पीएम मोदी के चेहरे पर जनता को भरोसा
बीजेपी के जबरदस्त सफलता का श्रेय पीएम मोदी और अमित शाह की मजबूत रणनीति को जाता है। उन्होंने राज्य की कमान सीधे संभाल कर चुनावी फिजा बदल दी । राज्य बनाम केन्द्र की पॉलिटिक्स करने वाली ममता बनर्जी को मात दी और जनता को बताने में सफल रहे कि केन्द्रीय योजनाओं को ममता बनर्जी सरकार ने लागू नहीं कर राज्य की जनता का नुकसान किया। पीएम मोदी का मजबूत चेहरा आगे कर बीजेपी ने जमीन पर जमकर पसीना बहाया।
संगठन को मजबूत कर एक-एक बूथ पर अलग रणनीति बनाई गई। बूथ मैनेजमेंट से लेकर वॉर रूम तक पर गृहमंत्री अमित शाह की नजर रही। पार्टी के कैडर तक को यह विश्वास दिलाया कि ममता बनर्जी की सरकार को बदला जा सकता है। ममता के खौफ का यह आलम था कि जनता उनके खिलाफ बोलने से कतराती थी। उस जनता ने इस बार टीएमसी के गुंडों को हराने का निश्चय किया और ममता की पार्टी के खिलाफ वोट डाला। हालाँकि टीएमसी का जमीन पर नेटवर्क हमेशा मजबूत रहा है। इसलिए चुनाव में टक्कर देखने लायक रही।
हर बार जनता को डराया धमकाया जाता था। इस बार चुनावों में बड़ी संख्या में अर्धसैनिक बलों की तैनाती, सीसीटीवी कैमरे लगाए गए। चुनाव को अपेक्षाकृत शांतिपूर्वक और निर्भय मतदान का संकल्प चुनाव आयोग ने पूरा किया।
SIR के माध्यम से वोटर लिस्ट का शुद्धिकरण को लेकर माइग्रेंट यानी प्रवासी बड़ी संख्या में बंगाल पहुँचे। लाखों प्रवासी बंगालियों ने वोट डाला। दिल्ली-एनसीआर ही नहीं कई शहरों से प्रवासी बंगाली नागरिक वापस लौटे। इसकी वजह से कई राज्यों में मजदूरों और घरेलू काम करने वाली महिलाओं की कमी देखी गई।
दो चरणों में मतदान के चुनाव आयोग के फैसले ने टीएमसी के फर्जीवाड़े को रोकने में काफी हद तक सफलता पाई। फर्जी नामों के हटने का असर चुनाव के परिणाम पर पड़ा। इसके अलावा पहले के चुनावों में टीएमसी के कैडर एक क्षेत्र से चुनाव होने के बाद दूसरे क्षेत्र में जाकर लोगों को डराते-धमकाते थे और खून खराबा करते थे, लेकिन इस बार यह मौका नहीं मिला।
महिलाओं ने बीजेपी को चुना
बीजेपी की जीत में महिला वोटरों का अहम रोल रहा है। महिला सुरक्षा बंगाल में अहम मुद्दा रहा। बीजेपी ने संदेशखाली और आरजीकर जैसी घटनाओं को टीएमसी के खिलाफ चुनाव में हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया। महिला सम्मान की बात की।
इसके अलावा केन्द्रीय योजनाओं को लागू करने और बीजेपी द्वारा 3000 रुपए हर महीना महिलाओं को देने का वादा रंग लाया। हालाँकि ममता बनर्जी ने लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाओं के माध्यम से 1500 रुपए हर महीना महिलाओं को दे रही है। लेकिन, महिला सम्मान और सुरक्षा के साथ-साथ महिला आरक्षण को लेकर टीएमसी का मुखर विरोध महिलाओ को बीजेपी के पक्ष में खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई। कुल मिलाकर महिलाओं का आशीर्वाद बीजेपी को मिला।
‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ से त्रस्त थी जनता
मुस्लिम तुष्टिकरण की टीएमसी की राजनीति ने इस बार हिन्दुओं को जोड़ा। बंगाल में करीब 30 फीसदी मुस्लिम आबादी है। परंपरागत रूप से ये टीएमसी के वोटर हैं। लेकिन इस बार कई नए दावेदार मैदान में उतरे थे। एआईएमआईएम और हुमायूँ कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी ने मुस्लिम वोटों में सेंधमारी की। कॉन्ग्रेस और लेफ्ट तो पहले से मौजूद ही थी।
चुनाव में हिन्दू वोटरों को एकजुट करने में बीजेपी काफी हद तक सफल रही और आक्रामक रणनीति बना कर नए समीकरण पैदा किए। राज्य में करीब 68 फीसदी हिन्दू आबादी है। पिछले 15 साल से टीएमसी के राज में इन्हें काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा।
बांग्लादेशी घुसपैठियों को एसआईआर के माध्यम से वोट डालने से रोका गया। इनमें कई वापस बांग्लादेश गए। वहीं राज्य के बाहर रहने वाले बंगाल के नागरिकों ने आकर वोट डाला। इसका फायदा बीजेपी को मिला।
15 सालों से सत्ता पर काबिज ममता बनर्जी की सरकार को जनता बदलना चाहती थी। यही वजह है कि ‘परिवर्तन’ चाहने वाली बड़ी आबादी ने बाहर आकर चुपचाप बीजेपी को वोट डाला। खराब कानून व्यवस्था, बेरोजगारी से परेशान लोगों ने विकास को चुना।
माछ और मतुआ फैक्टर
ममता के खिलाफ कौन। जाहिर है बंगाल चुनाव में इस बार न तो कॉन्ग्रेस और न ही लेफ्ट विकल्प देने की स्थिति में थी। इसलिए जानकार मान रहे हैं कि ममता राज को उखाड़ फेंकने के लिए कॉन्ग्रेस और लेफ्ट के समर्थकों ने भी बीजेपी को वोट किया।
24 परगना और उसके आसपास के क्षेत्रों में मतुआ फैक्टर काफी कारगर रहा। सीएए को लेकर इस समुदाय को बीजेपी से काफी उम्मीदें हैं। ये लोग बीजेपी के वोटर हैं और इनलोगों ने अपने इलाके में बीजेपी के पक्ष में हवा बनाने में अहम भूमिका निभाई। स्थानीय मुद्दों के साथ साथ पीएम मोदी के चेहरे पर भरोसे का असर इस बार दिखा।
बंगाल में माछ यानी मछली सबसे अहम खाया जाता है। ममता बनर्जी ने बीजेपी को माछ विरोधी बताने की नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की। इसको लेकर बीजेपी के नेताओं ने चुनाव में मछली खाकर जनता को बताया कि बीजेपी ‘माछ विरोधी’ नहीं है।
हर चुनाव में बंगाली अस्मिता का मुद्दा उठा कर बीजेपी को बाहरी साबित करने की कोशिश करती रही है। इस बार विधानसभा चुनाव ने बीजेपी ने स्थानीय नेताओं को मीडिया में आने और जनता से जुड़ने की रणनीति बनाई। इसका फायदा चुनाव में मिला।


