साहित्य अकादमी पुरस्कार 2025 की घोषणा पिछले दिनों हुई, जिसमें हिंदी में वरिष्ठ लेखिका ममता कालिया को उनके संस्मरण ‘जीते जी इलाहाबाद’ के लिए सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार प्रयागराज (पूर्व इलाहाबाद) के साहित्यिक और सांस्कृतिक परिवेश को याद करते हुए आया लेकिन इससे जुड़े विमर्श ने फिर से साहित्य अकादमी में वैचारिक प्रभाव और संस्थागत स्वायत्तता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मोदी सरकार के 11 वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बावजूद कई लोग मानते हैं कि अकादमी में वामपंथी-प्रगतिशील प्रभाव का दबदबा अब भी कायम है।
वरिष्ठ पत्रकार तरुण विजय ने इस पुरस्कार पर टिप्पणी करते हुए कहा कि साहित्य अकादमी ने वामपंथियों के यशोगान से पूर्ण एक पुस्तक अभी छापी है जबकि मोदी धरोहर की रक्षा और उनके योगदान पर केंद्रित पुस्तक को सांस्कृतिक सचिव को लौटा दिया गया। यह घटना अकादमी के भीतर वैचारिक असंतुलन को उजागर करती है।
स्वायत्तता या पुरानी लॉबी का चक्रव्यूह?
साहित्य अकादमी भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अधीन स्वायत्त संस्था है लेकिन इसका संविधान 1952 के सरकारी प्रस्ताव पर आधारित है, न कि संसदीय कानून पर। सर्वोच्च जनरल काउंसिल में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सरकार के पाँच नामित सदस्य, राज्य प्रतिनिधि और भाषा विशेषज्ञ शामिल होते हैं। पुरस्कार चयन बहु-स्तरीय है-भाषा-विशेष जूरी, एक्जीक्यूटिव बोर्ड की मंजूरी और अंतिम घोषणा।
आउटगोइंग काउंसिल ही इनकमिंग सदस्यों का चयन करती है, जिससे निरंतरता तो बनी रहती है लेकिन गुटबंदी और लॉबिंग की गुंजाइश भी बढ़ जाती है।
प्रधानमंत्री या संस्कृति मंत्रालय सीधे जूरी में हस्तक्षेप नहीं कर सकते। हाल ही में पुरस्कार घोषणा में तीन महीने का विलंब हुआ क्योंकि संस्कृति मंत्रालय ने ‘रिवार्ड स्ट्रक्चरिंग’ के लिए पूर्व अनुमति अनिवार्य कर दी थी। वामपंथी लॉबी ने इसे स्वायत्तता पर हमला बताया लेकिन विलंब के बाद घोषणा हुई और ममता कालिया जैसे नाम सामने आए।
यह घटनाक्रम साबित करता है कि सरकार एक झटके में पूरी प्रक्रिया नहीं बदल सकती। संविधान संशोधन के लिए व्यापक विमर्श, कानूनी प्रक्रिया और संसदीय सहमति जरूरी है। बिना इसके नई निर्वाचन प्रक्रिया-जैसे रोटेशन सिस्टम, अधिक पारदर्शी नामांकन और युवा/महिला प्रतिनिधित्व-नहीं लाई जा सकती।
ममता कालिया का मामला: पुरस्कार और वैचारिक असहजता
‘जीते जी इलाहाबाद’ संस्मरण में विभाजन काल के गैर-मुस्लिम शरणार्थियों पर टिप्पणियाँ, ईद की कुर्बानी और ताजा गोश्त का भावुक वर्णन, कुंभ मेले में स्वच्छता अभियान पर आक्षेप जैसी बातें हैं। उनके परिवार का इलाहाबाद के मुस्लिम बहुल मुहल्ले रानी मंडी से 6 दिसंबर 1992 को भागना भी दर्ज है।
अपने संस्मरण के 159वें पृष्ठ पर कालिया एक प्रसंग दर्ज करती हैं। जिसमें बताती हैं कि जैदी साहब के घर पाँच किस्म का गोश्त बना था। जैदी, इंदिरा और नेहरू के प्रशंसक थे। उनका ही कोई किस्सा छेड़ बैठे थे।
अब आती है सेकुलर किस्म की पंक्ति:- अचानक मेरे जेहन में घंटी बजी। आज कौन वार है? मंगलवार। हे भगवान यह कैसी इम्तहान की घड़ी आ गई।
मैं सोम मंगल का कोई उपवास व्रत नहीं रखती थी। पर न जाने कब से एक रूढ़ि मन में बैठी थी कि आज मंगलवार को मांसाहार नहीं करते। मैने धीरे से रवि से कहा: मेरी प्लेट तुम ले लो। आज मंगल है।
रवि इसमें कहते हैं, बुधवार को खा ले और मंगल को बचे। उसे जबरदस्ती खिलाना चाहिए।
ममता कालिया की पीढ़ी के ‘साहित्यकारों’ के लिए मंगलवार जैसे प्रसंग अपनी कहानी, नाटक, संस्मरण में डालना अनिवार्य होता है। ‘हिन्दू’ साहित्यकार ऐसा लिखकर ही प्रगतिशील हो सकता है। मुसलमानों को पाँच वक्त के नमाज पर सवाल नहीं उठाना पड़ता। प्रगतिशील खेमे में सारी परीक्षा हिन्दुओं को देनी है।
भारत में प्रगतिशील मुसलमान लेखकों ने नासिख-मंसूख (Abrogation) के सिद्धांत पर चुप्पी साधी। पत्नी को पीटने की अनुमति, महिलाओं की गवाही आधी, बाल विवाह या आयशा की उम्र से जुड़े प्रश्नों पर प्रगतिशील ‘स्त्रीवादियों’ ने कुछ कहा ही नहीं। क्या मजबूरी थी?
इस्लाम के अंदर मौजूद दंड व्यवस्था, वहाँ मौजूद जिहाद और काफिरों से संबंधित आयतों पर प्रगतिशीलों का कुछ ना लिखना, क्या साबित नहीं करता कि वे कथित धर्मनिरपेक्ष सरकारों के संरक्षण में कट्टरपंथी मुसलमानों को प्रोत्साहित कर रहे थे। खलीफा उस्मान बिन अफ्फान ने कुरान के पाठ में भिन्नता के कारण पैदा हुए विवादों को रोकने और पाठ की प्रामाणिकता को बनाए रखने के लिए कुरैश की बोली में एक मानक प्रति (उस्मानी मुस्हफ) तैयार करवाई। इसके बाद, उन्होंने अन्य सभी व्यक्तिगत या कथित गैर-मानक प्रतियों को नष्ट कर दिया, जिससे एकता बनी रहे और पाठ में कोई हेरफेर न हो।
क्या कभी किसी प्रगतिशील लेखक ने यह कहने का साहस जुटाया कि एके रामानुजन, थ्री हंडरेड रामायणा (1987) इसलिए लिख पाए क्योंकि इस देश में संवाद और विमर्श की परंपरा रही है। यहाँ वाल्मिकी रामायण के बाद श्रीराम के नाम पर काल्पनिक और षडयंत्र के हद तक लिखी गई झूठी कथाओं को भी जलाया नहीं गया। वह सब भी संरक्षित रहा। भारतीय परंपरा के इस शुक्ल पक्ष का उल्लेख जलेस और प्रलेस की किसी बैठक की मिनट्स में मिलता है क्या? नहीं मिलेगा?
जलाई गई तो उन लोगों के हाथों ‘मनु स्मृति’ जो चौक चौराहों पर ऊँची आवाज में गा रहे थे, बोल की लब आजाद हैं तेरे। बोल जबाँ अब तक तेरी है। तेरा सुत्वाँ जिस्म है तेरा। बोल कि जाँ अब तक तेरी है।
प्रगतिशील लेखक समझते हैं कि उनकी ये टिप्पणियां देश की बहुसंख्यक आबादी को असहज करती हैं, फिर भी ऐसी रचनाओं को चुन चुन कर पुरस्कार दिया जाता है। ममता कालिया के नाम का चयन करने वाली जूरी में अरुण कमल, अनामिका और डॉ. अरविंदाक्षन जैसे सदस्य थे।
अकादमियों में अशोक वाजपेयी के ‘गुरुकुल’ से जुड़े नाम बार-बार दिखते हैं। ये दर्शाते हैं कि निर्णायक मंडल में पुरानी कांग्रेस-वाम मानसिकता का वर्चस्व बरकरार है। आज भी भारत सरकार के तमाम सांस्कृतिक केन्द्रो पर अशोक वाजपेयी एक महत्वपूर्ण नियामक बने हुए हैं। उनकी टीम के लोग सिस्टम में अपना काम करा लेने का हुनर जानते हैं।
राष्ट्रीय विचार को मजबूत बनाने के रास्ते
राष्ट्रीय विचार परिवार को अब विलाप नहीं, ठोस रणनीति चाहिए:
- व्यापक विमर्श – अकादमी संविधान की खामियां (आउटगोइंग काउंसिल का स्व-चयन) सार्वजनिक बहस का विषय बनें। लेख, गोष्ठियाँ, सोशल मीडिया से दबाव बने।
- अपने लोगों की उपस्थिति – निष्ठावान विद्वानों को राज्य अकादमियों, विश्वविद्यालयों, साहित्यिक संगठनों में स्थापित करना। वे नामांकन प्रभावित करेंगे।
- नई पीढ़ी का निर्माण – युवा लेखकों को प्रोत्साहन, प्रकाशन और मंच। आत्ममुग्धता छोड़नी होगी।
- वैकल्पिक संस्थाएँ – राष्ट्रीय विचार आधारित नई पुरस्कार योजनाएँ, साहित्यिक मंच शुरू करें। पुरानी व्यवस्था पर निर्भरता कम करें।
- तत्व-निष्ठा – ‘सर्टिफिकेशन’ की लालसा छोड़कर विचार से समझौता न करने वाले नेतृत्व को आगे लाएं।
नैतिक दबाव का हथियार
जहाँ वामपंथियों का ही वर्चस्व है और अकादमी में गैर-वामपंथी विचार के 8-10 सदस्य ही हैं और वे रहकर कुछ नहीं कर पा रहे। यदि वे अकादमी की इस गंदी राजनीति का हिस्सा बनने से इंकार कर दें, तो फर्क पड़ेगा।
वामपंथियों ने दशकों में नैरेटिव बनाया है कि श्रेष्ठ लेखक वही, जो बीजेपी और आरएसएस से घृणा करे। उनके समूह में अल्पसंख्यक बनकर गलत होते देखते रहें, या सामूहिक त्यागपत्र देकर मनमानी उजागर करें। यदि आप पुरस्कार देने वालों से खुद को अलग नहीं करेंगे, तो शामिल माने जाएंगे। ऐसे में 100 में 8 लोगों का त्यागपत्र भी दबाव का औजार बन सकता है। ‘मूंदहों आँखी कतहूँ कुछ नाहीं’ वाली मानसिकता छोड़नी होगी।
भारत में 2015 का पुरस्कार वापसी अभियान ने दबाव बनाया था, भले एक भी सम्मान न लौटा हो।
अमेरिका के नेशनल काउंटर टेररिज्म सेंटर के पूर्व निदेशक जोसेफ कैंट ने ट्रंप प्रशासन की ईरान नीति पर इस्तीफा देकर वैश्विक बहस खड़ी की। उन्होंने लिखा- “मैं आर्मी वेटरन हूं, मेरी पत्नी इजरायल की जंग में शहीद हुई, लेकिन यह युद्ध अमेरिका के हित में नहीं।” जोसेफ कैंट भी सोच सकते थे कि एक इस्तीफे से क्या होगा?
विलाप से संघर्ष की ओर
ममता कालिया का पुरस्कार उदाहरण भर है। पूरे 24 भाषाओं में देखें तो स्थिति स्पष्ट है। साहित्य अकादमी में राष्ट्रीय विचार को शिखर पर पहुँचाने के लिए अब ‘काम खत्म’ वाला फरमान नहीं, निरंतर संघर्ष चाहिए। सरकार एक झटके में प्रक्रिया नहीं बदल सकती, लेकिन विमर्श और दबाव से नई निर्वाचन प्रक्रिया ला सकती है।
राष्ट्रीय विचार के साधकों को एकजुट होकर हर जगह उपस्थिति सुनिश्चित करनी होगी। त्यागपत्र, विमर्श, नई संस्थाएँ-ये हथियार हैं। यदि हम ‘बाकी सब ठीक, बस चल रहा है’ वाली लाइन रटते रहे, तो विमर्श की लड़ाई में हार तय है।
समय है कि हम विलाप, प्रलाप और अपलाप से ऊपर उठें। साहित्य अकादमी जैसी संस्थाएँ राष्ट्र की आत्मा हैं। इन्हें वामपंथी कब्जे से मुक्त कर राष्ट्रीय विचार का सच्चा प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना हमारा दायित्व है। ‘सबते भले हैं मूढ जिन्हि न व्यापत जगत गति’– यह मानसिकता अब छोड़नी होगी।


