महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों ने भारतीय राजनीति में एक नया संकेत दिया है। मुस्लिम बहुल इलाकों में अब कॉन्ग्रेस या अन्य सेकुलर दलों की छाया में रहकर वोट देने की पुरानी आदत टूट रही है। इसके बजाय मुस्लिम मतदाता खुलकर अपनी पहचान वाली पार्टियों के पीछे खड़े हो रहे हैं। असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने जहाँ राज्य भर में 114 से 125 सीटें जीतकर सबको चौंका दिया, वहीं मालेगांव जैसे शहर में स्थानीय स्तर की ‘इस्लाम पार्टी’ ने सबसे बड़ी पार्टी बनकर इतिहास रच दिया।
यह सिर्फ महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है। पश्चिम बंगाल में भी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) से निष्कासित विधायक हुमायूँ कबीर अपनी नई पार्टी लेकर मैदान में उतर रहे हैं और ओवैसी से गठबंधन की बात कर रहे हैं। उनका दावा है कि 2026 के विधानसभा चुनाव में वह किंगमेकर बनेंगे। तो वहीं असम में AIUDF भी वही काम कर रही है। यह सब मिलाकर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है कि क्या मुस्लिम वोटबैंक अब पूरी तरह से अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाने की ओर बढ़ रहा है?
महाराष्ट्र निकाय चुनाव में AIMIM का दमदार उभार
महाराष्ट्र के 29 नगर निकाय चुनावों में 15 जनवरी 2026 को हुए AIMIM ने अपेक्षा से कहीं बेहतर प्रदर्शन किया। पार्टी ने कुल 114 से 125 वार्डों में जीत हासिल की, जो पिछले चुनावों की तुलना में दोगुनी से ज्यादा है। छत्रपति संभाजीनगर (पहले औरंगाबाद) में पार्टी ने 33 सीटें जीतकर खुद को दूसरी सबसे बड़ी ताकत बना लिया।
यहाँ भाजपा के बाद AIMIM ही सबसे मजबूत दिखी। मालेगांव में 21, नांदेड़ में 13-14, धुले में 10, सोलापुर में 8, मुंबई (BMC) में 8, अमरावती में 11-12, नागपुर में 7 और ठाणे-मुंब्रा में 5-5 सीटें जीतीं। कुल मिलाकर पार्टी ने समाजवादी पार्टी (SP), महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) और एनसीपी (शरद पवार गुट) को पीछे छोड़ दिया।
AIMIM के राष्ट्रीय प्रवक्ता वारिस पठान ने कहा, “वॉर्ड के चुनाव बुनियादी मुद्दों पर होते हैं। जनता को लग रहा था कि इतने सालों से वह जिन्हें वोट देकर जिता रहे थे, वह उनके लिए काम ही नहीं कर रहे। ऐसे में उन्होंने ओवैसी साहब पर यकीन जताया।” समाजवादी पार्टी पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि SP का महाराष्ट्र में सूपड़ा साफ हो गया और जनता ने उनके घमंड को चकनाचूर कर दिया।
महाराष्ट्र अध्यक्ष इम्तियाज जलील ने भी इस जीत का श्रेय ओवैसी की रैलियों और पार्टी के काम को दिया। उन्होंने कहा कि अब AIMIM का समर्थन सिर्फ मुसलमानों तक सीमित नहीं है। अनुसूचित जाति, जनजाति और कुछ हिंदू मतदाता भी पार्टी के पक्ष में आ रहे हैं। संभाजीनगर के गुलमंडी वार्ड जैसे इलाके, जो पहले शिवसेना-भाजपा का गढ़ थे, वहां भी AIMIM के उम्मीदवार जीते। मुंबई में जीतीं खैरुन्निसा अकबर हुसैन ने कहा, “यह जीत जनता की है। हम उन मुद्दों पर काम करेंगे जो हमने उठाए थे।”
यह प्रदर्शन इसलिए भी खास है क्योंकि पार्टी में चुनाव से पहले आंतरिक कलह थी। मुंबई इकाई के अध्यक्ष ने इस्तीफा दे दिया था और जलील को धमकियां मिली थीं। फिर भी ओवैसी और उनके भाई अकबरुद्दीन की रैलियों ने माहौल बना दिया। कई जगहों पर AIMIM किंगमेकर की भूमिका में आ गई है, जहां महायुति या महाविकास अघाड़ी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला।
मालेगांव में इस्लाम पार्टी का तूफान
मालेगांव की कहानी इससे भी आगे की है। पावरलूम और बुनकरों के शहर मालेगांव में राष्ट्रीय दलों की लहर नहीं चली। यहाँ ‘इस्लाम पार्टी’ (फुल फॉर्म: Indian Secular Largest Assembly of Maharashtra) ने 84 सीटों वाली नगर निगम में 35 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बन गई। बहुमत के लिए 43 सीटें चाहिए, इसलिए अब समाजवादी पार्टी (5 सीटें) और कॉन्ग्रेस (3 सीटें) की ओर नजरें हैं। अगर ये साथ आए तो इस्लाम पार्टी का पहला मेयर बनना तय है।
इस्लाम पार्टी की स्थापना 2024 में पूर्व कॉन्ग्रेस विधायक आसिफ शेख ने की थी। पार्टी का मुख्य एजेंडा स्थानीय मुद्दे हैं – पावरलूम उद्योग बचाना, बिजली-पानी की सुविधाएं और बुनकरों की समस्याएं। नाम भले धार्मिक लगे, लेकिन फोकस सेकुलर और लोकल है। यहां भाजपा सिर्फ 2 सीटों पर सिमट गई, कॉन्ग्रेस 3 पर और एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने 18 सीटें जीतकर तीसरा स्थान पाया। AIMIM, जो पहले मजबूत थी, इस बार 21 सीटों पर रुक गई। मुफ्ती इस्माइल जैसे नेता का जादू नहीं चला।
स्थानीय लोग कहते हैं कि राष्ट्रीय दल बड़े वादे करते हैं लेकिन जमीन पर काम नहीं करते। इस्लाम पार्टी ने यही गैप भरा। यह जीत साबित करती है कि मुस्लिम बहुल इलाकों में अब ‘बाहरी’ पार्टियों से ज्यादा ‘अपनी’ और लोकल पहचान वाली पार्टियां पसंद की जा रही हैं।
कॉन्ग्रेस और सेकुलर दलों का नुकसान
इन नतीजों से सबसे बड़ा नुकसान कॉन्ग्रेस, समाजवादी पार्टी और एनसीपी जैसे दलों को हुआ। मुस्लिम वोटबैंक, जो दशकों से इन दलों का मजबूत आधार था, अब बंट रहा है। ओवैसी लगातार उन मुद्दों पर बोलते हैं जिन पर सेकुलर दल चुप रहते हैं- अल्पसंख्यक अधिकार, असुरक्षा की भावना और स्थानीय समस्याएँ। युवा मुस्लिम मतदाताओं में उनकी दमदार बोलने की शैली लोकप्रिय है।
राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि अल्पसंख्यकों में बढ़ती असुरक्षा और पारंपरिक दलों की नाकामी ने यह बदलाव लाया है। अब मुस्लिम मतदाता खुद तय कर रहे हैं कि उन्हें अपनी पहचान वाली पार्टी चाहिए।
पश्चिम बंगाल में अगला ट्रेलर तैयार
महाराष्ट्र का यह ट्रेलर पश्चिम बंगाल में पूरा शो बन सकता है। TMC से निष्कासित विधायक हुमायूँ कबीर ने नई पार्टी लॉन्च की। कबीर मुर्शिदाबाद में अयोध्या की बाबरी मस्जिद जैसी मस्जिद बना रहे हैं। उनका दावा है कि 2026 विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी 135 सीटों पर लड़ेगी और वह किंगमेकर बनेंगे।
पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी करीब 30% है और 120-126 सीटों पर निर्णायक। 45 सीटें ऐसी हैं जहाँ 50% से ज्यादा मुस्लिम वोटर हैं। कबीर का कैलकुलेशन है कि अगर TMC का वोटबैंक बंटे तो वह फायदा उठा सकते हैं। 2021 में TMC को 215 सीटें मिली थीं, जो बहुमत से काफी ज्यादा थीं। अगर TMC को 100 सीटों का नुकसान हो और कबीर 40-50 जीत लें तो वह किंगमेकर बन सकते हैं। इससे भाजपा को भी फायदा हो सकता है, जो सबसे बड़ी पार्टी बन जाएगी।
कबीर ने ‘मस्जिद, मुसलमान और ओवैसी’ का कॉकटेल बनाया है। बिहार के बाद ओवैसी की स्वीकार्यता बढ़ी है। 2021 में बंगाल में AIMIM अकेले लड़ी थी लेकिन मुस्लिम वोट TMC के पास रहा था। अब लोकल लीडर कबीर के साथ गठबंधन और बाबरी मस्जिद का इमोशनल फैक्टर नया प्रयोग है। अगर मुस्लिम वोट ध्रुवीकृत हुआ तो TMC को बड़ा नुकसान हो सकता है।
असम में मुस्लिम राजनीति की बदलती तस्वीर, अपनी पहचान की ओर बढ़ते कदम
असम में मुस्लिम वोटबैंक की राजनीति लंबे समय से AIUDF (ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट) के इर्द-गिर्द घूमती रही है। बदरुद्दीन अजमल की यह पार्टी मुस्लिम बहुल इलाकों में मजबूत आधार रखती है और कॉन्ग्रेस की छाया से बाहर अपनी अलग पहचान बना चुकी है। 2026 विधानसभा चुनाव से पहले यह ट्रेंड और मजबूत होता दिख रहा है।
हालिया खबरों में अजमल ने असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM के साथ गठबंधन का संकेत दिया है, जिससे कॉन्ग्रेस काफी बैचेन है। अजमल ने दावा किया कि उनकी पार्टी कॉन्ग्रेस को पीछे छोड़ सकती है, जबकि कॉन्ग्रेस ने AIUDF से किसी गठबंधन की संभावना को साफ खारिज कर दिया।
यह बदलाव ऊपर वाले मुद्दे से जुड़ता है- मुस्लिम मतदाता अब पारंपरिक सेकुलर दलों की बजाय अपनी पहचान वाली पार्टियों को तरजीह दे रहे हैं। असम में बांग्लादेशी घुसपैठ, NRC और CAA जैसे मुद्दों ने मुस्लिम राजनीति को और ध्रुवीकृत किया है। BJP इसे ‘लोकल vs माइग्रेंट मुस्लिम’ के रूप में पेश कर रही है, जबकि हिमंता बिस्वा सरमा की लोकप्रियता सर्वे में ऊंची है।
AIUDF-AIMIM का संभावित टाइ-अप कॉन्ग्रेस के मुस्लिम वोटबैंक में सेंध लगा सकता है। अगर यह हुआ तो असम में भी महाराष्ट्र जैसा ट्रेंड दिखेगा, जहाँ मुस्लिम वोट अपनी पार्टियों के पीछे एकजुट हो रहा है। हालाँकि, BJP की मजबूत पकड़ और इंडिजिनस मुद्दों के कारण विपक्ष के लिए चुनौती बड़ी है।
भविष्य के मायने: नई मुस्लिम राजनीति का उदय
ये सारे घटनाक्रम एक बड़ा बदलाव दिखाते हैं। मुस्लिम मतदाता अब कॉन्ग्रेस, सपा या TMC जैसे दलों की छाया में नहीं रहना चाहते। वे अपनी पार्टियों के साथ खुलकर खड़े हो रहे हैं- चाहे वह AIMIM हो, इस्लाम पार्टी हो, AIUDF हो या हुमायूँ कबीर की नई पार्टी। यह बदलाव कई कारणों से हुआ है। एक तो पारंपरिक सेकुलर दलों की नाकामी- वे मुद्दे उठाते तो हैं लेकिन जमीन पर काम नहीं करते। दूसरा, ओवैसी जैसे नेताओं की दमदार आवाज और युवाओं में लोकप्रियता। तीसरा, स्थानीय मुद्दों पर फोकस करने वाली नई पार्टियां।
यह बदलाव सेकुलर दलों के लिए खतरे की घंटी है। मुस्लिम वोट बंटने से विपक्ष कमजोर होगा और सत्तारूढ़ दलों को फायदा मिल सकता है। लेकिन लंबे समय में यह मुस्लिम राजनीति को मजबूत बनाएगा। मुस्लिम समुदाय अब खुद अपनी राजनीतिक पहचान गढ़ रहा है, न कि दूसरों की छाया में रहकर। महाराष्ट्र ने ट्रेलर दिखाया, पश्चिम बंगाल में पूरा शो आने वाला है। अन्य राज्य जैसे बिहार, उत्तर प्रदेश, केरल और कर्नाटक में भी ऐसे संकेत मिल रहे हैं। भारतीय राजनीति का यह नया अध्याय दिलचस्प होगा।


