भारत में कई वर्षों से एक राजनीतिक बहस चलती रही है। जब भी पीएम मोदी किसी विदेशी दौरे पर जाते हैं, तो विपक्ष और कुछ आलोचक सवाल उठाते हैं कि क्या इन यात्राओं से वास्तव में कोई फायदा होता है? कई बार इन्हें ‘इवेंट डिप्लोमेसी’ कहकर भी निशाना बनाया गया। लेकिन मिडिल ईस्ट में बढ़ते युद्ध और तनाव के बीच जिस तरह अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ और कूटनीतिक हलकों में मोदी का नाम मध्यस्थ के रूप में सामने आ रहा है, उसने इस बहस को नया मोड़ दे दिया है।
अमेरिका और अरब देशों के विशेषज्ञ अब खुलकर कह रहे हैं कि यदि मिडिल ईस्ट में बढ़ते संघर्ष को रोकना है, तो उन नेताओं में से एक व्यक्ति जो सभी पक्षों से बात कर सकता है, वह भारत के प्रधानमंत्री हैं।
दरअसल, पिछले कुछ दिनों में मिडल ईस्ट में तनाव ने पूरे विश्व को चिंता में डाल दिया है। 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजराइल के संयुक्त हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनी की मौत हो गई। इसके बाद ईरान ने जवाबी हमले किए और क्षेत्रीय सुरक्षा पूरी तरह से बिगड़ गई। इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार (12 मार्च 2026) को ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन से टेलीफोन पर बात की। उन्होंने क्षेत्र में बढ़ते तनाव, नागरिकों की मौत और बुनियादी ढाँचे को हुए नुकसान पर गहरी चिंता जताई।
पीएम मोदी ने स्पष्ट कहा कि भारतीय नागरिकों की सुरक्षा, फारस की खाड़ी से सामान और ऊर्जा का निर्बाध प्रवाह भारत की सबसे बड़ी प्राथमिकता है। उन्होंने शांति और स्थिरता के लिए बातचीत और कूटनीति की अपील की।
यह बातचीत कोई सामान्य कॉल नहीं थी। यह उस समय हुई जब ईरान-अमेरिका-इजराइल के बीच युद्ध की आशंका चरम पर है। सोशल मीडिया पर पीएम मोदी ने खुद लिखा, “क्षेत्र में तनाव बढ़ने और नागरिकों की मौत तथा बुनियादी ढाँचे को नुकसान पर गहरी चिंता व्यक्त की। भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और सामान व ऊर्जा के निर्बाध परिवहन को भारत की सर्वोच्च प्राथमिकता बताया।”
इस एक कॉल ने दुनिया को दिखा दिया कि भारत की आवाज अब सिर्फ एशिया की नहीं, बल्कि वैश्विक शांति की भी है। जो लोग सालों से पीएम मोदी की विदेश यात्राओं पर तंज कसते रहे, उन्हें अब जवाब मिल गया है। वे कहते थे कि मोदी विदेश घूमने के शौकीन हैं, टैक्सपेयर का पैसा बर्बाद करते हैं, कुछ हासिल नहीं होता।
इस बीच, यूएई के पूर्व राजदूत हुसैन हसन मिर्जा ने कहा, “पीएम मोदी का एक फोन कॉल ही इस युद्ध को रोक सकता है।” उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी का क्षेत्र में काफी सम्मान है। उनका कहना था कि अगर मोदी किसी भी पक्ष से बात करते हैं तो उसकी गंभीरता होती है और कई बार सिर्फ एक फोन कॉल भी तनाव कम करने में मदद कर सकती है।
मिडिल ईस्ट संकट के बीच कई अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने भी भारत और प्रधानमंत्री मोदी की भूमिका पर ध्यान दिलाया है। अमेरिकी सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी डगलस मैकग्रेगर ने भी कहा, “युद्ध रोकने के लिए मध्यस्थ की जरूरत है और नरेंद्र मोदी सबसे उपयुक्त हैं।”
उन्होंने साफ कहा कि इस युद्ध को रोकने के लिए किसी मजबूत और विश्वसनीय मध्यस्थ की जरूरत है। उनके अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन नेताओं में शामिल हैं जो यह भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने कहा कि पीएम मोदी की खासियत यह है कि वह सभी पक्षों से संवाद कर सकते हैं और उनकी बात को गंभीरता से सुना जाता है।
पीएम मोदी ही क्यों सबसे बेहतर मध्यस्थ?
आज की दुनिया में बहुत कम नेता ऐसे हैं जो युद्ध के दोनों पक्षों से खुलकर बात कर सकें। ईरान-अमेरिका-इजराइल संघर्ष में ऐसा नेता और भी कम है। लेकिन पीएम मोदी उन दुर्लभ नेताओं में से एक हैं जो दोनों पक्षों और पूरे क्षेत्र के प्रमुख देशों से सीधा संवाद रखते हैं। उन्होंने ईरानी राष्ट्रपति से बात की, तो इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से भी बात की। इसके अलावा कतर, सऊदी अरब, कुवैत, जॉर्डन, ओमान और संयुक्त अरब अमीरात के नेताओं से भी संपर्क किया, जिन पर ईरान के जवाबी हमले हुए थे।
यह संतुलित संपर्क भारत की विदेश नीति का नतीजा है। भारत ने कभी क्षेत्र को ब्लॉक या गठबंधन के नजरिए से नहीं देखा। हमने इजराइल के साथ रक्षा साझेदारी मजबूत की, तो ईरान के साथ ऐतिहासिक और ऊर्जा संबंध बनाए रखे। सऊदी अरब, यूएई, कतर और कुवैत जैसे देशों के साथ आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी बढ़ाई। इसी वजह से क्षेत्र के सभी देश भारत को निष्पक्ष और विश्वसनीय समझते हैं। कोई भी पक्ष सोचता नहीं कि भारत किसी का पक्ष ले रहा है। यही वजह है कि अमेरिकी विशेषज्ञ डगलस मैकग्रेगर कह रहे हैं कि मोदी ही एकमात्र ऐसे नेता हैं जो दोनों पक्षों को मेज पर ला सकते हैं।
भारत की बढ़ती भूमिका और स्थिरता की आवाज
भारत की अर्थव्यवस्था और रणनीतिक ताकत तेजी से बढ़ रही है। पश्चिम एशिया में भारत अब सिर्फ तेल खरीदने वाला देश नहीं रहा। हम वहां निवेश कर रहे हैं, बंदरगाह बना रहे हैं, व्यापार बढ़ा रहे हैं। क्षेत्र के नेता भारत को स्थिरता देने वाली शक्ति मानते हैं। इसलिए जब पीएम मोदी क्षेत्र में तनाव कम करने की अपील करते हैं तो उनकी बात का वजन होता है। उन्होंने हर बातचीत में एक ही संदेश दिया कि बढ़ते तनाव से बचो, कूटनीति अपनाओ, मानवीय पहलुओं का ध्यान रखो और बड़े क्षेत्रीय युद्ध को रोको।
रूस-यूक्रेन युद्ध के समय भी पीएम मोदी ने यही रुख अपनाया था। उन्होंने व्लादिमीर पुतिन और वोलोदिमीर जेलेंस्की दोनों से बात की और शांति की अपील की। उस समय भी आलोचक कहते थे कि मोदी कुछ नहीं कर पाएंगे। लेकिन आज मिडल ईस्ट में वही नीति काम आ रही है। भारत की संतुलित नीति ने हमें वह विश्वास दिलाया है जो किसी और देश के पास नहीं है।
विशेषज्ञों ने दे दिया आलोचकों को सीधा जवाब
जो लोग कहते हैं कि पीएम मोदी की विदेश यात्राएं सिर्फ दिखावा हैं, उन्हें अब सोचना चाहिए। बहरहाल, जब यूएई के पूर्व राजदूत हुसैन हसन मिर्जा साफ कहते हैं कि पीएम मोदी का एक फोन कॉल इस मुद्दे को सुलझा सकता है। तो वे जानते हैं कि मोदी गल्फ क्षेत्र में कितने सम्मानित हैं। डगलस मैकग्रेगर ने भी कहा कि मोदी इजराइल से अच्छे संबंध रखते हैं, ईरान से भी और चीन से भी उचित संबंध हैं। यही वजह है कि वे मध्यस्थ बन सकते हैं।
भारत की कूटनीति का नया अध्याय
यह कॉल सिर्फ एक फोन नहीं था। यह भारत की वैश्विक भूमिका का प्रतीक है। जब दुनिया दो धड़ों में बंट रही है, तब भारत संतुलन बना रहा है। पीएम मोदी ने हमेशा कहा है कि युद्ध कोई समाधान नहीं। बातचीत ही रास्ता है। आज जब ईरान के साथ Strait of Hormuz बंद होने का खतरा है और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो रही है, तब भारत की आवाज महत्वपूर्ण हो जाती है।
क्या भारत भविष्य में मध्यस्थ बन सकता है?
यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि भारत आधिकारिक रूप से किसी युद्ध में मध्यस्थ की भूमिका निभाएगा या नहीं। लेकिन इतना स्पष्ट है कि आज दुनिया के कई देश भारत को एक जिम्मेदार और संतुलित शक्ति के रूप में देख रहे हैं। यदि भविष्य में किसी तरह की शांति प्रक्रिया शुरू होती है, तो यह संभव है कि भारत की भूमिका उसमें महत्वपूर्ण हो।
मिडिल ईस्ट का मौजूदा संकट सिर्फ क्षेत्रीय मुद्दा नहीं है बल्कि वैश्विक स्थिरता के लिए भी चुनौती है। ऐसे समय में जिन देशों और नेताओं पर सभी पक्ष भरोसा कर सकें, उनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की राय यह संकेत देती है कि भारत की कूटनीतिक स्थिति पिछले वर्षों में काफी मजबूत हुई है।
वर्षों से बनाए गए संबंध, संतुलित विदेश नीति और सभी पक्षों से संवाद की क्षमता ने भारत को एक ऐसी स्थिति में ला खड़ा किया है जहाँ उसकी आवाज को गंभीरता से सुना जा रहा है। इसलिए जब आज कुछ विशेषज्ञ यह कहते हैं कि मिडिल ईस्ट में शांति की कोशिशों में मोदी की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है, तो यह सिर्फ एक राजनीतिक बयान नहीं बल्कि भारत की बदलती वैश्विक स्थिति का संकेत भी है।


