अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील दौरे पर चीन की राजधानी बीजिंग पहुँचे थे। यह दौरा 2 दिन का था। इस ऐतिहासिक शिखर सम्मेलन में ट्रंप के साथ अमेरिका के सबसे बड़े बिजनेस लीडर्स और शीर्ष अधिकारी मौजूद थे। लेकिन कैमरे के सामने दिखने वाली दोस्ती के पर्दे के पीछे एक डिजिटल जंग चल रही थी।
चीन दौरे पर जासूसी और हैकिंग का बहुत बड़ा डर देखने को मिला। इसी डर की वजह से अमेरिकी टीम के लिए एक सख्त ‘डिजिटल लॉकडाउन’ लागू कर दिया था। चीन से वापस लौटते समय अमेरिकी अधिकारियों और पत्रकारों को मिले सभी तोहफे, बैज और पिन विमान पर चढ़ने से पहले ही एयरपोर्ट पर एक कचरे के डिब्बे में फेंकने पड़े।
इसके अलावा, अमेरिकी टीम का कोई भी सदस्य अपना पर्सनल मोबाइल या लैपटॉप चीन लेकर ही नहीं गया था। वहाँ बातचीत के लिए सिर्फ कुछ समय वाले अस्थाई ‘बर्नर फोन’ इस्तेमाल किए गए थे, जिन्हें बाद में पूरी तरह नष्ट करने का आदेश दिया गया। साफ-साफ कहें तो अमेरिका को डर था कि चीन इन गिफ्ट्स और फोन के जरिए उनकी खुफिया बातें सुन सकता है या उनका डेटा चोरी कर सकता है।
🚨 THE US DELEGATION JUST THREW EVERY CHINESE GIFT INTO A TRASH BIN AT THE FOOT OF AIR FORCE ONE. BEFORE BOARDING. IN FULL VIEW OF CAMERAS.
— 🇺🇸 Thomas A. Whitaker (@WhitakerTA_) May 15, 2026
The last time a US president's team performed a visible public discard of host-country materials on a tarmac during a major summit, it made… pic.twitter.com/LCmHqJ01DG
एयरपोर्ट पर सीढ़ियों के पास रखा गया डस्टबिन, ‘नो चाइना आइटम’ रूल
विमान पर चढ़ने से पहले सभी अमेरिकी अधिकारियों और पत्रकारों को साफ कह दिया गया था कि वे चीन से मिला कोई भी सामान प्लेन के अंदर नहीं ले जा सकते। सुरक्षा नियमों के कारण पूरी टीम को चीन की तरफ से मिले तोहफे, पास और कोट पर लगाने वाले सरकारी पिन वहीं रखे एक डिब्बे में फेंकने पड़े।
चीन में कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, एप्पल के मालिक टिम कुक और एनवीडिया के प्रमुख जेन्सेन हुआंग जैसे बड़े दिग्गज ये पिन लगाए हुए दिखे थे, लेकिन जासूसी के डर से बाद में इन सभी चीजों को कूड़ेदान में डाल दिया गया।
पर्सनल फोन-लैपटॉप घर छोड़े, सिर्फ ‘बर्नर फोन’ का हुआ इस्तेमाल
साइबर एक्सपर्ट्स का कहना है कि चीन में मोबाइल और लैपटॉप से डेटा चोरी करना या उनमें वायरस डालना बहुत आसान है। वहाँ फोन बंद होने पर भी हैक किया जा सकता है। इसी बड़ी खतरे से बचने के लिए अमेरिकी टीम अपने असली फोन और लैपटॉप घर पर ही छोड़ गई थी।
चीन में काम चलाने के लिए उन्होंने सिर्फ कुछ दिनों के लिए अस्थाई ‘बर्नर फोन’ का इस्तेमाल किया था। बाद में इन फोन्स को भी पूरी तरह नष्ट करने का आदेश दिया गया ताकि चीन भविष्य में भी उनकी बातें न सुन सके और जासूसी का कोई खतरा न रहे।
चीन में हर चीज पर नजर, होटल के Wi-Fi और चार्जर से भी दूरी
अमेरिका के सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि चीन एक ‘मास सर्विलांस स्टेट’ है यानी वहाँ हर एक गतिविधि पर सरकार की नजर रहती है। सुरक्षा अधिकारियों ने डेलिगेशन को साफ चेतावनी दी थी कि चीन में कोई भी इलेक्ट्रॉनिक बातचीत सुरक्षित नहीं है। अधिकारियों को होटल के वाई-फाई नेटवर्क से कनेक्ट करने या किसी भी सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशन का इस्तेमाल करने से मना किया गया था।
ऐसा ‘जूस जैकिंग’ के खतरे को देखते हुए किया गया, जिसमें चार्जिंग पोर्ट के जरिए फोन का डेटा चोरी कर लिया जाता है। अमेरिकी दल केवल अमेरिका से साथ लाए गए सरकारी प्रमाणित चार्जर और पावर बैंक का ही इस्तेमाल कर रहा था। इस डिजिटल लॉकडाउन के कारण अधिकारियों के रोजमर्रा के काम भी प्रभावित हुए क्योंकि वे क्लाउड स्टोरेज या अपने निजी अकाउंट्स का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे थे। कई बेहद संवेदनशील संदेशों को डिजिटल रूप से भेजने के बजाय अधिकारियों ने आपस में आमने-सामने (इन-पर्सन) बात करके साझा किया।
बंद दरवाजों के पीछे तीखी बहस और सुरक्षा पर टकराव
बाहर से देखने पर भले ही ट्रंप और जिनपिंग की मुलाकात बहुत अच्छी लग रही थी, लेकिन दोनों देशों के सुरक्षा अधिकारियों के बीच अंदर ही अंदर भारी तनाव चल रहा था। जब वे बीजिंग के मशहूर ‘टेंपल ऑफ हीवन’ देखने गए, तो चीनी अधिकारियों ने अमेरिका के एक सुरक्षा एजेंट को अंदर जाने से रोक दिया क्योंकि उसके पास नियम के मुताबिक हथियार था।
इस बात पर दोनों पक्षों में करीब डेढ़ घंटे तक तीखी बहस हुई, जिससे वहाँ मौजूद मीडिया का काम भी देर से शुरू हुआ। यही नहीं, जब ट्रंप वापस लौटने लगे तब भी चीनी सुरक्षाकर्मियों ने अमेरिकी पत्रकारों की गाड़ियों को राष्ट्रपति के काफिले में शामिल होने से रोक दिया था, जिसके बाद अमेरिकी अफसरों को बीच-बचाव करके रास्ता साफ कराना पड़ा।
‘हम भी उन पर जमकर जासूसी करते हैं’- ट्रंप का बयान
चीन से वापसी के दौरान जब एयर फोर्स वन विमान हवा में था, तब पत्रकारों ने डोनाल्ड ट्रंप से पूछा कि क्या उन्होंने शी जिनपिंग के सामने साइबर हमलों का मुद्दा उठाया था? इस पर ट्रंप ने स्वीकार किया कि दोनों देश एक-दूसरे के खिलाफ जासूसी अभियानों में लगे हुए हैं। ट्रंप ने संवाददाताओं से कहा, “शी जिनपिंग ने उन साइबर हमलों के बारे में बात की जो हमने चीन में किए थे। जो वे करते हैं, वही हम भी करते हैं। हम भी उन पर जमकर जासूसी करते हैं।”
ट्रंप ने आगे दावा किया कि उन्होंने शी जिनपिंग से आमने-सामने कहा, “हम आपके खिलाफ ऐसी बहुत सी चीजें करते हैं जिनके बारे में आपको भनक तक नहीं है।” हालाँकि, अमेरिकी खुफिया एजेंसियाँ चीन के ‘वोल्ट टाइफून’ और ‘साल्ट टाइफून’ जैसे हैकिंग समूहों पर अमेरिकी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाने का आरोप लगाती रही हैं, जबकि चीन ने हमेशा इन दावों को खारिज करते हुए कहा है कि वह कानूनन डेटा प्राइवेसी का सम्मान करता है।


