मिडिल-ईस्ट में महीनों से जारी विनाशकारी जंग के बाद मेरिका और ईरान के बीच एक ऐतिहासिक शांति समझौता (MOU) हो गया है, जिसने दुनिया को लगभग तीसरे विश्व युद्ध के मुहाने से बचा लिया है। कतर और पाकिस्तान की मध्यस्थता से हुए इस समझौते के तहत आगामी 19 जून 2026 को जेनेवा में औपचारिक हस्ताक्षर किए जाएँगे। शुरुआत में दोनों देशों के बीच 60 दिनों के युद्धविराम (सीजफायर) पर सहमति बनी है, जिससे फिलहाल सैन्य कार्रवाइयाँ रुक गई हैं।
इस स्पेशल रिपोर्ट के माध्यम से हम ये समझते हैं कि दोनों पक्षों के बीच किन मुख्य शर्तों पर सहमति बनी है और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बड़े-बड़े दावों के विपरीत क्या वाकई यह समझौता सिर्फ होर्मुज की खाड़ी को खोलने तक ही सिमट कर रह गया है? आखिर इस भयंकर लड़ाई का असली विजेता कौन है?
शांति समझौते का ऐतिहासिक आगाज और विनाशकारी युद्ध की पृष्ठभूमि
मिडिल-ईस्ट के आधुनिक इतिहास में 28 फरवरी 2026 का दिन एक काले अध्याय के रूप में दर्ज हुआ था, जब संयुक्त राज्य अमेरिका ने इजरायल के साथ मिलकर ईरान के खिलाफ सीधे और पूर्ण सैन्य मोर्चे की घोषणा कर दी थी। दशकों से चला आ रहा छद्म युद्ध (Proxy War) और राजनयिक गतिरोध अचानक एक ऐसे सीधे सैन्य टकराव में बदल गया, जिसने पूरे वैश्विक परिदृश्य को हिलाकर रख दिया। महीनों तक चली इस भीषण और विनाशकारी जंग में दोनों पक्षों को जान-माल का अभूतपूर्व नुकसान उठाना पड़ा।
इस युद्ध की विभीषिका का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्ला अली खामेनेई सहित देश के दर्जनों शीर्ष सैन्य और असैन्य अधिकारी मारे गए। इस अभूतपूर्व नेतृत्व संकट के बीच ईरान की कमान अली खामेनेई के बेटे मोजताबा खामेनेई ने संभाली और युद्ध को जारी रखा। इस संघर्ष में हजारों निर्दोष नागरिकों और सैनिकों की जान गई, लाखों लोग विस्थापित हुए और कई ऐतिहासिक शहर मलबे के ढेर में तब्दील हो गए।
वैश्विक स्तर पर इस युद्ध ने अंतरराष्ट्रीय शेयर बाजारों को धराशायी कर दिया और कच्चे तेल की कीमतों को रिकॉर्ड स्तर पर पहुँचाकर वैश्विक अर्थव्यवस्था को मंदी के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया।
इस विनाशकारी गतिरोध को तोड़ने और दुनिया को एक संभावित तीसरे विश्व युद्ध की आग से बचाने के लिए परदे के पीछे से कूटनीतिक प्रयास शुरू हुए। कतर और पाकिस्तान जैसे देशों ने इस बेहद जटिल और संवेदनशील परिस्थिति में मध्यस्थ की भूमिका निभाई।
महीनों तक चली लंबी, थकाऊ और अत्यंत कठिन वार्ताओं के बाद आखिरकार दोनों देशों के रणनीतिकार एक शुरुआती शांति समझौते यानी समझौता ज्ञापन (MOU) के मसौदे पर सहमत होने में सफल रहे। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इस सौदे के पूरा होने की आधिकारिक घोषणा करते हुए इसे अपनी एक बड़ी कूटनीतिक कामयाबी के रूप में पेश किया।
“The Deal with Islamic Republic of Iran is now complete. Congratulations to all!” President Donald J. Trump 🇺🇸 pic.twitter.com/RdSwyEdEtO
— The White House (@WhiteHouse) June 14, 2026
दूसरी ओर ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने भी एक आधिकारिक बयान जारी कर इस बात की पुष्टि की कि दोनों देशों ने महीनों की कठिन वार्ता के बाद एक साझा रूपरेखा तैयार कर ली है। इस समझौते के लागू होते ही सभी मोर्चों पर तात्कालिक रूप से सैन्य कार्रवाइयाँ रोक दी गईं, जिससे इस क्षेत्र में फिलहाल एक बड़ी मानवीय और आर्थिक तबाही पर विराम लग गया है।
इस ऐतिहासिक और बहुप्रतीक्षित शांति समझौते पर औपचारिक रूप से हस्ताक्षर करने की तिथि और स्थान भी सुनिश्चित कर लिया गया है। आने वाले शुक्रवार (19 जून 2026) को स्विटजरलैंड के कूटनीतिक केंद्र जेनेवा में एक भव्य और औपचारिक अंतरराष्ट्रीय समारोह का आयोजन किया जाएगा।
मध्यस्थ देश पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और ईरानी विदेश मंत्रालय ने इस बात की पुष्टि की है कि इस समारोह में दोनों देशों के उच्चायुक्त और अंतरराष्ट्रीय गवाहों की मौजूदगी में इस मसौदे पर आधिकारिक मुहर लगाई जाएगी। इस समझौते के तहत शुरुआती चरण में 60 दिनों के युद्धविराम (Cease-fire) की घोषणा की गई है।
यह 60 दिन का समय दोनों देशों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि इसी दौरान दोनों पक्षों के राजनयिक और रणनीतिकार युद्ध को पूरी तरह से समाप्त करने, स्थायी शांति स्थापित करने और भविष्य के संबंधों की दिशा तय करने के लिए जेनेवा और अन्य कूटनीतिक मंचों पर गहन और विस्तृत वार्ता के अगले दौर की शुरुआत करेंगे।
डोनाल्ड ट्रंप के दावों और हकीकत में दिखा अंतर
इस समझौते के सामने आने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उन पुराने बयानों की याद ताजा हो गई है, जो उन्होंने युद्ध की शुरुआत और उसके दौरान दिए थे। राष्ट्रपति ट्रंप और उनके कट्टरपंथी रणनीतिकारों का रुख ईरान को लेकर हमेशा से बेहद आक्रामक और सख्त रहा था। युद्ध के शुरुआती हफ्तों में ट्रंप ने कई सार्वजनिक रैलियों, प्रेस वार्ताओं और सोशल मीडिया पोस्ट्स के जरिए यह दावा किया था कि वे ईरान को पूरी तरह से नेस्तनाबूद कर देंगे।
ट्रंप ने अमेरिकी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन करते हुए चेतावनी दी थी कि यदि ईरान ने आत्मसमर्पण नहीं किया, तो उसके सभी महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों, आर्थिक केंद्रों और सांस्कृतिक धरोहरों को निशाना बनाया जाएगा। ट्रंप का स्पष्ट विजन था कि इस युद्ध के जरिए ईरान के इस्लामी शासन को उखाड़ फेंका जाए और वहाँ एक ऐसी व्यवस्था लाई जाए जो वाशिंगटन के हितों के अनुकूल हो, जिसे कूटनीतिक भाषा में ‘सत्ता परिवर्तन’ (Regime Change) कहा जाता है।
ट्रंप के दावों का एक बड़ा हिस्सा ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसकी संप्रभुता से जुड़ा हुआ था। उन्होंने बार-बार यह रेखांकित किया था कि ईरान के पास परमाणु तकनीक विकसित करने या यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) करने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए। ट्रंप प्रशासन का मानना था कि साल 2015 में पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल के दौरान हुआ परमाणु समझौता (JCPOA), जिससे ट्रंप ने 2018 में अमेरिका को अलग कर लिया था, एक ‘बेहद खराब और कमजोर सौदा’ था।
ट्रंप ने दावा किया था कि वे इस युद्ध के माध्यम से ईरान को एक ऐसे समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर करेंगे, जो ओबामा के समझौते से सौ गुना अधिक सख्त होगा। इस प्रस्तावित कड़े रुख के तहत ईरान को अपने सभी परमाणु रिएक्टरों को हमेशा के लिए बंद करना पड़ता, अपने मिसाइल कार्यक्रम को पूरी तरह समाप्त करना पड़ता और अपने क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय निरीक्षकों को असीमित पहुँच देनी पड़ती।
अमेरिकी प्रशासन ने ईरान को पूरी तरह से आर्थिक रूप से पंगु बनाने के लिए एक वैश्विक नौसैनिक नाकाबंदी लागू की थी, ताकि ईरान की जीवनरेखा माना जाने वाला तेल व्यापार पूरी तरह ठप हो जाए। ट्रंप का मानना था कि इस भीषण सैन्य और आर्थिक दबाव के आगे ईरान के नए नेतृत्व के पास घुटने टेकने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचेगा। उन्होंने बार-बार दोहराया था कि जब तक ईरान उनकी सभी ‘अधिकतम माँगों’ (Maximalist Demands) को पूरी तरह स्वीकार नहीं कर लेता, तब तक अमेरिका अपनी सैन्य कार्रवाई और प्रतिबंधों को वापस नहीं लेगा।
ट्रंप के ये बयान अमेरिकी जनता और उनके सहयोगियों को यह विश्वास दिलाने के लिए थे कि अमेरिका इस युद्ध में एक पूर्ण और निर्णायक जीत हासिल करने जा रहा है, जहाँ शर्तों को सिर्फ और सिर्फ वाशिंगटन ही तय करेगा, लेकिन यहाँ मामला उल्टा दिख रहा है।
होर्मुज की खाड़ी तक सिमटता दिख रहा समझौता
अब जबकि इस समझौते की वास्तविक रूपरेखा सामने आई है, तो यह साफ दिख रहा है कि ट्रंप के बड़े-बड़े दावे और उद्देश्य इस समझौते में कहीं पीछे छूट गए हैं। यह पूरा समझौता मुख्य रूप से ‘होर्मुज की खाड़ी’ (Strait of Hormuz) को दोबारा खोलने और वहाँ से व्यापार बहाल करने तक ही सिमट कर रह गया है।
इस समझौते का सबसे बड़ा और तत्काल हासिल यह है कि ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य को सभी वाणिज्यिक जहाजों के लिए तुरंत खोल देगा और इसके बदले में अमेरिका ईरानी बंदरगाहों पर लगाई गई अपनी नौसैनिक नाकाबंदी (Naval Blockade) को पूरी तरह हटा लेगा।
ट्रंप जिन मुख्य मुद्दों पर अड़े थे जैसे ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करना, उसके समृद्ध यूरेनियम (Enriched Uranium) के भंडार को नष्ट करना और ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना वे सभी बातें इस शुरुआती समझौते से पूरी तरह नदारद हैं।
अमेरिका में ट्रंप के विरोधी और विशेषज्ञ इस बात पर सवाल उठा रहे हैं कि जो होर्मुज की खाड़ी युद्ध शुरू होने से पहले भी खुली हुई थी, उसे ही दोबारा खुलवाने के लिए अमेरिका ने अरबों डॉलर पानी की तरह बहा दिए और कई अमेरिकी सैनिकों की जान जोखिम में डाल दी। जिन बुनियादी विवादों के कारण युद्ध शुरू हुआ था, उन्हें सुलझाने के बजाय अगले 60 दिनों की भविष्य की वार्ताओं पर टाल दिया गया है।
संघर्ष विराम के 14 अहम बिंदु, जिनपर टिका है समझौते का भविष्य
अमेरिका और ईरान के बीच हुए इस ऐतिहासिक संघर्ष विराम और अस्थाई शांति के पीछे 14 बिंदुओं (14 Points) का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विस्तृत मसौदा है। इन 14 बिंदुओं को दोनों देशों के राजनयिकों ने कतर और पाकिस्तान की मध्यस्थता में तैयार किया है, ताकि युद्ध की लपटों को तुरंत शांत किया जा सके और एक दीर्घकालिक स्थायी समझौते के लिए आवश्यक पृष्ठभूमि तैयार की जा सके। यह 14 सूत्रीय एजेंडा वर्तमान में दोनों देशों के बीच सैन्य गतिरोध को पूरी तरह समाप्त करने का एकमात्र कानूनी और कूटनीतिक आधार है।
- सैन्य कार्रवाइयों की तत्काल समाप्ति: अमेरिका और ईरान सभी मोर्चों पर अपनी सभी प्रकार की सैन्य कार्रवाइयों, हवाई हमलों, और नौसैनिक झड़पों को तुरंत प्रभाव से पूरी तरह बंद कर देंगे।
- क्षेत्रीय मोर्चों पर युद्धविराम: इस युद्धविराम के दायरे में लेबनान का मोर्चा भी शामिल होगा, जहाँ इजरायल और ईरान समर्थित हिजबुल्लाह के बीच भीषण जंग जारी है, ताकि क्षेत्रीय तनाव को कम किया जा सके।
होर्मुज की खाड़ी को खोलना: ईरान बिना किसी देरी के होर्मुज जलडमरूमध्य को सभी अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक और तेल टैंकर जहाजों के आवागमन के लिए पूरी तरह सुरक्षित और खुला घोषित करेगा।
नौसैनिक नाकाबंदी हटाना: इसके जवाब में संयुक्त राज्य अमेरिका ईरानी बंदरगाहों और तटीय क्षेत्रों पर लगाई गई अपनी नौसैनिक घेराबंदी (Naval Blockade) को अगले 30 दिनों के भीतर चरणबद्ध तरीके से पूरी तरह हटा लेगा।
परमाणु कार्यक्रम को फ्रीज करना: ईरान इस बात पर सहमत हुआ है कि अगले 60 दिनों की विस्तृत वार्ता के दौरान वह अपने परमाणु कार्यक्रम को मौजूदा स्तर पर ही स्थिर (Freeze) रखेगा, यानी वह यूरेनियम का और अधिक उच्च-स्तरीय संवर्धन नहीं करेगा।
परमाणु हथियार न बनाने की प्रतिबद्धता: ईरान इस मसौदे के तहत अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह लिखित आश्वासन देगा कि वह परमाणु हथियारों के निर्माण या उन्हें हासिल करने का प्रयास नहीं कर रहा है।
नए प्रतिबंधों पर रोक: बातचीत की अवधि के दौरान संयुक्त राज्य अमेरिका ईरान की अर्थव्यवस्था, तेल व्यापार या बैंकिंग क्षेत्र पर कोई भी नया आर्थिक प्रतिबंध लागू नहीं करेगा।
तेल निर्यात में अस्थाई छूट: ईरान को अपने आर्थिक ढाँचे को संभालने के लिए सीमित मात्रा में तेल निर्यात करने और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में वैध तरीके से व्यापार करने की अस्थायी छूट प्रदान की जाएगी।
फंसी हुई संपत्तियों की मुक्ति: विभिन्न अंतरराष्ट्रीय बैंकों और अमेरिकी नियंत्रण में फंसी ईरान की लगभग 25 अरब डॉलर की संपत्तियों को मुक्त करने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
वित्तीय चैनलों की बहाली: इस मुक्त की गई संपत्ति को सीधे बैंक हस्तांतरण, वित्तीय क्रेडिट लाइनों और कतर जैसे क्षेत्रीय मध्यस्थ देशों के बैंकिंग तंत्र के जरिए ईरान तक सुरक्षित पहुंचाया जाएगा।
क्षेत्रीय पुनर्निर्माण योजना: अमेरिका, ईरान और उनके क्षेत्रीय साझेदार मिलकर युद्ध से प्रभावित क्षेत्रों, बंदरगाहों और बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण के लिए एक साझा आर्थिक योजना की रूपरेखा तैयार करेंगे।
60 दिनों की कूटनीतिक समयसीमा: दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हुए हैं कि स्थायी शांति, यूरेनियम के भंडार के निपटारे और प्रतिबंधों को स्थायी रूप से हटाने जैसे जटिल मुद्दों पर अगले 60 दिनों के भीतर गहन बातचीत पूरी की जाएगी।
गारंटी तंत्र की स्थापना: भविष्य में होने वाले किसी भी अंतिम समझौते में एक स्पष्ट अंतरराष्ट्रीय गारंटी तंत्र शामिल किया जाएगा, ताकि कोई भी पक्ष अपनी प्रतिबद्धताओं से एकतरफा पीछे न हट सके।
अंतरराष्ट्रीय निगरानी: इस 60 दिनों के युद्धविराम की शर्तों के पालन की निगरानी के लिए एक संयुक्त कूटनीतिक कार्यबल (Joint Task Force) का गठन किया जाएगा, जिसमें मध्यस्थ देशों के प्रतिनिधि शामिल होंगे।
युद्ध में कूटनीतिक जीत या रणनीतिक विफलता?
अमेरिका-ईरान युद्ध की समाप्ति और समझौते के इस मोड़ पर आने के बाद अब वैश्विक भू-राजनीतिक विश्लेषकों के सामने यह सबसे बड़ा और यक्ष प्रश्न है कि आखिर इस खूनी और खर्चीले संघर्ष से किसे क्या हासिल हुआ? क्या इसे ईरानी कूटनीति और उसकी रणनीतिक जिद की एक बड़ी और ऐतिहासिक जीत माना जाए या फिर इसे अमेरिकी सैन्य और रणनीतिक योजनाकारों की एक बहुत बड़ी और गंभीर विफलता के रूप में देखा जाए? सतह पर देखने पर दोनों ही देशों का शीर्ष नेतृत्व अपने-अपने घरेलू राजनीतिक हितों को साधने के लिए इस समझौते को अपनी-अपनी महान विजय के रूप में प्रचारित कर रहा है।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जहाँ इसे अपनी ‘डीलमकेकर’ छवि की एक और मिसाल बता रहे हैं और अमेरिकी जनता को यह भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि उन्होंने बिना किसी बड़े अमेरिकी नुकसान के क्षेत्र में शांति स्थापित कर दी है और वैश्विक तेल संकट को टाल दिया है, वहीं ईरान का नया नेतृत्व इसे इस रूप में मना रहा है कि उन्होंने दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य महाशक्ति के सामने न तो घुटने टेके, न अपनी संप्रभुता का सौदा किया और न ही अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह सरेंडर किया।
वैसे, अगर इस पूरे घटनाक्रम का एक निष्पक्ष, व्यावहारिक और गहराई से विश्लेषण किया जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कूटनीतिक रूप से जीत कर भी वास्तव में हार गए हैं। अमेरिका के भीतर ही इस बात को लेकर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं कि इस युद्ध के जो घोषित उद्देश्य थे जैसे ईरान में सत्ता परिवर्तन, उसके परमाणु कार्यक्रम का पूर्ण खात्मा और उसकी मिसाइल क्षमता को पंगु बनाना, उनमें से एक भी उद्देश्य प्राप्त नहीं किया जा सका।
अमेरिका ने इस युद्ध में अपने अरबों डॉलर के टैक्सपेयर्स का पैसा पानी की तरह बहा दिया, अपने सैनिकों की बलि चढ़ाई और वैश्विक स्तर पर अपनी साख को दाँव पर लगाया, लेकिन अंत में उसे उसी ईरान के साथ टेबल पर बैठना पड़ा जिसे वे दुनिया के नक्शे से मिटाने की धमकी दे रहे थे। इसके अलावा, युद्ध के कारण ईरान का कट्टरपंथी शासन कमजोर होने के बजाय घरेलू स्तर पर राष्ट्रवाद की लहर के सहारे और अधिक मजबूत और एकजुट होकर उभरा है। अयातुल्ला खामेनेई की मौत के बाद भी वहां की व्यवस्था में कोई बिखराव नहीं आया, जो अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की एक बड़ी नाकामी को दर्शाता है।
दूसरी ओर इस समझौते को ईरानी जिद की एक रणनीतिक जीत के रूप में देखा जा सकता है। ईरान ने अमेरिकी प्रतिबंधों और हवाई हमलों के भीषण दबाव के बावजूद अपने परमाणु संवर्धन के अधिकार को पूरी तरह नहीं छोड़ा और न ही अपनी सैन्य संपदा का आत्मसमर्पण किया। उसने चतुराई से होर्मुज की खाड़ी के अपने भौगोलिक नियंत्रण का इस्तेमाल एक हथियार के रूप में किया और अंततः अमेरिका को अपनी 25 अरब डॉलर की फंसी हुई संपत्ति जारी करने और प्रतिबंधों में ढील देने के वादे पर सहमत होने के लिए मजबूर कर दिया।
विश्लेषकों की मानना है कि यह समझौता वास्तव में वाशिंगटन द्वारा तेहरान के सामने किया गया एक कूटनीतिक आत्मसमर्पण है, क्योंकि युद्ध के बाद भी स्थितियाँ लगभग वैसी ही हैं जैसी युद्ध से पहले थीं, बस फर्क यह है कि इस दौरान हजारों जिंदगियाँ खत्म हो गईं और अरबों डॉलर नष्ट हो गए।
इसलिए यह निष्कर्ष निकालना गलत नहीं होगा कि ट्रंप प्रशासन की यह रणनीति पूरी तरह से विफल रही, जिसने अमेरिका को एक ऐसे अनिर्णायक और महँगे युद्ध में झोंक दिया, जिसका अंत एक ऐसे समझौते से हुआ जो ईरान को उसकी पुरानी स्थिति और ताकत के साथ वापस स्थापित करता है।
भविष्य की राह और क्षेत्रीय अस्थिरता के अनसुलझे सवाल
जेनेवा में 19 जून 2026 को होने वाले आधिकारिक हस्ताक्षर भले ही इस युद्ध पर तात्कालिक रूप से विराम लगा दें, लेकिन यह शांति कितनी टिकाऊ होगी, इस पर अभी भी अनिश्चितता के काले बादल मंडरा रहे हैं।
इस शांति समझौते का सबसे संवेदनशील और कमजोर पहलू यह है कि इसमें इजरायल को सीधे तौर पर शामिल नहीं किया गया है। इजरायल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-ग्विर ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि उनका देश इस अमेरिकी-ईरानी समझौते से किसी भी तरह बाध्य नहीं है और वे हिजबुल्लाह और ईरान के खिलाफ अपनी सैन्य कार्रवाई को तब तक जारी रखेंगे जब तक कि उनका पूर्ण उन्मूलन नहीं हो जाता।
इजरायल का यह कड़ा रुख इस समझौते की सफलता के आगे एक बहुत बड़ा रोड़ा है, क्योंकि यदि इजरायल लेबनान या सीरिया में अपने हमले जारी रखता है, तो ईरान समर्थित समूह भी जवाबी कार्रवाई करेंगे, जिससे यह 60 दिनों का नाजुक युद्धविराम किसी भी समय टूट सकता है।
इसके अलावा अगले 60 दिनों में होने वाली वार्ताओं का एजेंडा इतना जटिल है कि उस पर दोनों देशों के बीच किसी आम सहमति पर पहुँचना लगभग असंभव प्रतीत होता है। ईरान अपने समृद्ध यूरेनियम के भंडार को पूरी तरह नष्ट करने के पक्ष में नहीं है, जबकि अमेरिका और इजरायल इसके बिना किसी भी स्थाई समझौते को स्वीकार नहीं करेंगे।
राष्ट्रपति ट्रंप ने पहले ही संकेत दे दिए हैं कि अगर इन 60 दिनों के भीतर उनके मनमुताबिक परमाणु समझौता नहीं होता है, तो वे अगस्त 2026 में ईरान पर दोबारा और इससे भी अधिक भीषण सैन्य हमले शुरू कर सकते हैं।
ट्रंप का यह बयान दर्शाता है कि यह समझौता स्थायी शांति का दस्तावेज नहीं, बल्कि नवंबर में होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनावों से पहले घरेलू मोर्चे पर अपनी गिरती लोकप्रियता को संभालने और अर्थव्यवस्था को तात्कालिक राहत देने की एक रणनीतिक चाल मात्र हो सकता है। ऐसे में पश्चिम एशिया की वास्तविक शांति अभी भी कूटनीतिक दाँव-पेंचों, अधूरी शर्तों और क्षेत्रीय शक्तियों के आपसी अविश्वास के चक्रव्यूह में फंसी हुई दिखाई देती है।


