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बच्चों के लिए बंद करो सोशल मीडिया… दुनियाभर से उठ रही माँग, पर टेलीग्राम फाउंडर बैन को बता रहे खतरनाक: जानिए- VPN से परिवार तक, उनके तर्क में कितना दम

वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क यानी वीपीएन एक ऐसा असुरक्षित प्राइवेट इंटरनेट है, जो बगैर डेटा प्रोवाइडर के सीधे वीपीएन सर्वर से जुड़ जाता है। इसके जरिए बच्चे सरकारी प्रतिबंधों और पेरेंटल कंट्रोल को दरकिनार करते हुए डार्क वेब और असीमित, असुरक्षित कंटेंट (जैसे पॉर्नोग्राफी और बेहद हिंसा) तक पहुँच जाते हैं।

दुनिया भर में बच्चों और किशोरों का बचपन मोबाइल, टैब और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों तक सीमित होता जा रहा है। उन्हें पढ़ने-लिखने से लेकर खेलने-कूदने तक पर सोशल मीडिया का असर है। इसको देखते हुए कई देशों ने बच्चों को सोशल मीडिया से दूर करने के लिए उम्र सीमा तय की है।

ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, फ्रांस समेत कई देश मानते हैं कि सोशल मीडिया बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, लत, साइबर बुलिंग और यौन शोषण के खतरे को बढ़ाता है, लेकिन सोशल मीडिया पर प्रतिबंध के बाद ‘खतरा’ और भी बड़ा दिख रहा है। आलोचकों का कहना है कि बच्चे और किशोर VPN की ओर चले जाते हैं।

VPN की ओर जाना ज्यादा खतरनाक क्यों है?

वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क यानी वीपीएन एक ऐसा असुरक्षित प्राइवेट इंटरनेट है, जो बगैर डेटा प्रोवाइडर के सीधे वीपीएन सर्वर से जुड़ जाता है। इसके जरिए बच्चे सरकारी प्रतिबंधों और पेरेंटल कंट्रोल को दरकिनार करते हुए डार्क वेब और असीमित, असुरक्षित कंटेंट, जैसे- पॉर्नोग्राफी और बेहद हिंसा तक पहुँच जाते हैं। इसके माध्यम से बच्चे उन देशों के सर्वर से जुड़ जाते हैं, जहाँ ऑनलाइन प्रतिबंध नहीं है। इससे आसानी से उनकी पहुँच पोनोग्राफी और हिंसक कंटेंट तक हो जाती है।

वीपीएन लोकेशन और आईपी (IP) एड्रेस को छिपा देता है। इससे पता नहीं चलता है कि बच्चा विश्व के किस कोने में मौजूद है। सबसे अहम बात है कि इसकी वजह से माता-पिता या स्कूल का नेटवर्क यह नहीं ट्रैक कर पाता कि बच्चा क्या देख रहा है। वीपीएन के इस्तेमाल के दौरान अक्सर बच्चे बिना सुरक्षा के अवैध वेबसाइटों और स्कैमर्स के संपर्क में आ जाते हैं। यह उसकी सुरक्षा के लिए भी खतरनाक है।

जब लोकप्रिय सोशल मीडिया जैसे-एक्स, इंस्टाग्राम, टिकटॉक, फेसबुक, मेटा आदि से बच्चे जुड़ते हैं, तो उनके आयु की पुष्टि की जाती है। लेकिन वीपीएन में ऐसा कुछ नहीं है। बच्चे के न तो उम्र का पता है, न देश का पता है, न भाषा-संस्कृति की पहचान की जा सकती है, लेकिन बच्चा वीपीएन के माध्यम से इंटरनेट पर सारे कंटेंट देख लेता है।

समस्या यह है कि VPN केवल सोशल मीडिया ही उपलब्ध नहीं कराता, बल्कि पूरे इंटरनेट की सारी सीमाओं को खत्म कर देता है। इससे बच्चे उन वेबसाइटों, और प्लेटफॉर्मों तक पहुँच सकते हैं, जहाँ किसी तरह का नियंत्रण या मॉडरेशन नहीं होता।

साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि VPN फ्री होते हैं और ज्यादातर यूजर्स का डेटा जमा करते हैं। ब्राउजिंग एक्टिविटी रिकॉर्ड करते हैं और ये आपत्तिजनक एड नेटवर्क से भी जुड़े होते हैं। यदि कोई 13-15 साल का बच्चा बिना समझे ऐसे ऐप डाउनलोड करता है तो उसकी गोपनीयता और सुरक्षा दोनों प्रभावित हो सकती हैं।

माता-पिता के ‘कंट्रोल से बाहर’ हो रहे बच्चे

कई VPN बच्चों के स्कूल नेटवर्क फिल्टर, पैरेंटल कंट्रोल और कंटेंट फिल्टरिंग को दरकिनार कर देते हैं। UK के एक अध्ययन में VPN इस्तेमाल करने वाले कुछ बच्चों ने माना कि वे इसका उपयोग स्कूल प्रतिबंधों या पैरेंटल कंट्रोल्स से बाहर जाने के लिए करते हैं। इससे बच्चों में ‘छिपकर इंटरनेट इस्तेमाल’ करने की प्रवृति विकसित होने लगती है।

ऑस्ट्रेलिया पर हुए एक हालिया शोध में पाया गया कि किशोर प्रतिबंधों को चुनौती के रूप में देखने लगे और वे यह सीखने लगे कि सिस्टम को कैसे चकमा दिया जाए। शोधकर्ताओं ने इसे तकनीकी नियंत्रणों की एक बड़ी कमजोरी बताया।

Telegram फाउंडर पावेल दुरोव ने क्या कहा

ब्रिटेन में 16 साल से कम उम्र के बच्चों पर सोशल मीडिया बैन किए जाने के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म टेलीग्राम के फाउंडर Pavel Durov की प्रतिक्रिया सामने आयी। उन्होंने कहा कि ‘कोई कानून अच्छी परवरिश की जगह नहीं ले सकता।’

उन्होंने कहा कि यदि बच्चों को सोशल मीडिया से पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाएगा तो वे VPN का उपयोग शुरू कर देंगे और इससे वे अवैध या अधिक खतरनाक कंटेंट देखेंगे। उनके मुताबिक, माता-पिता के पास पहले से स्क्रीन-टाइम लिमिट, पैरेंटल कंट्रोल और डिवाइस नियंत्रण जैसे तरीके मौजूद हैं। इसका इस्तेमाल कर बच्चों को नियंत्रित किया जा सकता है। दुरोव ने रूस का उदाहरण देते हुए बताया कि जब रूसी सरकार ने टेलीग्राम को बैन किया था, तो 95% युवा वीपीएन का उपयोग करके प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते रहे।

भारत में Telegram पर NEET को लेकर लगाए गए अस्थायी प्रतिबंध के बाद भी Durov ने कहा कि किसी प्लेटफॉर्म को ब्लॉक करने से समस्या की जड़ खत्म नहीं होती, बल्कि यूजर्स दूसरे प्लेटफॉर्मों पर चले जाते हैं। उन्होंने कहा कि यह 150 करोड़ लोगों को ‘सजा’ देने जैसा है।

VPN का चलन दुनिया भर में बढ़ा

UK Online Safety Act लागू होने के बाद एक VPN को ब्रिटेन में डाउनलोड करने वालों की संख्या 1800% तक बढ़ गई। देश में VPN को लेकर सर्च और चर्चा में जबरदस्त उछाल आया है। गुगल पर वीपीएन को लेकर सर्च करीब 89% बढ़ी। सरकार भी मान रही है कि वीपीएन नियमों से बच निकलने का आसान रास्ता है। हालाँकि बच्चों में वीपीएन को जानने की दिलचस्पी बढ़ी है इसका कोई प्रमाण सामने नहीं आया है।

UK की संस्था Internet Matters के अनुसार, केवल 8% बच्चों ने पिछले 12 महीनों में वीपीएन के उपयोग की बात कही और नियमों उम्र को लेकर पाबंदी के बाद बच्चों के VPN उपयोग में कोई बड़ी उछाल नहीं दिखी। इसका मतलब है कि वीपीएन डाउनलोड करने वालों की संख्या जरूर बढ़ी है, लेकिन हर वृद्धि का मतलब यह नहीं कि सभी यूजर्स बच्चे ही हैं।

पूरी दुनिया की बात करें, तो हाल के वर्षों में वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क मार्केट का साइज तेज़ी से बढ़ा है। 2025 में $71.25 बिलियन यानी लगभग ₹6.76 लाख करोड़ था, जो 2026 में बढ़कर $86.02 बिलियन यानी ₹7.18 लाख करोड़ से ज्यादा हो जाएगा। इसका सालाना ग्रोथ रेट 20.7% है। 2030 तक यह बढ़कर $182.00 बिलियन यानी ₹17.29 लाख करोड़ रुपए हो जाएगा।

ऐसे में सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध और खुली आजादी के बीच का रास्ता अख्तियार करना जरूरी है। बच्चों की उम्र सीमा तय करना अच्छा कदम है। लेकिन ऐसे प्लेटफॉर्मों को भी उम्र के वेरिफिकेशन को सख्त करना चाहिए। जिन देशों में अभी उम्र संबंधी नियम नहीं बने हैं, उन्हें प्लेटफॉर्म को मजबूर करना चाहिए कि अनजान मैसेज पर प्रतिबंध लगे, खासकर तब जब यूजर बच्चा हो।

लोकल शेयरिंग की लिमिट होनी चाहिए। स्क्रॉलिंग की लिमिट होनी चाहिए। सबसे अहम है ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर एल्गोरिथम अनुशंसा पर नियंत्रण अर्थात यूजर तय करे कि उसे क्या देखना है, न की प्लेटफॉर्म का एग्लोरिथम। इस दिशा में कई प्लेटफॉर्म आगे बढ़े हैं, लेकिन बच्चों को लेकर इसका सख्ती से पालन होना जरूरी है।

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रुपम
रुपम
रुपम के पास 20 साल से ज्यादा का पत्रकारिता का अनुभव है। जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा। जी न्यूज से टेलीविज़न न्यूज चैनल में कामकाज की शुरुआत। सहारा न्यूज नेटवर्क के प्रादेशिक और नेशनल चैनल में टेलीविज़न की बारीकियाँ सीखीं। सहारा प्रोग्रामिंग टीम का हिस्सा बनकर सोशल मुद्दों पर कई पुरस्कार प्राप्त डॉक्यूमेंट्री का निर्माण किया। एडिटरजी डिजिटल हिन्दी चैनल में न्यूज एडिटर के तौर पर काम किया।

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