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जहाँ जन्मे मुखर्जी, अब वो बंगाल भी भगवा है… मोदी-शाह ने पूर्ण किया श्यामा प्रसाद का स्वप्न

अभी के रुझान बता रहे हैं कि बीजेपी 199 से ज्यादा सीटों पर जीत रही है, जो बहुमत से कहीं ऊपर है। वहीं, पिछले 15 सालों से राज कर रही TMC 90 सीटों के आसपास सिमट गई है। यह महज एक चुनावी जीत नहीं है बल्कि एक ऐसी वैचारिक यात्रा का पड़ाव है जिसकी नींव डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने दशकों पहले रखी थी।

बंगाल में 4 मई की सुबह जब सूरज उगा, तो हवाओं में बदलाव की महक थी। टीवी और रेडियो पर जैसे ही गिनती शुरू हुई, आँकड़ों ने सबको चौंका दिया। बंगाल की खाड़ी से उठी ‘भगवा लहर’ ने ममता दीदी के उस किले को ढहा दिया, जिसे कभी कोई हिला नहीं पाया था।

अभी के रुझान बता रहे हैं कि बीजेपी 199 से ज्यादा सीटों पर जीत रही है, जो बहुमत से कहीं ऊपर है। वहीं, पिछले 15 सालों से राज कर रही TMC 90 सीटों के आसपास सिमट गई है। यह महज एक चुनावी जीत नहीं है बल्कि एक ऐसी वैचारिक यात्रा का पड़ाव है जिसकी नींव डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने दशकों पहले रखी थी।

पुरानी यादें और BJP का बड़ा मकसद

BJP के लिए बंगाल में जीतना सिर्फ कुर्सी पाने जैसा नहीं है। यह उनके लिए भावनाओं से जुड़ा मामला है। दरअसल, BJP जिस ‘भारतीय जनसंघ’ से निकलकर बनी है, उसकी शुरुआत करने वाले डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंगाल के ही रहने वाले थे। BJP उन्हें अपना सबसे बड़ा आदर्श मानती है और हमेशा से मानती आई है कि बंगाल उनकी असली जन्मभूमि है। इसलिए, बंगाल में सरकार बनाना उनके लिए अपनी जड़ों की ओर लौटने जैसा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने चुनाव के दौरान लोगों को एक पुरानी कहानी याद दिलाई। उन्होंने कहा कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी के दो बड़े सपने थे। पहला- कश्मीर से ‘अनुच्छेद 370’ हटाना, जिसे सरकार ने कुछ साल पहले पूरा कर दिया। और दूसरा- बंगाल को फिर से सोने की चिड़िया यानी ‘सोनार बांग्ला’ बनाना। उन्होंने जनता से वादा किया कि कश्मीर के बाद अब बंगाल का सपना पूरा करने की बारी है।

नेताओं की यह बात बंगाल के मध्यमवर्गीय परिवारों के दिल को छू गई। लोगों को लगा कि BJP सिर्फ राजनीति नहीं कर रही, बल्कि बंगाल की पुरानी पहचान, भाषा और संस्कृति को बचाने की बात कर रही है। इस संदेश ने लोगों के मन में यह भरोसा जगा दिया कि अगर अपनी विरासत और मान-सम्मान को सुरक्षित रखना है, तो BJP ही उनकी सबसे बड़ी ढाल बन सकती है। इसी भरोसे ने वोटर्स को कमल के निशान तक पहुँचा दिया।

2016 से 2026 तक का सफर: शून्य से शिखर तक

अगर हम 10 साल पीछे जाकर देखें, तो बंगाल में BJP की स्थिति बहुत कमजोर थी। साल 2016 के चुनावों में पार्टी के पास खोने के लिए कुछ नहीं था और पाने के लिए भी बहुत कम था। उस समय BJP को पूरी 294 सीटों में से केवल 3 सीटें मिली थीं। जनता के बीच भी पार्टी की पकड़ कम थी और उसे सिर्फ 10 प्रतिशत लोगों का साथ मिला था। उस वक्त किसी ने नहीं सोचा था कि यह पार्टी कभी बंगाल की सत्ता तक पहुँच पाएगी।

बंगाल विधानसभा चुनाव 2016 नतीजें

2021: जब बीजेपी ने सबको चौंका दिया

5 साल बाद यानी 2021 में कहानी पूरी तरह बदल गई। BJP ने बंगाल की राजनीति में ऐसी छलाँग लगाई कि बड़े-बड़े दिग्गज हैरान रह गए। पार्टी की सीटें 3 से बढ़कर सीधे 77 पर पहुँच गईं। लोगों का भरोसा भी बढ़ा और BJP को करीब 38 प्रतिशत वोट मिले। भले ही पार्टी तब सरकार नहीं बना पाई, लेकिन उसने यह साफ कर दिया कि वह बंगाल में TMC को टक्कर देने वाली इकलौती और सबसे बड़ी ताकत बन चुकी है।

2026: शिखर पर पहुँचने की ऐतिहासिक जीत

अब 2026 के नतीजों ने तो इतिहास ही रच दिया है। BJP ने अपनी पिछली सीटों का आँकड़ा दोगुना करते हुए बहुमत हासिल कर लिया है। पार्टी न केवल सीटों के मामले में आगे निकली, बल्कि उसे मिलने वाले वोटों का प्रतिशत भी TMC से ज्यादा हो गया है। यह सफर दिखाता है कि बंगाल के लोगों ने पिछले 10 सालों में धीरे-धीरे अपना मन बदला और एक नई राजनीति को मौका देने का फैसला किया। आज BJP शून्य से शुरू होकर बंगाल के शिखर पर पहुँच गई है।

कमल मेला और फुटबॉल: BJP की ‘आउट ऑफ द बॉक्स’ रणनीति

इस बार BJP ने सिर्फ बड़ी-बड़ी रैलियाँ और भाषण ही नहीं दिए, बल्कि बंगाल के लोगों के बीच पहुँचने के लिए ‘कमल मेलों’ का आयोजन किया। ये मेले सिर्फ राजनीति के लिए नहीं थे, बल्कि इनमें बंगाल की संस्कृति, खान-पान और संगीत की झलक देखने को मिली। पार्टी ने स्थानीय कलाकारों और गायकों को अपनी कला दिखाने का मौका दिया। इससे लोगों के मन में यह बात बैठ गई कि BJP कोई ‘बाहरी’ पार्टी नहीं है, बल्कि वह बंगाल की मिट्टी और यहाँ की परंपराओं का पूरा सम्मान करती है।

बंगाल के लोगों के लिए फुटबॉल सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि एक जुनून है। BJP ने इस जुनून को समझा और पूरे राज्य में फुटबॉल टूर्नामेंट्स करवा दिए। इन मैचों के जरिए पार्टी के नेता सीधे लाखों युवाओं से मिले। खेल-खेल में ही युवाओं को BJP की विचारधारा से जोड़ा गया। इस अनोखी तरकीब ने नौजवानों के बीच यह संदेश भेजा कि BJP सिर्फ चुनाव की बात करने वाली पार्टी नहीं है, बल्कि वह उनकी पसंद और नापसंद का भी ख्याल रखती है।

इन नए प्रयोगों का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि BJP ने खुद को जनता का हिस्सा बना लिया। रैलियों में अक्सर नेता दूर मंच पर खड़े होकर भाषण देते हैं, लेकिन मेलों और खेल के मैदानों में वे लोगों के बिल्कुल करीब आ गए। इससे जनता को लगा कि पार्टी उनकी भावनाओं को समझती है। इसी जमीनी जुड़ाव ने BJP को बंगाल के हर घर और हर दिल तक पहुँचने में मदद की, जिसका सीधा फायदा उन्हें चुनावी नतीजों में देखने को मिल रहा है।

आंगन बैठक और माइक्रो-मैनेजमेंट का कमाल

बीजेपी की जीत की सबसे बड़ी इनसाइड स्टोरी उनके ‘आंगन बैठक’ मॉडल में छिपी है। जब परीक्षाओं के कारण लाउडस्पीकर पर रोक लगी तो सुनील बंसल और भूपेंद्र यादव की टीम ने इसे अवसर में बदल दिया। पार्टी कार्यकर्ताओं ने एक ही महीने में 1 लाख 65 हजार से ज्यादा छोटी-छोटी बैठकें लोगों के घरों और आंगनों में कीं।

इन बैठकों में 10 से 15 लोगों के समूह होते थे जिनसे सीधी बातचीत की गई और उनके मन की शंकाओं को दूर किया गया। इस ‘माइक्रो-मैनेजमेंट’ ने चुनाव को बड़ी-बड़ी रैलियों के शोर से निकालकर लोगों के ड्राइंग रूम तक पहुँचा दिया। हर बैठक के बाद व्हाट्सएप ग्रुप बनाए गए जिससे पार्टी का संदेश सीधे मतदाता की जेब तक पहुँच गया।

साख और स्थानीय चेहरे: बाहरी बनाम भीतरी का अंत

2021 के चुनाव में ममता बनर्जी बीजेपी को ‘बाहरी’ पार्टी बताकर वोट बटोरने में सफल रही थीं। लेकिन 2026 तक आते-आते BJP ने इस चुनौती का डटकर मुकाबला किया। पार्टी ने सुवेंदु अधिकारी जैसे कद्दावर स्थानीय नेताओं को पूरी कमान दी और उम्मीदवारों के चयन में भारी बदलाव किया।

इस बार BJP ने केवल दलबदलुओं पर भरोसा नहीं किया बल्कि स्थानीय स्तर पर प्रतिष्ठित डॉक्टरों, वकीलों, खिलाड़ियों और कलाकारों को टिकट दिया। इससे जनता के बीच यह संदेश गया कि BJP के पास बंगाल को चलाने के लिए अपने खुद के काबिल चेहरे हैं। इस रणनीति ने ‘बाहरी’ होने के नैरेटिव को पूरी तरह कुंद कर दिया।

RG कर और संदेशखाली का प्रभाव

बंगाल के चुनाव में करीब 70 फीसदी ‘स्विंग वोटर्स’ होते हैं जो आखिरी समय में अपना मन बदलते हैं। इस बार दो बड़ी घटनाओं ने इन मतदाताओं को हिलाकर रख दिया। RG कर मेडिकल कॉलेज की घटना ने शहरी मध्यम वर्ग और विशेष रूप से महिलाओं को ममता सरकार के खिलाफ कर दिया।

वहीं संदेशखाली में महिलाओं के साथ हुए अत्याचार ने ग्रामीण इलाकों में TMC के ‘सिंडिकेट राज’ के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा पैदा किया। जो महिलाएँ पहले ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी सरकारी योजनाओं के कारण TMC की समर्थक थीं, वे सुरक्षा के मुद्दे पर BJP की ओर झुक गईं। इस ‘मूक क्रांति’ ने वोटिंग के दिन TMC के सारे गणित बिगाड़ दिए।

भ्रष्टाचार पर किया सीधा प्रहार: सिंडिकेट राज का खात्मा

मोदी-शाह की जोड़ी ने इस बार भ्रष्टाचार को केवल चुनावी मुद्दा नहीं बनाया बल्कि इसे एक भावनात्मक मुद्दा बना दिया। रैलियों में शिक्षक भर्ती घोटाले और राशन घोटाले का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने सीधे तौर पर बंगाल के युवाओं से पूछा कि क्या उन्हें उनका हक मिल रहा है?

ED और CBI की कार्रवाई में मिले नोटों के पहाड़ों की तस्वीरों ने जनता के मन में यह बात बैठा दी कि उनका पैसा TMC के नेताओं की तिजोरियों में जा रहा है। BJP का वादा कि वह एक विशेष टास्क फोर्स बनाकर भ्रष्ट नेताओं की संपत्ति कुर्क करेगी और गरीबों में बाँटेगी, बेहद असरदार रहा।

घुसपैठ और राष्ट्रीय सुरक्षा: ध्रुवीकरण का नया मॉडल

BJP ने सीमावर्ती जिलों में बांग्लादेशी घुसपैठ के मुद्दे को इस बार राष्ट्रीय सुरक्षा और स्थानीय संसाधनों से जोड़कर पेश किया। पार्टी ने यह नैरेटिव सेट किया कि घुसपैठिए बंगाल के युवाओं की नौकरियाँ और राशन छीन रहे हैं। सीएए (CAA) के लागू होने से मतुआ समुदाय जैसे शरणार्थी समूहों ने BJP को एकतरफा वोट दिया।

अमित शाह का यह बयान कि ‘बीजेपी सरकार आने पर परिंदा भी पर नहीं मार पाएगा‘ ने सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले उन लोगों को सुरक्षा का भरोसा दिया जो तस्करी और अपराध से परेशान थे। इस ध्रुवीकरण ने बीजेपी के कोर वोट बैंक को एकजुट कर दिया।

अमित शाह का ‘बंगाल प्रवास’ और मोदी की 15 गारंटी

गृह मंत्री अमित शाह का चुनाव के दौरान 15 दिनों तक बंगाल में ही रुक जाना BJP की गंभीरता को दर्शाता है। उन्होंने कोलकाता को अपना कंट्रोल रूम बनाया और हर जिले की पल-पल की रिपोर्ट ली। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महिलाओं के लिए ’15 गारंटी’ का ऐलान किया जिसने TMC की योजनाओं की हवा निकाल दी।

3000 रुपए की आर्थिक सहायता और सरकारी नौकरियों में 33 फीसदी आरक्षण के वादे ने महिलाओं के बीच एक मजबूत विकल्प पेश किया। PM मोदी के प्रति लोगों का अटूट भरोसा और शाह की संगठन क्षमता ने मिलकर बंगाल में ‘डबल इंजन’ की रफ्तार पकड़ ली।

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