मंदिर पर हमला, शिवलिंग पर पेशाब, मूर्तियों को तोड़ना, पत्थरबाजी: मुसलमान चाहते क्या हैं?

मूर्तिभंजक तो इस्लामी लुटेरे शुरू से ही रहे हैं। लेकिन जब हज़ार सालों में लूटपाट छोड़ने के बाद, सभ्य समाज में रहते हुए, जिन्हें हर जगह के बहुसंख्यक ने बसने दिया, इनकी भीड़ दोबारा उसी बर्बर मोड में क्यों जाना चाहती है?

कुछ घटनाएँ जो बीते दिनों में हुई हैं वो हमें इस्लामी आक्रांताओं के उस दौर को याद दिलाती हैं जब लुटेरों, बलात्कारियों और आतंकियों की एक भीड़ सीमा लाँघते आती थी, मंदिरों को तोड़ती थी, मूर्तियों को तहस-नहस करती थी, पुस्तकालयों में आग लगाती थी, तलवार की नोक पर मज़हब की शपथ दिला कर मुसलमान बनाती थी, और अपने आतंक की छाप छोड़ कर चली जाती थी।

दौर बदल चुका है लेकिन कुछ लोगों में वही आतंकी प्रवृत्ति अभी भी है। आज भी कश्मीर से लेकर सूरत तक मुसलमानों की भीड़ पत्थरबाजी करती है। लगातार, एक के बाद एक जगहों से मंदिरों के तोड़ने की ख़बरें आ रही हैं। हाल ही में बुलंदशहर में शिवलिंग पर एक मुसलमान ने पेशाब कर दिया। उससे पहले दिल्ली में दुर्गा मंदिर में न सिर्फ़ मंदिर पर पत्थरबाजी हुई, बल्कि मूर्तियाँ विखंडित की गईं, और वहाँ भी मंदिर में पेशाब करने की ख़बर आई। साथ ही, सिर्फ़ जून के महीने में कम से कम दस जगहों पर मंदिरों पर हमले की घटनाएँ सामने आई हैं।

तीन जून को हरियाणा के खड़ा गाँव वीर बहादुर सिंह वैरागी की मूर्ति तोड़ दी गई और किशोरदास मंदिर पर हमला किया गया। बिजनौर के सबदलपुर गाँव में पहले चामुण्डा देवी मंदिर में उत्पात की घटना सामने आई, उसके कुछ घंटों बाद पीपलसना गाँव के शिव मंदिर की मूर्तियाँ विखंडित की गईं। पुलिस अपराधियों की तलाश में है। हरियाणा के मित्रोल गाँव के तुलसी कुंडम मंदिर में हनुमान जी और गणेश जी की मूर्तियों पर अज्ञात लोगों ने पत्थर फेंके। ये घटना एक और दो जून के बीच की रात की है।

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राजस्थान के दौसा ज़िले में बिनावाला गाँव के स्थानीय मंदिर के भगवान हनुमान और महादेव की मूर्तियों पर हमले की घटना ख़बरों में आई। उत्तर प्रदेश के खतोली गाँव में इसी महीने मूसा नाम के एक मुसलमान नवयुवक ने भगवान हनुमान की मूर्ति तोड़ने की कोशिश की लेकिन वो उसके आगे लगे शीशे को तोड़ने के बाद पकड़ लिया गया। उसने वहाँ पूजा कर रहे लोगों को गालियाँ भी दी।

जून के पहले सप्ताह में पीलीभीत के रोहन्या गाँव में मुसलमानों की एक भीड़ ने मंदिर में लाउडस्पीकर के बजने को लेकर तोड़-फोड़ की। इन लोगों ने न सिर्फ़ लाउडस्पीकर तोड़ा, बल्कि मंदिर की मूर्तियाँ तक साथ लेकर चले गए। जून के आखिरी सप्ताह में, मेरठ के घसौली गाँव में एक दलित को मुसलमानों की एक भीड़ ने इसलिए पीट दिया क्योंकि उसने मंदिर पर लाउडस्पीकर लगाए, जो कि मुसलमानों की मस्जिद से थोड़ी ही दूरी पर था। इसके बाद इस भीड़ ने मंदिर पर हमला किया, पत्थरबाजी की और धारदार हथियारों का भी इस्तेमाल किया जिससे आधा दर्जन हिन्दू घायल हुए।

जून के दूसरे सप्ताह में तमिलनाडु के त्रिचि पुलिस द्वारा मुजीबुर रहमान को तंजावुर के बृहदेश्वर मंदिर में देवी की हज़ार साल पुरानी मूर्तियों के साथ अश्लील तस्वीरें लगाने के लिए गिरफ्तार किया। हाल ही में इसी राज्य के तिरुवरुर ज़िले के पेरियानायकी अम्मन मंदिर की 25 मूर्तियों को तोड़ दिया गया। पुलिस ने पाँच नाबालिगों को गिरफ्तार किया है।

गत सप्ताह, इरशाद ने बुलंदशहर के जहांगीराबाद इलाके के महादेव मंदिर में स्थापित शिवलिंग पर पेशाब कर दिया। दिल्ली के हौज़ क़ाज़ी में दुर्गा मंदिर में क्या हुआ ये सबको पता ही है कि कैसे ‘हिन्दुओं ने मुसलमान युवक को ‘जय श्री राम’ न कहने पर मार डाला’ कह कर भीड़ जुटाई गई और मंदिर पर धावा बोल दिया। तरीका, वही फेवरेट- पत्थरबाजी, नारा-ए-तदबीर और भीड़ द्वारा मंदिर में घुस कर मूर्तियों को तोड़ देना। मतलब, इन्हें जब बहाना भी नहीं मिलता तो, ये ख़ुद ही अफ़वाह फैला कर बहाना पैदा कर लेते हैं।

बात सिर्फ़ भारत की ही नहीं है, इंग्लैंड में भी गत माह की 10 और 19 तारीख को वालसॉल के फोर्ड स्ट्रीट में गुजरातियों के कल्चरल सेंटर और ‘श्री राम मंदिर’ के बाहर एक अपराधी ने तीन मूर्तियाँ तोड़ दी। वहाँ की मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार तीन महीने में यह तीसरी ऐसी घटना है और हिन्दुओं का कहना है कि चूँकि वो प्रशासन से अपनी बात हो-हल्ला करते हुए नहीं कहते, उसका फ़ायदा उठाया जा रहा है।

ये बस पिछले चालीस दिनों की कुछ घटनाएँ आपके सामने हैं जिनमें से कई मामले में मुसलमान नाम वालों की करतूतें हैं, और बाकियों में ये लोग अज्ञात हैं जिसकी तलाश पुलिस कर रही है। आप इन सभी में एक पैटर्न देख सकते हैं कि ये लोग मूर्तियाँ तोड़ते हैं, पत्थरबाजी करते हैं, और भीड़ का रूप लेकर मंदिरों में पूजा करने वालों को डराते हैं।

हाल ही में देहरादून में एक घटना के विरोध में कुछ हिन्दू संगठनों ने विरोध प्रदर्शन हेतु, अनुमति के साथ, रैली निकाली तो उस रैली पर आरी, पेंचकस, चाकुओं और डंडों से इमानुल्ला इलाके के मुसलमानों की भीड़ द्वारा हमला किया गया। इसी के उलट, गुजरात के सूरत में झारखंड के कथित तौर पर चोर कहे जा रहे तबरेज़ की कथित भीड़ हत्या पर प्रशासनिक अनुमति न मिलने के बावजूद, मुसलमानों की एक भीड़ नमाज़ के बाद मस्जिद से निकलती है, और नारेबाजी करते हुए अराजकता फैलाती है। पुलिस जब उन्हें रोकना चाहती है तो क्या होता है? वही पुराना पैटर्न- पत्थरबाजी। पुलिस पर हमला किया जाता है, पाँच पुलिसकर्मी घायल होते हैं, उनकी गाड़ियों को मुसलमान भीड़ आग के हवाले कर देती है।

ये सब तो वो मामले हैं जिनके बारे में रिपोर्ट बनी हैं। वरना, ऐसे कई मामले होते हैं जब इस तरह की बात होती है और स्थानीय पुलिस दोनों समुदायों को बिठा कर समझा देती है। किसको कितना समझ में आता है, वो बात और है, लेकिन मुद्दा तो यह है कि दिन में पाँच बार लाउडस्पीकर से अजान देने वालों को मंदिर में दो बार भजन बजाने से आपत्ति कैसे हो जाती है? ये किस तरह की सोच है कि तुम्हारे लाउडस्पीकर से आती आवाज़ इलाके का हर कान, चाहे या न चाहे सुनेगा ही, लेकिन दूसरे समुदाय ने भजन बजाया तो तुम मंदिर में घुस कर मूर्ति उखाड़ कर ले जाते हो!

मूर्तिभंजक तो इस्लामी लुटेरे शुरू से रहे हैं। लेकिन जब हज़ार सालों में लूटपाट छोड़ने के बाद, सभ्य समाज में रहते हुए, जिन्हें हर जगह के बहुसंख्यक ने बसने दिया, इनकी भीड़ दोबारा उसी बर्बर मोड में क्यों जाना चाहती है? आज के दौर में पत्थरबाजी और आगजनी कर के ये भीड़ क्या साबित करना चाहती है? नमाज पढ़ने के बाद कुछ जगहों के मुसलमान हाथ में पत्थर लिए क्यों घूमते हैं? और ये जो ‘वो अच्छे मुसलमान नहीं हैं’ वाला भद्दा मजाक इनके मज़हबी नुमाइंदे करते हैं, वो कब तक ऐसी वाहियात लाइन बोल कर इन आतंकी वारदातों को इग्नोर करते रहेंगे?

ये सब बहुत क्यूट लगता है जब आप एक कथित चोर, जिसका बाप भी चोर था, उसकी भीड़ द्वारा की गई पिटाई और कुछ दिन के बाद हुई मौत पर जुलूस निकालते हुए एक पाँच साल के बच्चे के हाथ में बैनर थमा देते हैं जिस पर खराब हिन्दी में यह लिखा होता है कि ‘हम मोहब्बत से कलमा पढ़ा कर गले लगा लेते हैं, और तुम ज़बरदस्ती जय श्री राम कहला कर क़त्ल कर देते हो। क्या यही है हिन्दू धर्म? स्टॉप भगवा टेरर।’

इस बच्चे को पता भी नहीं कि इसे कट्टर बनाने की तैयारी हो चुकी है

अरे भाई, पहली बात तो ये है कि हमें नहीं पढ़ना तुम्हारा मोहब्बत वाला कलमा। वो अपने पास रखो, आपस में पढ़ो ताकि तुम्हें और तुम्हारे पूरे समुदाय को मोहब्बत शब्द का अर्थ समझ में आए और यह भी कि गले मिल कर प्रेम से रहने का सही अर्थ यह नहीं कि भीड़ बना कर मंदिरों पर हमला करो। दूसरी बात, एक अपराध का सामान्यीकरण करना बंद करो वरना हर ऐसे तबरेज़ पर दस हिन्दू नाम गिना दिए जाएँगे। तुम्हारी आतंकी बमबारी से पूरी दुनिया और मज़हबी उन्माद से पूरा बंगाल दहल रहा है।

तुम ऐसे छोटे बच्चों का इस्तेमाल करना बंद करो। क्या सिखा रहे हो उसे? वो मानने लगे कि ‘भगवा आतंक’ है। फिर तो उसे यह भी बताते होगे कि ये जो मंदिरों पर उसके भाई-बापों की भीड़ हमला करती है वो इस्लामी आतंक है। फिर तो तुम उसके हाथ में यह बैनर भी देते होगे जहाँ वो यह समझ सके कि ‘जय श्री राम’ कह कर किसी को पीटने और ‘अल्लाहु अकबर’ चिल्लाते हुए सैकड़ों की जान ले लेने में बहुत ज्यादा अंतर है। अगर भगवा वाला ही तुम्हारे लिए आंतक है, तो उस बच्चे को इस्लामी आतंक समझाने के लिए तो नए शब्द बनाने पड़ेंगे! कम से कम बच्चों को तो अपने फ़रेब और अजेंडे से दूर रखो।

जब बात नैरेटिव बनाने की ही है, जहाँ ‘हिन्दू टेरर’ के नाम पर एक चुनाव लड़ा गया, असहिष्णुता के डिबेट से दूसरा, ‘डरा हुआ मुसलमान‘ से तीसरा, वहीं अब सारे नुस्खे असफल होने पर ‘जय श्री राम’ के उद्घोष को ऐसे रिपोर्ट किया जा रहा है जैसे लोग बाजारों में बम बाँध कर ‘अल्लाहु अकबर’ की जगह यही बोल कर फट रहे हैं।

आप गौर से देखिए कि किस तरह के पैरेलल बनाए जा रहे हैं। पूरी दुनिया इस्लामी आतंक से परेशान है, और कॉन्ग्रेस तथा वामियों के कामपंथी तंत्र ने क्या टर्म बनाया! भगवा आतंक। इससे पहले इस्लामी आतंक, आतंक का कोई मज़हब नहीं होता और हर मुसलमान द्वारा किया दंगा, हत्या, मारपीट, आगजनी ‘समुदाय विशेष’ के नाम पर छुपाया जाता रहा। असहिष्णुता यह है कि तुम जानबूझकर गाय काटते हो, जबकि वो ग़ैरक़ानूनी है, असंवैधानिक है और हिन्दुओं की पूज्या है। ये भड़काने के लिए काटी जाती है।

लेकिन, जब गौतस्करों को कुछ लोग रोकते हैं, तो उसे असहिष्णु कहा जाता है। हाँ, इसमें हत्याएँ भी हुई हैं लेकिन हत्या तो उन पुलिस वालों की भी हुई हैं जिन पर ये गौतस्कर ट्रक चढ़ा कर भाग निकले। उन पुलिस वालों की जान का क्या? लेकिन असहिष्णु कौन है! हिन्दू! दुर्गा विसर्जन से लेकर रामनवमी के जुलूसों पर पत्थरबाजी कौन करता है? तिरंगा यात्रा के जुलूस पर कासगंज के चंदन को गोली कौन मारता है? जी, यही है वो डरा हुआ मुसलमान जिसके हाथ डर से इतने जोर से काँपते हैं कि वो कहीं बम, कहीं पत्थर, कहीं गोली, कहीं रॉड चला बैठता है। क्योंकि वो बहुत डरा हुआ है।

फिर नया पैरेलल गढ़ा जा रहा है ‘जय श्री राम’ का। इसे वही स्पिन दिया जा रहा है, जो इस्लामी आतंकी आईसिस से लेकर भारत की कई गलियों, चौराहों पर ‘नारा-ए-तदबीर’ के बाद गुनगुनाते हुए कभी बम तो कभी पत्थर फेंकते हैं। ‘जय श्री राम’ बुलवा कर अभी तक सिर्फ़ पीटने की ख़बरें आई हैं, जो कि अक्षम्य है, ग़लत हैं, ग़ैरक़ानूनी हैं। तबरेज़ भले ही चोर रहा हो, लेकिन किसी भीड़ को न तो उसे पीटने की ज़रूरत है, न ही ‘जय श्री राम’ कहलवाने की।

लेकिन, इसे इतना तूल देना कि ऐसा लगे कि हर हिन्दू, हर मुसलमान को राह चलते पीट रहा है, और उससे जबरन ‘जय श्री राम’ बुलवा रहा है, ग़लत है और ग़ैरज़रूरी भी। हमें इन घटनाओं पर उसी तरह से पुलिस पर विश्वास दिखाना चाहिए जैसे हम ‘नारा-ए-तदबीर’ कह कर दुर्गा मंदिर पर हमला करती भीड़ पर दिखाने को कहते हैं। जबकि दोनों में एक और लाख का फ़र्क़ है, फिर भी हिन्दुओं ने इतनी सहिष्णुता हमेशा दिखाई है।

यही कारण है लोग पक चुके हैं मीडिया की दोगली रिपोर्टिंग से। बुद्धिजीवियों को उनके वाल पर, टाइमलाइन पर और कमेंट पर गालियाँ पड़ रही हैं क्योंकि सोशल मीडिया के दौर में हर गाँव के टूटते मंदिर की वीडियो नाम-पते के साथ सेकेंडों में उपलब्ध हो जाती है। सूचना पर नियंत्रण, मीडिया का गेटकीपर अब अप्रासंगिक हो चुका है क्योंकि समय अब ड्रोनों का है। अब सूचना का एडिटर की आइडियोलॉजी या संस्थान के मुखिया के राजनैतिक झुकाव से कोई लेना-देना नहीं है, वो कहीं से भी अपने कच्चे स्वरूप में, बिना किसी ट्रीटमेंट के टपक जाती है।

इससे मुखौटे उतर रहे हैं। आप ध्यान दीजिए तो अब आपको वो अपराध भी दिखेंगे जो आप कभी सुनते ही नहीं थे। आपको वो शब्द सुनाई देंगे जिनके पर्याय के रूप में समुदाय विशेष कह कर उनकी विशेषताओं को हमेशा यही गेटकीपर और एडिटर छुपा लिया करता था। इनकी दबंगई, दंगाई प्रवृत्ति और घृणाजन्य अपराधों की रेल निकल रही है। ये डरे हुए तो बिलकुल नहीं हैं। ये मिनटों में अपनी दंगाई भीड़ जुटाने की क्षमता, अपने प्रागैतिहासिक काल के हथियारों और टिकटॉक से लेकर मीडिया स्टूडियो, अकादमिक संस्थानों और सत्ता के गलियारों में बैठे वैचारिक आतंकियों की शह पर विश्वास रखते हैं।

लेकिन, ये बंद होना चाहिए और ये बंद होगा। भारत ने अपनी अस्मिता, क्षेत्र, संसाधन, धन और संस्कृति तक पर वृहद स्तर के हमले झेले हैं। इन महलों का स्वरूप बदलता है लेकिन रेसिपी वही है। छोटे स्तर पर भीड़ जुटा कर, मूर्ति तोड़ कर, पत्थरबाजी करके पायलट प्रोजेक्ट किया जाता है ताकि देखा जाए कि हिन्दू कितना सोया है, कितना जगा हुआ है। छोटी मूर्ति टूटने पर अगर हिन्दू नहीं बोलता, विसर्जन के जुलूस पर ईंट फेंके जाने पर वो नहीं बोलता, रामनवमी के जुलूस पर चप्पल फेंके जाने पर वह नहीं बोलता तो, यह भीड़ एक क़दम और आगे बढ़ाती है।

तब यह भीड़ बड़े मंदिर तोड़ती है, तब यह भीड़ बड़े स्तर पर दंगे करती है, तब यह भीड़ शिवलिंग पर पेशाब कर देती है। इस भीड़ को पायलट प्रोजेक्ट के ही स्तर पर रोकना जरूरी है वरना गाय छोड़ कर मंदिरों को लूटने वाले तो इस देश ने बहुत देखे हैं।

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