Monday, November 28, 2022
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पीरियड आते ही निकाह… क्या मुस्लिम लड़कियों पर भी लागू होगा शादी की न्यूनतम उम्र 21 साल करने वाला बदलाव?

कानून में बदलाव होगा तो ये सारे समुदायों पर काम करेगा लेकिन सवाल आता है कि क्या ये मुस्लिमों पर भी लागू होगा, जिनमें निकाह के लिए इस्लाम पर्सनल लॉ काम करता है और जो सामान्य कानून से थोड़ा अलग है।

केंद्र की मोदी सरकार ने कानूनों में बदलाव के उस प्रस्ताव पर मुहर लगा दी है जिससे लड़कियों की शादी की न्यूनतम आयु 18 वर्ष से बढ़ाकर 21 साल हो जाएगी। 2020 में स्वतंत्रता दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री ने इस दिशा में बदलाव के संकेत दिए थे। अब इस दिशा में सरकार बढ़ती दिख रही है। कैबिनेट की मँजूरी के बाद बाल विवाह निषेध कानून, स्पेशल मैरिज एक्ट और हिंदू मैरिज एक्ट में संशोधन का रास्ता साफ हो गया है। फिलहान कानून लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र 18 साल और लड़कों की 21 साल अनिवार्य है

हर समुदाय पर लागू होगा कानून?

हिंदू मैरिज एक्ट जिसमें बदलाव की बात का जिक्र हो रहा है उसके तहत हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध समुदाय के लोगों की शादियाँ आती हैं। जाहिर है कि जब कानून में बदलाव होगा तो ये सारे समुदायों पर काम करेगा लेकिन फिर सवाल आता है कि क्या ये मुस्लिमों पर भी लागू होगा, जिनमें निकाह के लिए इस्लाम पर्सनल लॉ काम करता है और जो सामान्य कानून से थोड़ा अलग है?

जवाब है कि सरकार द्वारा बनाया गया हर कानून देश के हर समुदाय के लिए होता है बशर्ते वो उसे मानें। इस्लाम लॉ तो लड़कियों की बालिग होने की उम्र 18 भी नहीं मानता… इसके मुताबिक, पीरियड आने के बाद लड़कियाँ निकाह के लिए योग्य हो जाती हैं। फिर चाहे वो उम्र 12-13 की हो या फिर 15 की।

मेडकली माना जाता है कि लड़किया प्यूबर्टी की स्टेज को 15 साल की उम्र में छूती हैं। हालाँकि, ये भी सच है कि कई लड़कियों को माहवारी कम उम्र में ही शुरू हो जाती है और इस्लाम के अनुसार वो उसी उम्र में निकाह के लायक बन जाती हैं। आँकड़ों की बात करें तो यूनिसेफ के नंबर बताते हैं कि भारत में 27 फीसदी लड़कियों की शादी 18 साल और 7 फीसदी की 15 साल की उम्र से पहले हो जाती है। इसमें एक बड़ा हिस्सा समुदाय विशेष का क्यों होता है, इसका जवाब मुस्लिम पर्सनल लॉ के प्रावधान हैं।

बाल विवाह निषेध कानून कर पाएगा कुछ मदद?

विभिन्न समुदाय वाले भारत में बाल विवाह निषेध कानून वो कानून है जो हर समुदाय पर लागू होता है। हालाँकि, इसमें भी विडंबना ये है कि इस कानून में इस्लाम को लेकर स्थिति स्पष्ट हीं है क्योंकि दिल्ली हाईकोर्ट ने 2012 में एक 15 साल की लड़की की अपनी मर्जी से शादी को वैलिड मानते हुए कहा था कि इस्लामिक कानून के मुताबिक लड़की मासिक धर्म शुरू होने के बाद अपनी इच्छा के मुताबिक शादी कर सकती है। 

वहीं गुजरात हाई कोर्ट ने 2015 में कहा था कि बाल विवाह निषेध कानून 2006 के दायरे में समुदाय विशेष वाले भी आते हैं। अक्टूबर 2017 में सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस एमबी लोकुर और दीपक गुप्ता ने समुदाय विशेष के अलग विवाह कानून को पीसीएमए के साथ मजाक बताया था। सितंबर 2018 में पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने कहा था कि समुदाय विशेष पर यह कानून लागू नहीं होता। अदालत का कहना था कि मुस्लिम पर्सनल लॉ स्पेशल एक्ट है, जबकि पीसीएमए एक सामान्य एक्ट है।

सरकार का प्रस्ताव और समुदाय विशेष का विरोध शुरू?

मोदी कैबिनेट में लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ाने को लेकर अभी प्रस्ताव पारित ही हुआ है कि इस्लाम के ठेकेदारों ने इस पर गुरेज करना पहले शुरू कर दिया। जी न्यूज पर बात करते हुए मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की सदस्य पूछती हैं कि आखिर नए-नए बिल लाकर सरकार क्या कर लेगी?

वहीं लखनऊ के मौलाना इश्तियाक कादरी कहते हैं लड़कियों की शादी की उम्र 18 ही रहने दी जानी चाहिए। सरकार ने नए बिल को लाकर नौजवानों की आजादी छीन ली है। मुस्लिम संगठन जमीयत-उलेमा-ए-हिंद के सचिव गुलजार आजमी ने कहा कि वे इसे नहीं मानेंगे। इससे लड़किया गलत राह पर जाएँगी। उनके अनुसार यह बिलकुल गलत है। उनके मजहब में लड़का-लड़की 14-15 साल में ही बालिग हो जाते हैं।

अब यहाँ बता दें कि सरकार की कोशिश लड़कियों को अच्छा जीवन देने की है। इन्हीं प्रयासों के तहत ये कदम उठाया गया है। सोचिए, 18 की उम्र तक एक सामान्य लड़की सिर्फ 12वीं तक पढ़ पाती है लेकिन थोड़ा समय मिले तो स्नातक करना, अच्छे नौकरी के लिए खुद को योग्य बनाना, कोई मुश्किल काम नहीं होता। सरकार का यह फैसला बेशक उन लड़कियों को अपने लिए सोचने का मौका देगा जिन्हें शादी की धमकियाँ देकर घर में बैठा दिया जाता था या जिनपर ऐसे मजहबी ठेकेदार हावी होते हैं। लेकिन, अगर विरोध यही आलम रहा तो बताइए कि कौन सी सरकार या कौन सा कानून कट्टरपंथ की बेड़ियों से मुस्लिम लड़कियों को आजाद करवा पाएगी।

शादी की उम्र और बहस पुरानी

आज कट्टरपंथी चाहे कुछ भी कहें, शादी की न्यूनतम उम्र कितनी हो इस पर भारत में अरसे से बहस हुई है। अंग्रेजी राज में इस संबंध में पहली बार कानून बना। बाद में कई बार बदलाव हुए। लेकिन, समुदाय विशेष के लोग बदलाव से अछूते रहे। 1860 के इंडियन पीनल कोड में शादी की उम्र का कोई जिक्र नहीं था, लेकिन 10 साल से कम उम्र की लड़की के साथ शारीरिक संबंध को गैरकानूनी बताया गया था। फिर धर्म के आधार पर शादी की उम्र को लेकर कानून आए। इंडियन क्रिश्चियन मैरिज एक्ट 1872 में लड़के की न्यूनतम उम्र 16 साल और लड़की की न्यूनतम उम्र 13 साल तय की गई। 1875 में आए मेजोरिटी एक्ट में पहली बार बालिग होने की उम्र 18 साल तय की गई। इसमें शादी की न्यूनतम उम्र का तो कोई जिक्र नहीं था, लेकिन लड़के और लड़की दोनों के बालिग होने की उम्र 18 साल मानी गई।

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