तेज प्रताप ने बनाया लालू-राबड़ी मोर्चा: खुद निर्दलीय लड़ने की भी दी धमकी, यादव कुनबा धराशाई!

"मुझे दो सीट चाहिए जहानाबाद और शिवहर से, वहाँ से जो घोषित हुए हैं, वो पहले से हारे हुए हैं। लालू और राबड़ी जी का आशीर्वाद हमेशा साथ है। जरूरत पड़ी तो खुद निर्दलीय लड़ जाऊँगा। ये मेरा मोर्चा लालू-राबड़ी मोर्चा है।"

पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के बाग़ी पुत्र तेज प्रताप यादव ने अपने माता-पिता के नाम पर एक अलग राजनीतिक मोर्चा बनाने की बात कही है। लालू यादव के बड़े बेटे ने राजद नेताओं पर पार्टी और परिवार को तोड़ने का आरोप मढ़ा है। प्रदेश अध्यक्ष रामचंद्र पूर्वे पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि कुछ नेता उनके भाई तेजस्वी को भड़का रहे हैं ताकि पार्टी टूट जाए। उन्होंने अपने छोटे भाई तेजस्वी को अपना हृदय बताते हुए उनकी तुलना अर्जुन से की। उन्होंने दावा किया कि पूर्वे उनके हर काम को रोकने के लिए तेजस्वी से उनकी शिकायत करते हैं। उन्होंने राजद के ऐसे नेताओं को स्वार्थी बताते हुए कहा कि उन लोगों ने पार्टी के कई उच्च पदों को कब्ज़ा लिया है। पटना में तेज प्रताप ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अलग मोर्चा का ऐलान कर दिया है। उन्होंने कहा:

“मुझे दो सीट चाहिए जहानाबाद और शिवहर से, वहाँ से जो घोषित हुए हैं, वो पहले से हारे हुए हैं। दो बार, तीन बार चुनाव हारे हैं.. ये हमारे परिवार, भाई में लड़वाने वाले लोग हैं। आरएसएस के लोग, बजरंगदल के लोग लड़वा रहे हैं। हम ऐसे कैंडिडेट की माँग कर रहे हैं जो नौजवान और ईमानदार हैं। ऐसे लोग को कतई नजरअंदाज नहीं कर सकते। लालू और राबड़ी जी का आशीर्वाद हमेशा साथ है। मैंने पहले भी कहा है तेजस्वी मेरा अर्जुन है। निष्पक्ष लोगों को उम्मीदवार बनाएँगे। हम जरूरत पड़ी तो नया मोर्चा बनाएँगे। जरूरत पड़ी तो खुद निर्दलीय लड़ जाऊँगा। ये मेरा मोर्चा लालू-राबड़ी मोर्चा है। पार्टी में कुछ लोग डेरा जमाकर बैठे हैं। हमको जहानाबाद और शिवहर सीट चाहिए। लड़कर, जीतकर लेंगे। बेतिया से राजन तिवारी को लड़ाएँगे, हाजीपुर से लड़ाएंगे”

ज़ी न्यूज़ में प्रकाशित ख़बर के अनुसार, तेज प्रताप यादव ने कहा:

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“ऐसे ही स्वार्थी लोगों के सफाए के लिए मैंने ‘लालू-राबड़ी’ मोर्चा बनाया है। यह मोर्चा ऐसे नेताओं का सफाया करेगा। तेजस्वी यादव समझदार हैं लेकिन उन लोगों की वजह से उनके आँखों पर पर्दा आ गया है। मेरी माँ राबड़ी देवी को भी सजग रहने की ज़रूरत है। मेरी बातें सभी लोगों को बाद में समझ आएँगी। जो लोग ख़ून-पसीने से पार्टी को सींचने का काम कर रहे हैं, उन्हें टिकट नहीं दिया गया। इसलिए तेजप्रताप यादव उनके लिए खड़ा हो गया है और पार्टी में अलग मोर्चे को तैयार कर रहा है।”

इंडिया का डीएनए 2019′ कार्यक्रम में बोलते हुए तेज प्रताप यादव ने दावा किया कि उन्होंने अपना हर उम्मीदवार चुनने से पहले जनता दरबार लगाया और आम लोगों की राय ली। इसके लिए उन्होंने हर क्षेत्र में घूमने का भी दावा किया। शिवहर और जहानाबाद लोकसभा क्षेत्रों के लिए राजद द्वारा घोषित उम्मीदवारों की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि उनके चयन में राजनीति की गई। सारण को अपनी पुश्तैनी सीट बताते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें इस पर किसी भी बाहरी व्यक्ति का कब्ज़ा मंज़ूर नहीं है। उन्होंने इस सीट पर चुनाव लड़ने के लिए अपनी माँ पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी का नाम प्रस्तावित किया।

हम बता चुके हैं कि कैसे जहानाबाद से अपने क़रीबी चंद्र प्रकाश यादव को टिकट दिलाने की जुगत में लगे तेज प्रताप को पार्टी से निराशा हाथ लगी और तेजस्वी ने सुरेंद्र यादव के नाम पर मुहर लगा दी। इस बात से बौखलाए तेज प्रताप ने समर्थकों से नामांकन दाखिल का आदेश देकर एक तरह से बगावत का ही ऐलान कर दिया। इसी तरह शिवहर से भी वह अंगेश यादव को टिकट देना चाहते थे लेकिन वहाँ भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी। गुरुवार (मार्च 28, 2019) को तेजस्वी यादव ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का ऐलान किया था लेकिन ऐन वक़्त पर पार्टी के बड़े नेताओं को इसकी भनक लग गई और उन्होंने तेज प्रताप को किसी तरह मनाया।

तेज प्रताप यादव के इस क़दम से राजद संगठन और कार्यकर्ताओं में असमंजस का माहौल पैदा हो सकता है। जिस लालू परिवार को यादव वोटों को एकजुट रखने की धुरी माना जाता था, उसके बिखरने से संगठन पर नकारात्मक असर पड़ेगा। अगर सारण से तेज प्रताप अपने ससुर के ख़िलाफ़ हैं तो लालू परिवार का पारिवारिक कलह राजनीतिक सतह पर आ जाएगा और विरोधियों को आलोचना करने का नया मौक़ा मिल जाएगा। हालाँकि, तेज प्रताप का कोई जनाधार नहीं है और न ही संगठन में उन्हें वरिष्ठ नेताओं का साथ मिल रहा है। लेकिन फिर भी, लालू के कुनबे की एकजुटता से बिहार का राजनीतिक और चुनावी समीकरण का निर्णय होता आया है।

उधर लालू यादव भी पटना से दूर राँची में अपनी सज़ा पूरी कर रहे हैं। लालू के पटना में उपस्थित रहने मात्र से ही राजद में चीजें सही रहती थीं लेकिन उनकी अनुपस्थिति में जब परिवार दो फाड़ हो चुका है, कार्यकर्ताओं को लामबंद रखने में परेशानी आ सकती है। लालू ने जेल से ही टिकट वितरण सहित सारे निर्णय लिए, कन्हैया को टिकट न देने के पीछे भी उनका ही हाथ था। अब अपने परिवार को साथ रख कर चलने में नाकाम लालू यादव के कुनबे का क्या होता है, इसका निर्णय संभवतः अब राँची से ही होगा।

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