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दो दशक बाद लाहौर में लौटा ‘बसंत’ लेकिन अपने गढ़े इतिहास के साथ, हिंदू संस्कृति को नकार खुसरो से जोड़ा नाता: जानिए क्यों लग रहे हैं पाकिस्तान पर ‘कल्चर चोरी’ के आरोप

लाहौर में पतंगबाजी लौट आया है, लेकिन पाकिस्तान में बसंत की हिंदू जड़ों को मानने में हिचकिचाहट है। यही वजह है कि इस्लाम के पहले के अतीत में मनाई जाने वाली बसंतोत्सव को सूफी अमीर खुसरो से जोड़ा जा रहा है, लेकिन बसंत को इस्लामी मान्यता की जरूरत नहीं है।

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में दो दशक बाद आधिकारिक तौर पर बसंत उत्सव मनाया गया। लाहौर का आसमान एक बार फिर रंग-बिरंगी पतंगों से पट गया। 6 से 8 फरवरी 2026 तक शहर में जमकर पतंगबाजी हुई। पंजाब की मुख्यमंत्री मरियम नवाज ने खुद इसे प्रमोट किया है। इस दौरान सोशल मीडिया पर भारतीयों ने सवाल किए कि पाकिस्तान बसंत पंचमी त्योहार के नाम पर केवल पतंगबाजी करके कल्चर चोरी करने की कोशिश कर रहा है।

पाकिस्तान ने इसे ‘पंजाबी कल्चरल फेस्टिवल’ कहने की पूरी कोशिश की। इस दौरान निगरानी के लिए ड्रोन तैनात किए गए, QR-कोड वाली पतंगों की बिक्री हुई लेकिन पतंगों के आसमान में लौटने के बावजूद कई कमियाँ दिखी। सोशल मीडिया X पर कई यूजर्स ने कहा कि पाकिस्तान में मनाया जाने वाला बसंत भारत की बसंत पंचमी से बिल्कुल अलग है। यूजर्स ने दावा किया कि इसे लाहौर में अमीर खुसरो ने पतंग उड़ाने वाले बसंत के रिवाज के तौर पर शुरू किया था, जिसका हिंदू परंपरा या भारतीय सभ्यता से कोई लेना-देना नहीं है।

भारत में पतंग उड़ाने और बसंतोत्सव का इतिहास रहा है। लेकिन आमिर खुसरो की कहानी सदियों पुरानी सभ्यता की निरंतरता को एक सूफी कहानी तक सीमित कर देता है। जानबूझकर सांस्कृतिक भागीदारी और सांस्कृतिक शुरुआत के बीच की लाइन को धुँधला कर देता है। यह एक तरह से सांस्कृतिक चोरी है। त्योहार, उत्सव और उसकी परंपराएँ स्थानीय पहचान को बतलाती हैं।

इस्लाम और खुसरो से पहले बसंत की हुई शुरुआत

बसंत कोई ऐसा ‘मौसमी त्योहार’ नहीं है, जो पंजाब में मनाने की परंपरा हो। यह वसंत (बसंत) मनाने का एक आम तरीका है, जो भारतीय संस्कृति से जुड़ा है। यह इस्लाम के आने से पहले से ही मनाया जाता रहा है। परंपरागत संस्कृत साहित्य, मंदिर कैलेंडर और इलाके की लोक परंपराएँ, सभी बसंत को खेत और फसलों से जोड़ती है। बसंत का खास रंग पीला, कोई सजावटी इत्तेफाक नहीं है। यह पकते हुए सरसों के खेतों, बदलते खेती के चक्र और पूरे उत्तर भारत की उपजाऊ शक्ति को दिखाता है।

ये निशानियाँ लोकल संस्कृति में किसी भी सूफी जुड़ाव से सदियों पहले से मौजूद थीं। जब तक पंजाब और दिल्ली में मुस्लिम राज आया, बसंत पहले से ही एक सामाजिक सच्चाई बन चुका था। प्रकृति से जुड़ा यह पर्व खुद में एक परंपरा थी।

इसके बाद जो हुआ वह कोई नई खोज नहीं बल्कि बदलाव था। यह फर्क बहुत जरूरी है। जब मुस्लिम हमलावरों, अमीर लोगों या आम लोगों ने बसंत में हिस्सा लिया, तो वे पहले से ही बनी बनाई परंपरा का पालन कर रहे थे। इसलिए इनके आने से त्योहार में शुरुआत में कोई बदलाव नहीं आया। ये फसल चक्र से जुड़ा था इसलिए इसे कोई बदल भी नहीं सकता था।

अमीर खुसरो के साथ बसंत का संबंध अलग तरह का

बसंत के साथ अमीर खुसरो का रिश्ता समझ में आता है। ऐतिहासिक तौर पर खुसरो ने बसंत मनाने को शुरुआत लाहौर में नहीं बल्कि दिल्ली की निजामुद्दीन दरगाह में की थी। इसे किसी त्योहार से नहीं बल्कि एक घटना से जोड़ते हैं। कहा जाता है कि अपने जवान भतीजे की मौत के बाद हजरत निजामुद्दीन औलिया दुख में डूब गए थे। उस वक्त अमीर खुसरो भी थे, जिनकी शायरी में फारसी दरबारी कल्चर और लोकल बोलचाल दोनों था।

परंपरा के अनुसार, खुसरो को पीले कपड़े पहने और फूल लिए हिंदू महिलाओं का एक ग्रुप मिला, जो बसंत मनाने के लिए कालकाजी मंदिर जा रही थीं। खुसरो ने पीले रंग की पोशाक धारण की और दरगाह वापस आ आए। उन्हें देख कर उनके गुरु का दुख कुछ देर के लिए कम हो गया। इस घटना की याद में निजामुद्दीन दरगाह में बसंत का त्योहार आज भी रस्म के तौर पर मनाया जाता है।

दिल्ली में एक खास सूफी दरगाह पर बसंत मनाने की परंपरा का न तो बसंत के महत्व से कोई लेना देना है और न ही बसंतोत्व से। इससे ये दावा भी गलत साबित होता है कि खुसरो ने बसंत को एक मुस्लिम त्योहार के तौर पर ‘शुरू’ किया।

लाहौर में पतंग उड़ाने की परंपरा दिल्ली के बाद हुई। आज का कोई भी फारसी इतिहास या ऐतिहासिक ब्यौरा ऐसा दावा नहीं करता कि दिल्ली से पहले लाहौर में पतंगबाजी हुई। आज जो समझाने की कोशिश की जा रही है, वह इतिहास नहीं है, बल्कि मनगढ़ंत कहानियाँ है।

इस्लाम से पहले शुरू हुई बसंत पंचमी उत्सव

पाकिस्तान का इस्लाम से पहले के इतिहास के साथ रिश्ता हमेशा से अजीब रहा है। हिंदू मंदिरों को खत्म कर इतिहास बदलने की कोशिश की गई। किताबों में भारतीय इतिहास को नजरअंदाज किया गया। लेकिन बसंतोत्सव पंजाब के सामाजिक जीवन में इतनी गहराई से जुड़ा हुआ है कि इसे पूरी तरह से खत्म नहीं किया जा सकता।

इसका एकमात्र उपाय यह रहा है कि त्योहार को बनाए रखा जाए और इसकी शुरुआत को अपने तरीके से बताया जाए। बसंत को भारतीय त्योहार के बजाय ‘पंजाबी’ त्योहार, हिंदू त्योहार के बजाय मुस्लिम कल्चरल रिवाज और इस्लाम से पहले की परंपरा के बजाय खुसरो की परंपरा बताना, इसे नए तरीके से परिभाषित करना ही है। बिना भारतीय सभ्यता की विरासत को अपनाए पाकिस्तान को इस त्योहार को मनाने का मौका मिलता रहा है।

यही कल्चरल चोरी का मतलब है, रिवाज को बनाए रखना, सोर्स को मिटा देना।

नहीं मिटा सकते विरासत को

पाकिस्तान में पंजाबियों का बसंत मनाना नकल नहीं है। आखिर, कल्चर बॉर्डर की सीमा से बाहर है। लेकिन किसी त्योहार को उसकी शुरुआत को नकारते हुए मनाना बेईमानी है। बसंत को इस्लामिक पहचान की जरूरत नहीं है। अमीर खुसरो को सभ्यता और परंपरा का निर्माता बनाने की जरूरत नहीं है। और पंजाबी कल्चर को मनाने के लिए इतिहास को भूलने की जरूरत भी नहीं है।

आप पतंग उड़ा सकते हैं। आप शहर को पीला रंग सकते हैं, लेकिन आप उस डोर को नहीं काट सकते जो बसंत को उसकी भारतीय, हिंदू, सभ्यता की जड़ों से जोड़ती है, चाहे कहानी कितनी भी बार लिखी जाए।

(मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है, इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

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Dhruv Mishra
Dhruv Mishra
Dhruv Mishra is a researcher and writer specializing in Indian politics and policy analysis. With a background in data-driven storytelling, he explores elections, governance, and India’s role in global affairs.

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