कुतुबमीनार, ज्ञानवापी, मथुरा या ढाई दिन का झोपड़ा: मस्जिद जो हिंदुओं के जख्म पर नमक जैसे हैं

हिंदुओं को संयम या सहिष्णुता न सिखाओ बे! यदि हिन्दू असहिष्णु होता न तो दिल्ली, पटना, मध्य प्रदेश, गुजरात, यूपी... कोई भी जगह शांत न रहती, जहाँ सीधे नंगी आँखों को मंदिरों के ऊपर तामीर की गई मस्जिद दिखाई देती है।

अयोध्या में भगवान राम के मंदिर का निर्माण प्रशस्त करने का फैसला जब 9 नवंबर को आ रहा था, तो शुरुआती 2 टिप्पणियाँ देखकर मैंने लिखा था, ‘सबको खुश करने वाला फैसला आने की उम्मीद है।’ जब 11 बजे फैसला आ गया तो कई मित्रों ने कहा, “मैंने अधीरता और आवेश में वैसा लिखा, कोर्ट ने तो फैसला ‘हिंदुओं के पक्ष’ में दिया है।” अब, जबकि 2 दिन बीत चुके, धूल बैठ चुकी, मैं फिर भी पूरी तरह अपनी बात पर क़ायम हूँ।रामजन्मभूमि पर अदालती फैसले पर जो मेरी समझ है, उसे निम्नलिखित कुछ बिंदुओं से समझते हैं:-

  1. पहली बात तो यह कि बधाई या प्रसन्नता की कोई बात नहीं है। लगभग 500 वर्षों के संघर्ष के बाद हिंदुओं को अपने आराध्य के पूजन का, उनके मंदिर का अधिकार मिला है। इसके साथ ही अदालत ने 5 एकड़ का मुआवजा भी थमा दिया है, जो हिंदुओं के ऊपर जुर्माने से कम नहीं है। भाई, मुकदमा तो इसका था न कि अयोध्या में मंदिर को तोड़कर (यह अलग बात है कि भारत की अधिकांश मस्जिदें मंदिर तोड़कर बनीं) मस्जिद बनाई गई, वह स्थल हिंदुओं के आराध्य की जगह है, उसे वापस हिंदुओं को देना है। इसमें 5 एकड़ मुआवजा क्यों देना? हिंदुओं को तो राम के अस्तित्व का प्रमाण देना पड़ा, अदालती लड़ाई में कूदना पड़ा, जो राम इस देश के कण-कण में हैं, उस राम को झुठलाने के जिहादी-वामपंथी षड्यंत्र का कालकूट पीना पड़ा। इसमें बधाई की कौन सी बात है।
  2. कई सेक्युलर-कुबुद्धिजीवी खुलकर न्यायालय के फैसले की आलोचना कर रहे हैं। इस देश को गटर बनाने वाली पार्टी कॉन्ग्रेस ने तो अपने मुखपत्र तक में सर्वोच्च न्यायालय की आलोचना की है। JNU में लबार लौंडे-लौंडियों ने इस फैसले के विरोध में सभा की। ओवैसी जैसा जिहादी सीना ठोक कर मुखालफत करता है। 5 एकड़ की ‘खैरात’ से इनकार करता है। क्या हम यह सोच भी सकते हैं कि इन पर कड़ी कार्रवाई होगी? शायद नहीं।
  3. कौमी-कॉन्ग्रेसी-कुबुद्धिजीवी अचानक से हमें याद दिलाते हैं कि “तथ्यों के मुकाबले आस्था को प्राथमिकता” डील पर यह निर्णय हुआ। इस बात का सिवाय बढ़िया पश्च-सेवा के अलावा क्या जवाब है? कुतुबमीनार हो या ज्ञानवापी, भोजशाला हो या मथुरा, ढाई दिन का झोपड़ा हो या कोई भी बुलंद मस्जिद, वह हिंदुओं के स्वाभिमान को ध्वस्त करने के लिए उनके परम पूज्य आराध्यों के मंदिरों को भूमिसात कर बनाई गई है। आज भी उनके साक्षात प्रमाण हिंदुओं को मुँह चिढ़ाते हैं, उसके ज़ख्मों पर नमक छिड़कते हैं। और ये मक्कार, झूठे, लबार तथ्यों की बात करेंगे, जिन्होंने रोमिला-हबीब जैसे उपन्यासकारों के जरिए भयानक झूठ बोले, षड्यंत्र किए और जन्मभूमि के मामले को उलझाने की कोशिश की? ये बात के नहीं, सोंटे के लायक हैं।
  4. और अंत में। अचानक से कुछ धिम्मियों की आत्मा जागी है, उनके अंग-विशेष से आँसू निकल रहे हैं। वे हमें सिखा रहे हैं कि “प्रतिक्रिया देना मुसलमानों से सीखें। उन्होंने जो संयम दिखाया है, उसे देखकर हिंदुओं को शर्म आनी चाहिए।”

अब ऐसे लोगों की तुड़ाई के अलावा कोई चारा नहीं है। पहली बात, सरकार के इक़बाल और पूरी तैयारी की वजह से हमारे “शांतिदूत” भाई चुप हैं। हालाँकि, यह एक बृहत तैयारी के पहले की खामोशी भी हो सकती है। दूसरे, हिंदुओं को संयम या सहिष्णुता न सिखाओ बे! यदि हिन्दू असहिष्णु होता न तो दिल्ली, पटना, मध्य प्रदेश, गुजरात, यूपी… कोई भी जगह शांत न रहती, जहाँ सीधे नंगी आँखों को मंदिरों के ऊपर तामीर की गई मस्जिद दिखाई देती है। तीसरी और अंतिम बात, मुसलमान यदि सचमुच सहिष्णु है तो तत्काल कम से कम काशी और मथुरा के मंदिरों को खुद खाली करे और हिंदुओं के साथ वहाँ भव्य मंदिर बनवाए। बाकी, 30 हज़ार मंदिरों की तो बात भी नहीं हुई है…. (अफसोस, ऐसा हो न पायेगा।)

यह लेख स्वामी व्यालोक पाठक ने लिखा है।


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डिस्क्लेमर:- यह पोस्ट किसी भी तरह माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के ऊपर टिप्पणी नहीं है।

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