इजरायल के पीएम नेतन्याहू ने सुझाया है कि क्यों न होर्मुज के विकल्प के तौर पर जमीन का रास्ता चुना जाए। उनका कहना है कि सऊदी अरब की जमीन पर पाइपलाइन बिछा कर गैस और तेल को खाड़ी देश लाल सागर तक भेजें, वहाँ से भूमध्यसागर से होते हुए तेल की सप्लाई यूरोप और दुनिया के दूसरे महादेशों तक किया जाए। लेकिन ये समाधान आकर्षक तो है, पर इतना आसान नहीं है।
ईरान युद्ध और होर्मुज स्ट्रेट रूट पर ईरानी कब्जे की वजह से दुनिया के ज्यादातर देश गैस-तेल की संकट का सामना कर रहे हैं। इन देशों को होर्मुज स्ट्रेट से होकर सऊदी अरब, यूएई, कुवैत, ईरान, ओमान आदि देशों से कच्चे तेल-गैस की सप्लाई होती थी। अमेरिका और इजरायल ने जब ईरान पर हमला किया तो ईरान ने सामरिक महत्व के इस रूट को बंद कर दिया है
क्या कहा इजरायल के पीएम बेंजामिन नेतन्याहू ने
इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सोमवार (2 अप्रैल 2026) को कहा कि होर्मुज स्ट्रटे में संकट का हमेशा के लिए समाधान किया जा सकता है। इसके लिए पाइपलाइनों का निर्माण होगा, जो खाड़ी देशों के तेल और गैस को भूमध्य सागर तक ले जाएगी।
अमेरिकी मीडिया आउटलेट Newsmax के साथ एक इंटरव्यू में नेतन्याहू ने समझाया, “दीर्घकालिक समाधानों में ऊर्जा पाइपलाइनों का रास्ता बदलकर उन्हें पश्चिम की ओर, सऊदी अरब से होते हुए लाल सागर और भूमध्य सागर तक ले जाना शामिल है, जिससे ईरान के चोक प्वाइंट (choke point) से बचा जा सकता है।”
फिलहाल, दुनिया का 20 फीसदी तेल और गैस की सप्लाई होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरती है। इस पर ईरान का कब्जा है और इससे गुजरने के लिए उसकी अनुमति जरूरी है।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भी होर्मुज स्ट्रेट को खुलवाने की कोशिश छोड़ने की बात कही है। उनका कहना है कि अमेरिका को होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले तेल-गैस की जरूरत नहीं है क्योंकि अमेरिका के पास तेल गैस का विशाल भंडार है। इसलिए जिन देशों को मिडिल ईस्ट देशों से गैस तेल मँगवाना है और होर्मुज स्ट्रेट पर जो निर्भर हैं, वे देश इसे खुलवाएँ, अमेरिका उनकी मदद कर सकता है। इसको देखते हुए इजरायल के पीएम के सुझाव की ओर गंभीरता से विचार किया जा सकता है। इससे ईरान और होर्मुज पर कई देशों की निर्भरता खत्म होगी और ईरानी दादागिरी से मुक्ति भी मिलेगी।
हालाँकि होर्मुज स्ट्रेट सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और ओमान का भी क्षेत्रीय जल क्षेत्र है, लेकिन होर्मुज के दूसरी तरफ ईरान की मौजूदगी ने इसे संवेदनशील बना दिया है। ईरान होर्मुज से गुजरने वाले वैसे जहाजों पर हमला कर रहा है, जो उसकी अनुमति से नहीं निकले हैं। भारत, चीन, रूस, पाकिस्तान जैसे देशों के तेल और गैस से भरे टैंकर यहाँ से सुरक्षित बाहर निकल रहे हैं क्योंकि ईरान इन देशों को ‘मित्र राष्ट्र’ मानता है।
मौजूदा युद्ध के दौरान ईरान की रणनीति होर्मुज पर नियंत्रण के साथ-साथ इजरायल और दूसरे खाड़ी देशों के अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमला रहा है। पीएम नेतन्याहू का मानना है कि युद्ध खत्म होने के बाद ये रास्ता पूरी तरह से खुल सकता है लेकिन इससे स्थाई समाधान नहीं निकल सकता। इसलिए एक ऐसे समझौते की जरूरत है जिससे होर्मुज का महत्व ही खत्म हो जाए और ईरान दुनिया को ब्लैकमेल न कर सके। जो इस जलडमरूमध्य के रणनीतिक महत्व को ही खत्म कर दे, वह दीर्घकालिक रूप से सबसे बेहतर रास्ता हो सकता है।
क्या है नए रूट की चुनौतियाँ
नए रूट के लिए सबसे जरूरी है सऊदी अरब की सहमति, क्योंकि ये रूट मध्यपूर्व देशों से तेल लेकर सऊदी अरब से गुजरने वाली पाइपलाइन के माध्यम से लाल सागर तक पहुँचेगी। इसके लिए सऊदी अरब एक छोड़ से दूसरे छोड़ तक पाइपलाइन बिछाना होगा। इस लंबे रूट को बनाने में अरबों डॉलर का खर्च आएगा। साथ ही रूट की सुरक्षा भी बड़ी जिम्मेदारी होगी। इसका खर्च कौन उठाएगा, यह बड़ी चुनौती है।
इसके अलावा इजरायल और अरब देशों के बीच तनातनी वाले रिश्ते रहे हैं। ऐसे में इजरायल और सऊदी अरब दोनों मिलकर इस पर काम करेंगे यह भी एक बड़ा सवाल है। ये रूट जमीन से होकर गुजरेगा, इसलिए इस पर आतंकी हमले और युद्ध के वक्त विध्वंस का भी खतरा रहेगा। कुल मिलाकर सुरक्षा बहुत बड़ा सवाल है।
योजना लागू होने पर बदल जाएगी तस्वीर
अगर नेतन्याहू की योजना जमीन पर उतरती है, तो दुनिया का ऊर्जा मैप बदल जाएगा। समुद्री रास्तों के बजाए पाइपलाइन नेटवर्क काफी अहम हो जाएगी। तेल की कीमतें स्थिर रहेंगे। इनमें उतार-चढ़ाव में कमी आएगी। सबसे अहम बात है कि मिडिल ईस्ट में पावर बैलेंस बदल जाएगा। ईरान का प्रभाव कम होगा, वहीं सऊदी अरब का महत्व काफी बढ़ जाएगा।
दरअसल होर्मुज संकट सिर्फ जंग और तेल संकट से जुड़ा नहीं है, बल्कि यह संकरा रास्ता कभी भी बंद किया जा सकता है और दुनियाभर में अफरा-तफरी मचाया जा सकता है। ईरान और होर्मुज स्ट्रेट का सामरिक महत्व इसलिए है। इजरायल की मंशा राजनीतिक और रणनीतिक तौर पर ईरान को किनारे करने की है और इसके लिए एनर्जी शिफ्ट करना जरूरी है।
लाल सागर और स्वेज नहर से होकर आता रहा है भारत तक तेल और गैस
भारत की बात की जाए तो लाल सागर और स्वेज नहर से होकर रूस से आने वाला कच्चा तेल भारत के पश्चिमी तटों तक आज भी पहुँचता है। रूसी कच्चा तेल काला सागर या बाल्टिक सागर पर लोड होता है। इसके बाद तुर्की जलडमरूमध्य पार करते हुए भूमध्यसागर में जाता है।
यहाँ से स्वेज नहर और लाल सागर के पतले रास्तों से होता हुआ अरब सागर में जाता है और फिर भारतीय पोर्ट तक पहुँचता है। यानी भारत के लिहाज से सोचा जाए तो सऊदी अरब में पाइपलाइन बिछाना ही सबसे अहम है, ताकि कच्चा तेल लाल सागर तक पहुँच सके और फिर अपने नियमित रास्तों से होता हुआ भारत के बंदरगाहों तक आ जाए।
इस रूट में लाल सागर के दक्षिणी छोर पर मौजूद संकरा रास्ता बाब अल मंडेब स्ट्रेट का भी काफी महत्व है, जिससे होकर स्वेज नहर से आने वाले जहाज अरब सागर तक जाते हैं। 1869 में स्वेज नहर के खुलने के बाद इस स्ट्रेट का सामरिक महत्व काफी बढ़ गया क्योंकि यूरोप और एशिया के बीच के हजारों किलोमीटर की दूरी को इसने खत्म कर दिया। हालाँकि इसे आँसुओं का द्वार भी कहा जाता है, क्योंकि इससे गुजरना काफी चुनौतीपूर्ण होता है। इसके अलावा यमन के हूतियों ने आक्रमण का खतरा भी यहाँ रहता है।
बहरहाल, संकट में भी अवसर छिपे हैं। नेतन्याहू ने जो फॉर्मूला दिया, वह अगर जमीन पर उतरा तो मध्यपूर्व की राजनीति और दुनिया की ऊर्जा सप्लाई हमेशा के लिए बदल जाएगी। फिलहाल दुनिया इंतजार कर रही है- युद्ध कब खत्म होगा और पाइपलाइन की बात कब अमल में आएगी।


