Thursday, April 2, 2026
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शेख हसीना पर किया हमला, मनी लॉन्ड्रिंग केसों में फरार: जानिए कौन है 17 साल बाद बांग्लादेश लौटा तारिक रहमान, कट्टरपंथ से है कट्टर रिश्ता

2001-2006 के बीच बीएनपी सत्ता में थी। उस वक्त भारत विरोधी गतिविधियों को बांग्लादेश में अंजाम दिया गया। आतंकवादियों को पनाह देने की वजह से भारत-बांग्लादेश के रिश्तों में खटास आई थी। दरअसल 2004 में जो 10 ट्रक चटगाँव में मिले थे। उनमें हथियार भरे हुए थे।

कट्टरपंथी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के 60 साल के कार्यकारी चेयरमैन तारिक रहमान की वतन वापसी हुई है। रहमान को इस्लामी ग्रुप जमात-ए-इस्लामी का समर्थन मिल रहा है। देश में फरवरी 2026 के चुनाव में बीएनपी उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ने जा रही है। इसको देखते हुए 25 दिसंबर 2025 को वे ढाका पहुँच गए हैं। वह लगभग 17 साल तक लंदन में अपनी इच्छा से ‘निर्वासन’ की जिंदगी जीते रहे हैं।

तारिक रहमान बांग्लादेश एयरलाइंस की फ्लाइट BG-202 से हीथ्रो एयरपोर्ट से बांग्लादेश पहुँचे। उनकी पत्नी डॉ. जुबैदा रहमान और बेटी जैमा रहमान भी उनके साथ थी। उनके स्वागत के लिए बड़ी संख्या में समर्थक एयरपोर्ट पर मौजूद थे। हालाँकि तारिक ने 16 दिसंबर को लंदन में विक्ट्री डे इवेंट में लोगों से आग्रह किया था कि वे एयरपोर्ट पर न आएँ। उन्होंने कहा था कि जो लोग इस रिक्वेस्ट का सम्मान करेंगे, वे पार्टी और देश का सम्मान करेंगे।”

बांग्लादेश की राजनीति का ‘क्राउन प्रिंस’

तारिक देश के आर्मी कमांडर और पूर्व राष्ट्रपति जियाउर रहमान और पूर्व प्राइम मिनिस्टर खालिदा ज़िया के सबसे बड़े बेटे हैं। खालिदा तीन बार प्रधानमंत्री बनीं और फिलहाल BNP की चेयरमैन हैं। तारिक को बांग्लादेशी पॉलिटिक्स का ‘क्राउन प्रिंस’ कहा जाता है।

तारिक का जन्म 20 नवंबर 1967 को हुआ था। उस वक्त बांग्लादेश पूर्वी पाकिस्तान के नाम से जाना जाता था। 1971 की आज़ादी की लड़ाई के दौरान उन्हें बचपन में कुछ समय के लिए जेल में रखा गया था। BNP अक्सर उनकी तारीफ में बचपन में जेल जाने पर जोर देती है। उन्हें ‘सबसे कम उम्र के युद्धबंदियों में से एक’ कहती है।

उनके पिता जियाउर रहमान 1975 में बांग्लादेश में हुए तख्तापलट के बाद सत्ता में आए। उस वक्त वे सेना प्रमुख थे। उन्होंने शेख हसीना के पिता और राष्ट्रपिता शेख मुजीबुर रहमान की तख्तापलट की थी। इस दौरान उनकी हत्या की गई थी। इस हत्या ने जिया और शेख हसीना के बीच दशकों से चली आ रही दुश्मनी को जन्म दिया। इस दुश्मनी को ‘बैटल ऑफ द बेगम्स’ भी कहा जाता है।

जिया उर रहमान 1977 से 1981 तक राष्ट्रपति रहे। उन्होंने बीएनपी की स्थापना की थी। 1981 में चटगाँव के एक सैन्य विद्रोह के दौरान उनकी हत्या कर दी गई।

तारिक 15 साल के थे जब जियाउर रहमान की हत्या हुई थी। 1980 के दशक में BAF शाहीन कॉलेज से अपनी अंडरग्रेजुएट पढ़ाई पूरी करने के बाद ढाका यूनिवर्सिटी के उन्होंने इंटरनेशनल रिलेशंस डिपार्टमेंट में एडमिशन लिया। फिर वह 23 साल की उम्र में BNP में शामिल हो गए। उन्होंने हुसैन मुहम्मद इरशाद के मिलिट्री शासन के खिलाफ प्रदर्शनों में हिस्सा लिया। हालाँकि उनका करियर काफी विवादों में रहा और कई गंभीर आरोप भी लगे।

2006 के यूनाइटेड स्टेट्स एम्बेसी केबल के मुताबिक, तारिक को BNP का ‘उत्तराधिकारी’ कहा गया था, जिससे पार्टी का ही एक धड़ा सहमत नहीं था। क्योंकि तारिक रहमान को ‘बहुत ज्यादा भ्रष्ट’ और ‘पीछे से सरकार चलाने वाला’ कहा जाता था। देश में हुए हिंसक वारदातों में भी उसका नाम आया।

1991 के नेशनल इलेक्शन कैंपेन में तारिक ने माँ खालिदा जिया के लिए काफी मेहनत की और जीत में अहम भूमिका निभाई थी। शेख हसीना के शासनकाल में 1996 से 2001 तक अवामी लीग के शासन के दौरान दबे-कुचले लोगों को न्याय दिलाने के बहाने सरकार के खिलाफ़ कई रैलियाँ कीं।

खुद से ‘देश निकाला देने वाला’ राजनीतिक वारिस

तारिक BNP के कार्यकारी चेयरपर्सन हैं। 2000 के दशक की शुरुआत से ही उन्हें अपनी मां का राजनीतिक वारिस माना जाता है। हालाँकि बांग्लादेश के राजनीतिक उथल-पुथल की वजह से उनका करियर बिखर गया था। 2007 में भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें 18 महीने जेल में रहना पड़ा। BNP नेता को 3 सितंबर 2008 को जमानत मिली, जिसके बाद वह तुरंत इलाज के लिए UK चले गए और तब से अपने परिवार के साथ वहीं रह रहे हैं। उन्हें कई मामलों में दोषी माना गया।

मनी लॉन्ड्रिंग से लेकर शेख हसीना की रैली में ग्रेनेड फेंकने का आरोप

2016 में बांग्लादेश के हाई कोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग के लिए उन पर 200 मिलियन टका यानी 14.50 करोड़ से ज्यादा का जुर्माना लगाया गया और 7 साल जेल की सजा हुई। इस फ़ैसले ने ढाका कोर्ट के 2013 के उस फ़ैसले को पलट दिया, जिसमें तारिक को बरी कर दिया गया था। उन पर आरोप था कि सिंगापुर में उन्होंने और उनके एक साथी ने 2003 और 2007 के बीच $2.5 मिलियन यानी करीब 20 करोड़ रुपए से ज्यादा का गबन किया था।

एंटी-करप्शन कमीशन ने उनके और उनके करीबी दोस्त गियासुद्दीन अल मामून के ख़िलाफ़ 12 शिकायतें दर्ज की थीं। ढाका की एक स्पेशल कोर्ट ने 10 अक्टूबर 2018 को उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी। कोर्ट ने उन्हें 21 अगस्त 2004 को ढाका में हुए एक ग्रेनेड धमाके के सिलसिले में मर्डर और क्रिमिनल कॉन्सपिरेसी के कई आरोपों में दोषी पाया था, इसमें 24 लोग मारे गए थे और शेख हसीना घायल हो गई थीं। यह हमला उस समय हुआ जब खालिदा जिया देश की प्रधानमंत्री थीं।

दिलचस्प बात यह है कि बांग्लादेश सुप्रीम कोर्ट के अपील डिवीज़न ने पिछले साल 5 अगस्त को हसीना सरकार गिरने के एक महीने से भी कम समय में तारिक और दूसरों को इस मामले में बरी करने वाले हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराया।

हिंदुओं से नफ़रत और भारत में आतंकियों को हथियार सप्लाई में भूमिका

लंदन में रहते हुए तारिक रहमान ने सोशल मीडिया और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए BNP के कामकाज में बतौर कार्यकारी चेयरपर्सन, अहम भूमिका निभाते रहे हैं।

BNP के इस वारिस ने अपनी राजनीति कार्यकलाओं में हिंदूफोबिया दिखाया है और पवित्र ग्रंथों का अपमान किया है। उन्होंने 2023 में एक फेसबुक लाइव में कहा, “हिंदू धर्म के ग्रंथ कोई नैतिक शिक्षा नहीं देते… सभी धार्मिक ग्रंथ अश्लील हैं।” तारिक के गोनो अधिकार परिषद के संयोजक नूरुल हक नूर के साथ अच्छे रिश्ते थे। नुरुल हर हाल में शेख हसीना को हटाना चाहते थे।

नूर ने सऊदी अरब से एक Facebook Live में कहा था, “हाँ, मैंने मोसाद समेत विदेशी इंटेलिजेंस एजेंसियों के साथ मिलकर साज़िश की है। सरकार को हटाने की अपनी कोशिश में, मैंने मोसाद के एजेंट मेंडी एन सफादी के साथ मीटिंग की, ताकि इस सरकार को हटाने की साजिश रची जा सके।” शेख हसीना की सरकार के खिलाफ षड़यंत्र करने और अमेरिका की भूमिका पर अक्सर सवाल उठते हैं।

भारत की डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी (DIA) के रिटायर्ड डिप्टी डायरेक्टर जनरल मेजर जनरल गगनजीत सिंह ने खुलासा किया कि अप्रैल 2004 में चटगाँव में हथियारों से भरे दस ट्रक ज़ब्त किए गए। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) और जमात गठबंधन भारत में मिलिटेंट ग्रुप्स की इन हथियारों से मदद कर रहे थे।

ढाका जेल में बंद ULFA लीडर अनूप चेतिया उर्फ़ गोलाप बरुआ ने खुलासा किया कि यह भारी गोला-बारूद बैन यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ़ असम (ULFA) और उत्तर-पूर्वी भारत में इसी तरह के दूसरे संगठनों के लिए देश को अस्थिर करने के लिए था।

इंडिया टुडे से बात करते हुए सिंह ने कहा कि चेतिया ‘डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ़ फोर्सेज़ इंटेलिजेंस’ (DGFI) और कुछ नेशनल सिक्योरिटी इंटेलिजेंस (NSI) अधिकारियों के साथ मिलकर काम कर रहा था। चेतिया के तारिक रहमान (BNP के मौजूदा एक्टिंग चेयरमैन) और उनके साथियों के साथ करीबी रिश्ते थे।

2001-2006 के बीच बीएनपी सत्ता में थी। उस वक्त भारत विरोधी गतिविधियों को बांग्लादेश में अंजाम दिया गया। आतंकवादियों को पनाह देने की वजह से भारत-बांग्लादेश के रिश्तों में खटास आई थी। दरअसल 2004 में जो 10 ट्रक चटगाँव में मिले थे। उनमें हथियार भरे हुए थे।

BNP-जमात गठबंधन सरकार (2001–2006) के दौरान हवा भवन (BNP का पॉलिटिकल ऑफिस) आतंकियों की मदद के लिे सबसे सुरक्षित, ताकतवर और दूसरे पावरहाउस के तौर पर जाना जाता था। तारिक ने अपने बहुत ध्यान से चुने हुए ‘धोखेबाज़’ भरोसेमंद लोगों के ग्रुप के साथ मिलकर कई गलत योजनाओं को अंजाम दिया, जिसमें उस समय विपक्ष की नेता शेख हसीना पर ग्रेनेड हमला भी शामिल था।

इसके अलावा लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादियों की मदद करने और उन्हें हथियारों की खेप पहुँचाने के लिए पाकिस्तानी आईएसआई के साथ मिलकर काम किया था। प्लानिंग स्टेज की मीटिंग्स में भी बीएनपी नेता मौजूद थे।

भारत समेत पूरी दुनिया की नजर

अशांति के बीच 17 साल बाद तारिक रहमान की वापसी से बांग्लादेश की पॉलिटिक्स में बड़े बदलाव की झलक दिख रही है। भारत समेत पूरी दुनिया देख रही है कि इलेक्शन के बाद बांग्लादेश की फॉरेन पॉलिसी में कितना बदलाव हो सकता है। उस्मान हादी की मौत के बाद बांग्लादेश में राजनीति हालात काफी खराब हैं। हादी के परिवार और समर्थकों ने भी उसकी मौत के लिए यूनुस प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया है।

कई पॉलिटिकल एनालिस्ट्स के मुताबिक, अगले साल बांग्लादेश इलेक्शन में BNP की वापसी लगभग तय है। अगर BNP जीतती है तो तारिक रहमान प्राइम मिनिस्टर होंगे। हालाँकि, राजनीतिक, आर्थिक और संस्थागत तनावों के बीच बांग्लादेश को आगे ले जाने में उन्हें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा।

तारिक रहमान की वतन वापसी को देखते हुए बांग्लादेश में काफी हलचल है। अपने तीन दिवसीय कार्यक्रम में तारिक अपनी बीमार माँ और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया से मिलने जाएँगे। इसके अलावा उस्मान हादी की कब्र पर भी जा सकते हैं। इसलिए राजनीतिक विश्लेषक तारिक रहमान की इस वापसी को चुनावी रणनीति के तौर पर भी देख रहे हैं।

(मूल रूप से ये लेख अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

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Rukma Rathore
Rukma Rathore
Accidental journalist who is still trying to learn the tricks of the trade. Nearing three years in the profession.

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