंग प्रवेश नहीं होना चाहिए।

मौजूद जानकारी के अनुसार, ये बात ईरान के संस्थापक अयातुल्लाह खुमैनी ने अपनी किताब में कह रखी है, “लड़की के 9 साल के होने से पहले सेक्स नहीं करना चाहिए। भले ही वह स्थाई या अस्थाई निकाह ही क्यों न हो। इसके अलावा अन्य तमाम हरकतें की जा सकती हैं जिसमें कामुक टच, गले लगाना और पैरों के बीच में प्राइवेट पार्ट रगड़ना शामिल है। यहाँ तक कि ये सब किसी दूध पीती बच्ची के साथ भी जायज है।”

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मजहब देखकर नहीं पड़ता शरीर पर असर

लड़कियों के लिए शादी की सही उम्र 16 हो, 18 हो या 21 हो- इस पर बहस लंबे समय से हो रही है। जाहिर है कि इसके पीछे कारण सिर्फ सामाजिक नहीं हैं। मेडिकली भी माना जाता है कि इस तरह कम उम्र में लड़कियों की शादियाँ उनकी शारीरिक, मानसिक विकास के लिए सही नहीं होता।

पढ़ने की उम्र में लड़कियाँ घर के काम-काज में उलझ जाती हैं। उनका मानसिक विकास चार दिवारी में होना शुरू होता है और वहीं सीमित रह जाता है। इसी तरह हेल्थ की बात करें तो कई अध्य्यन हैं जो कहते हैं कि कम उम्र में शादी के बाद प्रसव के समय माँ और बच्चा दोनों की जान को खतरा बराबर रहता है।

कई बार कमजोर शरीर के कारण गर्भपात के खतरे बढ़ जाते हैं और कई बार वे एनिमिया, हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों की शिकार हो जाती हैं। नेशनल लाइब्रेरी ऑफ साइंस पर प्रकाशित एक लेख बताता है कि कम उम्र में लड़कियों की शादी उनके लिए तमाम बीमारियाँ लेकर आती हैं। कई बार उन्हें यौन संबंधी समस्या हो जाती हैं, तो कभी बार सर्वाइकल कैंसर से उन्हें जूझना पड़ता है।

ncbi पर प्रकाशित लेख से लिया स्क्रीऩशॉट

इंसानी शरीर को मद्देनजर रखते हुए किए गए विज्ञान के शोध मजहब देखकर नहीं किए जाते। न ही ऐसे शोधों में मजहब का कोई रोल होता है। अगर विज्ञान इस बात को कह रहा है कि बाल विवाह के बाद की समस्याएँ लड़की के शरीर के लिए खतरनाक हैं, तो ऐसा नहीं है कि उसने सिर्फ हिंदू, ईसाई लड़कियों को देख अपने निष्कर्ष दिए। इसमें मुस्लिम लड़कियाँ भी आती हैं जिनके निकाह की उम्र उनके माहवारी के बाद से शुरू हो जाती है।

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