पश्चिम एशिया संकट और हॉर्मुज स्ट्रेट की नाकेबंदी की वजह से ईंधन की कीमतों पर भारी दबाव पड़ रहा है। ऐसे में मोदी सरकार ने पेट्रोल-डीजल की कीमतों में सिर्फ ₹3 प्रति लीटर की बढ़ोतरी की है। हालाँकि दुनिया के अन्य देशों की तुलना में ये बढ़ोतरी नाममात्र की है, लेकिन इस मुद्दे पर कॉन्ग्रेस पार्टी और उसके नेता लगातार मोदी सरकार को निशाना बना रही है।
कॉन्ग्रेस पार्टी का आरोप है कि पीएम मोदी ने जनता पर कोड़ा बरसा दिया है। कॉन्ग्रेस ने यह भी आरोप लगाया कि यह फैसला जानबूझकर विधानसभा चुनाव खत्म होने तक टाल दिया गया था।
राहुल गाँधी ने कहा, “जनता मोदी सरकार की गलती की कीमत चुकाएगी। तीन रुपए का झटका तो आ गया, बाकी रिकवरी किस्तों में होगी।” इससे पहले 28 अप्रैल को उन्होंने कहा था, “चुनावी राहत खत्म, महंगाई की आग आने वाली है! 29 अप्रैल के बाद सावधान- पेट्रोल, डीजल, सब महँगा हो जाएगा।” उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया कि जब तेल सस्ता था तब मुनाफा कमाया और अब बोझ जनता पर डाल दिया।
गलती मोदी सरकार की,
— Rahul Gandhi (@RahulGandhi) May 15, 2026
कीमत जनता चुकाएगी।
₹3 का झटका आ चुका,
बाकी वसूली क़िस्तों में की जाएगी।
कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी इसे ‘मोदी सरकार द्वारा निर्मित संकट’ बताते हुए नेतृत्व की कमी और अक्षमता को जिम्मेदार ठहराया। कॉन्ग्रेस के अन्य नेता भी इसी सुर में सुर मिला रहे हैं।
विपक्षी पार्टी के ऐसे हमले इतिहास को सुविधानुसार भुला देते हैं। इस संदर्भ में यूपीए काल की वित्तीय चालाकी को दोबारा याद करना जरूरी है, जिसने देश पर लाखों करोड़ की टाली गई जिम्मेदारी (Deferred Liability) को थोपकर घाटे को छिपाया गया।
UPA के दौर में तेल बांड से छिपाया जाता था वित्तीय घाटा
विपक्ष के ये हमले इतिहास को बड़ी सफाई से नजरअंदाज कर रहे हैं। इस संदर्भ में यूपीए (UPA) काल की उस “वित्तीय जालसाजी” को याद करना जरूरी है, जिसने देश पर लाखों करोड़ रुपये का बोझ लाद दिया था।
ऑयल बॉन्ड को बनाया था राजकोषीय घाटा छिपाने का हथियार
यूपीए सरकार ने पेट्रोल, डीजल, केरोसिन और एलपीजी पर सब्सिडी देने के लिए तेल कंपनियों को विशेष ‘ऑयल बॉन्ड’ जारी किए थे। बजट से सब्सिडी देने के बजाय, डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार ने तेल विपणन कंपनियों (OMCs) को ये बॉन्ड थमा दिए, जो बाद में देश के लिए एक महँगा कर्ज बन गए।
उपभोक्ताओं को राहत देने के बजाय, यूपीए के इन ऑयल बॉन्ड ने अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुँचाया और कर्ज चुकाने का सारा बोझ आने वाली सरकार पर डाल दिया। इसके विपरीत, मोदी सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर फिर से अंधाधुंध सब्सिडी देने से इनकार कर दिया, जो वित्तीय अनुशासन का एक मॉडल है, खासकर तब जब पूरी दुनिया वैश्विक संकट से जूझ रही है।
भविष्य की पीढ़ी पर लादा ₹3 लाख करोड़ का बोझ
साल 2005 से 2010 के बीच, यूपीए सरकार ने तेल कंपनियों को लगभग ₹1.48 लाख करोड़ के ऑयल बॉन्ड जारी किए। ये साधारण कर्ज नहीं थे। बजट से नकद सब्सिडी देने के बजाय, सरकार ने लंबी अवधि की प्रतिभूतियां (Sovereign Securities) जारी कीं।
इन बॉन्डों की अवधि 15 से 20 वर्ष थी और ब्याज दर 7 से 8.4 प्रतिशत तक थी। कागजों पर तो राजकोषीय घाटा कम दिखा, क्योंकि सब्सिडी बजट का हिस्सा नहीं थी, लेकिन हकीकत में यह भविष्य के करदाताओं के साथ धोखा था।
यूपीए सरकार के इस रवैये ने अर्थव्यवस्था को कई मोर्चों पर चोट पहुँचाई, जिसमें-
- वित्तीय भ्रम: यूपीए ने घाटे को छिपाकर लक्ष्यों को पूरा करने का दिखावा किया, जबकि कच्चा तेल 147 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गया था। केवल ब्याज भुगतान ने ही दो दशकों में ₹1.70 लाख करोड़ जोड़ दिए, जिससे कुल भुगतान (मूलधन + ब्याज) ₹3 लाख करोड़ से ऊपर निकल गया।
- विकास कार्यों में कटौती: सरकार को हर साल सिर्फ ब्याज चुकाने के लिए ₹10,000 करोड़ अलग रखने पड़े। यह पैसा बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य या शिक्षा पर खर्च हो सकता था।
- तेल कंपनियों की बदहाली: तेल कंपनियों के पास नकदी के बजाय ऐसे बॉन्ड रह गए जिन्हें वे भुना नहीं सकती थीं। इससे रिफाइनिंग क्षमता और विस्तार में उनकी निवेश क्षमता घट गई।
सब्सिडी के बावजूद आसमान छूती थीं कीमतें
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन बॉन्डों से आम जनता को कोई खास राहत नहीं मिली। यूपीए के 10 सालों में कीमतें लगातार बढ़ती रहीं। 2004 में दिल्ली में पेट्रोल ₹34 प्रति लीटर था, जो 2014 तक ₹72 पार कर गया (118% की वृद्धि)। डीजल ₹22 से बढ़कर ₹55 हो गया (155% से अधिक की वृद्धि)। 2012 में तो एक ही झटके में पेट्रोल के दाम 8 रुपए बढ़ा दिए गए थे।
मोदी सरकार ने चुकाया यूपीए का ‘क्रेडिट कार्ड’ बिल
यूपीए द्वारा जारी किए गए ज्यादातर ऑयल बॉन्ड 2014 के बाद परिपक्व (Mature) हुए। असली भुगतान का भारी बोझ (सालाना हजारों करोड़ रुपये) मोदी सरकार के कंधों पर आया। इस साल मार्च तक, मोदी सरकार ने इन बॉन्डों की आखिरी किश्तें चुकाकर लगभग ₹3.20 लाख करोड़ का कुल दायित्व खत्म कर दिया है।
जहाँ यूपीए ने ₹1.48 लाख करोड़ के बॉन्ड जारी किए और मूलधन के रूप में केवल ₹13,764 करोड़ चुकाए, वहीं डॉ. मनमोहन सिंह सरकार ने 2014 तक ब्याज के तौर पर ₹68,750 करोड़ का भारी भुगतान किया।
कुल मिलाकर, ₹1.48 लाख करोड़ के बॉन्ड के लिए सरकारी खजाने से ₹1.71 लाख करोड़ का केवल ब्याज चुकाया गया है। 2014 से 2026 के बीच मोदी सरकार ने कुल ₹2.36 लाख करोड़ (मूलधन + ब्याज) का भुगतान किया है।
यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं थी। जब वैश्विक तेल कीमतें कम थीं, तब भी सरकार ने एक्साइज ड्यूटी कम नहीं की और उस राजस्व का उपयोग यूपीए के इन पुराने घावों (ऑयल बॉन्ड) को भरने के लिए किया।
मौजूदा समय की चुनौतियाँ और जमीनी वैश्विक हकीकत
दिल्ली में पेट्रोल ₹97.77 और डीजल ₹90.67 प्रति लीटर है। ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर पार कर 126 डॉलर तक पहुँच चुका है। पश्चिम एशिया के तनाव ने दुनिया के समुद्री तेल व्यापार के एक चौथाई हिस्से को बाधित कर दिया है। यूरोप से लेकर चीन और जापान तक, हर देश इसकी मार झेल रहा है। भारत, जो अपनी जरूरत का 85% कच्चा तेल आयात करता है, इस वैश्विक हकीकत से अछूता नहीं रह सकता।
मोदी सरकार का फैसला कि वह फिर से सब्सिडी के जाल में नहीं फंसेगी, आर्थिक रूप से सही कदम है। 2014 और 2016 में पेट्रोल-डीजल की कीमतों को बाजार से जोड़ने के कारण अब स्वचालित समायोजन (Automatic Adjustment) होता है, जिससे तेल कंपनियों को घाटा नहीं होता।
कॉन्ग्रेस की रणनीति न दोहराने से देश को फायदा है। यूपीए का अनुभव बताता है कि वित्तीय देनदारियों को टालना कोई राहत नहीं है, बल्कि यह ब्याज के साथ आने वाला ‘विलंबित दर्द’ है। कॉन्ग्रेस अपनी याददाश्त खोकर राजनीतिक लाभ खोज सकती है, लेकिन रिकॉर्ड साफ है कि यूपीए ने जो बिल उधार छोड़ा था, उसे मोदी सरकार ने चुकाया। देश को आज के संकट का सामना आज ही करना होगा, इसे भविष्य के लिए टाला नहीं जा सकता।
(ये रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)


