Thursday, October 1, 2020
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मौत के 16 साल बाद: नरसिम्हा राव के तिरस्कार पर कॉन्ग्रेस को पछतावा या मौकापरस्ती?

असल में यह राव का जन्म शताब्दी वर्ष है। उनकी जयंती पर पिछले महीने कई अखबारों में पूरे पन्ने का विज्ञापन छपा था। इसमें उन्हें 'तेलंगाना का बेटा… भारत का गर्व' बताया गया था। इसी विज्ञापन ने अचानक से राव को राजनीति में फिर से प्रासंगिक बनाते हुए कॉन्ग्रेस को अपने स्टैंड में बदलाव के लिए मजबूर किया।

उन्होंने बेहद मुश्किल वक्त में देश और कॉन्ग्रेस का नेतृत्व सॅंभाला था। वे नेहरू-गॉंधी परिवार के बाहर के पहले शख्स थे, जिसने बतौर प्रधानमंत्री पॉंच साल का कार्यकाल पूरा किया। उस शख्सियत का नाम था पीवी नरसिम्हा राव।

राव को जीते जी सोनिया गॉंधी के इशारे पर पहले कॉन्ग्रेस में अपमानित कर किनारे लगाया गया। मृत्यु हुई तो दिल्ली में उनका अंतिम संस्कार होने नहीं दिया गया। उनके शव को कॉन्ग्रेस कार्यालय में लाने तक की अनुमति नहीं दी गई। दिल्ली में उनका मेमोरियल 2015 में तब बन पाया, जब केंद्र में मोदी के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार चल रही थी।

दिसंबर 2004 में मौत के बाद राव का जब तिरस्कार हुआ तो मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री हुआ करते थे। वित्त मंत्री बनाकर राजनीति में मनमोहन को लाने वाले भी राव थे। लेकिन मनमोहन सिंह ने उनकी अंतिम यात्रा में शामिल होना भी उचित नहीं समझा।

इस घटना के 16 साल बाद जब कॉन्ग्रेस का सूर्य ढलता दिख रहा उसने राव को लेकर यू टर्न मारा है। सोनिया गॉंधी ने पहली बार सार्वजनिक तौर पर उनकी प्रशंसा की है। हैदराबाद में शुक्रवार को कॉन्ग्रेस की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में सोनिया गॉंधी का पत्र पढ़ा गया। इसमें उन्होंने राव को प्रधानमंत्री के रूप में साहसिक फैसलों से देश को नई दिशा देने का श्रेय दिया गया।

सोनिया ने पत्र में लिखा, “राज्य और राष्ट्रीय राजनीति में एक लंबे कैरियर के बाद वह गंभीर आर्थिक संकट के समय भारत के प्रधानमंत्री बने। उनके साहसिक नेतृत्व के माध्यम से हमारा देश कई चुनौतियों को सफलतापूर्वक पार करने में सक्षम हुआ। 24 जुलाई 1991 का केंद्रीय बजट और हमारे देश के आर्थिक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया।”

वहीं पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राव को देश का ‘महान सपूत’ और भारत में आर्थिक सुधारों का जनक बताया है। उन्होंने कहा, “आर्थिक सुधार और उदारीकरण में वाकई उनके सबसे बड़े योगदान हैं। विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदानों को कम करके आँका नहीं जा सकता है।”

भारत में खुली अर्थव्यवस्था का श्रेय राव को देते हुए मनमोहन ने कहा, “यह एक कठिन विकल्प और साहसी फैसला था और यह संभव इसलिए हो सका क्योंकि प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने मुझे चीजों को शुरू करने की आजादी दी, क्योंकि वह उस समय भारत की अर्थव्यवस्था की समस्या को पूरी तरह से समझ रहे थे।”

यहाँ बता दें कि राजीव गॉंधी की हत्या के बाद अचानक राव को जिम्मेदारी सॅंभालनी पड़ी थी। लेकिन कॉन्ग्रेस में सोनिया गाँधी के उदय के साथ ही उनका तिरस्कार शुरू हो गया था, जो उनकी मृत्यु के बाद तक चलता रहा।

23 दिसंबर 2004 को राव की मृत्यु हुई थी और 27 दिसंबर को स्तंभकार एमडी नलपत ने लिखा,”वास्तव में, 1998 में कॉन्ग्रेस की कमान नेहरू वंश के हाथों में दोबारा आने से बाद, AICC के पूर्व अध्यक्ष और प्रधानमंत्री होने के बावजूद, नरसिम्हा राव को कॉन्ग्रेस कार्यसमिति से न केवल बाहर किया गया था, बल्कि उन्हें विशेष आमंत्रित सदस्य की सूची से भी निकाल दिया गया था। उस सूची में केवल वे थे जो आलाकमान की जय-जयकार करते थे।”

नलपत ने दावा किया था कि राव के अंतिम संस्कार के विषय पर चर्चा के लिए दोपहर 3 बजे एक विशेष केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक बुलाने के बावजूद, 9 मोतीलाल नेहरू मार्ग पर उनके शव को लाकर एक मंच पर रखने के लिए कोई व्यवस्था नहीं की गई थी। वहाँ न फूल थे और न शोक सभा में आए लोगों के बैठने के लिए कारपेट। यहाँ तक लॉन के शामियाने में कोई इंतजाम नहीं था।

यह सिलसिला राव के देहांत पर भी खत्म नहीं हुआ था। उनके निधन के बाद भी कॉन्ग्रेस पार्टी ने उनका तिरस्कार करना नहीं बंद किया। वे हमेशा पार्टी के निशाने पर हमेशा रहे। पिछले वर्ष राव के पोते एनवी सुभाष ने इसके लिए पार्टी को आड़े हाथों भी लिया था। लगातार राव पर लगते आरोपों को देखते हुए उन्होंने गाँधी परिवार से उस अन्याय के लिए माफी माँगने को कहा था, जो उन्होंने नरसिम्हा राव के साथ किया।

एन वी सुभाष ने AICC सचिव जी चिन्ना रेड्डी के एक बयान पर कहा था कि राव ने अपने कार्यकाल के दौरान नेहरू-गाँधी परिवार को ‘दरकिनार’ करने की कोशिश की थी, ‘यह सच नहीं है और निंदनीय’ है। उन्होंने दावा किया कि राव, गाँधी परिवार के सबसे भरोसेमंद और वफादार नेता थे और हमेशा कई मुद्दों पर गाँधी परिवार का मार्गदर्शन करते थे।

ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि मौत के 16 साल बाद राव को लेकर कॉन्ग्रेस के स्टैंड में यह​ बदलाव पाश्चाताप है या फिर मौकापरस्ती?

असल में यह राव का जन्म शताब्दी वर्ष है। उनकी जयंती पर पिछले महीने कई अखबारों में पूरे पन्ने का विज्ञापन छपा था। इसमें उन्हें ‘तेलंगाना का बेटा… भारत का गर्व’ बताया गया था। यह विज्ञापन तेलंगाना की सत्ताधारी पार्टी टीआरएस की तरफ से प्रकाशित किए गए थे। इसी विज्ञापन ने अचानक से राव को राजनीति में फिर से प्रासंगिक बनाते हुए कॉन्ग्रेस को अपने स्टैंड में बदलाव के लिए मजबूर किया।

इस विज्ञापन के बाद कॉन्ग्रेस के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से पोस्ट कर उन्हें दूरदर्शी नेता बताया गया था। राहुल गॉंधी से लेकर मनमोहन सिंह तक सबने उन्हें याद किया। लेकिन सोनिया उस वक्त भी चुप रहीं। अचानक से राव को लेकर सोनिया का मुखर होना कभी मजबूत गढ़ रहे दक्षिण भारत में जमीन तलाशने की कॉन्ग्रेसी रणनीति का हिस्सा है।

कॉन्ग्रेस कर्नाटक की सत्ता बीजेपी के हाथों गॅंवा चुकी है। तेलंगाना में टीआरएस ने उसकी जगह ले ली है। आंध्र प्रदेश से उसे उस जगन मोहन रेड्डी ने उखाड़ फेंका है, जिसे कभी उसने पार्टी से बाहर कर दिया था। तमिलनाडु में उसकी उम्मीदें डीएमके पर टिकी है। बीते साल आम चुनावों में भी इन राज्यों में उसका प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा था। ऐसे में यह करनी पर पछतावे से ज्यादा राव की विरासत पर दावा कर कम से कम तेलंगाना में पैठ बनाने की कवायद दिखती है।

शायद कॉन्ग्रेस के लिए अब इस मोर्चे पर देर हो चुकी है। राव के लिए भारत रत्नी की मॉंग और जन्म शताब्दी के मौके पर साल भर के कार्यक्रम का ऐलान कर इस विरासत पर टीआरएस पहले ही दावा ठोक चुकी है।

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