मिडिल ईस्ट में अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्ते के सीजफायर का भारत ने खुले दिल से स्वागत किया है। भारत सरकार ने इसे वैश्विक स्थिरता और ऊर्जा सुरक्षा के लिए जरूरी बताया, लेकिन इस सकारात्मक खबर के बीच अंग्रेजी अखबार ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ (TOI) ने एक ऐसा नैरेटिव सेट करने की कोशिश की, जिससे भारत की कूटनीति से ज्यादा पाकिस्तान की ‘महारत’ की बू आ रही है।
भारत ने क्या कहा?
भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने बुधवार (8 अप्रैल 2026) को बेहद संतुलित बयान जारी किया। भारत ने कहा कि हम इस युद्धविराम (Ceasefire) का स्वागत करते हैं और उम्मीद करते हैं कि इससे पश्चिम में स्थायी शांति का रास्ता साफ होगा। भारत ने शुरू से ही ‘डिएस्केलेशन, डायलॉग और डिप्लोमेसी’ (तनाव कम करना, संवाद और कूटनीति) पर जोर दिया है।
भारत की सबसे बड़ी चिंता वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा को लेकर थी। मंत्रालय ने स्पष्ट कहा कि युद्ध ने लोगों को बहुत कष्ट दिए हैं, और वैश्विक व्यापार को बाधित किया है, इसलिए व्यापारिक जहाजों की आवाजाही बिना किसी रोक-टोक के होनी चाहिए।
‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की रिपोर्टिंग: भारत के नाम पर पाकिस्तान की ब्रांडिंग
हैरानी की बात यह है कि जहाँ भारत ने अपने बयान में कहीं भी पाकिस्तान का जिक्र तक नहीं किया, वहीं ‘टाइम्स ऑफ इंडिया‘ ने अपनी रिपोर्ट की हेडलाइन में ही लिख दिया, “भारत ने पाकिस्तान की मध्यस्थता वाले युद्धविराम का स्वागत किया।” TOI ने अपनी रिपोर्ट में भारत के स्वागत को सीधे तौर पर पाकिस्तान की ‘सफलता’ से जोड़ दिया।
TOI की रिपोर्ट में यह दिखाने की कोशिश की गई कि पाकिस्तान एक बहुत बड़ा ‘इंटरमीडियरी’ (बिचौलिया) बनकर उभरा है। इतना ही नहीं, TOI ने यह भी दावा कर दिया कि MEA प्रवक्ता ने उम्मीद जताई है कि पाकिस्तान की इस ‘कोशिश’ से यूक्रेन युद्ध में भी शांति का रास्ता निकलेगा। यह एक तरह से भारत के बयान के कंधे पर रखकर पाकिस्तान की कूटनीतिक जीत का ढोल पीटने जैसा है।
क्या छिपाने की कोशिश की गई?
TOI की रिपोर्ट में पाकिस्तान के ‘ब्रोकर’ रोल को तो बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया। लेकिन इस बात को दबा दिया गया कि भारत का रुख हमेशा से ‘थर्ड पार्टी मेडिएशन’ (तीसरे पक्ष की मध्यस्थता) के खिलाफ रहा है। भारत का स्टैंड साफ है कि पाकिस्तान आतंकवाद का गढ़ है और जब तक वह सरहद पार आतंकवाद नहीं रोकता, भारत उससे कोई बात नहीं करेगा। लेकिन TOI ने इसे ऐसे पेश किया जैसे भारत को इस बात का डर है कि पाकिस्तान को इस शांति प्रक्रिया से ‘अंतरराष्ट्रीय वैधता’ मिल जाएगी।
होर्मुज मार्ग और भारत की प्राथमिकता
भारत की असली प्राथमिकता होर्मुज रास्ते से अपने LPG टैंकरों को सुरक्षित निकालना और खाड़ी देशों में रहने वाले 1 करोड़ भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। भारत ने सीजफायर का स्वागत इसी व्यावहारिक आधार पर किया है, ना कि पाकिस्तान की मेजबानी की खुशी में। लेकिन TOI की रिपोर्ट में ऐसा महसूस कराया गया कि भारत पाकिस्तान की इस नई ‘भूमिका’ से असहज है।
पत्रकारिता या पड़ोसी की वकालत?
TOI की इस पूरी रिपोर्ट को पढ़कर ऐसा लगता है कि जैसे खबर का फोकस भारत का बयान नहीं, बल्कि पाकिस्तान की इमेज चमकाना है। भारत ने ‘शांति’ का स्वागत किया था, पाकिस्तान की ‘मध्यस्थता’ का नहीं। विदेश मंत्रालय के बयान में कहीं भी पाकिस्तान के प्रति कृतज्ञता नहीं थी, लेकिन ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने अपनी रिपोर्ट में शब्दों की बाजीगरी कर इसे ‘पाकिस्तान ब्रोकर्ड’ (पाकिस्तान द्वारा कराया गया) करार दे दिया।
यह जानते हुए भी कि पाकिस्तान और भारत के संबंध तनावपूर्ण हैं और भारत द्विपक्षीय मसलों में किसी तीसरे की दखल पसंद नहीं करता, TOI ने पाकिस्तान को एक ‘ग्लोबल पीसमेकर’ के रूप में पेश करने की कोशिश की। सरल शब्दों में कहें तो, भारत ने जो कहा वो ‘डिप्लोमेसी’ थी। लेकिन उसे जिस तरह रिपोर्ट किया गया वो ‘पाकिस्तान प्रेम’ की चाशनी में डूबा हुआ नैरेटिव था। भारत की चिंता अपनी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर थी, जिसे TOI ने पाकिस्तान की तथाकथित इंटरनेशनल सफलता के डर में बदल दिया।


