तुम्हारी देशभक्ति के उन्माद की परिणति है पायलट का लापता होना: लिबरल गिरोह

ऐसे लोगों को पहचानिए, और इनके अजेंडाबाजी पर, फर्जी के आँसू पर, इनकी नग्नता और निम्न स्तर के ट्वीटों पर सवाल कीजिए कि इतना गिरने की क्या ज़रूरत है? इनसे पूछिए कि कहाँ से लाते हैं ऐसा ज़हर जो उसी देश के खिलाफ इस्तेमाल होता है जिन्होंने उन्हें इतना बोलने की आज़ादी दे दी है कि वो देश के अस्तित्व को ही मिटाने वालों के साथ खड़े हो जाते हैं।

आज सुबह पाकिस्तान के F-16 ने भारतीय सीमा के कुछ सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने की कोशिश की। उनकी तरफ से बम भी गिराए गए और जब वो वापस जा रहे थे तब भारतीय वायु सेना के लड़ाकू विमानों ने उनका पीछा करते हुए एक F-16 को मार गिराया। ख़बरों के अनुसार यह विमान भारतीय सीमा के भीतर राजौरी सेक्टर में गिरा है। 

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इसी का दूसरा पहलू यह रहा कि भारतीय वायुसेना के पायलट अपने जहाज़ों के साथ जब पाकिस्तानी जेट का पीछा कर रहे थे तो उनके विमान को भी क्षति पहुँची और हमारे एक जेट को पाकिस्तानी एयर फ़ोर्स ने गिरा दिया एवम् एक पायलट, भारतीय विदेश मंत्रालय के आधिकारिक बयान के अनुसार, लापता बताए जा रहे हैं। कई ख़बरों से, और पाकिस्तानी पीएम इमरान खान के स्टेटमेंट से पता चला है कि एक पायलट पाकिस्तान में हैं। 

अगर पाकिस्तान से आने वाली जानकारी सही भी है, फिर भी जेनेवा कन्वेंशन के अनुसार वो पायलट सुरक्षित भारत वापस लाए जाएँगे। इसके अलावा जो भी ख़बर है, वो संदिग्ध है क्योंकि वो आधिकारिक नहीं हैं। इसको लिए आप अपनी बुद्धि और विवेक का इस्तेमाल कीजिए, कि आपको किसका वर्जन सही लगता है। इसके लिए आप स्वतंत्र हैं। 

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ज़ाहिर सी बात है कि ऐसे मौक़ों पर, जितनी खबरें आ रही हैं, और पब्लिक तक पहुँच रही हैं, तो आम जनता सकते में है। वो इसलिए कि हमारी सेना का एक अफसर लापता है। ये अपने आप में भारत के लिए एक नकारात्मक ख़बर है, भले ही हम पाकिस्तान को तहस-नहस करने की क्षमता रखते हैं। 

एक तरफ़ ऐसे लोग हैं, और बहुत हैं जो इस स्थिति में एक बेहतर रुख़ लेकर, सकारात्मक रवैये के साथ यह कह रहे हैं कि हमें अपनी सेना के साथ, अपने देश के साथ खड़े रहने की ज़रूरत है। ये भले ही एक धक्का है, लेकिन इसे हार नहीं कहा जा सकता। और दूसरी तरफ एक गिरोह है, जिसके होने से हमें लगता है कि हमें पाकिस्तान के F-16 की ज़रूरत नहीं है, उससे ज़्यादा घाव तो यही लोग कर जाते हैं। 

ये वही गिरोह है जिससे भारतीय मीडिया का समुदाय विशेष कहा जाता है। ये लम्पट और धूर्त पत्रकारों और छद्म-बुद्धिजीवियों का एक गिरोह है जो मौक़े तलाशता रहता है। चूँकि इनके पास शब्दों की कमी कभी होती नहीं, तो ये उस स्थिति में हमेशा रहते हैं जब बात घुमाकर देश की परिकल्पना और सरकारों के मजबूत क़दमों के खिलाफ लाया जा सके।

ये लोग सैनिकों के बलिदान से जाति निकाल लेते हैं, ये लोग सैनिकों के साथ खड़े होने वाले देशभक्त लोगों को हिन्दुओं के सवर्ण और मेट्रो शहरों के होने का दावा कर लेते हैं, ये लोग ऐसे धक्कों पर देश के साथ खड़े न होकर पाकिस्तान की मदद करते दिखते हैं जब वो पूछते हैं कि क्या सबूत है कि हमने 300 आतंकी मार गिराए। और पाकिस्तान इनकी मदद इन्टरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस तक लेता रहता है। 

देशभक्त होना गाली नहीं है। जिंगोइस्ट होना भी बुरा नहीं है। अतिराष्ट्रवाद भी बुरा नहीं है क्योंकि इन सबका उद्देश्य राष्ट्र की बेहतरी और वैश्विक छवि को सुदृढ़ करने का होता है। राष्ट्रवाद ज़हर कैसे हो सकता है? जो लोग मोमबत्तियाँ लेकर सड़कों पर श्रद्धांजलि देते हैं, उनके लिए देश बहुत मायने रखता है भले ही उनके घरों के पास की नाली साफ न की गई हो। 

ये इसलिए होता है क्योंकि हम चाहे जिस भी सरकार में, जिस भी स्थिति में हो, वो सिर्फ और सिर्फ देश के देश होने के कारण ही संभव है। इसलिए ऐसे मौक़ों पर कोई भीख माँगकर जीवन यापन करती बुजुर्ग महिला की पूरी पूँजी पुलवामा के बलिदानियों के परिवारों के नाम हो जाती हे। इसीलिए ऐसे मौक़ों पर लोग आगे बढ़कर हर संभव मदद करते दिखते हैं। 

यहाँ लोग, सरकार ने क्या विकास किया, उनके जीवन में क्या बदलाव लाए, इससे ऊपर उठ जाते हैं क्योंकि देशभक्ति गरीब से गरीब स्थिति में, अपनी पहचान के लिए लड़ते देश के लोगों में भी होती है। उसके लिए अमेरिका जैसी चमचमाती इमारतों की ज़रूरत नहीं होती। देशभक्ति देश के लिए होती है, और इसमें ‘नागरिक’ और ‘देश’ दो शब्द भर काफी हैं, इसके बीच की सारी बातें गौण हो जाती हैं क्योंकि आपका अस्तित्व और आपके देश का अस्तित्व एक दूसरे पर आश्रित हैं। 

इसलिए, ऐसी परिस्थितियों में हम एक हो जाते हैं। सारी पार्टियाँ एक हो जाती हैं। हम सड़कों पर एक साथ उतरते हैं, और एक साथ नारे लगाते हैं। हम किसी को नारे लगाता देखते हैं, तो उनके साथ हो जाते हैं, उस प्रदर्शन में शामिल हो जाते हैं। इसके लिए कुछ कहने की ज़रूरत नहीं होती। क्यों? क्योंकि देशप्रेम उसी तरह से विकसित होता है जैसे अपनी माँ से प्रेम करना। उसके लिए हम पूरे जीवन भर तैयार होते हैं, चाहे वो खेलों से हो, युद्धों की कहानियों से हो, हमारे इतिहास से हो, या इस बात से कि हम कहाँ थे, कैसे बर्बाद किए गए और आज कहाँ पहुँचे हैं। 

ये एक प्राकृतिक प्रतिक्रिया है ऐसे समय पर। लेकिन कुछ लोगों के लिए ये एक सहज बात नहीं होती। उन्होंने बार-बार दिखाया है कि उनकी ज़मीन कहीं और है। उनके लिए सैनिकों पर पत्थर फेंकने वालों के लिए, जवानों के घेरकर मार देने वाले नक्सलियों के लिए, देश को तोड़ने वाली शक्तियों के लिए हमेशा मानवाधिकार जैसे शाब्दिक हथियार होते हैं। लेकिन जब सैनिक का बलिदान होता है तो तर्क घास चरने चला जाता है, और जब आता है तो कहा जाता है कि ये तो उनका काम है! 

अब अगर आज ही की बात की जाए तो यही गिरोह सक्रिय हो चुका है और एक पायलट के लापता होने की ख़बर पर उसके परिवार की चिंता का फर्जी नाटक करते हुए कह रहा है कि उन्हें उस पायलट के परिवार की चिंता है, जो इंतजार में होंगे और प्रार्थना कर रहे हैं कि वो सुरक्षित लौट आएँ। इसमें उनकी चिंता पायलट की बिलकुल नहीं है, उनकी चिंता है कि कैसे देशभक्ति जैसे भाव को नीचा दिखाया जा सके, और सेना के समर्थन में खड़े लोगों को इसका दोषी बनाया जाए।

गिरोह के लोग यहीं नहीं रुके, उन्होंने लगातार लिखा कि वायु सेना द्वारा एयर स्ट्राइक की जड़ में भारतीय देशभक्तों का उन्माद है जिसके कारण सरकार ने ऐसी आज्ञा दी। साथ ही, उन्होंने पुलवामा हमलों के समय भी सरकार को घेरा था। इनकी स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाती, क्योंकि इन्हें न तो सेना से मतलब है, न सैनिक से, न देश से, न समाज से। 

इन्हें मतलब सिर्फ और सिर्फ नैरेटिव से है जो कि किसी भी तरह से, कैसे भी उन लोगों के खिलाफ ज़हर पैदा कर सके जो सही मायनों में देश के साथ खड़े हैं। गिरोह का सदस्य इसे चुनावों से जोड़ता है, और इसकी टाइमिंग पर सवाल उठाता है क्योंकि यही अजेंडा है। 

ऐसे लोगों को पहचानिए, और इनके अजेंडाबाजी पर, फर्जी के आँसू पर, इनकी नग्नता और निम्न स्तर के ट्वीटों पर सवाल कीजिए कि इतना गिरने की क्या ज़रूरत है? इनसे पूछिए कि कहाँ से लाते हैं ऐसा ज़हर जो उसी देश के खिलाफ इस्तेमाल होता है जिन्होंने उन्हें इतना बोलने की आज़ादी दे दी है कि वो देश के अस्तित्व को ही मिटाने वालों के साथ खड़े हो जाते हैं। 

लिबरलों का ये एक रोग है, ये मानसिक रूप से बीमार, घटिया लोग हैं। घटिया इसलिए क्योंकि ये चुप नहीं रह सकते। ये संवेदनशील नहीं हैं, ये देशविरोधी ताक़तों के एजेंट हैं जो क्षति होने पर सरकार को घेरते हैं, और बदला लेने पर सरकार को समीकरण से हटाकर सैनिकों की जय-जय बोलते हैं। फिर, जब इस प्रोसेस में क्षति होती है, तो दोबारा सरकार को, देशभक्त लोगों को कोसने लगते हैं। 

बदलते समीकरण पर विचार नहीं बदलते। विचार बदलने का मतलब है कि आपके आशीर्वचनों में धूर्तता है। इसका मतलब है कि आपकी संवेदनशीलता की जड़ में संवेदनहीनता है जो शब्दों के खेल से बस छुप गई है। जिंगोइज्म कुछ नहीं होता, अतिराष्ट्रवाद कुछ नहीं होता। देश के साथ होने की, अपने सैनिकों को समर्थन देने की कोई सीमा नहीं होती। 

चूँकि किसी ने ऐसे शब्द बना रखे हैं, तो उन्हें हर समय फेंक कर मारने और देशभक्त लोगों का मनोबल गिराने के लिए इस्तेमाल करना धूर्त लोगों की पहचान है। लेकिन, चिंता मत कीजिए, ऐसे लोग मोर बनने को चक्कर में खुद ही कपड़े उतार लेते हैं। और ये कपड़े इनकी कुत्सित सोच पर से भी उतर जाते हैं, जो कि हमारे और आपके लिए दिन के उजाले में साफ तरीके से दिखते हैं। 

और हाँ, हमें सुनने और जानने वाले राष्ट्रवादियो! आप कुछ भी गलत नहीं कर रहे। युद्ध में जय बोलने वालों का भी महत्व होता है। जवानों को हमेशा यह लगना चाहिए कि अगर उनके हाथ में बंदूक है, और उनका जीवन हम जैसों के लिए समर्पित है, तो हम जैसे लोग इस बात को हमेशा ध्येय वाक्य बनाकर चलते हैं कि ‘When you go home, Tell them of us and say, For your tomorrow, We gave our today.’

हाँ, हमारे अंदर आपके लिए असीमित सम्मान है क्योंकि आप हैं तो देश है, हम हैं तो देश है, और आपके कारण ही ये लिबरलों का धूर्त गिरोह साँस लेता है, ट्वीट करता है, फर्जी नैरेटिव गढ़ता है। और ऐसे समय पर ये सम्मान अपने उच्चतम स्तर पर होता है। इसे जिंगोइज्म कहें, राष्ट्रवाद कहें, अतिराष्ट्रवाद कहें, देशभक्ति कहें, हमें सब स्वीकार है क्योंकि हमें स्वयं पर गर्व है, इस भारत भूमि पर गर्व है, और सबसे ऊपर हर भारतीय सैनिक पर गर्व है चाहे वो जिस भी रंग की वर्दी पहनता है। 

जय हिन्द, जय भारत! 

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