Thursday, May 6, 2021
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‘फ्री कश्मीर’ की चाह लिए वामपंथी गुंडे हिंदू कॉलेज की दीपिका को दे रहे धमकी

एक ऐसी छात्रा पर हमला बोलना जिसने कोई राजनीति नहीं की, बल्कि एक छोटी सी, शांतिपूर्ण श्रद्धांजलि सभा बुलाई, यह बताता है कि वामपंथी सड़ाँध से बजबजाते कॉलेज और विश्वविद्यालय वैचारिक पतन के किस रास्ते चल चुके हैं।

DU बीट नामक ‘स्वतंत्र विद्यार्थी अखबार’ ने अपने फीचर्ड इमेज में कहीं का एक पोस्टर लगाया है जिसमें ‘स्टॉप वेपनाइजिंग कश्मीरी पंडित एग्जोडस’ (यानी कश्मीरी पंडितों के पलायन का हथियार की तरह इस्तेमाल करना बंद करो) लिखा है। भीतर में यह भी दावा किया गया है कि कॉलेज के जो ‘विद्यार्थी’ दीपिका के पत्र-पाठ पर नारेबाजी कर रहे थे, वो ‘कश्मीरी पंडितों के साथ’ होने के पोस्टर ले कर भी खड़े रहे हैं। कमाल की बात यह है कि DU बीट ने एक रैंडम पोस्टर फीचर्ड इमेज में लगाया है, और दूसरा पोस्टर हिमांशु सिंह और अभिराम एस विनोद नामक लड़कों को क्रेडिट दे कर, जिसमें कश्मीर का जिक्र कहीं नहीं है। रैंडम पोस्टर अगर इन विद्यार्थियों के हाथ में उस दिन होता, तो शायद इस आर्टिकल में दिख जाता।

DU बीट में प्रकाशित खबर का स्क्रीनशॉट

दूसरी बात, जिस दो नामों का जिक्र इस लेख में किया गया है, उन दोनों ने ही ‘फ्री कश्मीर’ वाले पोस्ट पर ‘लव’ रिएक्ट किया है। अब सवाल यह है कि अपनी प्रोफाइल में SFI से ताल्लुक बताने वाला हिमांशु सिंह और अभिराम, अगर कश्मीरी हिन्दुओं के साथ खड़े हैं तो वो फ्री कश्मीर के पोस्ट को ‘दिल’ क्यों दे रहे हैं? या तो हिमांशु जैसे नव-वामपंथी छात्रों को पता नहीं है कि कश्मीर का मुद्दा क्या है, जो अगर वो दीपिका की श्रद्धांजलि सभा में शांति बना कर कुछ मिनट सुन लेते तो ज्ञान हो जाता, या फिर ये लोग मूर्खतावश किसी भी पोस्ट को ‘लव’ रिएक्ट देते रहते हैं। दोनों ही मामले में, हिमांशु या अभिराम छात्र होने की बुनियादी जरूरत – जो लिखा है, जो बोला जा रहा है, उन्हें समझ पाना – पूरी नहीं कर पा रहे।

ऑपइंडिया पर दीपिका शर्मा के इंटरव्यू के बाद, वामपंथी गुंडों का सारा अजेंडा बाहर आ चुका है और ये लोग अब मिट्टी डाल कर ढकने की फिराक में हैं। जब ये लोग इस बात को मानते हैं कि जनवरी 19 को ही दीपिका के ग्रुप के छात्र-छात्राओं द्वारा श्रद्धांजलि सभा का आयोजन था, जिसमें बमुश्किल 10-20 लोग आए, तो फिर ‘कश्मीरी पंडितों के साथ खड़े होने वाले’ छात्रों का दिमाग क्या घास चरने गया था कि अगले दिन वहाँ गला फाड़ कर चिल्लाने लगे? क्या इन गुंडों का ‘श्रद्धांजलि’ या ‘सॉलिडेरिटी’ का मतलब भी पता है? क्या दीपिका किसी ‘फासिस्ट’ संस्था से संबद्ध थी? क्या उसका कोई अजेंडा था? या फिर उसी दिन को वो सभा होनी चाहिए थी क्योंकि भारतीय इतिहास का वही दिन वो काला दिन था?

हिमांशु और अभिराम के फेसबुक प्रोफाइल का स्क्रीनशॉट, जहाँ वो ‘फ्री कश्मीर’ की वकालत कर रहे हैं

इन लफंगों से सवाल यह है कि प्रोटेस्ट करना क्या उनका ही निजी अधिकार है? क्या उन्हीं के हिसाब से प्रोटेस्ट होगा? स्वघोषित रूप से वामपंथी छात्रों द्वारा ‘फ्री कश्मीर’ और ‘इन सॉलिडेरिटी विद कश्मीरी पंडित’ दोनों जगह सहमति देना उनकी मूर्खता पर बहुत कुछ नहीं कहता? अगर यह भी मान लिया जाए कि फीचर्ड इमेज वाला पोस्टर ले कर हिमांशु जैसे लड़के घूम रहे थे, तो DU बीट को यह तो बताना चाहिए कि दीपिका के किन शब्दों से कश्मीरी पंडितों के पलायन को हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा था?

आज दीपिका को धमकियाँ मिल रही हैं, उसे अलग-थलग करने की कोशिशें हो रही हैं। जब वो अपना पक्ष रख रही है, तो यह बताया जा रहा है कि उसका पक्ष ‘भ्रम’ फैला रहा है, गलत तरीके से दिखाया गया है। ऑपइंडिया से बातचीत में दीपिका शर्मा ने बताया था कि जैसे ही उन्होंने यह पत्र पढ़ना शुरू किया, कॉलेज के ही कुछ वामपंथी छात्र गुटों ने दीपिका के खिलाफ जोर-जोर से नारेबाजी शुरू कर दी। दीपिका ने बताया कि हालाँकि उन्हें यह पहले से ही आभास था कि इसके लिए वामपंथी गुट उन्हें परेशान करेंगे। बावजूद दीपिका ने यह जोखिम उठाया।

दीपिका ने बताया कि आज के समय में अगर आप खुद को लेफ्टिस्ट का तमगा नहीं देते हैं, तो आपको नकार दिया जाता है। साथ ही उन्होंने कहा कि उनके दक्षिणपंथी होने की वजह से उन्हें ब्राह्मणवादी, पिछड़ा और भी न जाने कितने ही विशेषण दिए जाते हैं। उन्होंने बताया कि वामपंथी विचारधारा के लोग अपने साथ खड़े न होने पर लोगों को किसी भी तरह से पिछड़ा हुआ साबित करने का प्रयास करते हैं और मानसिक प्रताड़ना देते हैं। उन्होंने कहा कि कश्मीरी पंडितों के साथ समर्थन व्यक्त करने के लिए उनके खिलाफ ‘इस्लामॉफ़ोबिक’ नारे लगाए गए। दीपिका ने सवाल उठाते हुए कहा कि यदि कोई कश्मीरी पंडितों के अधिकारों की बात करता है तो वह इस्लाम विरोधी क्यों ठहरा दिया जाता है? उन्होंने बताया कि ‘बोल कि लब आजाद हैं तेरे’ जैसे नारे लगाने वाले नहीं चाहते कि उनके अलावा कोई दूसरा बोले।

इसमें गलत क्या दिखाया गया है?

वामपंथी गुंडों ने नारेबाजी की। श्रद्धांजलि सभा पर नारेबाजी, वो भी तब जब जगह और सभा की जानकारी पहले से ही हो, रुक कर तब तक की जाए जब तक वो लड़की भावुक हो कर, यह सोच कर टूट न जाए कि कैसे लोग हैं जो लाखों लोगों की व्यथा पर शोर कर रहे हैं, गुंडागर्दी और लफ़ंगापन ही है। इसके लिए और कोई नाम नहीं।

ये लोग गुंडे इसलिए हैं क्योंकि जिस बात का ये विरोध कर रहे हैं, उसे पढ़ने की जगह, उसे समझने की जगह, बस अपने प्रोफेसरों के कहने पर, या अपनी ही अटल अज्ञानतावश पोस्टर ले कर निकल पड़े हैं। इन्होंने अपनी बुद्धि-विवेक का प्रयोग बंद कर दिया है और जो भी इनके साथ नहीं है, जो भी न्यूट्रल है, कुछ और करना चाह रहा है, जो पोलिटिकल नहीं है, वो इनका दुश्मन बन जाता है।

कैम्पसों को वैचारिक चर्चा की जगह, ‘एक ही तरह के विचारों पर चर्चा’ की जगह बनाने की वामपंथी मुहिम सिर्फ इसलिए चल रही है क्योंकि एकेडमिक जगहों में ऐसे शिक्षकों का वर्चस्व है जो पढ़ाने की जगह बच्चों को बरगलाते रहते हैं कि उनका पहला काम सड़क पर नारे लगाना है। ये शिक्षक अपनी राजनैतिक महात्वाकांक्षा या कुंठा को हवा देने के लिए बच्चों को ब्लैकमेल तक करते हैं। जो बच्चे इनकी रैलियों में नहीं आते उनके ‘इंटरनल मार्क्स’ कम किए जाने की अनकही धमकी हर जगह सुनाई देती है।

इसलिए, एक ऐसी छात्रा पर हमला बोलना जिसने कोई राजनीति नहीं की, बल्कि एक छोटी सी, शांतिपूर्ण श्रद्धांजलि सभा बुलाई, यह बताता है कि वामपंथी सड़ाँध से बजबजाते कॉलेज और विश्वविद्यालय वैचारिक पतन के किस रास्ते चल चुके हैं।

हिंदू कॉलेज में कश्मीरी पंडितों का दर्द बयाँ कर रही थी दीपिका, टूट पड़े वामपंथी गुंडे

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