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ग्लोबल टाइम्स के ‘टैप वॉटर’ से आगे की कहानी: भारत-जापान कैसे बदल रहे हैं एशिया का भविष्य

ग्लोबल टाइम्स का यह हालिया 'पानी विवाद' केवल एक ध्यान भटकाने वाली कोशिश है, जो एशिया की इस बदलती भू-राजनीतिक हकीकत और चीन के गिरते प्रभाव को छिपाने की नाकाम छटपटाहट को प्रदर्शित करता है।

हैदराबाद हाउस की सीढ़ियों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान की प्रधानमंत्री सनाए तकाइची (Sanae Takaichi) की मुलाकात सिर्फ एक औपचारिक कूटनीतिक तस्वीर नहीं थी। जब प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें अपनी ‘छोटी बहन’ कहा, तो यह दोनों देशों के बीच बढ़ते भरोसे और रिश्ते का प्रतीक बन गया। आज भारत और जापान की ‘स्पेशल स्ट्रैटेजिक एंड ग्लोबल पार्टनरशिप’ सिर्फ कागजों तक सीमित ना होकर एशिया की बदलती राजनीति में एक मजबूत साझेदारी के रूप में सामने आ रही है। मगर इस मुलाकात ने बीजिंग के गलियारों में ब्लड प्रेशर की समस्या को और गंभीर कर दिया।

इस मुलाकात ने सबसे ज्यादा बेचैनी चीन में पैदा की। इसकी झलक चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के सरकारी मुखपत्र ‘ग्लोबल टाइम्स’ की रिपोर्टिंग में साफ दिखाई दी। जापान के प्रधानमंत्री के भारत दौरे को ‘नल के पानी’ (Tap Water) जैसे मामूली, हास्यास्पद और बेबुनियाद विवाद से जोड़ने की कोशिश यह बताती है कि चीन का सरकारी मीडिया अब गंभीर पत्रकारिता से ज्यादा सोशल मीडिया ट्रोल की तरह व्यवहार करने लगा है।

ग्लोबल टाइम्स का प्रोपेगैंडा, चीनी पत्रकारिता का ‘डाउनफॉल’

ग्लोबल टाइम्स ने दावा किया कि जापानी प्रतिनिधिमंडल ने भारत में नल का पानी नहीं पिया और कुल्ला करने के लिए भी बोतलबंद पानी का इस्तेमाल किया। लेकिन यह रिपोर्ट एक तथ्य से ज्यादा प्रोपेगैंडा और नैरेटिव बनाने की कोशिश लगती है। ऐसे हिट जॉब का इस्तेमाल चीन का सरकारी मीडिया पहले भी कई बार करता रहा है।

असलियत यह है कि किसी विदेशी प्रतिनिधिमंडल का अपना पानी या विशेष भोजन साथ रखना कोई असामान्य बात नहीं है। यह अक्सर सुरक्षा, स्वास्थ्य और तय प्रोटोकॉल का हिस्सा होता है। इसे किसी देश का अपमान मानना सही नहीं है।

इतिहास भी इसका उदाहरण देता है। साल 1902 में महाराजा सवाई माधो सिंह द्वितीय जब लंदन गए थे, तब वे दो विशाल चाँदी के कलशों में करीब 4,000-4,000 लीटर गंगाजल साथ लेकर गए थे। उन्होंने ऐसा अपनी धार्मिक आस्था के कारण किया था, न कि ब्रिटेन का अपमान करने के लिए। इसे दुनिया ने उनकी सांस्कृतिक निष्ठा के रूप में देखा था।

ऐसे में जापानी प्रतिनिधिमंडल के पानी को लेकर विवाद खड़ा करना एक कमजोर तर्क है। इससे भारत की छवि पर कोई सवाल नहीं उठता, बल्कि यह जरूर दिखता है कि ग्लोबल टाइम्स ने एक सामान्य प्रोटोकॉल को राजनीतिक विवाद में बदलने की कोशिश की।

ग्लोबल टाइम्स ने यह नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की कि जापानी प्रधानमंत्री ने नल का पानी नहीं पीकर भारत का अपमान किया। लेकिन यह दावा न तो पत्रकारिता की कसौटी पर खरा उतरता है और न ही सामान्य समझ पर।

असल में किसी विदेशी प्रतिनिधिमंडल का अपनी सुरक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े तय प्रोटोकॉल का पालन करना दुनिया भर में एक सामान्य बात है। इसे किसी देश के सम्मान या अपमान से जोड़ना तथ्यों से ज्यादा राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने की कोशिश लगता है।

यही वजह है कि ग्लोबल टाइम्स की यह रिपोर्ट पत्रकारिता से अधिक प्रोपेगैंडा प्रतीत होती है। यह चीन की उस साम्यवादी सोच को भी दिखाती है, जिसमें किसी व्यक्ति की पसंद, संस्थागत प्रोटोकॉल या सुरक्षा संबंधी फैसले को भी राजनीतिक संदेश के रूप में पेश करने की कोशिश की जाती है। ऐसी रिपोर्टिंग का उद्देश्य सूचना देना कम और एक खास धारणा बनाना अधिक दिखाई देता है।

चीन की बेचैनी की असली वजह क्या है?

चीन की नाराजगी सिर्फ एक कूटनीतिक मुलाकात की वजह से नहीं है। असली कारण यह है कि भारत और जापान के रिश्ते अब केवल दोस्ती तक सीमित नहीं रहे। दोनों देश रक्षा, तकनीक, अर्थव्यवस्था और इंडो-पैसिफिक की रणनीति में तेजी से साथ काम कर रहे हैं। यही साझेदारी चीन के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है।

रक्षा और रणनीति: चीन की चुनौती बढ़ रही है

भारत और जापान समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में पहले से कहीं ज्यादा करीब आ रहे हैं। दोनों देशों ने भारतीय नौसेना के लिए ‘यूनिकॉर्न’ (UNICORN – Unified Complex Radio Antenna) नेवल रेडियो एंटीना सिस्टम विकसित करने का फैसला किया है। माना जा रहा है कि इससे भारतीय नौसेना की क्षमताएँ और मजबूत होंगी, खासकर स्टील्थ (Stealth) ऑपरेशन में।

इसके साथ ही भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ (Act East) नीति और जापान का ‘फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक’ (FOIP) विजन एक-दूसरे के पूरक बन रहे हैं। इस नीति का उद्देश्य केवल दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों से बेहतर रिश्ते बनाना नहीं, बल्कि भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को एशिया की आर्थिक और रणनीतिक गतिविधियों से जोड़ना भी है। इसी लक्ष्य को आगे बढ़ाने के लिए एक्ट ईस्ट फोरम (Act East Forum – AEF) बनाया गया, जिसके माध्यम से जापान असम, मेघालय और मिजोरम जैसे राज्यों में सड़क, पुल और अन्य कनेक्टिविटी परियोजनाओं में बड़े पैमाने पर निवेश कर रहा है।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण ब्रह्मपुत्र नदी पर बन रहा धुबरी-फुलबारी पुल है। यह इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना पूर्वोत्तर भारत की आर्थिक तस्वीर बदलने वाली पहल मानी जा रही है। इससे लोगों और सामान की आवाजाही तेज होगी, व्यापार बढ़ेगा और पूरे क्षेत्र में निवेश के नए अवसर पैदा होंगे।

लेकिन इसकी अहमियत केवल आर्थिक नहीं है। बेहतर सड़क और कनेक्टिविटी नेटवर्क के जरिए भारत का पूर्वोत्तर सीधे दक्षिण-पूर्व एशिया से जुड़ सकेगा। इससे भारत की एक्ट ईस्ट नीति को नई गति मिलेगी और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उसकी रणनीतिक मौजूदगी भी पहले से अधिक मजबूत होगी।

दोनों देशों का साझा उद्देश्य हिंद-प्रशांत क्षेत्र में नियम-आधारित व्यवस्था को मजबूत करना है। ऐसे माहौल में चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों पर स्वाभाविक रूप से दबाव बढ़ता है।

भारत और जापान की सुरक्षा चिंताएँ अलग-अलग जरूर हैं, लेकिन उनका स्रोत काफी हद तक एक ही है; चीन का लगातार आक्रामक होता रवैया।

भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर चीन की सैन्य गतिविधियाँ और सीमा पर बढ़ता दबाव है। वहीं जापान के लिए पूर्वी चीन सागर में स्थित सेनकाकू द्वीप (Senkaku Islands) की सुरक्षा एक बड़ा रणनीतिक मुद्दा है, जहाँ चीन लगातार अपना दावा और मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश करता रहा है।

यही कारण है कि दोनों देशों के सुरक्षा हित अब एक-दूसरे के पूरक बन गए हैं। भारत और जापान समझते हैं कि हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र में शांति और नियम-आधारित व्यवस्था तभी कायम रह सकती है, जब क्षेत्रीय देशों के बीच मजबूत रणनीतिक सहयोग हो।

इसी सोच के तहत क्वॉड (QUAD) में भारत और जापान की भूमिका लगातार मजबूत हुई है। अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर यह समूह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में मुक्त, सुरक्षित और नियम-आधारित समुद्री व्यवस्था का समर्थन करता है। चीन इसे अपने बढ़ते समुद्री प्रभाव और क्षेत्रीय दावों के लिए एक बड़ी रणनीतिक चुनौती के रूप में देखता है। इसलिए क्वॉड आज केवल एक कूटनीतिक मंच नहीं, बल्कि हिंद-प्रशांत में शक्ति संतुलन बनाए रखने का महत्वपूर्ण सुरक्षा ढाँचा भी बन चुका है।

सेमीकंडक्टर और सप्लाई चेन: चीन की पकड़ कमजोर करने की कोशिश

तकनीक के क्षेत्र में भी भारत और जापान तेजी से सहयोग बढ़ा रहे हैं। दोनों देश सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स और क्रिटिकल मिनरल्स जैसे अहम क्षेत्रों में साथ काम कर रहे हैं ताकि सप्लाई चेन सिर्फ चीन पर निर्भर न रहे

गुजरात के साणंद में रेनेसास इलेक्ट्रॉनिक्स का करीब ₹7,600 करोड़ का सेमीकंडक्टर प्रोजेक्ट और भारत के उत्तर-पूर्व में जापानी निवेश इसी बड़ी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। अगर यह सहयोग सफल होता है, तो वैश्विक कंपनियों के पास चीन के अलावा एक मजबूत विकल्प तैयार हो सकता है।

अर्थव्यवस्था: एशिया का नया शक्ति केंद्र बनने की संभावना

भारत और जापान रुपए (INR) और येन (JPY) में व्यापार बढ़ाने जैसे विकल्पों पर भी चर्चा कर रहे हैं। इसका उद्देश्य आपसी कारोबार को आसान बनाना और आर्थिक सहयोग को मजबूत करना है।

डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए भारत और जापान के बीच रुपया-येन (INR-JPY) में सीधे व्यापार की संभावनाओं पर भी काम किया जा रहा है। यदि यह व्यवस्था मजबूत होती है, तो दोनों देशों को हर लेन-देन के लिए अमेरिकी डॉलर पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

यह कदम सिर्फ व्यापार को आसान बनाने तक सीमित नहीं है। इसका बड़ा रणनीतिक महत्व भी है। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ने से दोनों देशों को विनिमय दर (Exchange Rate) के जोखिम कम करने, लेन-देन की लागत घटाने और अपनी आर्थिक संप्रभुता (Economic Sovereignty) को मजबूत करने में मदद मिल सकती है।

यही कारण है कि रुपया-येन डायरेक्ट ट्रेड को भारत की बढ़ती वैश्विक आर्थिक भूमिका और बदलती अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था में उसकी मजबूत होती स्थिति के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है।

चीन के लिए चिंता की बात यह है कि एक तरफ भारत दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में से एक है, तो दूसरी तरफ जापान उन्नत तकनीक और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग में अग्रणी है। अगर दोनों देशों की ताकत एक साथ आती है, तो एशिया की आर्थिक और रणनीतिक तस्वीर में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

भारत-जापान साझेदारी किन मजबूत स्तंभों पर खड़ी है?

भारत और जापान का रिश्ता अब सिर्फ कूटनीति तक सीमित नहीं है। यह निवेश, तकनीक, ऊर्जा और भविष्य की अर्थव्यवस्था जैसे कई क्षेत्रों में तेजी से आगे बढ़ रहा है। यही वजह है कि इसे दोनों देशों की सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदारियों में गिना जाता है।

  • निवेश और अर्थव्यवस्था: दोनों देशों ने आने वाले वर्षों में आर्थिक सहयोग को नई ऊँचाई पर ले जाने का लक्ष्य रखा है। पहले जहाँ 5 ट्रिलियन जापानी येन के निवेश का लक्ष्य था, वहीं अब अगले दशक के लिए इसे बढ़ाकर 10 ट्रिलियन जापानी येन (करीब 68 अरब डॉलर) तक ले जाने की बात हो रही है। भारत में पहले से 11 जापानी इंडस्ट्रियल टाउनशिप (JIT) काम कर रही हैं। इससे साफ है कि जापानी कंपनियाँ भारत को सिर्फ एक बाजार नहीं, बल्कि लंबे समय के मैन्युफैक्चरिंग और निवेश केंद्र के रूप में देख रही हैं।
  • स्वच्छ ऊर्जा में साझेदारी: ऊर्जा के क्षेत्र में भी दोनों देश मिलकर काम कर रहे हैं। जापान ग्रीन हाइड्रोजन जैसी उन्नत तकनीकों में आगे है, जबकि भारत इस क्षेत्र में अपना राष्ट्रीय मिशन चला रहा है। अगर दोनों देशों का सहयोग इसी तरह बढ़ता रहा, तो स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में एक ऐसा मॉडल तैयार हो सकता है, जो भविष्य में दुनिया के लिए भी अहम साबित हो।
  • तकनीक और डिजिटल भविष्य: समय के साथ तकनीकी और आर्थिक मोर्चे पर भी चीन की एकाधिकारवादी पकड़ कमजोर हो रही है। ऐसे में भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका सॉफ्टवेयर इकोसिस्टम, इंजीनियरिंग प्रतिभा और डिजिटल क्षमता है। वहीं जापान हार्डवेयर, इलेक्ट्रॉनिक्स और हाई-प्रिसिजन मैन्युफैक्चरिंग में दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल है। इन दोनों की ताकत एक साथ आने से एक ‘सॉवरेन एआई नेटवर्क’ (Sovereign AI Network) विकसित करने की संभावना बनती है। इसका मतलब है ऐसा एआई इकोसिस्टम, जो किसी एक विदेशी कंपनी या देश पर निर्भर न हो, बल्कि दोनों देशों की अपनी तकनीक, डेटा और कंप्यूटिंग क्षमता पर आधारित हो।

इसी सहयोग के जरिए भविष्य में ऐसे लार्ज लैंग्वेज मॉडल (Large Language Models – LLMs) विकसित किए जा सकते हैं, जो सिर्फ पश्चिमी डेटा पर निर्भर न हों, बल्कि एशियाई भाषाओं, संस्कृतियों, समाज और स्थानीय जरूरतों को बेहतर ढंग से समझ सकें। इससे भारत और जापान तकनीक के उपभोक्ता भर नहीं रहेंगे, बल्कि AI के वैश्विक विकास में अपनी अलग पहचान भी बना सकेंगे।

इन दोनों क्षमताओं के साथ आने से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), क्वांटम कंप्यूटिंग, 6G और एडवांस टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में बड़े अवसर पैदा हो सकते हैं। यही वजह है कि दोनों देश डिजिटल पार्टनरशिप को भी लगातार मजबूत कर रहे हैं।

हर बड़ी साझेदारी की तरह भारत और जापान के रिश्ते में भी कुछ चुनौतियाँ हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार संतुलन, रूस को लेकर अलग-अलग विदेश नीति के नजरिए और रक्षा तकनीक के ट्रांसफर जैसे मुद्दों पर अभी भी काम होना बाकी है।

इसके बावजूद दोनों देश लगातार ऐसे तंत्र विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं, जिनसे निवेश बढ़े, नई तकनीक साझा हो और उद्योगों के बीच सहयोग आसान बने। यही वजह है कि विशेषज्ञ मानते हैं कि यह साझेदारी आने वाले वर्षों में और मजबूत होगी।

चीन के लिए कड़वी हकीकत

चीन शायद यह समझ नहीं पा रहा कि दुनिया अब एकध्रुवीय (Unipolar) नहीं रही। उसे यह समझ लेना चाहिए कि दुनिया अब मल्टीपोलर (Multipolar) है। भारत अब केवल एक बाजार नहीं रहा गया है; ये एक उभरती हुई बड़ी शक्ति है। ग्लोबल टाइम्स का यह ‘पानी विवाद’ उस छटपटाहट का संकेत है, जिसे चीन अपने गिरते प्रभाव को रोकने के लिए कर रहा है। भारत और जापान आज फ्रेंड-शोरिंग की रणनीति पर तेजी से काम कर रहे हैं। इसका मतलब है कि महत्वपूर्ण उद्योगों, सप्लाई चेन और निवेश को ऐसे भरोसेमंद देशों के बीच विकसित किया जाए, जिनके साथ राजनीतिक स्थिरता, पारदर्शिता और रणनीतिक विश्वास मौजूद हो।

कोविड-19 महामारी और वैश्विक तनावों ने दुनिया को यह सिखाया कि किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता कितना बड़ा जोखिम बन सकती है। इसी अनुभव के बाद भारत और जापान मिलकर ऐसी सप्लाई चेन तैयार कर रहे हैं, जो अधिक सुरक्षित, विविध और संकट के समय भी भरोसेमंद बनी रहे।

जापान की बुलेट ट्रेन की रफ्तार और भारत के बढ़ते आर्थिक कद के सामने चीन का ब्लड प्रेशर स्वाभाविक है। भारत और जापान की यह जोड़ी न केवल चीन के विस्तारवाद एवँ उसकी एकध्रुवीय रणनीतियों को संतुलित करने की क्षमता रखती है, बल्कि भविष्य के वैश्विक एजेंडे को भी निर्धारित करेगी। यह व्यापारिक समझौता तो है ही, साथ ही साथ एशिया की सुरक्षा का नया ‘सुरक्षा कवच’ भी है।

चीन का सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स शायद यह समझ नहीं पा रहा कि एशिया की रणनीतिक तस्वीर तेजी से बदल रही है। भारत आज दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने की दिशा में आगे बढ़ रहा है और इसी के साथ उसकी वैश्विक भूमिका भी लगातार मजबूत हो रही है।

ऐसे समय में जब भारत और जापान रक्षा, अंतरिक्ष और उन्नत तकनीक जैसे क्षेत्रों में अपने सहयोग का दायरा बढ़ा रहे हैं, तो इसका असर पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र पर पड़ना स्वाभाविक है। उदाहरण के लिए, दोनों देश LUPEX (Lunar Polar Exploration Mission) के तहत चंद्रमा के ध्रुवीय क्षेत्रों की संयुक्त खोज के लिए काम कर रहे हैं। वहीं सेमीकंडक्टर, एआई और सप्लाई चेन जैसे क्षेत्रों में भी उनका सहयोग लगातार गहरा हो रहा है।

यही वह बदलाव है जो चीन के लिए चिंता का कारण बनता है। यदि भारत और जापान मिलकर रक्षा, अंतरिक्ष, हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग और सेमीकंडक्टर जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में मजबूत विकल्प खड़े करते हैं, तो कई ऐसे क्षेत्रों में चीन की वर्षों पुरानी बढ़त और प्रभुत्व को चुनौती मिल सकती है।

ऐसे में ‘पानी विवाद’ जैसे मुद्दों को उछालना कई विश्लेषकों को इस बात का संकेत लगता है कि चीन वास्तविक रणनीतिक और आर्थिक बदलावों पर चर्चा करने के बजाय ध्यान भटकाने वाले विवादों को अधिक महत्व दे रहा है।

साथ ही चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) को भी पिछले कुछ वर्षों में कई देशों में कर्ज, परियोजनाओं की व्यवहार्यता और भू-राजनीतिक प्रभाव को लेकर आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है। ऐसे माहौल में भारत-जापान की पारदर्शी, नियम-आधारित और तकनीक-केंद्रित साझेदारी एशिया में एक अलग विकास मॉडल के रूप में उभरती दिखाई दे रही है।

चुनौतियाँ: यथार्थवाद के आईने में

इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत और जापान के रिश्ते दूध-शहद की तरह नहीं हैं। यहाँ पर कुछ व्यावहारिक चुनौतियाँ भी हैं; जैसे कि चीन का बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव आज भी दुनिया के सबसे बड़े वैश्विक इंफ्रास्ट्रक्चर और वित्तीय कार्यक्रमों में से एक है। पूँजी, निवेश और परियोजनाओं की संख्या के मामले में भारत और जापान अभी उसके बराबर नहीं हैं। रक्षा तकनीक के हस्तांतरण में कानूनी पेच हैं, व्यापार घाटा एक चुनौती है, लेकिन दोनों देशों की रणनीति भी BRI की नकल करना नहीं है। भारत और जापान का जोर ऐसे इंफ्रास्ट्रक्चर मॉडल पर है, जो पारदर्शी हो, स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए टिकाऊ हो और देशों को कर्ज के जाल में न फँसाए।

पिछले कुछ वर्षों में BRI की कई परियोजनाओं को अत्यधिक कर्ज, लागत बढ़ने, राजनीतिक विरोध और सीमित आर्थिक लाभ जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। ऐसे में कई विकासशील देश अब सिर्फ बड़ी पूँजी नहीं, बल्कि भरोसेमंद, पारदर्शी और दीर्घकालिक साझेदार भी तलाश रहे हैं।

समय बदल चुका है और चीन को अपनी पुरानी रिवीजनिस्ट (Revisionist) नीतियों को त्यागकर भविष्य के इस नए तालमेल को स्वीकार करना ही होगा। यह सही है कि भारत और जापान की विदेश नीतियाँ पूरी तरह एक जैसी नहीं हैं। जापान की सुरक्षा व्यवस्था लंबे समय से अमेरिका के साथ उसके गठबंधन पर आधारित रही है, जबकि भारत ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) की नीति अपनाता है और किसी एक शक्ति-गुट का हिस्सा बनने से बचता है। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी दोनों देशों के दृष्टिकोण में अंतर देखने को मिला।

लेकिन किसी रणनीतिक साझेदारी की सफलता का पैमाना यह नहीं होता कि दोनों देश हर वैश्विक मुद्दे पर एक जैसी राय रखें। असली कसौटी यह है कि क्या वे अपने साझा हितों पर लगातार साथ काम कर पा रहे हैं। भारत और जापान के मामले में यही तस्वीर दिखाई देती है। चीन की बढ़ती आक्रामकता, हिंद-प्रशांत में मुक्त और नियम-आधारित व्यवस्था, सुरक्षित सप्लाई चेन, सेमीकंडक्टर, उभरती तकनीक और विश्वसनीय आर्थिक साझेदारी जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के हित स्पष्ट रूप से एक-दूसरे से मेल खाते हैं।

यही कारण है कि रूस जैसे कुछ मुद्दों पर मतभेद होने के बावजूद रक्षा सहयोग, क्वाड, सेमीकंडक्टर, एक्ट ईस्ट फोरम, डिजिटल पार्टनरशिप और बुनियादी ढाँचे में दोनों देशों का सहयोग लगातार बढ़ा है। इसलिए यह साझेदारी किसी एक अंतरराष्ट्रीय संकट पर आधारित नहीं है, बल्कि साझा रणनीतिक हितों के कई मजबूत स्तंभों पर खड़ी है। यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।

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आशीष नौटियाल
आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

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